ढाट इतिहास

ढाट इतिहास

ढाट का ढंग निराला मन भावन पावन,
ढाट का रंग निराला चित्त चित्र पावन।

खावड़ में खोदते ख़ूब पार खेतों में ,
मीठा मन भावन धोरा धरती रेतों में।

झाड़ जंगल पहाड़ नहीं आकड़े उगते अपार,
बूहड़ा फोग सिणिया खीप खड़े कर क़त़ार।

मनख महमानों की करते मान मनोहार मोकली,
जीमण को रोटी राबड़ी झण मखण ढोकली।

कंठे की कीर्ति रीति रस्म अनोखी अजब,
पीलू पाका जाल केरां में गांगेठी ग़ज़ब।

पारकर में प्रेम बसता जहां डूंगर कालूंझर,
बोल चाल गुजरत से मिलती जुलती मधुर।

सामरोटी की रोटी बेटी व्यवहार रसीला रंगीला,
मेल जोल मेलाप मन मोहक नैन नशीला।

वट वंगे में मिलावट नहीं शुद्ध आचरण,
रहमकी बज़ार की उमंग संग उम्दा आचरण।

मोहराणो अमराणो सिर मोर ढाट का ढकन,
लांगोटा तरेवटा फेंटा फूटरा सुंदर सिर ढकन।

कागा कितना करें बखान ढाट इतिहास का,
दुनिया में नहींं जोड़ ढाट इतिहास का।

ढाट इतिहास

जिला थरपारकर सिंध दो भागों में विभाजित है एक धोरा ऊबड़ खाबड़ टीलों टीबों वाला मरू भूमि भाग जो थार ढाट के नाम से ओर दूसरा सख़त समतल हि़स़ा जिसको नारा नाम से प्रसिद्द है!
संस्कृत में स्थल को थळ ढाट थर थार कहा गया,!
ढाट में अमरकोट, छाछरो, मिठ्ठी, दीपलो, नगर पारकर ओर खिपरो शामिल है नगर पारकर का कुछ भाग पहाड़ी रण क्षेत्र है !

थळ ढाट को रेगिस्तान नाम से भी सम्बोधित किया जाता है,सिंधी भाषा में यहां निवास करने वालों को थरी ढाटी भी कहते है इनकी मातृ भाषा ढाटकी जिसमें सिंधी हिंदी मारवड़ी गुजराती कच्छी का समावेश है!

पारकर: प्राचीन काल से पारकर के भूभाग ओर कच्छ क्षेत्र के मध्य पानी रहने के कारण उनको खारी कहते थे को पार करने के लिये आवा गमन बाधित होता था इसलिये खारी पार कहने लगे जो बाद में पारकर नाम दिया गया कारूंझर पहाड़ नगर पारकर में स्थित है! ढाट का क्षेत्र फल लगभग 10542 वर्ग मील है!

सीमा:

ढाट परगने के उतर दिशा जोधपुर रियास्त का कुछ भाग खिपरो सामारो पूर्व में जोधपुर रियासत दक्षिण कच्छ का रण सामारो हैदराबाद टंडोबागो स्थित है! समस्त ढाट रेतीला बाळू है जहां समतल भूमि है उनके डेहर कहते है शेष ऊंचे विशाल काय धोरे है गांव कांटिया से अमरकोट तक 48 मील दूरी में 140 बड़े धोरे मोजूद है जिसको भिट कहा जाता है!

सूरज उदय होने पर जिस भाग पर धूप (तिड़का) पड़ती उसको तिड़कोल ओर विलोम भाग को गोछार ऊपर भाग को मथारी जहां दो धोरों का मिलन हो उनको बुकळ अतिम छोर की पूछढ़ी को पोछांडो समतल सीधी ज़मीन को डेहर डाहरी छोटी भिट को दड़ो दो दड़ो के बीच सख़्त ह़िस़े को तली नाम से पुकारा जाता है!

ऊंची भिटें उनके नाम:

1,कालकर भिट यह ढाट की ऊंची लगभग डेढ़ मील लम्बी हेलारियो लंजा एंव पोसरके सादन के बीच है,लूणकी भिट की ऊंचाई 588 फुट दादिये का तला के उतर में सादूल भिट ऊंचाई 408 फुट अरनियाळो भिट ऊंचाई 484 फुट रोझड़ो भिट 518 फुट धाड़िंदड़ो भिट ऊंचाई 529 फुट आलमसर भिट ऊंचाई, 493 फुट काळी भिट गांव बिसारणिया से अढ़ाई मील दूर ऊंचाई 595फुट झूंड भिट ऊंचाई 373 फुट वेराड़ो भिट ऊंचाई 459 फुट गंगासरो भिट ऊंचाई 428 फुट वेसरोड़ी भिट ऊंचाई गांव साहू का तला के पूर्व दिनोड़ी भिट 512 फुट गांव तुगूसर के उतर में ढोकाणी भिट गांव चारणोर की पूर्व दिशा झिरकली भिट जींदे का तला की पूर्व दिशा चांगे जो टौंक गांव चेलहार के पश्चिम दिशा बलिहारी भिट छड़ हमीर के पास ,करकर भिट जेसे का पार की उतर ओर हाडारी भिट ठारे जे तड़ की पूर्व दिशा कसल कोट भिट नाम की दो भिट है एक गांव चारणोर की पश्चिम दिशा ओर दूसरी कांटिये के पास मेघेके तड़ के पश्चिम वाली भिट जिससे तड़ हमीर वाली भिट, 36 मील की दूर देखी जाती है सामी भिट मेघे जे तड़ की पूर्व ओर शाहमीर भिट शाहमीर तड़ की उतर ओर सोनियाबा भिट जेसे जे पार की उतर ओर साईये जी भिट छाछरो की पश्चिम दिशा वहां से चौहटन का पहाड़ 60 मील दूर स़ाफ़ दिखाई देता है!

केळ भिट मिठ्ठी की उतर दिशा जहां ढोरो नारो वाली लाईट हवाई जहाज़ों को देने वाली रोशनी 74 मील दूर स़ाफ़ दिखाई देती है !झिरकली भिट सन्1856 में भूकम्प के कारण दो टुकड़े हो गइ !कोहराड़ी भिट चेलहार के दक्षिण ओर जहां किरूंझर पहाड़ी 72 मील दूरी पर नज़र आती है! ईसाबो टौंक गांव पाबूवेरो की पूर्वी दिशा में जहां चौहट का पहाड़ 60मील दूर से दिखता है ! महकी भिट, उठ थम्भी, नेतारी, गडह पठो, गेनण, गोगटियारी,टोरियारी,टोरो टौंक, मांगर भिट आदि अनेक बेशुमार भिटें है!

मुख्य डेहर,

अधिक क्षेत्रफल समतल जो डेहर होता है जहां खेती बाड़ी बारानी बहात्तर होती है ढाट में है कीतार का दक्षण पश्चम भाग मिठा तड़ का उतर भाग, सिल का पश्चिम ह़िस़ा ओर अकली के पूर्व तक, चारणोर का पश्चिम ह़िस़ा छछी का डेहर ,ताजे जो तड़ का पश्चिम क़ाबल शाह के पूर्व दिशा करणोर देथा एंव संग्रासी के बीच, !

विछेरे का डेहर मिश्री शाह के पश्चिम जानब अली शाह के पूर्व तथा भगीसल की दक्षिण ओर, हेकल कोरी धाड़ींदड़े के पश्चिम मेघे जे तड़ से पूर्व गांव रड़ली के दक्षिण पूर्व दिशा, मेणछो डेहर धांधो जे तड़ से पश्चिम वकड़िये की दक्षिण दिशा एंव झिरकली भिट की पूर्वी दिशा, ढोकारी डेहर चारणोर के दक्षिण एंव बुढे जो तड़ की उतर तरफ़ स्थित है, लाठी जो डेहर चारणोर के उतर पश्चिम दिशा, डे जो डेहर गवारड़ी के पश्चिम ओर मिश्री शाह के उतर ओर, डसारणो डेहर रबासर की दक्षिण एंव खुडी की उतर ओर, पोसरके जो डेहर पोसरका ओर रोहीड़ी के बीच, वे जो डेहर कांकिये के पश्चिम राजोड़े के पूर्व करणोर की उतर ओर, भकोई जो डेहर भकोई ओर आलमसर के बीच, टालपे जो डेहर मिठा तड़ के पश्चिम एंव सौभे जो तड़ की पूर्व दिशा, छहो डेहर छाछरो की पूर्व दिशा प्रेमी जी बेरी के पास, घोघारो डेहर हरियार की उतर त़रफ़, तालसर जो डेहर, सींहार जो डेहर सजाई जो डेहर चोणहार जो डेहर बड़े उपजाऊ प्रसिद्द है इनके अलावा प्रति गांवों में ढाट में ठाठ है!

कारूंझर पहाड़ी

थर ओर पारकर के भूभाग में कोई भी पहाड़ नहीं हैं केवल पारकर में चारों ओर छोटी छोटी पहाड़ियां है बीच में नगर पारकर शहर के पास एक बड़ी क़त़ार मुर्गी की अंडकार घूम आती है इसको कारूंझर डूंगर कहा जाता है!यह पहाड़ी नगर पारकर शहर के निक्ट दक्षिण पश्चिम की ओर कछ के रण के किनारे पर है जहां काफ़ी संख्या में प्राकृतिक दृश्य स्थल देखने योग्य है!

साळधरो: नगर पारकर से दक्षिण पूर्व पर है जहां शिव मंदिर तथा पानी का कुंड बहुत गहरा है सदेव लबालब रहता है यहां पर अस्थियां विसृजित की जाती है ओर क्रिया क्रम की रस्म आवा होती है हरिद्वार की श्रेणी में रखा गया है, शिवरात्रि में बड़ा मेला आयोजित होता है यहां पाराशर ऋषिका स्थान भी है जहां किंवदंती के अनुसार ऋषि ने खड़े होकर तपस्या की थी जहां उंगलियों के चिन्ह अभी तक मोजूद है !

गऊ मुखी :शाळधरे के दक्षीण तरफ़ एक मील पर गाय की शक्ल का एक झरना है जिसके स्तनों से पानी बहता रहता है!
भीम कुंड: गऊ मुखी के पास 20 फुट चौड़ा 40 फुट लम्बी बहुत गेहरा है पानी से भरा रहता है को भीम गोडा भी कहते है!
अंचलशोर: जहां अधिक संख्या में आनी के झरने है बारह मास बहते रहते है!

बाईयां रो बेसणो; गांव कासबे के पास पूर्व एक चट्टान है नीचे ख़ाली पच्चीस जनों को बेठने की जगह ओर ऊपर छत्री नुमा पत्थर है जब डाकू ह़मला करते थे तब यहां औरतें अपनी सुरक्षा के लिये आकर छिपती थी सुरक्षित स्थान है!
चंदन गढ: यह क़िला राणा चांदण गोबिंद राय द्वारा निर्मित है जब पारकर के राणा ओर अंग्रेजों के बीच फ़साद हुआ तब सन 1859 में अंग्रेजों की फोज ने तोपों से उड़ा दिया था!

कारूंझर की चारों ओर नगर पारकर भोडेसर मूंदरो मऊ,आधीगाम,खारड़ियो ,कासबो, एंव घरटियाळी आदि गांव है!पहाड़ी पर गुगळ, कूंभट,थोहर, सरस जाळ, बबुल आदि के पैड़ बहुत है जंगली जानवर सूअर बघड़ गीदड़ जरख आदि भी है! बारिश का पानी कछ के रण में चला जाता है पहाड़ की तलहटी यें प्राचीन अवशेष खंडहर के रूप मे दृष्टिगत होते है!

तालाब

थर ढाट में रेत की भिटें धोरे रेतीला क्षेत्र होने के कारण नदी बांध ढंढ नहीं है पेयजल के लिये कूआं खोद पानी पीते है जिनको तड़ तला खूह से जाना जाता हैजो बहुत गेहरे होते है बारिश के पानी पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है कुछ छोटी तलाई टोभा में चंद दिनों तक पानी ठहरता है कुछ गांवों में बड़े तालाब है जिसका विवरण निम्न प्रकार है
छछी तालाब: गांव का़बल शाह के पूर्व छछी के डेहर में लगभग अढ़ाई माह पानी रुकता है!

उणंद जी तराई: गढ़ड़ो से दो मील दक्षिण नगर पारकर के रास्ते पर तीन चार महिना पानी नहीं सूखता है !
गढड़े जो तालाब: शहर के दक्षिण छह तक पानी रहता है !
राणासर तालाब: गांव चेलहार के पास अमरकोट मार्ग पर छह माह पानी ठहरता है एक ओर छछी नाम का तालाब चार माह तक पानी होता है!

काला तालाब: चारणोर के पूर्व डोकारे के डेहर में चार माह पानी रुकता है !
खींसर जो तालाब: गांव के पूर्व चार माह पानी सूखता नहीं!
मिट्ठी तालाब: दक्षिण दिशा में तीन माह तक पानी रहता है!
भोडेसर जो तालाब: एक साल तक पानी रहता है –
इसके अलाव ओर भी छोटी ताल तलाईयां है का ठहराव कम है!

ढाट का भाग
थर की बनावट अजीबो ग़रीब क़िस्म की है जिसके नाम निम्न है!
खाओड़: छाछरो शहर से पूर्व ओर उतर गढड़ो तक को खाबड़ बोलते है जहां बड़े दरख़्त नहीं है!
कंठो: यह भाग छाछरो से दक्षिण भाग एंव नगर पारकर का उतरी हिस़ा शामिल है की ज़मीन उपजाऊ समतल सुंदर है जहां चौमासे की खेती बहूत होती है !


पारकर: नगर पारकर का दक्षिण भाग मगरा कंकरीली समतल भूमि है जहां रेतीले धोरे नहीं है !
सामरोटी: यह भूभाग तालुका मिठ्ठी से अक्षिण पश्चिम एंव दीपलो तालुका का उतर हिस़ा यहां की ज़मीन पर गेहूं प्याज़ की खेती होती है!
वंगो; तालुका दीपलो का पश्चिम भाग आता है!

वठ: तालुका मिठ्ठी ओर दीपलो का दक्षिण वाला भुभाग कछ का रण के निक्ट होने से पानी ऊंचा है!
महराणो:समाप्त महराण प्राचीन काल नदी के बहाव तट पर तालुका छाछरो का पश्चिम अमरकोट का दक्षिण पूर्व भाग है!
ढाट: थर का हृदय स्धल क़ेंद्र बिंदु बीच वाला भाग जो अमरकोट का थोड़ा भाग छाछरो का अधिकांश हिस़ा मिठ्ठी आग उतर भाग को ढाट कहते है एंव रहने वाले लोगों को ढाटी नाम से जाना जाता है की शुद्ध भाषा ढाटकी है!
अछो थळ:अमरकोट का उतरी भाग तालुका खिपरो का उतर पूर्व आता है तथा जोधपुर रियासत जैसलमेर तक सीमा है इसको बूअठ एंव डींईया भी कहते की जन संख्या बस्तियां अल्प मात्रा में है!

ढाट का ढंग ढाळ

ढाट प्राचीन काल से उथल पुथल वाला क्षेत्र रहा है ऊंचे नीचे धोरे टीले रेतीली ज़मीन समुंदर के कारण रही है कहा जाता है यहां समुंदर था जो बाद में प्राकृतिक आपदा के कारण प्रलय हुआ जिसके अवशेष ऊबड़ खाबड़ भूमि है आज भी वर्तमान में समु़ंदर सूख जाने पर कोडियां, शंख, खांरोटा, सीप, राओ (पत्थर चूरा) मिलते है ढाट की बाळू लाल रंग की अधिकतर पाई जाती है जो समुंदर के तट कराची के किलफ़टन जेसी है, समु़ंदर के बहाव के कारण भूमि सत़ह़ के नीचे पंद्रह बीस फीट के नीचे पत्थर मिलता है जिसको रोह कहते है खूह (तला)खोदने पर पानी खारा निकलता है जबकि दरिया के किनारे पानी मीठा होता है!

हाकड़ो नदी ओर महराण नदी भी ढाट में कुछ ह़िसे में बहती थी जो सिंधु नदी से निकल ढाट को आंशिक आबाद करती थी वो भी किसी भूकंप अथवा आपदा के करण बहाव बंद हो गया जिसका उदगम सिंधु नदी से होकर कछ के रन में होते समु़ंदर में समाती थी थर के बारे में भिन्न भिन्न मत है!

सिंधु नदी की शाख हाकड़ो बहावलपुर सिंध का पूर्व भाग वाया अमरकोट नगर पारकर कछ का रण जाती थी बहावलपूर जेसलमेर ढाट में निशान अभी तक मौजूद है!

मेहराण नदी सिंधु का शाखा थी दो वघो कोट दीपलो रहमकी बाज़ार बलिहारी से होकर कछ का रण होते लखपत तक जाती थी जिस पर सिंचाई से काश्त होती थी महराण नदी बहाव वाले क्षेत्र को महराणो कहते है!

राजपूत

ढाट (थर पारकर) पर शुरूआती दौर से परमार सोढा राजपूतों का शासन रहा है कभी सिंध के अधीन कभी दिल्ली बादशाहों की ताबेदारी तथा यदा कदा ख़ुद मुख़्त्यार(स्वातंत्र) रहकर अपना राज किया है
अग्नि कुल से उत्पन्न चार वंस है,1, परमार 2, पड़िहार 3, सोलंकी, 4, चौहान, तत्पचात छह 1,अख्य वाक, सूर्य 2,अंदर शोम चंद्र वंश 3,गहलोत 4,यदो 5,तंवर 6,राठोड़! इनमें से बढ़ कर छत्तीस साखें हो गई! परमारों की 35साखें है!

राजपूतों को क्षत्री नाम से जाना जाता था जो महाभारत पुराण उपनिषद तथा चंद्र बरदाई चारण द्वारा रचित प्रथ्वीराज रासा पुस्तक में राजपूत शब्द नहीं लिखा है राजाओं ने भी क्षत्री शब्द को उचित माना था बाद में राजपूत माने राजा का पुत्र (पूत) रज -भूमि पुत रजपूत उपयोग में आया!

सिंघ यानी सिंह माने बहादुर शक्ति शाली का अलंकार बाद में बोल चाल में नाम के पीछे उपनाम सिंघ लगाया गया जो विक्रमी संबत के बाद का है! जब ईरान के राजा ने हिंदु सभ्यता को अपनाया तब अपने नाम के साथ सिंघ शब्द वीरता का प्रतीक मानते हुऐ लगाया गया।

सर्व प्रथम गुजरात राजपूताना, मालवा,काठियावाड़ एंव दखन पर शासन करने वाले शाक जाति के खतरब वंशी बहादुर राजा रुद्र दामा के पुत्र महा प्रतापी राजा के समय (शाक संबत 103,118 विक्रमी संबत 238 तद्नुसार ईसवी 181196 )से शिला लेखों एंव सिक्कों में शाक संबत 103विक्रमी 238 वेसाख सुदी पंचम एंव ईस्वी 181के प्राप्त विधि लेख में उनके नाम के साथ सिंघ शब्द लिखा हुआ है (देखें भाव नगर इंस्क्रपन्शनस प्रष्ठ सं,23पर)।

परमार राजाओं के नाम के साथ सिंघ शब्द जोड़ने का रिवाज विक्री दसवीं स़दी मेंं कछवाहों में बारहवीं स़दी के अंत में चौहान में तेरहवीं स़दी में मारवाड़ के राठोड़ों में सत्रहवीं स़दी में प्रतीत होता है! राजपुतों के बाद सिखों के दसवीं गुरू गोबंदसिंह (1722,1725 ) अठारहवीं स़दी में सिंघ शब्द लगाया गया जो किसी भी जाति पंथ सम्प्रदाय धर्म से शामिल हुआ हो!

ढाट राणा शासन


जब सोढ़ो एंव उनका पुत्र चाचक देव रतो कोट में थे तब चाचक के पुत्र राज देव उर्फ़ राय देव को विचार आया जो उस समय रतो कोट का गादीनशीं राजा था बड़ा शक्तिशाली राजकुमार था कि अब ढाट पारकर पर क़ब़्जा किया जाये सूमरा सिंध के हाकम थे अमरकोट राजधानी थी!

राजा रायदेव के दरबार में एक प्रसिद्ध बुद्धिमान कवि जनफ चारण को ह़ुकम दिया कि आप अपना भेष बदल अमरकोट पर ह़म ला करने की खोज ख़बर लेकर आयें तदुनसार बड़े लशकर कटक के साथ हमला किया गया ओर सूमरों से मुक़ाबला किया तिथि सप्तम शुक्ल पक्ष माह वेसाख संबत 1282 ईस्वी सन् 1226 को जंग हुई जिसमें 125 सूमरा शहीद हुए शेष दुम दबाकर भाग गये ओर दीपलो के दक्षिण अपना नया राज बनाया!

राण राम देव की जीत के बाद कवि जनफ़ चारण को गांव खारोड़ा जो अमरकोट से उतर 4 मील दूर छोड़ रास्ते पर है बखशीश के त़ौर पर जागीर ज़मीन गायें भैंसें दान की जो आज तक बरक़रार है !
राणो राय देव के बाद जय ब्रह्म जेसर सोमेश्वर धारा बरश अमरकोट पर शासक बने! सूमरा ओर रणा के बीच अमरकोट राजधानी रही!
अमराणो अमरापुरी धरा सुरंगी ढाट ,
रही जो सोढो राजवी पह पंवाहरण पाट,!
ढाट सुरंगी गोरियां राणो चतुर सुजान ,
बड़ झुकिया लांबे तणा तब आयो गढ़ अमराण!

