Hum kab Jagenge

  • हम कब जागेंगे | Hum kab Jagenge

    हम कब जागेंगे? ( Hum kab jagenge )  अपनों की आवाज़ अपनों के खिलाफ बुलंद कराते हैं.. कुछ टुकड़े फेंक ललचाते हैं और हम, आपस में टकराते हैं! जाल यही हुक्मरानों की चाल यही राजघरानों की हमें बांट, लहू ये पीते हैं और लाशों पर फख्र से जीते हैं उनकी चालों के हम मुहरें हैं…