मंजिल | Poem manzil
मंजिल ( Manzil ) मंजिल अपनी निश्चित है,और भाव भी मन मे सुदृढ़ है। रस्ता तय करना है केवल,जो मंजिल तक निर्मित है। जो मिलता ना रस्ता तो फिर, खुद ही नया बनाएगे। कर्मरथि हम मार्ग बनाकर, खुद मंजिल तक जाएगे। टेढी मेढी हो पगदण्डी या फिर कंटक राहों मे। हम पर्वत…

