बेरोजगारी और युवाओं में आक्रोश
बेरोजगारी और युवाओं में आक्रोश

निबंध : बेरोजगारी और युवाओं में आक्रोश

( Unemployment and youth outrage: Essay In Hindi )

बेरोजगारी आज हमारे देश के लिए एक अभिशाप बन गई है और इसका बने रहने से विकास आनंदमय नही बन सकता है। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में चाहे वह विकसित हो या विकासशील या फिर अल्पविकसित, बेरोजगारी की समस्या सामान्य रूप से हर जगह पाई जाती है।

भारत की अर्थव्यवस्था विकासशील अर्थव्यवस्था है। ऐसे में बेरोजगारी के स्वरूप अन्य राष्ट्रों से भिन्न है, विशेष करके जो विकसित अर्थव्यवस्था है उनसे अलग है।

 बेरोजगारी क्या है

बेरोजगारी से तात्पर्य श्रम शक्ति में रोजगार में लगे श्रमिकों की घटाने से जो श्रम शक्ति बढ़ती है उसे बेरोजगारी कहते हैं। इसमें देश के श्रम शक्ति से आशय उस देश में रहने वाले उन व्यक्तियों से है जिनकी उम्र 15 से 65 साल की है।

बेरोजगारी के संबंध में प्रोफेसर राज कृष्ण ने चार कशोटी बताई है।

  • यदि कोई व्यक्ति किसी उधोग में इष्टतम और रोजगार के घंटे से कम में काम करता है तो उसे समय आधार पर बेरोजगार कहेंगे।
  • यदि कोई वंचित न्यूनतम स्तर से कम आय कम अर्जित करता है तो उस कसौटी पर बेरोजगार कहेंगे।
  • यदि कोई व्यक्ति वर्तमान में लगे हुए काम से अधिक कार्य करने के लिए इच्छुक है तो उसे इच्छुक के आधार पर बेरोजगार कहेंगे।
  • यदि कोई व्यक्ति रोजगार से निकालने के बाद भी कुल उत्पाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है तो उसे निष्पादन आधार पर बेरोजगार कहेंगे।

भारत में संरचनात्मक बेरोजगारी के आधार विद्यमान है। भारत में बेरोजगारी को दो भागों में बांट सकते हैं।

  • शहरी बेरोजगारी
  • ग्रामीण बेरोजगारी

शहरी बेरोजगारी दो प्रकार से हो सकती है – 

  • औद्योगिक श्रमिकों में पाई जाने वाली बेरोजगारी
  • शिक्षित बेरोजगारी

औद्योगिक क्षेत्र में पाई जाने वाली बेरोजगारी मुख्यतः संगठित क्षेत्र में देखने को मिलती है। यह औद्योगिक क्षेत्र में विकास दर के कम होने की वजह से पाई जाती है। शहरी क्षेत्रों में प्रमुख रूप से शिक्षित बेरोजगारी पाई जाती है जिसका प्रमुख कारण दोषपूर्ण शिक्षा है। यह एक व्यावसायिक पहलू है।

शिक्षा व्यवस्था मांग आवश्यकता के अनुरूप नहीं होने की वजह से रोजगार सृजन में धीमी वृद्धि करती है। राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाए तो शिक्षित बेरोजगारी भारत की सबसे गंभीर समस्या है। इसमें श्रमिक पर शिक्षा व्यय के रूप में निवेश किया जाता है। परंतु प्रतिफल नही मिलता है।

ग्रामीण क्षेत्र में पाए जाने वाले बेरोजगारी दो प्रकार से होती है –

  • मौसमी बेरोजगारी
  • प्रच्छन्न बेरोजगारी

ग्रामीण क्षेत्र में कृषि की जुताई, बुवाई, कटाई जैसे कार्यों के समय तो श्रमिकों को रोजगार मिलता है। लेकिन जब कृषि का समय नहीं रहता तब रोजगार नहीं मिलता है।

अर्थात वर्ष के कुछ भाग में तो काम रहता है और कुछ भाग में नहीं रहता है। ऐसे समय में पाए जाने वाले बेरोजगारी को मौसमी बेरोजगारी कहा जाता है। यह बेरोजगारी का स्थाई भाव है।

भारत में अभी देखा जाता है कि खेतों में उत्पादन की दृष्टि से रोजगार को प्राप्त करने के लिए जितने लोगों की आवश्यकता होती है उससे अधिक लोग कृषि कार्य में लगे होते हैं। ऐसे लोगों को यदि खेती से निकाल दिया जाए तब भी कृषि से प्राप्त उत्पादन में कमी नहीं होगी।

ऐसे श्रमिकों को हम प्रच्छन्न बेरोजगार कहते हैं। भारतीय कृषि में यह सबसे गंभीर समझते हैं। बेरोजगारी चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो बेरोजगारी एक अभिशाप और कलंक है।

इससे युवाओं में असंतोष बनाता है। जिसके घातक परिणाम सामने आते हैं। भारत में किसी एक कारण की वजह से बेरोजगारी नहीं है बल्कि इसके कई कारण है।

भारत में बेरोजगारी के कारण :-

जनसंख्या में तीव्र वृद्धि –

स्वतंत्रता के बाद देश की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि देखी गई है। जनसंख्या वृद्धि इस बात का संकेत करती है कि भारत की जनसंख्या में 2001 से 2011 के दशक में 18.2 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई।

जो कि ब्राजील विश्व में जनसंख्या के संदर्भ में पांचवें स्थान की कुल जनसंख्या के बराबर है। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि से श्रमिकों की संख्या में वृद्धि हुई जिसका नतीजा यह हुआ कि बेरोजगारी बढ़ गई। देश में गरीबी भी बेरोजगारी का एक बड़ा कारण है क्योंकि पूंजी के अभाव में बेरोजगारी बढ़ती है।

दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली –

भारत में लार्ड मैकाले द्वारा शुरू की गई शिक्षा प्रणाली आज भी लागू है। इस शिक्षा प्रणाली की शुरुआत अंग्रेजों ने क्लर्क पैदा करने के लिए की थी और आज भी हम उसी पर चल रहे हैं। व्यवसायिक शिक्षा, कौशल पूर्ण शिक्षा का अभाव देखने को मिल रहा है।

युवक मध्यम और उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद खुद को सरकारी नौकरी के काबिल समझने लगता है और उसी में प्रयासरत रहता है। उधम सिलता के अभाव के कारण किसी और दिशा में सोच भी नहीं पाता है। सालो भटकने के बाद उसे समझ में आता है कि उसने कोई व्यवसाय चुना होता तो अच्छा रहता।

दोषपूर्ण योजनाएं –

भारत में 1951 से पंचवर्षीय योजना के द्वारा विकास कार्य करना शुरू हुआ। पिछली लगभग सभी पंचवर्षीय योजना का एजेंडा लगभग एक जैसा है।

वह रोजगार के सृजन और बेरोजगारी को कम करने की दिशा में प्रयासरत नहीं थे। इन योजनाओं में यह लिया गया कि विकास के द्वारा बेरोजगारी स्वतः ही समाप्त हो जाएगी।

धीमी औद्योगिक विकास दर –

आधुनिक विकास अपेक्षाकृत धीमा है, जैसे उद्योगों में रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है। कृषि की विकास दर भी निरंतर घटती जा रही है।

कृषि के विकास,  कृषि क्षेत्र में लगे हुए लोग भी बेरोजगार हो रहे हैं। कृषि एवं उद्योगों में नवीन तकनीक के प्रयोग से मशीनों का प्रयोग होने लगा है ऐसे में बेरोजगारी में वृद्धि देखने को मिली है।

निष्कर्ष –

भारत में बेरोजगारी बढ़ने से अनेक प्रकार की समस्याएं पैदा हुई। युवाओं में तनाव और असंतोष बढ़ा है जिसकी वजह से हिंसा और अराजकता सामने आ रही है।

बेरोजगारी से परेशान लोग आत्महत्या कर रहे हैं। बेरोजगारी के कारण अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। युवाओं में नशाखोरी ही देखने को मिल रही है।

भारत में बेरोजगारी को भगाने के लिए है सबसे पहले आर्थिक विकास की गति को बढ़ाना होगा। आर्थिक विकास की गति तीव्र होने से रोजगार उपलब्ध होने लगेंगे आर्थिक क्रियाकलापों में लोगों की भागीदारी बढ़ेगी तो आर्थिक क्षेत्र में मजबूती और गतिशीलता आएगी।

जिससे बेरोजगारी की समस्या का हल निकलेगा। भारत में बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए बचत और निवेश को भी प्रोत्साहित करना होगा। रोजगार के सृजन के लिए पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है।

पूंजी का संचय बचत से हो सकता है। इसलिए हमें बचत के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना होगा। बेरोजगारी की समस्या से उबरने के लिए जनसंख्या नियंत्रण पर ध्यान देना होगा।

रोजगार की समस्या के समाधान के लिए नियोजन को वरीयता देने होगी और युवाओं को रोजपरक प्रशिक्षण देना होगा। उन्हें वित्तीय सहायता और कच्चे माल के आदि की समुचित सुविधा देकर स्वावलंबी बनाना होगा।

लेखिका : अर्चना  यादव

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