ये हम कहां जा रहे हैं?
कहा जाता है कि भारतीयों की बुद्धि चूल्हे से शुरू होकर चूल्हे पर ही खत्म हो जाती है। इस चूल्हे के चक्कर में हम हजारों वर्षों तक गुलाम रहे। फिर भी चूल्हे का चक्कर है कि आज भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
कहने का तात्पर्य यही है कि इस व्यक्ति के यहां का भोजन हम नहीं करेंगे ,पानी नहीं पियेंगे क्योंकि यह निम्न कोटि का है? इस समय संपूर्ण देश में इस चूल्हे के चक्कर (जाति) पर महासंग्राम छिड़ गया है ।
जितने भी मीडिया चैनल, नेता , मंत्री, धर्मगुरु हैं सभी इस महासंग्राम में अपनी बाजी मार कर जीत हासिल कर लेना चाह रहे हैं। तुलसी बाबा को भी इस महासंग्राम को देखकर चक्कर आ जाएगा।
वह भी सोचते होंगे जब से हमने मानस की रचना की 400 सालों में ऐसा चूल्हे का महासंग्राम नहीं देखा। ऐसा लग रहा है जैसे चूल्हे रूपी सेनाएं लंका पर विजय पाने की तैयारी में हों ।होनी भी चाहिए क्योंकि उनकी नाक का सवाल है।
वर्तमान परिदृश्य को देखकर ऐसा लग रहा है कि जनता की एकमात्र अंतिम समस्या चूल्हे की है क्योंकि सभी जन एक ही धुन में लग चुके हैं कि चुल्हा संस्कृति अर्थात जाति का विनाश किया जाए।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )







