नशा नाश का मार्ग

नशा नाश का मार्ग भाग

सनातन धर्म में मदिरा का सन्दर्भ अनेक सन्दर्भो में आता है सनातन सत्य और प्राणी ब्रह्माण्ड ब्रह्म की सम्पूर्णता की संस्कृति संस्कार का धारण है अतः प्राणी मात्र के कल्याणार्थ उसकी प्रबृति परिस्थिति के अनुसार जीवन मूल्य को चुनने का विकल्प प्राणी मात्र पर छोड़ दिया गया है।

सनातन में आराधना की बाम पद्धति और शान्ति पद्धति दोनों को यथोचित स्थान दिया गया है ।

बाम मार्ग की उपासना में इन्द्रिय सुख संतुष्टि को नियत्रण से मुक्त रखा गया है इस मार्ग की उपासना पद्धति में मदिरा मांस आदि का वर्जन नही है मुख्यतः यह आसुरी आराधना की पद्धति है जो स्व की संतुष्टि के लिये ही ब्रह्म को ब्रह्ममाण्ड में स्थापित करने का मार्ग है ।

अंततः इस मार्ग की परिणीति विनास ही होता है यह आराधना पद्धति विनासक एवं राक्षसी होती है।
वर्तमान की पीढ़ी ख़ास कर् युवा वर्ग धर्म की आड़ में मदिरा शाराब के लिये तर्क देता है उसे वास्तविकता का ज्ञान नही होता
शराब वर्तमान काल में विशेषकर भारतीय समाज में ह्रास विनास का कारण बनती जा रही है।

शराब शौख नशा या नाश का सुगम मार्ग

शराब मदिरा दारु वाइन परिस्थिति की प्रेरणा की उपज होती है जो कालान्तर में नशा का भयंकर रूप धारण कर मनुष्य को उसके विनास तक पहुचाती है।

क़ोई भी मनुष्य जन्म लेते ही किसी भी नशे का आदि नही होता जीवन में कदाचित ऐसी परिस्थितिया पैदा हो जाती है जिससे वहः नशे के मकड़जाल में कैदी बनकर रह जाता है।

नशा या आदत दो प्रत्यक्ष फहलु हैँ यह प्रबृति प्राणी को ब्रह्माण्ड की आत्मा की परम् यात्रा का श्रेष्ठ मार्ग भी हैं और प्राणी के किसी शरीर प्राण को रसातल में भी पहुचाने में सक्षम हैं ।

निर्भर इस बात पर करता हैं नशे के रूप में आदत प्रबृत्ति किस प्रकार की हैँ यदि नशा आदत सत्यार्थ सार्थक है तो प्राणी का जीवन सार्थक दिशा दृष्टि दिशा का आविष्कार कर् सृष्टि में मूल्य महत्व के प्रकाश की प्रेरक प्रेरणा का मार्ग निर्धारित कर अजेय अमर हो आत्मा से परमात्मा की यात्रा पूर्ण करता है ।

यदि नशा आदत प्रबृत्ति स्व की संतुष्टि के लिये है तो निश्चय ही घातक आत्मघाती और ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार जिस प्रकार प्रतिदिन घटते जीवन में जन्मोत्सव के उल्लास में जीता जाता है।नशा जूनून आदत के दो विशेष कारक है एक तो स्व संतुष्टि के लिये इन्द्रिय शुख शांति के लिये नशा या जूनून आदत का उतपन्न होना दूसरा प्रेरणा परिस्थिति के कारण प्राणी में कोई नशा जूनून आदत हद तक प्रबृति में समाहित हो जाय ।

पहला कारण हानिकारक और विनासक होता है क्योकि इन्द्रिय संतुष्टि में सिर्फ स्व की संतुष्टि ही मूल होती है प्राणी मान लेता है की जीवन में स्व की संतुष्टि ही ब्रह्म ब्रह्माण्ड का सत्य है और निरंकुश हो इन्द्रिय की संतुष्टि मांग स्वाद के नशे जूनून में अँधा होजाता है और उसे स्वयं की संतुष्टि के लिये कोई मार्ग चुन लेता है ।

उसे अपना ही मार्ग सर्वोत्तम लगता है वर्तमान परिवेश में सम्पूर्ण विश्व इसी मार्ग का सिद्धान्त का अनुसरण करता नित नई चुनौतियों आफत को आमंत्रित करता जाता है और धर्म संस्कार संस्कृतीयो का छरण लोपः हो जाता है इसी सिद्धांत का अनुसरण विश्व का युवा वर्ग अंगीकार वर्तमान में करता जा रहा है जिसके कारण शराब हसिस हिरोईन आदि आदि ना जाने कितने आत्मघाती प्रबृतियो के नशे के आगोश में सिमटता जा रहा है।

प्रबृति के विकास का दुसारा कारक कारण परिस्थिति प्रेरणा है जो सदैव सार्थक दृष्टि दिशा देता है और प्राणी में इन्द्रिय सुख से इतर निस्वार्थ आत्म संयम इन्द्रिय सिद्धांत पर आधारित आत्मा की परम् यात्रा परमात्मा और आत्मा की वास्तविकता के आविष्कार का मार्ग देता है जो त्याग की जीवन शैली है जो प्राणी को सामान्यतः स्वीकार नही होता यदि स्वीकार हो गया तब प्राणी सिद्धार्थ की तरह आत्मा से परम् आत्मा की जीवन यात्रा का बुद्ध साक्षात् युग का मार्ग दर्शक होता हैं।

प्राणी के इन्द्रिय संतुष्टि की प्रब्रिृत्ति में वर्तमान में मदिरा शाराब दारु वाइन का समाज विश्व जीवन संस्कृति संस्कार पर प्रभाव जो शौख से प्रारम्भ होकर नशा प्रबृति बन प्राणी के प्राण का हिस्सा बन कर धीरे धीरे उसे स्व की अग्नि में जलाती जाती अंत में भस्म कर् अतीत के अन्धकार में धकेल देती है।

सुर्ती,गांजा, भांग, पान, धूम्रपान, मद्य पान जिंदगी का छद्म छलावा नशा!!

गोरी,छोरी, हुस्न आशिकी इंसान के डोलते ईमान का नशा!!
गंजेड़ी, भंगेड़ी, नशेड़ी शराबी, कबाबी, जुआरी, महान के तमाम नाम नशा!!

बीमार कि दावा नशेमन नीशील जहरीली ड्रग एडिक्शन नए जहां के नौजवान का नशा!!

मजदूर के पसीने से टप टप टपकता दारु परिवार कि भय, भूख अर्धढ़के वदन बेहाल आंखो के मासूम आँसू मजबूर, तकदीर, अरमान के बाप का नशा !!

तरुण छोड़ता सिगरेट कि लंबी कश का धुंआ, नौजवान चरस, हीरोइन, हसिस कि चिलम चिमनी को थामे दवा का मेवा ड्रग्स एक्शन का सन हीरो माँ बाप के अरमां का कातिल समाज के विगड़ते हालात का नशा!!

आँख सलामत फिर भी अंधे, सूरज का उजाला फिर भी अँधेरा अंधी गलियों कि दौड़ नज़र आज के नौजवान का नशा!!

नशा नसीहत कि गली से गुजर जाता हद से गटर वॉटर गंगा जल, जमीं, जन्नत विगड़े छैल छबीले के ग्यान, विग्यान के भविष्य वर्तमान का नशा!!

जात पात नहीं धर्म अधर्म रिश्त नाता मित्र शत्रु नहीं दीन ईमान नहीं ऊंच नीच नहीं भेद भाव नहीं आदमी इन्सान का पथ भ्रष्ट भ्रष्टाचार नशा!!

महात्मा गांधी जी ने अस्पृश्यता ,छुआ छूत, स्वच्छता,मद्य निषेध आदि सिद्धान्तों को भारतीय सामाजिक राष्ट्रीय उत्थान के बुनियादी ,मौलिक आधार के तौर पर स्वीकार करने हेतु अपनी संपूर्णता समग्रता की शक्ति से आवाहन किया और जन मानस को जागरुक किया ।

भारत के विकास उद्भव शसक्तीकरण हेतु सिद्ध मूल मंत्र
के स्वरूप में उक्त मौलिक चिंतन को निरूपित किया जो प्रमाणिक भी है सत्य भी है।

देश की आजादी के बाद महात्मा को राष्ट्र पिता तो घोषित कर दिया परन्तु उनके नैतिक मूल्यों, मर्यादाओं ,सिद्धांतो को नकार दिया गया जिसमे मद्य निषेध प्रमुख था।

मैं इस संदर्भ में एक स्वयं का संस्मरण साझा करना चाहूंगा जो मेरे लिये प्रेरणा और शिक्षा दोनों ही है।

वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों जिला पंचायतों के चुनाव चल रहे थे मैं प्रति दिन बारह से डेढ़ के मध्य नियामित गोरखपुर के देवरिया बाई पास रोड से गुजरता था मैंने देखा कि दिन हीन महिलाएं भूखी प्यासी प्रत्येक दिन सड़क पर बैठी रहती मग़र उनके सड़क पर बैठने से किसी भी आने जाने वाले को कोई परेशानी नही होती
सारी महिलाएं चुप चाप बिहार की तरफ अपना रुख करके बैठी रहती हाथ मे तख्ती लिये जिस पर लिखा रहता शराब बंदी लागू करो।

मैँ प्रतिदिन आते जाते इस दृश्य को देखता मगर एक मर्यादित शहरी होंने के कारण इन झमेलो में पड़ना मार्यादित शहरी की मर्यादा का उल्लंघन था ।

मगर प्रितदिन महिलाओं के धरने को आते जाते देखते देखते एक दिन मार्यादित कथित शहरी का यानी मेरा धैर्य जबाब दे गया मैने एक दिन अपनी बाइक उन धरने पर बैठी महिलाओं के पास रोकी और पूछा आप लोग क्यो रोज सड़कों पर बैठ कर धरना देती है उन महिलाओं की बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

महिलाओं ने कहा साहब हम लोग गरीब परिवार से है मेहनत मजुरी करने वाली महिलाएं है हम लोंगो की मांग है कि उत्तर प्रदेश में शराब बिक्री बन्द कर दी जाय हमने सवाल किया इससे आपको क्या फायदा होगा तब महिलाओं ने बताना शुरू किया हमारे पति अमूमन मजदूरी या मजदूरी के समकक्ष कार्य करते है और मेहनत करके दिन के चार पांच सौ रुपये कमाते है उसमें से डेढ़ सौ दो सौ रुपये की दारू पी जाते है बच्चों की पढाई लिखाई की बात तो दूर आए दिन घर आने पर झगड़ा मार पीट करते है घर मे आय दिन कलह का बातावरण कमाई दारू और कलह यही हमारी जिंदगी है जो नरक बन गईं है ।

हम लोंगो के पास खेती भी नही है सिर्फ पति की मजदूरी की कमाई ही जीवन का आसरा और सहारा है जिस कमाई का ज्यादेतर हिस्सा पति दारू में गँवा देता है।

तभी उन महिलाओं में बैठी रूपा बोली साहब हमार मरद अपने दो छोटे बच्चों को इशारा करते इनका बाप नकली दारू पीकर मर गया अब हम लोंगो का कोई नही है किसी तरह घरों में बर्तन माजकर बच्चों का पेट पालती हूँ।

मैने पूछा कि इन सबका इस धरने से क्या लेना देना तब एक स्वर में सभी महिलाओं ने बोला बिहार में शराब बंद किये है हम लोग चाहते है कि यू पी में भी शराब बंद हो।

नीतीश जी आज के असली भगवान है जो हम जईसन दुखियारीन के दर्द समझे है।

हम ग्राम प्रधान और जिला पंचायत ईलेक्सन में वही के वोट देईब जे शराब बंदी के लागू करावे के वादा करी।
शराब जो शुरू तो शौख से होता है फिर आदत बन जाता है जो नशे नाश के रास्ते पर चलता है।

प्रश्न यह उठता है कि शराब से प्रादेशिक सरकारों को राजस्व कि बहुत अच्छी आय होती है यदि शराब बन्दी लागू हो गई तो उसकी भरपाई किस माध्यम से होगी दूसरा शराब के माफिया को राजनीति एवं नेताओ के लिए अच्छे खासे धन एवं बाहुबल का संसाधन जुटाते है उनसे भी राजनीत राजनेता को अपना मोह भंग करना बहुत कठिन है।

