Poem on budhapa in Hindi

  • बुढ़ापा | Poem on budhapa in Hindi

    बुढ़ापा ( Budhapa )    शून्य है शेष जीवन हमारा, एक ब्यक्ती का संसार हूँ मैं।   अर्थ वाले जहाँ में निरर्थक, बन गया अब तो बस भार हूँ मैं।   हो गये अपनों के अपने अपने, उनके अरमां के घर बस गये हैं।   लोग पढ़कर जिसे फेंक देते, बासी अब तो वो अख़बार…