Dr. Chander Datt  Sharma Poetry

डॉ. चंद्र दत्त शर्मा की कविताएं | Dr. Chander Datt  Sharma Poetry

रक्तदान – रागनी

तरज मानी नी माई मुंडेर…

रक्तदान तै बड़ा दान ना, सबने न्यूं समझा दयो।
18 वर्ष की उम्र हुवे जब परोपकार मैं ला दयो ।।
भाइयों रै, सजनों रै…. भाइयों रै, सजनों रै….।

आदमी का दुनिया मैं ना सदा एक-सा बख्त होवै
घायल हो या कोए बीमारी संजीवनी यू रक्त होवै
बख्त होवै जब काम आण का आगै हाथ बढ़ा दयो।
रक्तदान तैं बड़ा दान ना, सबनै न्यूं समझा दयो ।।

रक्त-रूधिर – लहू – शोणित दखे कई नाम सैं इसके
पर रूप-रंग अर जाति-धर्म के बन्धन कोन्या जिसके
किसके भेद करै पगले रक्तदान तैं भेद मिटा दयो।
रक्तदान तैं बड़ा दान ना सबनै न्यूं समझा दयो ।।

कोए सड़क पै घायल सै,
कोए देश की खातर लड़ ज्या सबकी

ज्यान बचावण खातर खून घणा कम पड़ ज्या ,
अड़ ज्या सै नर काल के आगै
जै टेम पै खून पहुँचा दयो।
रक्तदान तें बड़ा दान ना सबनै न्यूं समझा दयो ।।

तीज-त्योहार अर जन्मदिवस पै रक्त शिवर तम लाया करो

रक्तदाता ही जीवनदाता, मिसाल नई बणाया करो
गली – मोहल्ले जा कै नै रक्तदान की अलख जगा दयो।
रक्तदान तैं बड़ा दान ना सवनै न्यूं समझा दयो ।।

रक्तदाता बण तीसरे भिन्ने रक्त की फसल उगाओ
रिश्ता बणै खून का थारा, सब नै न्यूं समझाओ
रक्तपुरुष मिलै मधुकांत – से आके कैम्प लवा दयो।
रक्तदान तैं बड़ा दान ना सबने न्यूं समझा दयो ।।

खूनदान कर मन भी नाचै, नाच उठ सै रोम-रोम
देश – प्रेम अर बणै एकता, दान करै जब छत्तीस कौम,
चन्द्रदत्त कह दाता बण कै रक्तदान का बीज बिजा दयो,
रक्तदान तैं बड़ा दान ना ,सबनै न्यूं समझा दयो ।।
भाइयों रै, सजनों रै… भाइयों रै, सजनों रै…।

दर्शन दे दो शनि महाराज

हो तेरे! मंदिर मैं हम आए दर्शन दे दो शनि महाराज ।-2

शनिदेव सैं सबतैं न्यारे
सूर्यपुत्र सबके सहारे ,
हारे होड़ तनै जिताए ,दर्शन दे दो शनि महाराज।

हाथ गदा अर दंड धार कै
दुष्टों नै देवो भगा मार कै
तुम्ह तै न्याय के देव बताए,
दर्शन दे दो शनि महाराज।

जिसनै दुनिया मैं घमंड करया सै
शनि नै उसका अभिमान हरया सै
तेरे भक्तों नैं नाम कमाए, दर्शन दे दो शनि महाराज।

चंद्र दत्त तेरी ज्योत जळावै
सचिन शर्मा भजन सुणावै,
उड़द, नारियल, तिल भगत चढ़ाएं, दर्शन दे दो शनि महाराज।

लौटेगा मर्यादा पुरुषोत्तम

(कविता अतुकान्त)

वैज्ञानिकों ने विलुप्त प्रजाति
डायर वोल्फ को फिर से
ला दिया धरती पर,
था जो गायब साढ़े बारह हजार वर्ष से;
सवाल जेहन मे आया
तो क्या उस मर्यादा और
मर्यादा पुरुषोत्तम को लाएंगे
जो मात्र सात हजार साल से
चले गए यहां से
जिनके तो विद्यमान है अब तक वंशज भी..
इस सवाल का जवाब मिलेगा या नहीं
पर कुछ सिरफिरे जुटे हैं
फिर से मर्यादा लाने और
हर आदमी को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने में
जिन्हें हम साहित्यकार कहते हैं।