उत्तर प्रदेश में जब राजनाथ सिंह जी उत्तर प्रदेश के शासन में थे तब उन्होंने साहसिक निर्णय लेते हुए शराब माफियाओं के चंगुल से प्रदेश को मुक्त कराया और लाईसेसिंग प्रणाली लागू कि जिसका कुछ प्रभाव अवश्य पड़ा जिसके कारण शराब माफियाओं के नाम से मण्डल एवं जनपद जाने पहचाने जाते थे।

कोरोना में जितनी कुल मौते हुई उतनी मौते चार से पांच वर्ष में नकली शराब पीने से हो जाती है मरने वाले वे लोग होते है जो मेहनत मजदूरी करके पेट पालते है और महंगी शराब नहीं पी सकते।

कोरॉना एक फौरी दैवीय संक्रमण था जिससे निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा ही लाखो करोड़ धन राशि व्यय कि गई जो अनिवार्य एवं आवश्यक था।

प्रश्न यह उठता है कि क्या जिन समस्याओं के कारण सामाजिक मूल्यों एवं स्तर में नियमित गिरावट आती है उन परम्परागत समस्याओं के स्थाई समाधान खोजने कि आवश्यकता है या नहीं।

मदिरा, शराब ,वाइन ,लीकर,दारू समय के साथ साथ बदलते नाम लेकिन प्रकृति में कोई बदलाव नही मदिरा महाराज,यानी राजा मतलब सपन्न व्यक्ति के लिये हो सकता है शक्ति,राज्य ,बैभव के अधीन ही मदिरा का रहना सेवन कुछ हद तक स्वीकार्य हो सकता है ।

शराब शौख है,मदिरा महत्व है वाइन प्रकृति कि अनिवार्यता है लीकर दारू विनाश का रास्ता है भारतीय धर्म मे मदिरा का सेवन वर्जित है माना जाता है कि यह विनास कि जननी है यदुवंशियों का विनाश वारुणी के मद में ही हुआ दुर्वासा के श्राप से समुद्र के जल ही मदिरा मय हो गया और मदिरा के मद में ही शाम्भ के टुकड़ों से एक दूसरे पर प्रहार करते रहे जो वज्र के समान घातक था।

मदिरा का रूपांतरण शराब में मुगल काल मे हो गया नाम ही बदला प्रकृति नही शराब के साथ सबाब और कबाब जुड़ गया जो सुरा सुंदरी का ही रूपांतरित स्वरूप था नबाबों एव बादशाहों के सामंतों के शौख मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करता था पश्चिमी देशों में जहां सर्दी पूरे वर्ष पड़ती है वहां के जीवन शैली कि अनिवार्यता हो सकती है वाइन शराब मदिरा अक्सर देश की सुरक्षा व्यवस्था में लगे सेना के जवानों को शराब पीने ना पीने की छूट उनके व्यक्तिगत निर्णय पर छोड़ दिया जाता है और एक निश्चित मात्रा तक ही अनुमति प्रदान की जाती है ।

शराब शौख से जब नशा का रूप धारण कर लेती है तो भयंकर हो जाती हैं और विनाश को जन्म देती है शराब संस्कृति किसी विकास शील या विकसित समाज के लिये अनिवार्यता नही हो सकती शराब की शुरुआत बहुत साधरण लगती है मगर धीरे धीरे असाधरण स्थिति कि तरफ ले जाती है कहा जाता है पहले इंसान शराब पीता है बाद में शराब इंसान को पी जाती है शराब मानव समाज मे प्राचीन ऐसा पेय है जिसका समय समय पर सिर्फ नाम बदला प्रकृति प्रबृत्ति नही ।

शराब सदैव हानिकारक नही

यदि कोई नियमित मात्रा में शराब का सेवन उचित आहार के साथ और नियमानुसार करता है तो नुकसानदेह नही होती ऐसा सिर्फ अभिजात्य वर्ग ही जो अनुशासन को स्वीकारता है कर सकता है आम जन के बस की बात नही है हज़ारों में कोई एक ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो शराब का नियमित सेवन करता हो और स्वस्थ दीर्घायु हो यह अपवाद है ।

