ख्वाहिशों का बोझ | Poem khwahishon ka bojh
ख्वाहिशों का बोझ! ( Khwahishon ka bojh ) पराई आग पे रोटी सेंकने नहीं आता, रेजा-रेजा मुझे बिखरने नहीं आता। कत्ल कर देती हैं वे अपनी नजरों से, इल्जाम उनपे मुझे लगाने नहीं आता। गुनाह की रेत में मत दबा मेरा वजूद, झूठ की आग में जलने नहीं आता। मत छीनों जरूरत की चीजें…