शादी में बैंड क्यों बजाया जाता है

(हास्य कविता )

दूल्हे को आगामी खतरे से आगाज कराया जाता है
कैसे बजता है बैंड यह उसको अंदाज कराया जाता है
वैसे तो बैंड का अर्थ होता है अपने अनुसार मरोड़ देना
कैसे बजता है बैंड प्रैक्टिकल करके दिखाया जाता है।

मैं जब भी देखता हूं बैंड वाले यम के दूत जैसे लगते है
नाचते हुए बराती अब मुझको तो भूत जैसे लगते हैं
फूल बिखेरते है किसी दूल्हे के स्वागत में मुझको तो
चमड़े के तेल पिए सिर में लगने वाले जूत जैसे लगते हैं।

जब बैंड बजता है तो आदमी अपने आप ही नाचता है
नाचना आए या ना आए पर बैंड पर औकात जांचता है
शादी में देखता है सिर्फ औरों को नाचते उदाहरण रूप में
बीबी घर पर आते बिना आवाज के ही बैंड बाजता है।

कुत्ता (हरियाणवी लघुकविता)

जो म्हारे बारण बैठा करदा
इसी हवा फिरी
इब बड़्डी कारां मैं बैठण लाग्या,
मैं गया नेता के घर आपणा मान कै
था मेरा वो जाणकार,
अर शहर जाकै पा ग्या ख्याति,
सोच्चा इंटरव्यू खातर मिल ल्यूं,
जिब गया कोठी पै दरवाजे पै लिक्खा था..
अन्दर खूंखार कुत्ता सै,
न्यूं पढकै मैं उल्टा बोहड़ लिया।

पाटड़ा

जो होवै सै घणे काम का
कदे यू भाती बणा दे
कदे सगाई करावै
कदे बराती बणा दे
कदे यू भजनां मैं बैठा कै
करावै प्रभू मैं ध्यान,
नहाण बी करावै खूब
पाटड़ा तैं शान हो सै
जब मां चूल्हे आगै बैठकै
पोवै रोटी, सबतैं बड़ा सिंघासन हो सै।

“मां” ( जनिका छंद )

मां
शब्द संपूर्ण
अपूर्ण संसार में।

मां
है पाठशाला
संस्कारों की सदा।

मां
एक याद
जिसे भुलाए नहीं।

मां
एक तपस्या
है वरदान रहित।

मां
एक रिश्ता
जो है अटूट।

मां
की गोद
स्वर्ग का किनारा।

मां
एक विश्वास
कभी न टूटे।

मां
एक पूंजी
कभी खत्म नहीं।

मां
है शम्मा
रोशन करे जिंदगी।

मां
एक साहस
जो थकता नहीं।

मां
सागर है
गहन अनुभूतियों का।

मां
आस्था है
हर नास्तिक की।

मां
मंदिर है
रहते प्रेम प्रभु।

चंद्रशेखर

तू है मेरा चंद्रशेखर!
जिसे चरण भी न मयस्सर था
धारण किया उसको मस्तक पर
देखा सिर्फ गुण
नहीं देखा दाग अवगुण
सच में तू है भोला!
क्यों न करे प्यार
यह पूरा संसार,
जब तुम इतने प्यारे हो,
भूत पिशाच, देव, किन्नर
मानव दानव पशु, प्रकृति
सबको सीने में समाते
सबके सहारे हो,
हम धतूरो के विषैले अवगुण भी
अधर से लगाते हो
हे चंद्र के चंद्रशेखर!
इसलिए महादेव कहलाते हो।

नीलकंठ शिवस्वयंभू महादेव छंद

यह वर्णिक छंद संक्षिप्त छंद है,
जो त्रिपदी है।
कुल वर्ण
4+5+4=13
तीनों पद एक दूसरे पर निर्भर है।
अंत में अर्थ पूर्ण हो।
सांकेतिक भाषा शिल्प
तुक अतुकान्त दोनों मान्य
हल्की अलंकारिक और बिंब, प्रतीक योजना।

उदाहरण:
4,5,4 वर्ण

हम सदा
साथ तेरे
हृदय में ।

तुम मेरे
हो धरा के
चंद्र प्रिय!

तेरी चोटी
है चितचोर
नैन तीर।

मेरे मीत
महादेव तू
कहां नहीं।

सदा सब
सूरत समा
सदाशिव!