कोट तो अमरकोट बाक़ी सब कोटड़ियां ! देवल मां का पवित्र स्थान खारोड़ा है लेखक के पूर्वज पुरखे जो चौहान रजपूत थे खारोड़ा में ही मेघवाल बनाये गये जो कागिया (कागा) नाम से ढाट में लगभग एक सौ गांवों में फेले है अधिकतर गांव कागिया जाति से नाम, दोबार, दादिये जो तड़, भगीसल, करनोर,कीतारी, ऊगे जो पार, चेलहार ,भाडासिंधा, मिठड़ियो चारण, मिठड़ियो सुथार, जोगी मढ़ी, वरणाबो, अमरकोट, टंडो अलहयार, कोटड़ी, कागिया कालोनी मिठ्ठी, तोकल कोलोनी मिठ्ठी,मिठा तड़ आदि गांवों में आबाद है !

राणा अवतारदे


राणा अवतारदे बड़ा शूरवीर शक्तिशाली था का विवाह मारवाड़ के राजा चूंडाजी जिसका राज विक्रमी संवत 1451 सै 1480 तक एक छत्र था की राजकुमारी से हुआ था इस ख़ुशी में राणा ने भाटों चारणों ओर ग़रीबों में अनगिनत दान दिया था बदले में प्रशंसा स्वरूप छंद कविताएं रची गई जो आम जनता की ज़ुबान पर बड़े चाव से गाई जाती थी,उनके बाद राणो थरो तथा उसके पश्चात राणो हमीर गद्दीनशीं रहे।

राणा हमीर ने हमीर सूमरे से अमरकोट फ़तह़ किया जो सन् 1355से 1439 तक सूमरों की हुकूमत थी राणो हमीर मशहूर प्रसिद्ध बहादुर था।
पीर पिथोरो।
राणा हमीर ने पीर पिथोरो पर ह़मला किया जबकि पीर पिथोरो परमार वंशज में दूर का चचेरा भाई था जो अकड़ी रेल्वे स्टेशन पर रहते थे पिथोरो के पिता का नाम माडण ओर दादा का नाम भाण था पीर पिथोरो बड़ा चमत्कारी दरवेश थे जिसके काफ़ी प्रसिद्धि थी उनके काफ़ी संख्या में चेले मुरीद थे दिनों दिन संख्या भढ़ती जा रही थी को देख राणा हमीर को विचार आया शायद मेरी सरकार को आंच नहीं आये ओर हुकूमत छीन लेने की चुनौती मिले ।

भयभीत होकर पिथोरो को संदेश भिजवाया कि आपनी मुरीदों को बंद कर वरना अंज़ाम बुरा होगा पीर पिथोरा को हुकूमत की कोई लालच नहीं थी बेपरवाह थे सिलसिला जारी रखा ओर हुकम मानने से मना कर दिया से नाराज़ होकर राणा हमीर अपनी फ़ोज को लेकर ह़मला करने के उद्देश्य से अकड़ी की ओर बढ़े।

पीर पिथोर अपने ओतारे पर अपने सेवकों के सथ अपनी धुन में मस्त बेठे थे तब किसी सेवक ने बताया कि राणा हमीर का लश्कर आ रहा है तब पिथोरो ने कहा अगर अपने शुभ चिंतक होंगे तो स्वातग है नीयत में खोट है तो अब एक क़दम आगे बढ़ नहीं सकेंगे ।

इतना कहने पर राणा हमीर सहित फ़ोज घुड़सवारों सहित ज़मीन में धंस गये केवल सिर बाहर दिखने लगे यह चमत्कार देख राणा ह़मीर को गलानि हुई ओर सामुहिक रूप से हाथ जोड़ विनती करने लगे ओर माफ़ी मांगी तब थोड़ी देर में ज़मीं से बाहर निकले ओर आकर पिथोरों के पैरों में गिर पड़े ओर सेवक बन गये तथा एक फ़रमान जारी किया कि अब प्रति वर्ष एक टोईया अनाज यानी दस किलो दक्षणा ओर लड़का-लड़की की शादी में सवा रुपया बख़्शीश दिया जायेगा जो आज तक पीढ़ी दर पीढ़ी जारी है।

पीर पिथोरो की माड़ी अकड़ी पर जहां हर साल हज़ारों की तादाद में जातरू आते हैं ओर बड़ा शानदार मेला लगता है जहां हिन्दू मुस्लिम का हुजूम उमड़ता है। मेघवाल सिखिया धार्मिक प्रवृति के भजन कीर्तन जुम्मा जाग्गरण के धन्नी अधिक संख्या में चेले रहे हैं यहां उल्लेखनीय है कि मेघवाल समाज लड़के की शादी के समय गुड़ का घोल भांग वितरण की जाती है जो एक विश्वास का प्रतीक है ।

लेकिन आराध्य कुल देवी मां देवल की कृपा से कागिया कागा मेघवाल को विशेष छूट है अनाज का टोईया नहीं दिया जाता नहीं सवा रुपया महज़ एक चवन्नी यानी कोरी जायज़ है कागिया को पीर देवी पुत्र बोल सम्बोधन करते हैं यहां तक पीर का घोड़ा घोड़ी पाहोरा में डाला अन्न भी नहीं खाता है।

राणो हमीर के बाद राणो डूडो राणो वीरसीन राणो तेजसिंह राणो चाम्पो एंव राणो प्रसाद गादीपति हुए। जिसने हुमांयुं बादशाह की मदद की जब दिल्ली से हार कर सिंध शरण आया।

हुमायूं बादशाह


शेरशाह सूरी से क़नोज की जंग में हार के बाद हुमायूं फलोदी के रास्ते वाया जैसलमेर ढाट में प्रवेश किया भारी भरकम लश्कर के कारण रसद की कम्मी अमरकोट के राणा प्रसाद से सहायता शरण मांगी राणा बड़ा नेक दिल इंसान था ।

ह़ुरम के लिये अपना कोट ख़ाली करा कर रहने को दिया ओर शेष अन्य लोग बाहर रहने लगे बादशाह की परेशानी देख हमदर्दी के तौर पर खाद्य सामग्री ओर अन्य आवश्यक सामान उपलब्ध कराया गया शहंशाह का आल अयाल कोट में रहने लगा सारी सफ़र की मुश्किलात भूल गया ओर राणा की मेहमान नवाजी देख बड़ प्रसन्न हुआ लेकिन हुमायूं के पास उस समय धन नहीं था जो कोई सौग़ात बख़्शीश कर सके हुमायूं ने अमरकोट में पूने दो माह गुज़ारे।

बेगम ह़मीद बानो गर्भावस्था में होने के कारण हुमायूं ने अपने भाई ख्वाजा मोज़म एंव ह़ुरम को अमरकोट में छोड़ 11-अकटूम्बर सन् 1542 को ठट्ठे पर ह़मला करने के इरादे। से रवाना हुआ ओर मौलाना क़ंद मशहूर ज्योतिष को अमरकोट छोड़ गया ताकि बच्चा दुरस्त समय ले सके ।

हुमायूं के जाने के तीसरे दिन बाद 15-अकटूमर 5-रजब 949 हिजरी तदुनासार कार्तिक सुदी छठ संबत -1599 वार रवि एक हिंदू परिवार के घर में अकबर का जन्म हुआ ।

