Hum kab Jagenge

हम कब जागेंगे | Hum kab Jagenge

हम कब जागेंगे?

( Hum kab jagenge ) 

अपनों की आवाज़
अपनों के खिलाफ
बुलंद कराते हैं..
कुछ टुकड़े फेंक ललचाते हैं
और हम, आपस में टकराते हैं!
जाल यही हुक्मरानों की
चाल यही राजघरानों की
हमें बांट, लहू ये पीते हैं
और लाशों पर फख्र से जीते हैं
उनकी चालों के हम मुहरें हैं
अब तक नहीं हम सुधरे हैं
सदियाँ कितनी ऐसे गुजरी हैं
बस्तियाँ हजारों ऐसे उजड़ी हैं!
फिर भी नहीं हम जागे हैं
झंडा ढोने में ही आगे हैं!
अब छोड़ो करना इनपर विश्वास
वरना होगा अबकी सर्वनाश!

#नवाबमंजूरकी_कविताएं

लेखकमो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

यह भी पढ़ें :

मंजूर के दोहे | Manzoor ke dohe

Similar Posts

  • सैनिक | Sainik kavita

    सैनिक  ( Sainik )    वो सैनिक है, वो रक्षक है || 1.न हिन्दू है न मुस्लिम है, वो केवल मानव राशी हैं | न दिन देखें न रात पता हो, वो सच्चे भारतबासी हैं | चाहे गर्मी हो या बर्फ जमे, अपना कर्तव्य निभाते हैं | खुद जान गंवा कर सीमा पर, हिन्दुस्तान बचाते…

  • जीवन यही है | Poem jeevan yahi hai

    जीवन यही है ( Jeevan yahi hai )   ना धरा में ना नभ में ना गहरे समंदर में। खोज खोज के खुद को खोया झाँका नहीं खुद के अंदर में। राहों से तु भटक ना राही किंचित सही नहीं है। अंतर्मन हि असीम सत्य है, यक़ीनन जीवन यही है। अल्फाज़ों में जो समझाऊं तो…

  • Ghazal | उलझन

    उलझन ( Uljhan ) क्यों  उलझा  है  शेर हृदय तू, बेमतल की बातों में। जिस संग मन उलझा है तेरा, तू ना उसके सासों में। मना  ले  अपने चंचल मन को, वर्ना तू पछताएगा, प्रेम पतित हो जाएगा फिर,रूक ना सकेगा आँखो में। इतना ज्ञान भरा है तुझमें, फिर.भी क्यो अंजान रहे। इकतरफा है प्यार…

  • धन्य कब होंगे नयन अधीर | Nayan Adheer

    धन्य कब होंगे नयन अधीर ! ( Dhanya kab honge nayan adheer )    न आये देव दीन के द्वार। तृषित उर को दे सका न तोष, तुम्हारा करुणा पारावार। न आये देव दीन के द्वार। निराशा का न हुआ अवसान, हुई आशायें प्रतिपल क्षीण। भग्न होते जाते स्वर तार, करुण क्रन्दन करती हृदवीण। प्रतीक्षा…

  • बेचारे मजदूर | Bechare Mazdoor

    बेचारे मजदूर ( Bechare Mazdoor )  उजड़ी हुई दुनिया मजदूर बसाते हैं, अपने पसीने से जहां सजाते हैं। गगनचुंबी इमारतें बनाते हैं देखो, मरुस्थल में फूल यही तो खिलाते हैं। ईंट,पत्थर, सरिया के होते हैं ये बने, यही तो बंगलों में उजाला फैलाते हैं। ऐसा राष्ट्र-धन लोग कुचलते मनमाना, ओढ़ते आसमां, ये धरती बिछाते हैं।…

  • नारी नित नमनीय | Nari Nit Namniye

    नारी नित नमनीय ( Nari Nit Namniye )   रंग बिखरे हों रंगोली से भरा हो सारा आकाश नेह का काजल लगाकर खत्म सारे ‘ काश’ हों …..! आदी से उस लक्ष्य तक की वीथिका के वृत्त को जोड़ती और संवारती अब बने हम व्यास। जगत सृजित करे नारी ही बहन बेटी पत्नी मां का…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *