कशिश | Kavita
कशिश ( Kashish ) एक कशिश सी होती है तेरे सामने जब मैं आता हूं दिलवालों की मधुर बातें लबों से कह नहीं पाता हूं मन में कशिश रहने लगी ज्यों कुदरत मुझे बुलाती है वर्तमान में हाल बैठकर दिल के मुझे सुनाती है प्रकृति प्रेमी बनकर मैं हंसकर पेड़ लगाता हूं…