हुमायूं अमरकोट से 12-कोस दूर एक तालाब पर ठहरा हुआ था जहां कास़द के ज़रीये पुत्र जन्म की इतला दी गई ख़ूशियां मनाई गई लेकिन उनके पास नज़राने के लिए एसी कोई चीज़ नहीं थी जी तक़सीम कर सके कस्तूरी के टुकड़े के अलावा कुछ भी नहीं था को थाली में रखकर बांटा गया जिससे मजलिस महक उठी।बच्चे का नाम जलालुद्दीन मौहम्मद अकबर रखा गया।

अमरकोट का क़दीमी क़िला जिसमें अकबर का जन्म हुआ था वो शहर से उतर दिशा में चंद क़दम पर अकबर का यादगार चबूतरा निर्मित है जिस पर शिलालेख लगा हुआ है।

अमरकोट दिल्ली के अधीन


अमरकोट पर ईस्वी 1439 से 1609 तक सोढों की हुकूमत रही राणा प्रसाद तक स्वतंत्र रहे तत्पश्चात कभी दिल्ली के अधीन कभी सिंध बादशाह के मातह़त नाम मात्र ताबेदारी रहे यदा कदा उनकी कमज़ोरी देख ख़ुद मुख्तयार भी रहे।

ढाट में ढल माफ़ी राणा हुकूमत में थर ढाट में रिवाज था कि जिस किसी काश्तकार को जितनी ज़मीन चाहिए काश्त कर सकता था लेकिन गद्दीनशीं राणा को उस गांव का मुखिया ढल वस़ूल कर राणा को पहुंचाते थे ओर राणा उसमें कुछ भाग दिल्ली ओर सिंध के बादशाह को ताबेदारी की स़ूरत में देते थे, यह क्रम लगातार जारी रहा ,जब अकबर दिल्ली तख़्त पर हुक्मरान बना तब 1590-ईस्वी मेंं मिर्ज़ा ख़ान ख़ानां उनड़पुर मिर्ज़ा जानी।

बेग को जीत सिंध हस्तांतरण की ओर अमरकोट पर क़ाबिज़ हुए,तब अकबर को राणा की ओर से अपने पिता को कठिन समय में मदद सहयोग की दास्तान याद आई तब राणा को पत्र लिखा कि अमरकोट मेरी जन्मभूमि है ओर आपकी वफ़ादारी को मद्देनजर रख सालयानी ढल लेना हराम समझता हूं इसलिए सारी ढल माफ़ करते हैं उस हुक्मनामे से ढाट में खु़शी की लहर छा गई हर ढाटी प्रशंसा करने लगे,कलहोड़ों की बादशाहत में शाह अब्दुल भिटाई घोट थर घूमने आया थब ढल लगान माफ़ी को देख अपना एक बेत भी कहा।

न झल, न पल, नको राणर देह में। पारकर पर भी राणा शासन था यह दस्तूर जारी रखा फलस्वरूप समस्त ढाट में ढल का रिवाज समाप्त हो गया।

राणो ईसरदास

राणा प्रसाद के बाद राणो चंद्रसैन राणो भोजराज एंव राणो ईसरदास हुए राणा ईसरदास को जैसलमेर के राजा रावल सबलसिंह ने विक्रमी संवत 1710 में गादी से हटा राणा गंगा सिंह के पोते जयसिंह उर्फ़ जगसिंह को अमरकोट की गादी पर बिठाया,राणा जयसिंह के बाद राणो सुरतानसिंह राणो आसकरण राणो संग्राम सिंह राणो मेहराज सिंह राणो केसरसिंह गादीपति हुए।

राणो केसर सिंह


राणा केसर सिंह के शासन काल के दौरान अमरकोट के पश्चिमी हिस्से में अखेराज सोढा रहता था एक दिन उनकी दासियां पानी भरने लांबे के तालाब में आई उस समय राणा केसर सिंह के आदमी वहां खड़े थे ।

जबरन पणिहानियों को राणा केसर सिंह के घर ले गये इस पर अखेराज सोढे ने समस्त सादूलों को इक्कठ्ठा कर राणा का क़त्ल करने कुछ साजिश रची ओर चौहान सादूल को तैयार किया लेकिन वो असफल रहा तब किसी ओर से क़त्ल कराया गया ओर वहां से घर बार छोड़ गांव कांटियों के पास एक भिट धोरे पर आकर रहने लगे पीछे-पीछे अमरकोट के सोढ़ा आये ओर आधके के तड़ पर लड़ाई हुई जिसमें कोई फ़ेस़ला नहीं हो सका।

राणा हमीर सिंह गाद्दीनशीं

अंत में अमरकोट के सोढा लोट गये इधर अखेराज सोढे के घर पर उस रात पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम कुशुल सिंह रखा गया इसलीये उस भिट को कुशल कोट नाम से पुकारा जाता है,सादूल सोढा एक सादूल सोढा साख है। बाद में गांव हंजतल में आबाद हुए।

राणा केसर सिंह के बाद राणा खेमसिंह राणो संग्रामसिंह 2 राणो शिवराज सिंह राणो सबल सिंह राणो महराज सिंह 2 राणो भभूत सिंह राणो सुरत सिंह राणो पीरदान सिंह राणो जसवंत सिंह एवं राणो अर्जुन सिंह हूए राणा अर्जुन सिंह का स्वर्गवास 25-जनवरी 1947 को हुआ तत्पश्चात 1955 ईस्वी से उनके ज्येष्ठ पुत्र राणा चंद्रसिंह गाद्दीनशीं हुए वार्तमान में उनके पुत्र राणा हमीर सिंह गाद्दीनशीं है।

सोढ़ा हुकूमत का नमूना


ढाट में बारानी सख़्त ज़मीन कम ओर रेतेली अधिक थी थर में काशत मह़ज़ डेहर तली पक्की ज़मीन पर होती थी जो उपज में पैदाईश का पांचवां भाग राणों को ढल के तौ़र पर दिया जाता था उसका तख़मीना कूंता अंदाज़ा खड़ी फ़स़ल देख लगाया जाता था राणों की अपनी जागीरें थी उनका आय का साधन उपज पर निर्भर था।

अमरकोट नगरपारकर के सोढों के पास अपना वैतनिक लश्कर नहीं था आपसी एकता थी आफ़्त आने पर आम जन मिल जुल मदद करते थे ,नगरपारकर के राणों को कोली एंव अमरकोट के राणों को भील बिना किसी लोभ लालच पगार अपना फ़र्ज़ मान सहयोग करते थे।

थर में किसी के ज़ुल्म सित्म पर कोई दरख़्वास्त स्टम्प की ज़रूरत नहीं होती थी फ़रियादी अपनी पीड़ा सीधा गाद्दीशीं राणा की दरबार में पहुंच अपना दर्द बताता था का उचित न्याय मिल जाता था छोटे मसले गांव के पटेल निपटारा कर देते थे अमनो अमान था।

उस समय कुछ यथाकथित डाकू डाल लोगों को लूटते थे जिसका भय किराड़ महेश्वरी ओर मालदार को रहता था एसी किसी घटना पर राणा ख़ुद सारा लूटा गया माल सामान बरामद करता था ओर अपने घर भोजन करा कर रवाना करता था।

अकबर बादशाह के ह़ुकम से जब ढाट में ढल का रिवाज बंद हुआ तब से राणों को आय में वृद्धि होने लगी, राणों में जब कोई शादी ब्याह होता था तब प्रजा के लोग अपनी रज़ामंदी से ऊंट घोड़ा गायें भैंसें रोकड़ पैसे गहने नज़राना पैश करते थे ।

