जैनियो सावधान.. कर्म की महिमा कम की जा रही है
आज तारीख है तीस जनवरी दो हजार पच्चीस.. समय है ब्रह्म मुहूर्त का ओर सहज ही मेरी नींद उचट गयी.. मोबाईल नामक बीमारी हाथ मे ओर नजर थम गई एक वीडियो पर.. एक मुनिराज ( उनके सम्मान में मैं उनका नाम नही लिख रहा हु ) अपने आहार को ले कर घोषणा कर रहे है कि वे कभी भी जैन कुल में ब्याही गयी बाहरी अजैनी बहुओं के हाथों आहार नही लेंगे।
मुनिश्री के निर्णय से मैं दुःख और संताप से भर गया.. आगे बढ़ने से पहले मैं बता देना चाहता हु की महान दिगम्बर जैन धर्म की परम्परा में भगवान के रूप में पूजे जाने वाले संतो से मेरा अदभुत लगाव है।
यह कोई आज का नही बल्कि बाल्यकाल से है.. आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज साहेब से शुरू लगाव ओर नमन की यह परिपाटी आचार्य श्री पद्मनन्दि जी, आचार्य श्री पुष्पदंत जी, आचार्य श्री विद्यासागर जी, आचार्य श्री वैराग्यनंदी जी तक लगातार शरू है.. आचार्य श्री रयण सागर जी महाराज साहेब ( अब वे हमारे साथ नही है ) से जुड़ाव इस कदर था कि बचपन मे मैं उन्हें अपना मित्र ही समझता था।
दिगम्बर संत निर्मोही होते मगर मैं छोटा था और धर्म के मर्म को नही जानता था सो आचार्य श्री के सहज सरल स्नेह को मित्रता समझता था.. तब वे मुनिश्री थे और उन से मेरा अत्याधिक लगाव देख कई श्रावक मुझे कहते थे कि कल हमारे यहां चौका है.. तेरे महाराज को हमारे घर लाना।
मेरे महाराज सुनकर बड़ा अच्छा लगता था.. लोगो की बातों से मैं फूलकर कुप्पा हो जाता था और मुनि श्री रयणसागर जी से जिद करता था कि वे फलाने घर ही आहार करे।
मैं नही जानता था कि मुनि श्री मेरी बात मान रहे है या उनकी विधि उसी घर मे मिल जा रही है जहाँ मैं उन्हें ले जाना चाहता था मगर बहुधा मुनि श्री मेरी मर्जी के घर मे ही आहार करते थे.. मैं श्रावकों से कहता था मुनिश्री को आहार में घी अधिक दो.. लोग मेरी बात सुनते थे और बहुत सारा घी मुनिश्री को पिलाते थे।
मुनिराज भी मुझ से हास्य करते थे कि रमेश तू मेरे साथ मे ही रह.. खूब घी मिलता है तेरे कारण.. वजह कुछ भी हो.. वातावरण कैसा भी हो मगर बाल जीवन को वह बाते स्वयं की बहुत बड़ी जीत लगती थी.. बड़ी खुशी होती थी.. विचारों की श्रंखला को आगे बढ़ाने से पहले मैंने यह भूमिका इसलिए बांधी है कि कल को कोई मुझ पर यह आरोप चस्पा न कर दे कि मैं कलयुगी नामधारी जैन हु ओर जो की संत परम्परा का सम्मान नही करता।
तो मुनिराज मुझे बड़े प्रिय लगते है.. उनका जीवन मुझे आंदोलित करता है.. उन की तप साधना को मैं अजूबा समझता हूं.. वे बड़ा ही अनोखा जीवन जीते है.. ओर जब मेरे भीतर वे इतने रचे बसे है तब किसी साधु का यह निर्णय की वे बाहरी बहुओं से दूरी बनाएंगे.. उनके हाथों आहार नही लेंगे मुझे मजबूर कर जाता है कि मैं कहु.. कुछ लिखूं.. उन बातों को उन तक पहुँचाऊँ जो कि निर्णय से धर्म का नुकसान कर सकती है।
तो मंथन का विषय बाहरी अजैन व्यक्ति का है जो कि जैन कुल में ब्याह गया है मगर वह दिगम्बर परंपरा के संत को आहार नही दे सकता क्योंकि संत की घोषणा है कि वह सिर्फ और सिर्फ जैन कुल में जन्मे लोगो से ही आहार लेंगे.. मेरे लिए यह बड़ी ही हैरानी वाली घोषणा है.. समझ से परे है.. स्वीकार नही है.. यदि कोई मनुष्य जैन दर्शन का पालन करता है.. उस के सिद्धान्तों से सहमति जताता है.. परम्परा के संत को गुरु मानता है.. दस धर्म की जय बोलता है तो उस से अधिक क्या चाहिए..?
