लघुकथा “गेटआऊट ” | Get Out

उसकी कॉलबेल बजी। एक नहीं , कई बार। बदन पर एक शॉल डाली और वह सशंकित मन गेट की ओर बढ़ी। आख़िर कौन हो सकता है इस ठिठुरते हुए ओले से बूंदा -बांदी के बीच। युवा अनछुए बदन में सिहरन -सी हुई।

दरवाजा खुलते ही वह अन्दर सेहन में आ खड़ा हुआ। खूबसूरत, शालीन मगर बेहद परेशान।
शालिनी अवाक् !

शालिनी तुम मुझे बचा लो , अन्यथा मै मर जाऊँगा। मेरी तस्वीर और मेरा नाम बेच – बेच कर वे अमीर ही नहीं शाहे – आलम हो गये। मैं मारा – मारा फिर रहा हूँ और भूख से आंतें ऐंठती जा रही हैं , शालिनी तुम मुझे बचा लो। वह उसके पैरों की ओर झुकने लगा।
” कौन हो तुम ?”
“विकास। ”
“ये दस रूपये ले और चल यहाँ से भाग। ”
“नहीं ———! ”
“बाहर निकल , गेटआउट। ” वह दहाड़ी और धक्का दे कर गेट से बाहर कर दिया और जोर की आवाज़ के साथ गेट बन्द हो गया।

 

डॉ.के.एल. सोनकर ‘सौमित्र’
चन्दवक ,जौनपुर ( उत्तर प्रदेश )

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