दे मॉं सरस्वती ऐसा वरदान
मेरे को वह हम सबको माँ सरस्वती ऐसा वरदान दे कि हम सबके जीवन में सदैव विद्या के संग विनय का ज्ञान होता रहे । वह माँ सरस्वती मेरे को ऐसा आशीर्वाद प्रदान करती रहना की मैं सदैव अपने लेखन को उत्कृष्टता पर लिख आध्यात्मिक संतुष्टि प्राप्त करता रहूँ।
मेरे दिवंगत आध्यात्मिक शिक्षक शासन श्री मुनि श्री पृथ्वीराज जी स्वामी ( श्री ड़ुंगरगढ़ ) और साध्वी श्री कृतार्थ प्रभा जी के द्वारा दी हुई लेखन की शिक्षा को मैं सदैव अपने जीवन में रख आगे से आगे बढ़ने को प्रोत्साहित होता रहूँ ।
कहते है कि जिस मनुष्य के हृदय में सच्ची मानवता हैं, उसकी सोच हमेशा यही होगी कि मुझे मिला हुआ दुःख किसी को नही मिले और मुझे मिला हुआ सुख सबको मिले।
वह मानव का यही मधुर सबंध और व्यवहार जीवन को सार्थक करता हैं वैसे सरलता सब गुणों में नायक है, ये है तो सब है,नही तो कुछ भी नही है । वह व्यक्ति इसी के सहारे ही सफल हो पाता है मगर विनय और विवेक साथ हो तो शिखर छू जाता है ।
हमारे जीवन में सही मायने में प्राप्त विद्या और विनम्रता में गहन घनिष्ठता है । आदमी वास्तव में जितना विद्वान होगा वह उतना ही विनयवान होगा। हम देखते है कि कुछ विद्वान जो दंभी दिखते हैं वह कभी भी वास्तविक विद्वान नहीं हो सकते है।
वह घमंडी का पद चाहे कितना ही ऊँचा हो वो ज्ञानी व विनीत के सामने सदा नीचा रहेगा , वास्तविक ज्ञानी तो विवेकशील एवं भीतर से बड़ा होगा। वह यह जानेगा कि छोटे से जीवन में क्यों अनावश्यक ही अहम का खंभा खड़ा किया जाए ।
वह यह भी जानता है कि विनम्रता से हम परायों को भी अपना बना लेते हैं जबकि अभिमान तो अपनों को भी दूर कर देता है । हमारे जीवन में विनय एक बहुत ही प्रिय गुण है । वह गुण क्या है , यह मानवता का आभूषण है।
नम्रता, ईमानदारी, शालीनता, मधुरभाषिता मिलनसारिता आदि – आदि से सरोबार विनयवान का व्यवहार होता है। यह उसके आचरण में स्पष्ट परिलक्षित होता है जो की शिष्टाचार के संस्कार है ।
उसके स्वभाव से दंभ और अभिमान कोसों दूर होते हैं इसीलिए हम देखते है कि विनयवान का व्यक्तित्व सदा ही विनम्र और महान होगा । विनयशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के द्वारा पिता के वचनों का सम्मान है ।
वह राजपाट का आसन त्यागकर तनिक नहीं हिचकिचाए और उन्होंने 14 वर्ष तक कठोर वनवास का जीवन जिया । अतः मॉं सरस्वती से पुनः अनुनय सविनय है कि मेरे को वह हम सब विद्वत जन को ऐसा वरदान दें कि विद्या के संग हमारे में विनय का ज्ञान भी सदैव हो । यही हमारे लिए काम्य है |

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)
यह भी पढ़ें :-







