Poem khwahishon ka bojh

ख्वाहिशों का बोझ | Poem khwahishon ka bojh

ख्वाहिशों का बोझ!

( Khwahishon ka bojh )

 

पराई आग पे रोटी सेंकने नहीं आता,
रेजा-रेजा मुझे बिखरने नहीं आता।
कत्ल कर देती हैं वे अपनी नजरों से,
इल्जाम उनपे मुझे लगाने नहीं आता।

गुनाह की रेत में मत दबा मेरा वजूद,
झूठ की आग में जलने नहीं आता।
मत छीनों जरूरत की चीजें मुझसे,
ख्वाहिशों का बोझ ढोने नहीं आता।

ओढ़कर सोता हूँ सुकूँ की रात छत पे,
मुझे रातभर पैसे गिनने नहीं आता।
सिसक रही हवाएँ कल -कारखानों से,
कुदरत का दिल दुखाने नहीं आता।

नर्म लफ्जों से बात करने में क्या हर्ज,
हँसती रात को रुलाने नहीं आता।
सूरज-चाँद- सितारों में छेद मत करो,
कुछ को रोशनी में नहाने नहीं आता।

मत सजाओ कोई गगन मिसाइल से,
बहुतों को खूँ में नहाने नहीं आता।
शाख- ए- अमन मत तोड़ अमेरिका,
तुझको दुनिया में रहने नहीं आता।

 

रामकेश एम यादव (कवि, साहित्यकार)
( मुंबई )
यह भी पढ़ें:-

खुद्दारी पे आँच आने न पाए | Khuddari par kavita

Similar Posts

  • सांवरिया मेंह बरसा दे रै | Saawariya marwadi geet

    सांवरिया मेंह बरसा दे रै ( Saawariya : Marwadi geet )   सांवरिया मेंह बरसा दे रै,सांवरिया मेंह बरसा दे रै। पड़े तावड़ो तपै धरती, मन हरसा दे रै। सांवरिया मेंह बरसा दे रै   यो जेठ रो महीनो ठाडो, आग उगळतो तावड़ो। गर्मी से बेहाल होरया, होरयो मिनट बावळो। आषाढ़ रा बादळ बरसा, सावण…

  • तुम ही तो माँ | Kavita Tum Hi to Maa

    तुम ही तो माँ ( Tum Hi to Maa ) सुबह सवेरे जब तुम मुझे उठाती थी, एक रौशनी सी मेरे आंखों को छू कर जाती थीं। उठ कर, हाथों से जब मैं आंखें मलती थी, ” सुबह हो गई बेटा ” कह कर तुम सीने से मुझे लगाती थी। देख कर तुम्हारी प्यारी सी…

  • कर्मफल

    कर्मफल *** कर्मफल के आधार पर ही- लेता प्राणी मानव योनि में जन्म, बड़े खुशनसीब हैं हम । पांच बरस बचपन का बीते, छह से चौदह किशोरवय हो जीते। पंद्रह से उन्नीस चढ़े जीवन की तरूणाई, फिर तो बोझ जीवन बोझ बन बोझिल हुई जाई; गृहस्थी का भार जो दबे पांव है चली आई। पहले…

  • खादी एक शान है | Khadi

    खादी एक शान है   खादी एक शान है, खादी एक सम्मान है। स्वाभिमान है खादी, खादी एक सद विचार है। देसी धागों से बना हुआ, देश प्रेम मे सना। रेशम के तानों से तना, खादी एक सत्कार है।   गांधी जी का जीवन दर्शन है, अपना तो दर्पण है, समर्पण है। तन ढकने को…

  • बेकाबू मन | Kavita bekaaboo mann

    बेकाबू मन ( Bekaaboo mann )     बेकाबू मन मेरा बार बार, स्मरण तुम्हारा करता है। तर जाता जनम मरण मेरा यदि,ईश्वर मे ये रमता है।   तुम मोह मेरे हरि मोक्ष रहे,मन जान नही ये पाता मेर। मन के संग प्रीत का मंथन है, हुंकार हृदय घबराता है।   आशा में तनिक निराशा…

  • क्या कहूं! ये इश्क नहीं आसां

    क्या कहूं! ये इश्क नहीं आसां ******** साजिश की बू आ रही है घड़ी घड़ी उसकी याद आ रही है इंतजार करके थक गया हूं फिर भी नहीं आ रही है। क्या ऐसा करके मुझे सता रही है? क्या कहूं ? साजिश की बू आ रही है यूं ही तो नहीं मुझे तड़पा रही है…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *