राजनीतिक घृणा मूक जीवों पर कहर ढा रही है
आज यह फ़िल्म देख कर मन उदास हो गया.. मन के भीतर कही गहरे में खून के आंसू रोने की इच्छा हो रही है.. उफ कितने गिर गए हैं हम.. उफ कितनी हीन मानसिकता से भर गए हैं हम.. बदला लेना चाहते हैं.. सामने वाले को नीचा दिखाना चाहते हैं.. मगर किस स्तर पर..?
किसी मूक लाचार जीव के गले पर छुरी चला कर.. किसी मासूम प्राणी की हत्या कर.. गिरे हुए हम लोग.. पतन में जाति हमारी सोच.. बदला लेना चाहते हैं मगर ऐसे.. यह फ़िल्म भी हमने बनाई है ओर यह यही सिद्द करती है की सभ्य संसार का इंसान पागल हो गया है.. उसे किसी ऊंच नीच की सोच की कोई फिक्र ही नही।
राजनीति की बिसात पर मूक पशुओं के प्राणों से खेला जा रहा है.. यह राजनीति नही है.. यह गंदी राजनीति है.. हमारी नापसंद भाजपा हो सकती है मगर हमारी नापसंदगी को क्या हम गाय की हत्या कर जताएंगे..?
भाजपा के झंडे पर गाय की हत्या कर आखिर क्या हासिल हुआ.. कुछ नफरते बढ़ी ही न.. इस के पहले भी कुछ लोगो ने केरल में सरेआम गाय की हत्या की थी.. कैसा विरोध जताते हैं हम..? यह कोई विरोध है..?
यह कोई तरीका है..? हमारा गुस्सा किस पर ओर हम गुस्सा उतार रहे हैं किस पर..? कभी कोई जैन मन्दिर के सामने मुर्गे मुर्गियों की हत्या करता है.. मगर क्यो..? ये बेचारे मूक जीव कुछ बोल नही सकते.. कुछ कर नही पाते तो हमारा गुस्सा इन पर उतरता है.. राजनीति कितने निम्न पायदान पर पहुँच गयी है।
हम अपना रोष कुछ रचनात्मक कार्यो द्वारा भी पेश कर सकते हैं.. नही कर सकते क्या..? जरूर कर सकते हैं.. अवश्य कर सकते हैं.. कुछ इस अंदाज में कर सकते हैं कि जन जन हमारी तरफ आकर्षित हो.. कुछ इस तरह से कर सकते हैं कि राजनीतिक दल चिंता में पड़ जाए.. हम उपवास कर सकते हैं।
हम शहर की सफाई कर सकते हैं.. हम चुल्लू भर पानी मे डूब मरने का प्रदर्शन कर सकते हैं.. हम भरे चौक में नेताओ के तस्वीरों की किरकिरी वाली आरती उतार सकते हैं.. हम अर्धनग्न हो कर बाझार में भीख मांगने का नाटक कर सकते हैं.. हम नेताओ की गाड़ियों के टायर की हवा निकाल सकते हैं.. यह सब रचनात्मक है।
ऐसे आंदोलन पर गौर भी किया जाता है.. जनता की नाराजी को मूक जीवो की हत्या कर प्रकट करने से बेहतर है मूक जीवो को अपने आंदोलन में शामिल किया जाए।
यह कैसी बहादुरी है कि अबोल जीव के पैरों को बांध कर उसे नीचे गिरा दिया जाता है और फिर उस का गला काट दिया जाता है.. उसकि दर्द से भरी आवाज सुनी..?
बेचारा वह रो भी नही पा रहा, गला जो काट दिया उसका.. उस जीव ने भला हमारा क्या बिगाड़ा था.. उस के पास भला कोंन सी सत्ता है जो कि हम उसका गला रेंत रहे है.. नाराजी किस से है.. बदला किस से ले रहे..?
यदि इसे ही इंसान राजनीति कहता है तो थू है ऐसी राजनीति पर.. किसी पार्टी में हमारी रुचि या अरुचि होना स्वाभाविक है मगर अरुचि को प्रकट करने का यह तरीका बहुत ही विभत्स है.. यह कैसी मूर्खता है कि नाराजी में घोड़े की इस कदर पिटाई की जाये कि वह अपने प्राणों से ही हाथ धो बैठे।
नेता कोई भी हो.. दल कोई भी हो.. मगर जब राजनीति की बिसात पर मूक जीवो को मोहरा बना कर चाल चलना शुरू कर देते हैं तब यक़ी मानिए ये लोग इंसान तो नही ही मगर जानवर भी कहलाने के लायक नही है क्योंकि जानवरो के सामाजिक जीवन मे अभी गंदगी नही आयी है।
उन्होंने कोई दल नही बनाया है.. वे किसी पार्टी में यक़ी नही रखते.. वे सिर्फ इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि यह धरती सभी की है.. वे कुदरत के खिलाफ कोई काम नही करते.. वे किसी भी इंसान से लाख गुना बेहतर है क्योंकि उनकी लालसा एक समय के पेट भरने की है।
उन्हें नफरत की राजनीति नही आती.. उन से तो बस उमड़ता है प्यार उन सभी के लिए जो कि प्यार से उन के सर पर हाथ फेरते है.. वे सिर्फ प्यार की भाषा समझते हैं.. कोई भाजपा, कोई कांग्रेस उन के इतिहास में नही है।
राजनीति के दांवपेंच रच कर वे अपने सुनहरे निर्दोष इतिहास को कलंकित करना नही चाहते.. हम इंसान कम से कम कुछ इन मूक जीवो से ही सिख ले.. दुश्मनी और बैर की दुनिया को खत्म करें.. अनेक अनेक धन्यवाद।

रमेश तोरावत जैन
अकोला
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