यदि आम जनता में कोई शादी होती थी तब वर वधु के घर से त़ौह़फ़े मुक़र्र थे अदा किये जाते थे जिसको बंधयाण राणों को देते थे अगर किराड़ महेश्वरी समाज में शादी होती थी तब साढा 26 रूपये रोकड़ साड़ी के नाम देते थे जिसके एवज़ में क़र्ज़ वस़ूली डाकुओं से बचाव आदि अपनी मर्ज़ी से स्वैच्छिक बंधयाण खु़द पर बंधे थे।

अन्य ग़रीब लोग अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार शादी पर एक रूपया देते थे को कंटा कहते थे कोई ग़रीब लकड़ी का भारा कोई स्वैच्छा से सांगरी कैर पीलू मतीरा काचर कूंभटिया राणों के घर पहुंचाते थे।

ग़रीब लोगों पर कुछ बंदिशें भी थी जेसाकि सिर पर लुंगी बांधना उच्च स्तर का वस्त्र गले में सोन का गहना औरतों के पैरों में कड़ा दुल्हे के मुक्ट बांधना ढोल बजाना आदि पर पाबंदी थी जब अंग्रेज़ सरकार के बाद शिथिलता मिली।

सोढ़ों का पारकर आगमन


राणा धारा बर्श तक पारकर समस्त थर ढाट में फेल चुके थे तब बंटवारा किया गया राजा बर्श के दो पुत्र थे बड़ा पुत्र दुर्जन शाल अमरकोट में रहा तथा छोटा पुत्र आसराय पारकर आया ओर नगरपारकर शहर के पास एक तालाब पर आबाद बस्ती बना कर रहने लगा जिसका नाम राणासर रखा गया ।

पारकर के राणों का शजरा निम्न प्रकारर है राण आसराय के बाद राणो देवराज ,मड़ख जी,खंगारजी, अर्जन जी,भीमजी,भाखर जी, गांगो जी, अखोजी, माणक राय, देपाल देव,रामसिंग जी, वणवीर जी, रायधण जी, खानजी खजसी, राणो कानजी,उर्फ़ कर्णजी,राणो रत्न जी जो कर्णजी का गौद पुत्र था, हमीर जी रणछोड़ जी ,अचलसिंह जी रहे।

सोढ़ा ढाट में फेल चुके थे जिसने अपने गांव आबाद किये जिसमें मुख्य छाछरो,चेलहार,मिट्टी, दीपलो, इस्लामकोट आदि, सोढ़ों का दबदबा देख मारवाड़ से अनगिनत लोग पलायन होकर ढाट में अनेक क़ौमें/जातियां शरणार्थी बन उसने लगी।

सोढ़ों की साखें

1,सुरताण सोढ़ा, अमरकोट, बीसूनी, भोजराजियो, कटाय, रामसर, अमरहार, काठो, जागोड़ो, नोहराड़ियो आदि
2,भोजराज सोढ़ा, छाछरो, सोखरू, नवोपुरो, माले जो पार, हंजतल, सिलह, झपियो, अलणाबाद, अड़बलियार,
भूणियो,आदि
3,नब्बा सोढ़ा, इस्लामकोट, अखेराज जो तड़, साकरियो, वीसासर,गोधियार, केरटी, रंगीलो, खींकनियो आदि
4,नरा सोढ़ा, मालणहोर, पाबूहर, खारियो नरा, जखरियो, जोड़ूओ आदि
5,मालदेव सोढ़ा, वेड़हार, अरोखी, वेड़ीझप, जगारी लाकोड़ी दीपला आदि,
6,बिजेराय सोढ़ा, गढड़ो, डाहली, भाणलबो, पारनो, जैसींधर आदि,
7,डूडा सोढ़ा, बचिये जो पार आदि
8,राम सोढ़ा, लखियारो ,करड़ो, पोछींडो, सरगीलो, लूणहार, रामसर आदि,
9, वेरसी सोढ़ा, रहड़, वाटकड़ी,आदि,
10, गंगदास सोढ़ा, छोड़, लपलो, सूंदरो, खूहड़ी, बंधड़ो, विसरियो,सलाड़ियो आदि,
11, जगमाल सोढ़ा, पाबूवेरो ,गरड़ियो,भाड़ाली,आदि,
12, सींहासोढ़ा,मिठड़ियो,जोगीदास,अरनरो,टोभारियो,भोरीलो,चाड़िहार,सींहार, आदि,
13, सादूल सोढ़ा, चेलहार, खोड़बी,बिटड़ा, बीभाणी, खेजड़ालो,आदि,
14,राणक दे सोढ़ा, खिपरो तामुका में आबाद विभिन्न गांवों में अछिया थल,
15, अखा सोढ़ा, नगरपारकर तामुका के विभिन्न गांवों में,
इस प्रकार सोढ़ों का ढाट में अपना दबदबा रहा चेलहार के इर्द गिर्द सादूल खेड़ी,इसलामकोट के पास नबकी छाछरो भोजराज सोढ़ा,दीपले के पास माल देव वीख्यित रहे।

सोढ़ों के अलावा अन्य राजपूत राठोड़, चौहान, सोलंकी, भाटी, दोहट, धांधल, बाहड़मेरा, खावड़िया, राठोड़, रायधर, भणकमल, सखता, उनड़, सींहड़, मेहाजल, रावलोत, सोनगरा, नाडोड़ा, बड़ा आदि रहते थे।

ढाट के शहर

अमरकोट,यह शहर थर के रेतीले धोरों एंव मैदानी समतल क्षेत्र के छोर सीमा पर स्थित है छोड़ ओर ढोरो नारो रेल्वे स्टेशन के निक्ट प्रत्येक के 12 से 14 मील दूरी पर है सड़क मार्ग से मीरपुरख़ास़ 46 मील है जहां एक पुराना क़िला है,भारत से पलायन कर मुहाजर आकर बसे है पश्चिमी ओर बाग़ है जहांआम, नीम्बू, सेब, शहतूत, द्राक्ष, अनार, केला, सब्ज़ियां पालक, सोआ, मूली, बींगन, भिंडी, तूरी, टमाटर, करेला इत्यादि बहुत होते है।

सन 1899इस्वी अकाल में असंख्य लोग मारवाड़ गुजरात से पलायन कर आकर बसे है। मिठ्ठी, थर का बड़ा शहर है जहां पर किराड़,ब्रह्मण,लोहाणा, मेघवाल, गुरू, माली,खत्री,सोनारा,सुधार, मुस्लिम,बजीर पिंजारा,कसाई, ह़जाम एंव अन्य जातियां रहती है मिठ्ठी कि शहर एक मिठ्ठी नाम की बजीराणी ने बसाया था, पश्चिमी ओर एक बड़ी भिट है जिसका नाम गढ़ी है।

छाछरो, यहां यहेश्वरी, ब्रह्मण, खत्री,मेघवाल,गुरू, मुस्लिम बजीर राजपूत एंव अन्य लोग रहते है। गढड़ो, यह जोधपुर रियास्त की सरह़द पर व्यापार का क़ेंद्र था बंटवारे के बाद सीमा पर होने के बाद उजड़ कर सूना खंडहर हो गया।

