चीनी यात्री ह्वेनसांग
चीनी यात्री ह्वेनसांग

बात हजारों साल पहले की है। कहा जाता है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत आया था तब वह भारत की संस्कृति से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए भारत और चीन के संबंधों पर जब भी कभी चर्चा होती है तब ह्वेनसांग की भारत यात्रा का जिक्र होता है।

बता दें कि चीनी यात्री ह्वेनसांग चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान भारत आया था और इस दौरान उसने भारत के कई प्रमुख स्थानों की यात्रा की और लोगों के व्यवहार, भारतीय संस्कृति और परंपराओं से रूबरू हुआ था।

चीनी यात्री ह्वेनसांग को भारतीय धर्मग्रंथों और इतिहास में भी बेहद रूचि थी और वह इसका अपने पास संग्रह भी रखे हुए थे। बताया जाता है कि ह्वेनसांग अपने देश चीन वापस लौटने से पहले अपने अनुभव को तत्कालीन सम्राट हर्षवर्धन के साथ चर्चा की थी और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की थी।

बदले में महाराज हर्षवर्धन ने उन्हें उपहार में काफी चीजें दिए थे और  चीन वापस लौटने के लिए उन्हें नाव और 20 सैनिकों की व्यवस्था भी कर दी थी।

इस बात के संबंध में एक कहानी बताई जाती है। कहा जाता है कि सम्राट हर्षवर्धन ने अपने योद्धाओं से कहा था कि जब वे चीनी यात्री ह्वेनसांग को चीन पहुंचाने जाएं तब साथ में अपने साथ भारतीय धर्मग्रंथ और ऐतिहासिक वस्तुएं भी सुरक्षित पहुंचाएं, जो कि भारतीय संस्कृति का प्रतीक है और उनकी रक्षा करना सैनिकों का कर्तव्य है।

भारतीय सैनिक जब ह्वेनसांग के साथ जा रहे थे तब समुद्र यात्रा के दौरान एक दिन समुद्र में भयंकर तूफान आया और सब लोग डर गए। नाव का संचालन करने वाला प्रधान नाविक कहा कि नौका का भार अधिक हो रहा है इसलिए इन ऐतिहासिक वस्तुओं और पुस्तकों को समुद्र में फेंक दिया जाये और अपने प्राणों की रक्षा की जाये।

इस पर एक अन्य सैनिक ने कहा कि यह हमारे लिए अग्निपरीक्षा का समय है और हम इन वस्तुओं और किताबों की रक्षा करेंगे क्योंकि यह हमारी भारतीय संस्कृति से जुड़ी हुई हैं और इनकी रक्षा करना हमारा प्रधान कर्तव्य है और देखते ही देखते कई सैनिक समुद्र में छलांग लगा लिये और इससे किताबें और वस्तुएं बचाने के बदले में कुछ सैनिक अपनी जान गवा दी।

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इस घटना से ह्वेनसांग बहुत प्रभावित हुए कि भारतीय सैनिक अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए किस तरह त्याग और बलिदान के लिए तैयार हैं। इस घटना से ह्वेनसांग इतनी प्रभावित हुए थे कि उनकी आंखों से आंसू आ गए थे। वही आज चीन भारत से दुश्मनी मोल लेने का दुस्साहस कर रहा है।

लेकिन भारतीय आज भी अपने संस्कारों को नहीं भूले हैं और आज भी चीन से आये लोगों का यहां पर स्वागत किया जाता है और उनके प्रति दोस्ती का हाथ बढ़ाया जाता है।

ह्वेनसांग ने अपने देश चीन भारत यात्रा से वापस लौट कर कई भारतीय ग्रंथो का अनुवाद किया था और भारतीय संस्कृति की तारीफ की थी। ह्वेनसांग के बाद भी कई चीनी यात्री भारत आये थे और यहाँ की संस्कृति और लोगो से रूबरू होते रहे।

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