तुझे करूं
मैं ऐसा प्यार
नहीं पार।

पाप और
पुण्य कभी न
खुद पास।

मेरे नाथ!
दो ऐसा हाथ
रहे आस।

आदमी है
नकाबपोश
गिरगिट!

सांस तार
और सूत भी
न भरोसा।

सावन तो
आता रहेगा
नयन में।

जो मेरा
वही तेरा है
अंतर क्या।

देखो ये हैं
उधारी सांसों
प्यार करो ।

किराए की
जिंदगी पर
पुण्य दुर्ग।

चंद्र के हो
चंद्रशेखर
चंद्रनाथ!
धड़कन
धड़ककर
दे हाजिरी।

इतना है
प्यार तुमसे
शब्द नहीं।

शिव तुम
मेरे सर्वस्व
क्या कहूं मै।

मेरी चित
चोरनी चली!
मंद – मंद।

सदा रहो
मेरे समीप
महादेव!

नशा

नशा हर कोई करता है
नशे का अंजाम भरता है
सारी दुनिया ही नशेड़ी है
कहीं हुक्का, दारू बीडी है।

किसी को चाम का नशा
किसी को दाम का नशा
किसी को काम का नशा
किसी को राम का नशा।

किसी को खाने का नशा
किसी को गाने का नशा
किसी को बजाने का नशा
कविता भी रचाने का नशा।

नशे की धुन में हर कोई
चलता मगन में हर कोई
किसी की चाल में नशा
किसी को माल में नशा।

नशा कोई भी होता है..
नशा बुद्धि को खोता है
नशा तो जोश भरता है
नशा मदहोश करता है।

नशा करो पर सात्विक हो
नशा करो पर आत्मिक हो
नशा नाश नहीं मस्ती का हो
नशा तो वतन परस्ती का हो।

चांद का ख्याल रक्खा है

उसने यूं घूंघट सम्भाल रक्खा है
लाजमी चांद का ख्याल रक्खा है।

अंधेरे में ही निकलती है बाहर वो
आई हर बला को टाल रक्खा है।

आईना देख के इसलिए शर्माता
आइने में नूर अपना डाल रक्खा है।

खुद को कहता है बड़े दिल वाला
किस किस का दिल निकाल रक्खा है।

तेरे शोर का भी इलाज है मेरे पास
देख उस कौने में तेरा भी माल रक्खा है।

लोग सेब तक नहीं बेच पाते मगर
उस भाव बेच खराब माल रक्खा है।

दिन में भी आज उजाला नहीं है
या आंख में काजल डाल रक्खा है।

चंद्र तेरी जुबान में क्या गहराई है!
जैसे पिंजरे में शेर पाल रक्खा है।

मैं हंसता रहता हूं

मैं हंसता रहता हूं
मुश्किलें इतनी बड़ी
समाधान हुआ ही नहीं
संभलना चाहा
मगर संभला ही नहीं
संबंध इतने टूटे
कोई बचा ही नहीं
धोखा इतना मिला
कुछ बचा ही नहीं
विश्वास इतना टूटा
शेष रहा ही नहीं
विरह इतना मिला
दशों दशा कम पड़ गई,
सपने इतने टूटे
हृदय में खंडहर हो गए।

अब सोचता नहीं
अब चिंता नहीं करता
अब किसी की याद नहीं बची
अब आंसू का कतरा नहीं रहा,
अब कोई मुश्किल आए तो
मुझे हंसी आती है,
मैं हो गया हूं..
बेपरवाह
लापरवाह
हंसता हूं
उस नियंता पर
जिसने नियम बनाए,
हंसता हूं उस पर
जिसने कहा था..
संसार दुखों का घर है,
अब मैं आजाद हूं…
क्योंकि मैं सिर्फ हंस देता हूं
लोग इसे व्यंग्य कहें
या मुझे लापरवाह
कोई फर्क नहीं पड़ता
मैं इनकी सोच पर भी
हंसता हूं।

वक्त तेरा है ( मुक्तक )

वक्त तेरा है तो क्या वो भी ढल जाएगा
रूप का है जो घमंड वो भी गल जाएगा
खाकर माल दूसरों का देह मजबूत की
पंचतत्व जलकर फिर से मिल जाएगा।

