Kop kudrat ka kavita

  • कोप कुदरत का | Kavita

    कोप कुदरत का ( Kop kudrat ka )   कुदरत कोप कर रही सारी आंधी तूफान और महामारी फिर भी समझ न पाया इंसां भूल हुई है अब हमसे भारी   खनन कर खोखली कर दी पावन गंगा में गंदगी भर दी पहाड़ों के पत्थर खूब तोड़े खुद ही खुद के भाग्य फोड़े   सड़के …