हरियाणवी को भाषा का दर्जा दिलाने के लिए अलख जगा रहे हैं , साहित्यकार डॉ.चंद्रदत्त शर्मा

हर किसी को अपनी मातृभाषा या बोली प्यारी होती है। बच्चा अपना पहला शब्द अपनी मां बोली में ही बोलता है। यही कारण है कि आदमी कहीं भी जाए वह अपनी बोली को नहीं भूलता। हरियाणवी तो ऐसी बोली है कि फिल्म से लेकर विदेश तक धूम मचाए हुए है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपने तो जुझारूपन अपने सीधे-सादेपन और स्पष्टवादिता के कारण बहुत ही लोकप्रिय हो गई है।

हरियाणवी को प्रचलित और प्रसिद्ध करने के लिए विभिन्न साहित्यकारों ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सभी का नाम लेना यहां कठिन कार्य है। इतना ही नहीं बॉलीवुड अभिनेताओं और हरियाणवी गायक और गीतकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

हरियाणवी के सबसे बड़े पक्षधर और ध्वजरक्षक तथा हरियाणवी को भाषा का दर्जा दिलाने के लिए वचनबद्ध खुद हरियाणा साहित्य अकादमी निदेशक डॉ. धर्मदेव विद्यार्थी जी हैं। डॉक्टर विद्यार्थी जी प्रत्येक जिले में कविसम्मेलनों को न केवल संबोधित करते है बल्कि हरियाणवी के संवर्धन के लिए हर संभव मदद का आश्वाशन भी देते हैं। उनके महान प्रयासों से अनेक साहित्यकारों ने हरियाणवी में साहित्य रचने लगे है।

आज हरियाणवी गानों की धूम विदेशों में भी मच रही है। हरियाणवी को बढ़ावा देने के लिए कुछ लोगों ने शॉर्ट फिल्म का भी सहारा लिया है। इनमें प्रमुख डॉक्टर वीएम बेचैन, पर्दे के अभिनेता श्री यशपाल शर्मा की फिल्म दादा लख्मीचंद, इसके अतिरिक्त बहुत से हरियाणवी नाटक जिनमें श्री नरेंद्र बल्हारा जी का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है।

साहित्यकारों में प्रमुख प्रोफेसर पूर्णचंद शर्मा, डॉक्टर विश्वबंधु शर्मा, श्री रामफल चहल, श्री जनार्दन शर्मा और भी बहुत से साहित्यकार है .. लोककवि श्री रघबीर शर्मा मदीना, रामधारी खटकड़, श्रीनिवास शर्मा, डॉक्टर मधुकांत, श्री महेंद्र सिंह बिलोटिया, सत्यवीर सिंह नाहड़िया, विनोद सिल्ला, आनंद कुमार आशोधिया, अनिल खरब, सुशीला जांगड़ा, रामफल खड़कड़, अशोक कुमार जाखड़, पवन मित्तल, डॉक्टर राम अवतार कौशिक, डॉक्टर राजकुमार जमदग्नि, दलबीर फूल, हरियाणवी हलचल,, श्री सतपाल पराशर आनंद, कृष्ण कुमार निर्माण, डॉक्टर पुष्पा कुमारी, सुदेश कुमारी, डॉक्टर आरती अरोड़ा, श्रीमती चंद्रावती दीक्षित, सीमा शर्मा, डॉक्टर तरुणा सचदेवा, डॉक्टर सतवीर निराला, नीलम नारंग,भूप सिंह भारती, जय सिंह जीत,डॉक्टर रमाकांता, जनार्दन शर्मा, डॉक्टर विकास यशकीर्ति, महेंद्र सिंह अचेत,कौशल समीर सोनू, मास्टर जयभगवान यादव, आशा खत्री लता, शकुंतला काजल, डॉक्टर शीलकराम जांगड़ा, डॉक्टर नवलपाल प्रभाकर दिनकर, डॉक्टर चंद्रदत्त शर्मा चंद्रकवि रोहतक आदि का नाम आदर के साथ लिया जा सकते है।

डॉक्टर चंद्रदत्त शर्मा चंद्रकवि हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार है जिन्होंने 50 पुस्तकों का सृजन किया है।
शैली साहित्यिक मंच रोहतक द्वारा साहित्य का प्रचार प्रसार 10 वर्षों से कर रहे हैं। डॉक्टर चंद्रदत्त शर्मा हरियाणवी को भाषा का दर्जा दिलाने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं।

इन्होंने हरियाणवी को बढ़ावा देने के लिए हमारे चारों तरफ बिखरे गुमनाम होते लोकगीतों को एकत्र कराया और उसकी पुस्तक का आकार दिया, इसका नाम गीत गुमनाम रखा। इसके अतिरिक्त अपने गांव ब्रह्मणवास के भजनिमों के 100 से अधिक भजनों को संकलित किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने माटी की महक हरियाणवी सैकड़ो कविताएं लिखी और हरियाणवी भजनों का भी संग्रह तैयार कर गायको को समय समय पर प्रदान करते रहे हैं।
इनका हरियाणवी लघुकविता काव्य संग्रह धतूरा भी है।

इसके अतिरिक्त इन्होंने एक ऐसी साहित्यकारों की टीम बनाई जिनको पहले हरियाणवी में लघुकथा ,लघुकविता आदि की प्रैक्टिस कराई गई, उसके बाद साझासंग्रह निकाले गए।

उनके प्रमुख साझा संग्रह हरियाणवी में हरियाणवी जिंदाबाद! जिसमें हरियाणवी लघु कविताएं हैं।
जय हरियाणवी साझासंग्रह इसमें हरियाणवी लघुकथाएं शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त डॉक्टर चंद्रदत्त शर्मा चंद्रकवि रोहतक ने हरियाणवी को बढ़ावा देने और उसकी भाषा का दर्जा दिलाने के लिए हरियाणवी व्याकरण जिसका नाम म्हारी व्याकरण है नाम से पुस्तक लिखी है।
इस प्रकार डॉक्टर चंद्रदत्त शर्मा सदा दिन रात हरियाणवी को समर्पित है और मां बोली को उसका हक दिलाने के लिए सभी साहित्यकारों के साथ काम कर रहे हैं।

डॉक्टर नवलपाल प्रभाकर दिनकर

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