फ़िक्र जहां की | Fikr Jahan ki
फ़िक्र जहां की! ( Fikr jahan ki ) बेवजह दिल दुखाना मुनासिब नहीं, जग में नफरत बढ़ाना मुनासिब नहीं। फूल खिलते रहें सारी दुनिया में यूँ, बैठी तितली उड़ाना मुनासिब नहीं। धरती नभ से मिले ये तो मुमकिन नहीं, तोड़ ढूँढों नहीं, ये मुनासिब नहीं। कोई कुदरत के हक़ को मिटाने लगे, फ़िक्र हो…