पुस्तक और आइना

पुस्तक और आईना विवाद कर बैठे
अपने अपने कर्मों का हिसाब कर बैठे
पुस्तक ने कहा मैं सदा शाश्वत हूं
सबसे अधिक प्रामाणिक विश्वस्त हूं
मैं सदियों संचित ज्ञान का भंडार हूं
मानव के मस्तिष्क की पहचान हूं
इतिहास की संजीवनी भी मैं हूं
मानव की सच्ची सहपथगामिनी हूं।

अब आइना मुस्काता बोल उठा
सुप्त ज्वालामुखी सा मुख खोल उठा
पुस्तक तूने जो कहा पूरा न कहा
जिसने तेरे अंदर भरा घूरा न कहा
लोगो ने तो जयचंद की पुस्तक रची
मीर जाफर की प्रशंसा खूब की
धर्म- ग्रन्थ को पाखड़ ग्रन्थ बनाया
तलवे चाटने वालों ने तुझे है घुमाया
अरे, अपने लिए अलंकार किसे नहीं भाते
सुनकर शठ और कहर हैं ढाते।

मैने जीवन में जो देखा वहीं कहा
गलत को गलत सही को सही कहा
दुनिया को जब मैं रास न आया
मुझे तोड़कर बाहर फिकवाया
पर मुझे टूटना तो स्वीकार था
क्योंकि सच से सदा ही प्यार था

जिस्म के कोई कितने टुकड़े करे
मगर मेरे अंश सदा सत्य पर अड़े
पुस्तक ! आदमी को भगवान बनाती
बताओ कब आदमी को इंसान बनाती।

जो पुस्तक को जीवन देता उसे नाम देती
उसने क्या कमी छोड़ी कब इल्जाम देती
माना आइने को तोड़ा जा सकता है
पर सुविधानुसार नहीं मरोड़ा जा सकता है
आईना कभी भी झूठ नहीं बोलता है
आदमी के चेहरे, आंख में छिपा खोलता है
आइने से सिर्फ उनको ही प्यार होता है
जिसे मिलावट का न तोहफा स्वीकार होता है।

मार की पुकार (लघुकविता)


सोने को लोहा पीटे
करने को आभूषण तैयार
मार कई बार सहे
निकले न आवाज एक बार
लोहे को लोहा पीटे
आवाज में हो चित्कार,
मार सदा अपनो की ही
होती है दुखदाई
गैर ठहरे गैर भला
उनसे कैसी रुसवाई।

हार जो गया तो क्या

हार स्वीकार जो गया
वह फिर जीता ही नहीं
मन से हो गया निढाल
फिर वह उठा ही नहीं।

हार जो गया मन से ही
जीत न पाए तन से भी
केवल सांसे ही चलती
हार जाता जीवन रण से।

जिसने हार को न माना
सिर्फ इसे जाना पहचाना
हर हार को आभार समझा
औ सीख को माना खजाना।

प्यास सभी को लगती है
न जाने कब कहां बुझती है
मन हो या हो मृगा हो कोई
मरीचिका सबको ठगती है।

हार को गले में ले धार
दिल में चुभेगा बार बार
उबलेगी पीड़ा लड़ेगा फिर
जीत में बदलेगा गुबार।।

क्या दिन थे


क्या दिन थे शादियों में धरती पे सोना भी सोना होता था
खुशी – गम में मिलकर रहते थे ना अकेला रोना होता था
हाथों का पलना होता था, ममता का बिछौना होता था
नींद की गोली नहीं कहानी सुनकर सोना होता था।

छोटी – छोटी शरारतों से दिल खोलकर हंसते थे
हो जाए गलती से गलती दांत कभी न कसते थे
थोड़ा था पर बड़े प्रसन्न थे नियत तो सबकी अच्छी थी
झूठ बोलना आता न था , झूठ भी सच्ची होती थी।

कोलाहल था नहीं किंतु उषा कलरव वाली थी
सुबह सुनहरी शाम सलोनी रात बड़ी मतवाली थी,
हंस कर टाल देते अगर कोई गुस्से से कहता था
अगर वैर हो जाए तो वैर में भी अपनापन रहता था।

लड़ झगड़ कर अगले दिन उनके घर से लस्सी लाते थे
पिटकर पिता से झाड़कर कपड़े अगले पल मुस्काते थे
आमदनी जो होती अठन्नी होते चवन्नी खर्चे थे
कई – कई बच्चे पल जाते थे कभी न सिर पर कर्जे थे।