शराब अल्कोहल का प्रयोग अनेको औषधियों के निर्माण में होता है और कभी के कभी विशेष रोगों में चिकितसको द्वारा भी एक निश्चिंत मात्रा में सेवन के लिये बताया जाता है शराब सेवन में थ्री डी नियम अनुभवी लांगो द्वारा प्रतिपादित किये जाते है पहला शराब के एक पैग से दूसरे पैग के बीच का समय बीस मिनट से तीस मिनट होना चाहिए दूसरा शराब के साथ वरिष्ट भोज्य होना अनिवार्य है तीसरा पचास मिली में उतना ही पानी अनिवार्य है संभव है यह शराब सेवन करने वालो के अपने अनुभव हो सम्भव है भिन्न भिन्न भी हो मगर किसी के द्वरा शराब सेवन की महिमा नही बताई गई है।

शराब का स्वस्थ एव समाज पर प्रभाव

शराब पहले इंसान पिता है बाद में जब शराब इंसान को पीने लगती है तब बहुत भयंकर स्थिति देखने को मिलती है चाहे कितना भी बड़ा आदमी हो उंसे दो नशे की आदत लग जाय समझो अपने आप वह दरिद्र और जानवर कि श्रेणी में आ खड़ा हो जाएगा ।

शराब नशे के तीन रूप होते है जब कोई व्यक्ति पीना शुरू करता है तो उसके ऊपर शराब शेर बनकर बोलती है वह स्वय को ताकतवर भी लगता है और उसके आस पास महिमा उसका महिमा मंडन करने वाले दरबारी भी नज़र आते है जब वह शराब सेवन के दूसरे दौर में पहुंचता है तो उसके अंतर्मन में भय शंका और दुविधा का प्रादुर्भाव हो जाता है शराब शुभारंभ का समाज पीछे छूट चुका होता है और वह अकेला हो जाता है जब शराब सेवन का तीसरा और अंतिम दौर व्यक्ति के जीवन मे आता है तो व्यक्ति सुअर हो जाता है स्तर विहीन मर्यादा विहीन और सिर्फ शराब ही जीवन में रह जाता है ।

शराब के समाज राष्ट्र पर पड़ने वाले प्रभाव

अधिकतर सड़क दुर्घटनाओं का जन्मदाता शराब ही है बहुत से लांगो को शराब बगैर बहन चलाने का मज़ा ही नही आता दूसरा एक स्वस्थ मन मस्तिष्क अपराध नही कर सकता जितने भी अमानवीय कृत्य किये जाते है वह शराब के नशे में ही होते है जो बिना शराब के नशे में सम्भव ही नही है ।

हत्या बलात्कार लूट आदि जितने भी अपराध होते है यदि उनके विषय मे आंकड़े एकत्र किए जाए तो स्पष्ठ है कि सौ फीसदी अपराध शराब के नशे में ही किये जाते है ।

शराब के कारण एक और भयंकर स्थिति देखने को मिलती है वह है घरेलू हिंसा इस प्रकार कि घटनाएं प्रायः निम्न मध्यम वर्ग या मजदूर परिवारो में देखने को मिलती है जिनके परिवार के मुखिया कि आय सीमित होती है और उसके आय का काफी हिस्सा उसके स्वय के शराब पर व्यव्य होता है नही मिलने पर वह तरह तरह के कर्जो के बोझ में तब जाता है और पारिवारिक मांगो एव आवश्यकताओ को पूर्ण नही कर पाता है जिसके कारण घर मे आय दिन घरेलू बात विवाद हिंसा होती है ऐसे परिवार का शराबी मुखिया अपने सामने ही अपनी पीढ़ी को वेवश मजबूर लाचार बोझ नागरिक बना देता है ।

शराबी या किसी भी नशे के नशेड़ी कि बहुत बड़ी विशेषता यह होती है कि वह बहुत बड़ा समाजवादी होता है उंसे कही कोई अंतर प्राणि प्राणि में नज़र नही आता वह कही किसी बातावरण को स्वीकार कर लेता है उंसे दिवाली होली ईद सिर्फ उसके नशे में निहित समाहित होती है समाज उसकी छोटी सी नशे की आवश्यकता का आधार बन जाता है जो अन्तह उंसे भयानक अंत कि तरफ ले जाता है।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

गोरखपुर उत्तर प्रदेश

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