जैन समाज के लिए यह कालखंड बड़ा ही हाहाकारी है.. बेटियों की कमी से पूरा जैन समाज झुंझ रहा है.. जैन लड़को ने वह उम्र पार करनी शुरू कर दी है तब पिछले दशकों में उस के स्वयं के बच्चे पांचवी कक्षा के छात्र हुआ करते थे मगर आज वह कुँआरा है.. जीवनसाथी की तलाश कर रहा है।
लिंग असंतुलन से यह तय है कि सभी लड़को को जैन कन्या नसीब नही होंगी और फिर इन हालातों में वह अन्य धर्म, समाज की बेटियों से ब्याह रचाएंगा.. वे बहुए जैन कुल से जुड़ेंगी.. कालांतर में उनकी ही कोख से जन्मा कोई शिशु धर्म ध्वजा का वाहक होंगा.. ओर जब कोई बाहरी बेटी इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार है तो फिर उस के हाथों आहार नही लेना.. उसे मुख्यधारा से अलग करना.. क्या यह उचित होंगा..? क्या यह उस के प्रति न्याय होंगा..?
दुनिया भर में एक चलन रहा है कि बाहरी व्यक्ति को अपने धर्म मे लाओ.. साम दाम दंड भेद की क्रिया करो मगर अपने धर्म की भीड़ बढ़ाओ.. मध्यकाल में तो तलवारो की नोक पर धर्म परिवर्तन की हजारो घटनाओं का उल्लेख इतिहास में दर्ज है.. मगर हमारे यहां इस के विपरीत परिस्थितियां बनाई जा रही है.. जो हमारे अपने जैन है उन्हें ही स्वयं से दूर किया जा रहा है.. संत का यह निर्णय धर्म प्रभावना की राह में बाधक है।
मेरे एक मित्र ने एक धार्मिक आयोजन में कई लाख रुपये दिए.. वह ओर भी कुछ रकम देना चाहते थे ओर साधु संतों के लिए चौका भी लगाने की भावना रखते थे मगर संत ने उन के घर आहार हेतु जाने से मना कर दिया.. उनके बेटे की बहुएं भी जैन कुल से ही है मगर संतश्री का कहना था कि वे भले ही जैन है मगर दूसरे सम्प्रदाय की जैन है और मेरा मित्र अन्य सम्प्रदाय का।
गौरतलब है कि दिगम्बर जैन परम्परा में भी कई अलग अलग पंथ अलग अलग सम्प्रदाय है.. सभी लोग अपने सम्प्रदाय में ही बेटी ब्याहते है, लाते है.. बेटियों की कमी की वजह से मित्र ने अन्य जैन सम्प्रदाय की बेटी को अपनी बहू बनाया और यही बात साधु को रास नही आई।
मित्र नाराज हुआ और उसके मन मे जो दान की भावना थी उसका गला घोंट वह अपने व्यापार में लगा.. साधु के एक वचन से मंदिर जी को लाखों रुपये का दान से हाथ धोना पड़ा।
दुनिया मे चारो तरफ हम देखते है हर कोई व्यक्ति हर किसी पर बंदूकें तान कर खड़ा है.. दो देशों में तनातनी चल रही है और दोनो युध्द पर आमादा है.. हिंसा के बगैर कोई पल नही बित रहा है और ऐसे समय पूरे विश्व की नजर हम पर है.. भगवान महावीर के पथ पर है।
जियो ओर जीने दो महावीर का यह घोष वाक्य आज मानवता के लिए संजीवनी बना हुआ है.. भगवान की इसी वाणी से शांति सम्भव है ओर हमे अपनी ऊर्जा उपयोग इस के प्रचार प्रसार में करना चाहिए मगर हम थोथी क्रियाओं में उलझे है।