चेलहार, यह शहर चेले नाम के चारण ने बसाया था यहां मेघवाल, ब्रह्मण, महेश्वरी,माली, मुस्लिम बजीर रहते है।
दीपलो, यह शहर दीपे मेघवाल ने बनाया था जिसकी क़बर तहस़ील प्रांगण की चारदीवारी में है,यहां अधिकतर मीमण,मेघवाल गुरू, माली खत्री,लुहाणि, बजीर,आदि रहते है।

इस्लमाकोट, यहां लुहाणा, मेघवाल,सारस्वत ब्रहमण,गुरू आदि रहते है। नगरपारकर, यह कारूंझर पहाड़ी के पास है यहां मेघवाल,मीमण, गुरू,लुहाणा अन्य जातियां रहती है इसके अलावा भोडेसर,वीरावाह,पारी नगर आदि शहर है जहां शिक्षा, चिकित्सका एंव स्वास्थ्य पुलिस तहस़ील नगर पालिका, पोस्ट आफ़िस,की समह्त उचित प्रबंध है।

ढाट में आबादी

ढाट में मूल निवासी जैन धर्म की आबादी थी तत्पश्चात परमार,ओर सूमरा राजपूत आये जिन्हों ने ढाट पर राज किया,बाद में राधनपुर से सोढ़ा आये बीच में खोसा,चांडिया,ओर बलोच आकर बस गये कुछ अछूत जातियां भील, मेघवाल,ओर कोली मूल निवासी प्राचीन काल से आबादी थे,उसके बाद मारवाड़ से आने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा ब्रह्मण, महेश्वरी,कुछ मेघवाल मारवाड़ से आये,लुहाणा, मुस्लिम सिंध से आकर बसे।

मुसलमान ,मुस्लमानों के दो फ़र्क़े है 1,सुनी 2,शीया, जो निम्न प्रकार है।
1, सैयद, ह़ज़रत मोहम्मद स़लेम जन की बेटी बीबी फ़ात़मा एंव ह़ज़रत अली करम अल्ला वजह़ जन के औलाद को स़ादात कहते है,सैयद शब्द की माने सरदार कहते है प्रत्येक मूस्लिम के धर्मगुरू है अपना मुरशिद मानते है।
शेख़, अ़रबों में किसी नेक मर्द बुज़र्ग,औलिया,मुखिया को शेख़ कहते है,हिंदू धर्म अथ्वा किसी अन्य मज़हब से धर्मांतरण करने पर इज़्ज़त आबरू का पद शोख़ कहते है।

पठाण, पठाण पठी इसराईल के बादशाह शावल के नस्ल से त़ालुक़ रखते है ये लोग अमरकोट में आबाद है अफ़ग़नस्तान के निवासी है तथा पुराना कोट, दरी,फ़राशी,हींग, किशमिश का व्यापार करते है।

बलोच, यह लोग ह़लब शहर का निविसी बग़दाद से होकर करमान मकरान से होकर ढाट में आबाद हुऐ यह अपने को अमीर ह़मज़े के ख़ानदान से बताये है इनका दादा हरीन था जिसके तीन पुत्र थे बड़े पुत्र कि नाम जलालदीन, मीर आली, ओर नूस थे कैच मकरान से आये जलाल दीन के चार पुत्र रंद लाशार होत,कोराई, रंद की शाख़ें रंद,डोमकी, जखराणी, लग़ारी, खोसा, जमाली, बोज़दार,चाकराणी, लाशार से अन्य मज़ीद शाखे़ं गोराणी, भूताणी, कलवाणी, गंबाणी, घरामाणी, बेहराणी, क़ंबराणी संदराणी, कोराणी पानी,बदाणी, दस्ती, जतोई, बुला, टरट, शर, कोश, खरोच,
ज़ंगेचा, बलेदी, ह़ाजेजा, बंगलाणी, बजाराणी।

खोसा, जमाणी,छटाणी,दरियाणी,सैहरयाणी,जागीराणु,शादाणी,मठेवाल।चांडिया,बिरोही,पताफ़ी,गरगेज़ , लुंड, मरी, मगसी, सिराई।

ख़्वाजा,अस़ल लुहाणा हिंदू थे बाद में मुस्लिम हुए। चाचड़ हिंदू से मुस्लिम हुए।सूमरा परमार राजपूत से मुस्लिम हुए।खोखर पंजाब से आकर बसे।महर,हिंदू से मुस्लिम हुए। मीमण,अस़ल लुहाणा थे मुस्लिम हुए।

समाट,शाख़ें ,पड़िहार,कोरेजा,नाहया,समेजा,लंजा,दाहर,चारड़ा,भट्टी,ओढर,लाखेर,लाखा,आधा,अधेचा,मेहर,सांद,कोराई, राधण,काके पोटा,हिंगोरजा,हालेपोटा,हाला साहड़,नेहड़ा,ज़खरा,काहया,पली,सोढ़र,ओढा,अबड़ा, अबड़ेचा,रुकन रहुमा आदि।

नोहड़ी को आरबाब भी कहते है रहुमा को भी अरबाब कहते है। नून, उनड़, आदि । माछी, भीलों से मुस्लिम बने।कसाई, ह़जाम, कुम्भार, खटी, बालेशाही, मंगणहार, धोबी, ख़ास़ख़ेली, शीदी, लंघा,इसके अलावा ढाट में अनेक मुस्लिम ज़ातें है।

मंगरिया,लंजा, जूणेजा, आरीसर, दर्स, चांग, राजड़ ,दल, पिंजारा, बेहपाल, भासा वसाये पोटा, मोसे पोटा, छछर, देथा, देदा, थेबा, ओठा,झंझी, साऊंद,बेसर,जेसर,भट्टी ,गेहलड़ा, केरबा, विकिया, खोड़, चन्ना, संग्रासी, करन, बुटा, मकवाणा, बाराच, वलहा, सहता, झागोरा, मयाणा,पाड़हा, गजू,चाचड़ आदि।

संग्रासी,दोहट,केलहण,नब्बा,मडा,कोटड़िया,समस्त हिंदू राजपूत मुस्लिम बन अपने गांव आबाद कर रहते है।

हिन्दू

ढाट में हिंदू बहूसंख्यक वर्ग है जेसे ब्रहमण, श्रीमाली, पुष्करणा, सारस्वत, भोजक, राजगुर आदि, महैश्वरी, ओसवाल, लुहाणा, जैन, राजपूत, सुथार, रबारी, चारण, जाट, माली, सोनारा, खत्री, दर्ज़ी, सामी, भाट, नाई, वरतिया, क्रिया गुर , लोहार, कुम्भार, बजीर, मेघवाल, कोली, भील, जटिया, ओड, दबगर, कलाल, हरिजन, गुरू, इत्यादि ।

ढ़ाट में हुनर

ढाट में कोई बड़ा कारख़ाना आदि नहीं था लेकिन छोटे स्तर पर मिठ्ठी,चेलहार,छाछरो,इस्लाम कोट,दीपलो,एंव नगरपारकर में निवार, अंगोछा, टाविल, देशी हल्का खेस, कमलिया, फरासी, खथा, लोईयां, जाजम, मोटी चद्दर , जीरोई, शालें बनती है।

लकड़ी के पाखड़ा,पलाण,संज,लकड़ी पर पीतल ओर लोह का काम होता है जोहीरार, चेलहार, मिठ्ठी, छाछरो, मालणहोर, गोधियार, में बनते है जो सुथार जाति के कारीगर नक़ाशी का काम करते है।

