दो अज़नबी एक रात

दो अज़नबी एक रात

दो अज़नबी एक रात

पूँछ ले ऐ मुसाफ़िर रात की तन्हाई का सहारा l
कलम कह उठेगी देख आसमान में चमकता सितारा ll
चाँद भी ऐंठकर चिल्ला उठता है l
जब मेरे संघ एकऔर चाँद दिखता है ll

चाँद ने पूँछा किसओर है चित l
बीते पलकी ओर है पूँछ मत ll
कह दो ,
ढलती रात में बढ़ता अंधेरा है l
तो सुनो ,
उससे बिछड़ने के बाद पताचला मौत
भी कोई चीज है ll
क्योंकि हमें तो जिन्दगी ही मिली थी l
उनकी मैंफ़िलों में ll
देखो ,
ऐंठोमत एकऔर चाँद है मेरे पास l
ऐठूँ क्यूँ , मुझें न किसी की आस ll

मैं बोलूँ ,
करूँ किससे गिला कोई नहीं पराया l
बस एक तुम्ही पूंछते हो कौन है पराया ll
ठीक है ,
अपनापन तो कोई भी जताता है l
लेकिन समय दिका ही देता है ll
कौन अपना है l
और कौन पराया ll

झूठ मत बोलो ,
सच – सच बताना बात क्या है ?
आँख लड़ी है या बात बड़ी है ll
मुश्किल है बताना , अच्छा टालना थाl
सालों से यहीं गुमान था l
रात मेरी और बात उसकी ll
मगर यह भी भ्रम टूट गया l
जब उसके पास एकऔर चाँद आ
गया ll

चाँद ने कहा ,
रात बीतगई , कलम थम झा ,
किसी और का मत हो झा ,
मन की बात अभी बाकी है l
मिलने की आस अभी बाकी है ll

वाहिद खान पेंडारी

( हिंदी : प्राध्यापक ) उपनाम : जय हिंद

Tungal School of Basic & Applied Sciences , Jamkhandi

Karnataka

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