भगवान ने कहा था मनुष्य जन्म से नही कर्म से महान बनता है.. कितनी प्यारी अवधारणा है यह जो कि गुणों को महिमामंडित करती है मगर हमने जन्म जाती को सर पर रखा है.. न जाने कौंन क्या क्या शास्त्र रच गए जो कि मूल सिद्धांतों को ही कमजोर करने की कोशिशें करते है।
यदि जैन व्यक्ति ही सबकुछ है तो फिर मुझे लगता है हर जगह जैन की ही सेवा लेनी चाहिए.. प्रवचन के लिए जो मंच बनते है वह जैन मजदूरों से बने.. पिच्छी कमंडल का निर्माण जैन ही करे.. माइक साउंड आदि बिजली के उपकरणों को जैन ही बनाये, वही मंच पर उसे लगाए ओर संघ के साथ मे सेवको की जो फ़ौज होती है वे भी सब जैन होने चाहिए।
फिर कोई बाहरी व्यक्ति भला कैसे हमारी व्हील चेयर को चला सकता है..? कहने का मतलब बस इतना ही कि जैन होने की शर्त सिर्फ आहार तक न हो बल्कि हर कदम पर हर जगह पर हो.. हमारे बाउंसर, ड्रायव्हर, पानी भरने वाले, सुरक्षा रक्षक ओर यहाँ तक कि विहार में हमारे साथ चलने वाली पोलिस भी जैन ही हो.. हमे यह कसम उठा लेनी चाहिए कि अब बस आज से सिर्फ जैन ही जैन, कोई और नही।
साधुओं को हमने वात्सल्य मूर्ति की उपमाएं दे रखी है मगर उनका यह संकल्प उनके वात्सल्य से विपरीत है.. भेदभाव वाला है.. इस संदर्भ मैने गूगल को खंगाला तो एक अन्य संत का वीडियो सामने आया जिस में वह कह रहे है कि आखिर वह उनका क्या लगता है जो उन्हें आहार देना चाहता है।
मुझे हैरानी हुई यह सुनकर क्योकि मेरे द्वारा मेरे परिवार द्वारा कई बार साधुओं को आहार दिया गया है मगर उन से हमारा कोई रिश्ता ही नही था.. साधु भक्त की भक्ति को नकार उलट उसकी भक्ति को अपमानित करते है यह पूछ कर की क्या रिश्ता है जो आहर देना चाहते हो..?
मूढ़ताओं को धर्म का चोला पहना दिया है हमने.. दिमाग तर्क को स्वीकार करने की स्थिति में नही.. विचार शून्य मस्तिष्क महावीर के वचनों को समझ ही नही पाया है.. भेड़ो की बुद्धि धारण कर ली है.. चले जा रहे है एक के पीछे एक.. एक गिरेगा तो पीछे सब गिरेंगे.. कोई बोध नही.. कोई होश नही।
जाती प्रधानता को देने वाले हम यह तक भूल गए कि महावीर भी जैन नही थे.. वे किसी जैन कुल में नही जन्मे थे.. उन्होंने कर्मो को ऊपर रखा.. कर्म से महानता की गणना की.. जाती को अगर वे महिमा मंडित करते तो कहते मनुष्य जैन धर्म मे जन्मे तो महान होता है.. मगर ऐसा कुछ नही हुआ।
वे जाती से परे गुणों के ग्राहक थे.. जाती ऊंची ओर कर्म उस के नीच तो फिर क्या फायदा..? एक संत से मेरी इस विषय पर चर्चा भी हुई.. वे सुकचाते हुए बोले आप की बात कही से भी गलत नही है.. मगर अब करे भी तो क्या करे.. मैने निवेदन किया आप कैमरे के सामने आ कर इस रिवाज का खंडन कर सकते हो.. वे बोले देखते है.. अनेक अनेक धन्यवाद।

रमेश तोरावत जैन
अकोला
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