गांव की लड़की सबकी बेटी इज्जत की रक्षा करते थे
डर से बड़ी शर्म थी ,बस बड़ों की आंखों से ही डरते थे
राम राम किए बिना निकला सबसे बड़ा अपराध था
कायदे में भी कायदा था हर किसी को याद था।

हस्त कला में मस्त सभी थे,कलपुर्जे का काम न था
आदान प्रदान वस्तु का होता नकद कोई दाम न था
जाति से बंधे थे काम लेकिन जातिवाद नहीं था
हंसी ठिठौली तो होती थी लेकिन वाद विवाद नहीं था।

हिंदी

अ अज्ञान अंध दूर करती है हिंदी
अा आचरण मन में भरती है हिंदी
इ इच्छा हमारी विश्व गुरु बनाएगी
ई ईश कृपा हम पर सदा छाएगी
उ उपर नीचे होता है जीवन कभी
ऊ ऊपर वाला याद करना तभी।
ऋ ऋषियों की वाणी अमृत दात्री
ए एक बार सबकी पतन की रात्रि
ऐ ऐसा न स्थल जहां पर हर नहीं
ओ ओमकार से सुखदा स्वर नहीं
औ औरत ही जगदम्बा का रूप है
अं अंक में पला जिसके हर भूप है
अ: प्रातः का सुमिरन फलतदाता
क कभी दिल न लगे अन्यत्र विधाता
ख ख्वाब मिलने के रख नर रब से
ग गजब का साहिब बैठा है कब से
घ घड़ीभर खुद का भी चिंतन कर
च चन्द्र चाहे जो भला भजन कर
छ छप्पन भोग भी न तुझे तृप्ति देंगे
ज जब सब्र होगा प्रभु मुक्ति देगे
झ झंझावात कितने हों जीवन में
ट टटोलता कौन है कंटक उपवन में
ठ ठग है आत्मा का जो छलावा है
ड डगर कठिन है, पथ में लावा है
ढ़ मंजिल एक, चलने का ढंग अलग
त तरक्की देख किसी की कभी न सुलग
थ थमेगा तूफान रुकेगा भूचाल भी
द दीवार टूटेंगी, झुकेंगी डाल भी
ध धर्म, धैर्य धनुष उठा संधान कर
न नहीं डर विपदा से समाधान कर
प पतंग है जीवन संभालता और है
फ फर्क है वह उपर नीचे करता डोर है
ब बार बार क्यों इंसान बेवफाई करो
भ भला जो चाहते हो भलाई करो
म मगर भला करके न अहसान कर
य यही मानवता का पथ पहचान कर
र रक्षा करेगा खुद तेरा भगवान ही
ल लक्ष्य जब हो तेरा जग कल्याण ही
व वरना अंत में सबकी मंजिल श्मशान है
श श्मशान से ही नश्वरता का ज्ञान है
ष षड्यंत्र तो भगवान का अपमान है
स सकल चराचर में शिव विद्यमान है
ह हिंदी हिंदुस्तान औ विश्व की भाषा है
क्ष क्षय न होने वाली ज्ञान पिपासा है
त्र त्रिगुणी सरल स्पष्ट संप्रेषण मात्र हिंदी
ज्ञ ज्ञान गुण शक्ति आंनद की पात्र हिंदी
श्र श्रमिक के श्रम सी सुखद हिंदी है
भंडार अपार सुखसागर अनहद हिंदी है।

सरस्वती वंदना


तुमसे वाणी मिली वाणी माता नमन
भाव सुमन दिए करते तुमको अर्पण
तम से हमको किया है दूर प्रकाशनी
इस धरा को हो देती, बुद्धि का नयन।

नहीं मांगते हैं हम, अपने वजूद की लिए
न अलंकार चाहिए किसी महबूब के लिए
वात्सल्य मिले मां भारती का, सदा
शुभ हो चिंतन हमारा कर्म शुभ के लिए।

कल कंठ करो मां हे श्वेतांबरी!!
कोई कालिख न देना जिंदगी में मेरी
गिरा दो गिरा! हमसे दंभ का अचल
भ्रम मिटा हमारा मां ब्रह्मचारिणी।

Dr. Chander


डॉ चंद्र दत्त शर्मा

रोहतक

तर्ज : तुमसे मिलने को दिल चाहता है रे बाबा

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