
हम कब जागेंगे?
( Hum kab jagenge )
अपनों की आवाज़
अपनों के खिलाफ
बुलंद कराते हैं..
कुछ टुकड़े फेंक ललचाते हैं
और हम, आपस में टकराते हैं!
जाल यही हुक्मरानों की
चाल यही राजघरानों की
हमें बांट, लहू ये पीते हैं
और लाशों पर फख्र से जीते हैं
उनकी चालों के हम मुहरें हैं
अब तक नहीं हम सुधरे हैं
सदियाँ कितनी ऐसे गुजरी हैं
बस्तियाँ हजारों ऐसे उजड़ी हैं!
फिर भी नहीं हम जागे हैं
झंडा ढोने में ही आगे हैं!
अब छोड़ो करना इनपर विश्वास
वरना होगा अबकी सर्वनाश!
#नवाबमंजूरकी_कविताएं
लेखक–मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर
सलेमपुर, छपरा, बिहार ।