कपड़े की बुराई का काम मेघवाल जाति के लोग बड़े कुशल कारीगर कोट का चोफेरो का काम गर्म कपड़ो को दाने जो तड़ , तुगूसर, आमरियो, दातर दिने जो तड़, जोड़ूओ, लूणहार ओर भाडासिंधा में करते है।

कपड़े पर कांच कशीदाकारी का काम जिसको भरत कहते है मेघवाल समुदाय की महिलाऐं किया करती है।
चमड़े के बूट सलीपर चपल मोजड़ी जूति मर्दानी ज़नानी पर कशीदाकारी सूती जारी मुक्का चांदी जड़ित का काम होता है तथा पख़ाल, सांदारी, दीवड़ी, दीवड़ा, कोस, चड़सी, बरत, समस्त ढाट में मेघवाल हुनरमंद लोग करते है।

छाछरो ,मिठ्ठी,दीपलो इस्लामकोट अमरकोट में कपड़े पर रंगाई छपाई का खत्री काम करते है।
बकरी,भैड़ ऊंट के बालों को काटने के बाद कताई कर बोरा, बोरियां खरड़ियां खड़िया, भील लोग बनाते है।
मिट्टी के बर्तन घड़ा, मटकियां मटका, ताणा तवा,कूंडियां ,फेलियांआदि कुंभार बनाते है।

ढाट के प्रमुख भाग, पारकर, वट, वंगो, कंठो, मोहराणो, सामरोटी, ढाट, खाओड़, अछो थर,डींया है।
सोढों के अलावा मेघवाल समुदाय के अनेक लोगों द्वारा सरकार की मदद करने पर एवज़ में ज़मीन माफ़ियां इनायत की गई थी।

जिसकी ढल वस़ूली नहीं होती थी जिसमें गांव चेलहार तालुका छाछरो में सुरतो पुत्र अणंदो बढ़िया जाति मेघवाल तारीख़ रेगिस्तान के लेखक रायचंद के दादा थे को ज़मीन का टुकड़ा बख़शीश किया था ओर मीर साहबी में क़िले में खोदा हुआ कूआ इनाम दिया गया था जो अब तक उस पर वारिस़ क़ाबिज़ है ओर मालकाना ह़क़ है मिठ्ठी में बाले मेघवाल को भी माफ़ी दी गई थी।

लाधो मेघवाल जिसने तरवट अंग्रेस शासक को पनाह देने पर एक ज़मीन का टुकड़ा माफ़ी के तो़र इमाम दिया गया था जिसका कोई लगाना नहीं लगता था,जो अब उनके पुत्र वाघले मेघवाल के नाम है।

1947 के बंटवारे के दौरान ढाट में पलायन नहीं हुआ था,पाक सरकार ने अछूत श्री जोगेंद्र नाथ मंडल जो क़ेंद्र में मंत्री था एलान किया कि जान माल की सुरक्षा होगी जो प्रत्येक विभाग में लागू हो गई।

पांचवीं स़दी के अंतिम दौर एंव सातवीं स़दी के शुरू तक सिंध पर राय घराणे के राजाओं का सिंध पर शासन था जो अस़ल शूदर थे जो बाद में ब्रहमणों ने शुद्धी कर छत्री बनाया गया यह उल्लेख तारीख रेगस्तान के भाग प्रथम के प्रष्ठ 30में लिखा गया है।

ढाट के प्रमुख स्थान

1.पारी नगर,
पारी नगर पधारजो करो लंबा वेस,
जिस घर नारियल रूंखड़ा उस घर दीजो आदेश।
पारी नगर वर्तमान नगरपारकर शहर से 14 मील एंव वीरावाह से पूर्व दिशा में 2 मील दूरी पर स्थित है जहां जैन धर्म का राज था जैन धर्म के अनेक मंदिर मौजूद है मीरपुरख़ास़ के निक्ट काहू जो दड़ो की खुदाई में जैन धर्म के मंदिर तथा हैदराबाद ज़िले के लाड़ में जैन धर्म कै मंदिर मिले है एसी ह़ालात में सिद्ध होता है कि यहां जैन धर्म का दबदबा था,पारी नगर के इर्द गिर्द बंदरगाह था आज भी लोहे के भारी भरकम अवशेष मौजूद है जैन धर्म की मूर्तियों का संग्रहालय वीरावाह में उपलब्ध है।
गोड़ी का मंदिर,
यह मंदिर नगरपारकर के शहर से 28 मील एंव मारवी की जन्म भूमि मलीर से 4 मील दूरी पर है जिसको गोड़ी का देहरा भी कहते है जो जैन धर्म का प्रसिद्ध सुंदर मंदिर है जैन पारसनाथ के पूजारी थे पारसनाथ को गोड़ीचा भी कहते है।
पारसनाथ की मूर्ति,
पारसनाथ का गुरू गोरखनाथ था जो गिरनार में रहते थे वो मूर्ती मंघो औसवाड़ ने स्थापित की थी। गोड़ी के मंदिर के पास पोलन स्थान भी है।
रेखो देव की मूर्ति,
वीरावाह के मंदिर में रेखो देव की सुंदर संग-मर्मर की मूर्ति भी है जो जैन धर्म की है।
माफ़ी जागीर,
नगरपारकर में भोड़ेसर जागीर ,वीरावाह जागीर,राणपुर जागीर,फीथारो जागीर, जो लगान मुक्त थे इसके अलावा पाकर में धींगाणो,कासबो,आधी गाम खारड़ियो,मोदरो,
आदि गांवों में सोढ़ों को काफ़ी ज़मीनें थी जिसकी ढल माफ़ थी।निम्न को कुछ भी रियायतें दी गई,
दाहली,गढड़ो,भाणल बो,पारणो के बिजय राय सोढा एंव छाछरो हंजतल,सिल,राणहार,माले जो पार,भूणियो, अड़बलियार,के भोजराज सोढ़ा,कृष्ण जी बेरी,रोहड़,मीणाऊ,के केलहण सोढा अमरकोट के राणा की गादी नशीन होने पर पहला तिलक केलहण सोढा देते है जो आज तक दस्तेर जारी है।
चेलहार,भोरीलो,मेहारी,खोड़बियां,तड़ ह़मीर ,अरनरो,कांटियो,पीर जो तड़,पाबू बेरो,सादूल सोढ़ा को भी माफ़ियां मिली थी, श्री अखजी रतनसिंह छाछरो पूर्व विधायक को 25 बनियां खेत माफ़ी के त़ौर पर आंवटित थी जो श्री लालजी श्री मेघराज सिंह के परिजन के पास 1971 तक रही है।
चेलहार में जूझार सिंह सोढा,मिठी में ख़ानजी सोढा,सामरोटी में बहादुरसिंह ,वेड़हार में कूंभा अखेराज जो तड़ में मोह़बतसिंह ,वंगे में अरबाबों को जागीर उनके वारिसान के पास मौजूद है।
मेघवालों का ज़िक्र पूर्व में किया जा चुका है।
मेघवाल समाज में श्री गुलजी पूर्व विधायक श्री सुगालचंद सेजू भील समाज में घमनसिंह भील कोली समाज में रूपलो कोली बड़ी हस्तियां रह चुकी है।

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा

पूर्व विधायक

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *