Hanuman ji kavita

हनुमान चालीसा की रचना किसने किया है: एक विश्लेषण

सामान्य जन में ऐसी मान्यता है कि हनुमान चालीसा की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है जो की अकबर द्वारा बंदी बनाए जाने पर हनुमान जी से प्रार्थना के रूप में किया है जिसे हनुमान जी प्रसन्न होकर पूरे अकबर के दरबार में बंदरों का आक्रमण हो जाता है उसके बाद अकबर तुलसीदास जी की महानता को देखते हुए उन्हें बंदीगृह से मुक्त कर देते हैं।

लेकिन वास्तविक रूप से हनुमान चालीसा की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने नहीं बल्कि तुलसीदास गोंडा जो अब बलरामपुर जिले की उत्तरी सीमा पर एक गांव के निवासी थे और जाति के कुर्मी थे ने किया था। उनके नाम पर ही उस कस्बे का नाम तुलसीपुर पड़ गया है।

यह भगवान श्री राम के परम भक्त थे श्री हनुमान चालीसा इन्हीं की रचना है। गोस्वामी जी की तरह यह प्रसिद्ध नहीं थे। जिसके कारण हनुमान चालीसा को प्रसिद्ध गोस्वामी जी की रचना समाज में मान लिया गया लेकिन यह सत्य नहीं है। यह कथन बाबू जगदेव सिंह पूर्व प्राध्यापक हिंदी विभाग एम .एल.के. महाविद्यालय बलरामपुर के द्वारा लिखित ग्रंथ ‘गोंडा जनपद के इतिहास’ में प्राप्त होता है।
( संदर्भ हिंदुस्तानी त्रैमासिक अप्रैल – जून २०२०)
डॉक्टर किशोरी लाल गुप्त ने गोस्वामी तुलसीदास विषयक ग्रंथ’ तुलसी और तुलसी’ में श्री रामचरितमानस के तुलसीदास के अतिरिक्त अन्य भी छह तुलसी नामधारी व्यक्तियों का उल्लेख किया है जिन्होंने राम भक्त परक रचनाएं की है-
१- सतसईकार तुलसी
२- तुर( ल) सीदास निरंजनी
३- आचार्य तुलसी
४- तुलसी साहब
५- ज्योतिषी तुलसी
६- बृजवासी तुलसी

डाक्टर गुप्त ने सतसई तुलसी को गोस्वामी तुलसीदास का समकालीन ही माना है ।‌ इनका ही वास स्थान काशी में लोलार्क कुंड के पास था। राम भक्त होने और पास-पास रहने के कारण दोनों तुलसी में परस्पर मैत्री थी।

सतसईकार तुलसी के रचनाओं पर गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं का प्रभाव पड़ने के कारण यही था ।जिसका विस्तृत विमर्श डॉक्टर गुप्त ने अपनी इस पुस्तक में किया है।

डॉक्टर किशोरी लाल गुप्त ने दूसरे तुलसी की कुल 48 रचनाओं का उल्लेख किया जो बोलचाल के भाषा में लिखे गए हैं । इनमें से अंतिम चार ग्रंथ अलभ्य हैं।

तुलसी सतसई, ज्ञान दीपिका, हनुमान चालीसा, जय-जयावली, छप्पय रामायण, बरवै रामायण , कुंडलिया रामायण, पदावल (पद बंध) रामायण, भजन रामायण, रामायण छंदावली , खंड राम कथा विषयक 12 ग्रंथ , हनुमत भक्त विषयक 8 ग्रंथ ,मनोबोध, राम मुक्तावली आदि उल्लेख है। इन सब में राम का पावन यश प्रकाशित है।

तुलसी सतसई में कुल 747 दोहे हैं जो सात सर्गो में बंटे हुए हैं। सभी दोहों में राम भाव की झलक है।
डॉक्टर किशोरी लाल गुप्त के अनुसार- श्री रामचरितमानस में आठवां ‘लवकुशकांड’ अथवा ‘रामाश्वमेध’ में जोड़ने वाले तुलसीदास यही सतसईकार हैं।

अन्य तुलसीदास निरंजन की गणना 12 निरंजन महंतो में की जाती है। यह शेरपुर राजस्थान के निवासी कहे गए हैं । इनका उल्लेख प्रथमत: दादू पंथी राघव दास के भक्तमाल (विक्रम संवत 1717 )में प्राप्त होता है।
सेरपुर तुरसी जू वाणी नीकी ल्याए हैं।

डॉक्टर पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने संत तुलसी दास की सभी रचनाएं खोज निकाली है। इनकी कुल 8 रचनाएं हैं जिनमें साखी (4203 दोहा )और शबद ( 461) बड़ी है तथा शेष रचनाएं लघु हैं।

यह संत तुलसी दास भी गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन थे । यह विद्वान संत थे और इन पर कबीर का प्रचुर प्रभाव था। इन्होंने निरंजन पंथ के दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है।
( संदर्भ हिंदुस्तानी त्रैमासिक अप्रैल से जून २०२० पृष्ठ ३७)

उपर्युक्त विवेचन में हम देखते हैं कि हनुमान चालीसा की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने नहीं बल्कि दूसरे जिनकी 48 रचनाएं प्राप्त होती है द्वारा की गई हैं।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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