पत्थर तोड़कर पेट भरने वाले हाथ

पत्थर तोड़कर पेट भरने वाले हाथ

अरे दादा ….
न जाने कितनी पीढ़ियों से हम यह काम करते आ रहें है
हमारी कितनी ही पिढीयों ने इन पत्थरों कि कठोरता को छेनी और हथौडीं कि मार दे देकर इन कठोर पत्थरों को आकार देने की कला को तराशा है।

किसी पत्थर में चक्की तराशी जो कडक से कडक अनाज को पीसकर आटा बनाने की क्षमता रखती है , इस चक्की को तराशते हुए छेनी और हथौडी की मार में पीसकर रहें जाते है हमारे बच्चों की पढाई लिखाई की आशा और अभिलाषा, सिलबट्टे को तराशने की जुनून में हमारे सपनों को हमारी आशाओं को उस पत्थर के खुरदरे पन के घाव लग जाते है हमारी ऊंगलियों पर ,इन घावों को सहने की सहनशीलता हमें ईश्वर ही प्रदान करता हैं क्योकि इन बेजान पत्थरों को तराशकर जान भरने की शक्ति और महानता केवल हम ही रखते हैं ।

दादा बोलता जा रहा था अपने जीवन और मन की व्यथा……
हमारे हर परिवार को आज भी अंधविश्वास, निरक्षरता ,बालविवाह, शिक्षा की समस्याओं ने घेरा हुआ है ।

पहले बड़े बड़े गढ़ किलों का निर्माण होता था और बड़े भव्य मंदिरों को तराशा जाता था ,शिल्प कला बड़े चिरेबंदी बाडों का निर्माण किया जाता था तब हमारी कला को बहुत महत्व प्राप्त था लेकिन धीरे धीरे अधुनिकीकरण वैश्वीकरण के इस युग में यह काम हमसे छीनकर लिया जाने लगा और हमपर आज भी भुखमरी जैसी समस्याओं का जंजाल लगा हुआ है ।

पत्थरों को तराशना हमारी रोजी रोटी का एक साधन है जो हमें हमारे जीवन के बोझ को पत्थर के बोझ से ज्यादा लगता है । पहले पत्थरों के लिए रूपियों को नहीं देना पडता था।लेकिन अब हमें।पत्थर के भी पैसे सरकार को देने पड़ते है इस दुनियां में एसी कोई चीज नहीं है जो सस्ती मिलती हो जैसे मिट्टी, पानी ,पत्थर भी अब मोल ही लेना पड़ता है , मनुष्य का जीना और मरना भी महंगा होता जा रहा है कोई मर जाए तो उसके अंतिम संस्कार में भी आजकल बहुत खर्चा आने लगा है ।

मनुष्य का जीवन उपर उपर अधुनिकीकरण ,वैश्वीकरण के जबड़े में फंसता जा रहा हैं ,पहले पत्थर तराशने वालों का और उसकी तराशी हुई हर वस्तु का बहुत सम्मान किया जाता था जैसे किसी शुभ कार्यक्रम के अंदर विवाह, नामकरण विधी, अन्नप्राशन विधी आदी में चक्की, पाटा, सिलबट्टे को लक्ष्मी का रूप मानकर पूजा जाता था जो अब बहुत हद तक कम होने लगा हैं , मिक्सर का पीसकर खाना और विवाह समारोह दहलीज-आँगन में ना होकर बड़े बड़े मंगल कार्यालय किए जाने लगे है ,रीति-रिवाज कम होते गये और हमारी पीडींयों से चलती आ रहीं पत्थर तराशने की कला पर ही छेनी हथौड़ी की मार पड़ने लगी है ।

बच्चों का मरा हुआ मन हमसे देखा नहीं जाता वह शिक्षा लेते ही नहीं है और ले भी ले तो बीच मैं ही वह छूट जाती हैं ,महिलाओं की बीमारियों का सामना करना पड़ता है छेनी हथौडीं की मार उन्हे मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बनाती जातीं हैं ।

मजबुत पत्थर को ही तराशा जाता हैं कमजोर पत्थर पर घाव किए जाए तो उसके टूटने की संभावना होतीं है बल्कि वह टूटकर बिखर जाता हैं लेकिन मजबुत पाशान पर किए गयें वार वह आसानी से झेल जाता हैं उस पाशान का गुणधर्म ही इतना कठोर होता हैं इतना मजबुत होता हैं कि उसके ऊपर एक हीं बार घाव कर सुंदर से सुंदर नक्काशी उकेरी जाती हैं , पत्थर पर उकेरी हुई कला युगों युगों तक चिरस्थाई और चिरसंचित बनकर रह जातीं हैं । जैसे उस कलाकार की कला के पद चिन्ह उस पत्थर पर हमेशा के लिए बनकर रह जाते हैं अजरामर ….

पत्थर खुरदरा उबड़ खाबड़ जरूर होता हैं लेकिन योग्य कलाकार के हाथ में पड़कर बन जाता हैं वह अत्यंत उपयोगी और ईश्वरीय गुणों से सिद्ध , जैसे योग्य कलाकार के हाथ में पड़कर पत्थर योग्य बन जाता हैं वैसे ही एक कलाकार उस पत्थर को तराशकर क्यों नहीं बन जाता महान आखिर क्यो पर्दे के पीछे का कलाकार बनकर रहें जाता हैं
पत्थर तोड़कर पेट भरने वाला कलाकार…..
पत्थर तोड़कर पेट भरने वाला
जीवन भर कलाकारी के रंगमंच पर बनकर रह जाता हैं एक पर्दे के पीछे का कलाकार……
बात करते करते उस दादा की आँखें आंसुओं में डबडबाने लगी थी …..
पत्थर पर तराशी हुई नक्काशी अजरामर बन जाती हैं लेकिन उस लोककला को तराशने वाले हाथ सदियों से बनकर रह गयें हैं अदृश्य….

Shubhangi  Chauhan

चौहान शुभांगी मगनसिंह
लातूर महाराष्ट्र

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