क्या हुआ कैसे हुआ

क्या हुआ कैसे हुआ कितना हुआ

क्या हुआ कैसे हुआ

क्या हुआ कैसे हुआ कितना हुआ
जो हुआ वो था नहीं सोचा हुआ

फिर से रस्ते पर निकल आए हैं लोग
फिर से देखा वो ही सब देखा हूआ

दर्द तन्हाई अंधेरा सब तो हैं
मैं अकेला तो नहीं बैठा हुआ

उड़ गयी उल्फ़त किसी दीवार से
धूप में धुंधला गया लिख्खा हुआ

इक रियासत थी ये तेरे यार की
सामने जो है ये सब उजड़ा हुआ

आपने तो ख़ूब फ़ूंकी थी न छांच
आपके भी साथ में धोखा हुआ

काश क्या है पल है जीवन का ‘असद’
रह गया जो हाथ से छूटा हुआ

असद अकबराबादी 

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • बहुत बेचैन हूँ | Ghazal Bahut Bechain Hoon

    बहुत बेचैन हूँ ( Bahut Bechain Hoon ) सुकूँ दिल में यहाँ रहता नहीं है? ख़ुशी का जब यहाँ साया नहीं है बहुत बेचैन हूँ उसके लिये मैं अभी तक शहर से लौटा नहीं है उसे मैं कह सकूं कुछ बात दिल की मुझे वो राह में मिलता नहीं है उसे गुल देखकर पचता रहा…

  • मेरे ख़ुलूस को | Mere Khuloos ko

    मेरे ख़ुलूस को मेरे ख़ुलूस को चाहो अगर हवा देनामेरे ख़िलाफ़ कोई वाक्या सुना देना कभी तो आके मेरी ख़्वाहिशें जगा देनावफ़ा शियार हूँ तुम भी मुझे वफ़ा देना तमाम उम्र ये मंज़र रहेगा आँखों मेंनज़र मिलाते ही तेरा ये मुस्कुरा देना जिधर भी देखिए रुसवाइयों के पहरे हैंमेरे ख़ुतूत मेरे साथ ही जला देना…

  • उदास हुआ | Udaas Hua

    उदास हुआ ( Udaas Hua )   जब तेरे प्यार से उदास हुआ लग के दीवार से उदास हुआ इससे पहले तो ठीक ठाक था मैं बार इतवार से उदास हुआ बेवफाओं का ख़ैर क्या शिकवा इक वफादार से उदास हुआ कोई उसको हंसा नहीं सकता शख्स जो यार से उदास हुआ किसको भाई नही…

  • ज़िन्दगी पराई हो गई

    ज़िन्दगी पराई हो गई बेवफ़ा नहीं थी उससे बेवफ़ाई हो गईहोता ही नही यकीन जग हँसाई हो गई दे रही थी ज़ख़्म जो अभी तलक यहाँ मुझेदेखिए वो खुद ही ज़ख़्म की दवाई हो गई होठ मे गुलों की खुशबू और बातों में शहददो घड़ी में उससे मेरी आश्नाई हो गई बढ़ रही थी धड़कने…

  • नज़र ने बोल दिया

    नज़र ने बोल दिया नज़र ने बोल दिया बू-ए-हाथ से पहलेन जाने किस से मिला है वो रात से पहले वो मेरे साथ ही ग़मगीन सा नज़र आयाजो हँस रहा था बड़ा मेरे साथ से पहले मुझे लगा ही था ये बात होने वाली हैसो देखना था तेरा हाल बात से पहले ख़बर बुरी ही…

  • सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़ की ग़ज़लें | Sarfraz Husain Faraz Poetry

    नज़्में कहा करूं न मैं ग़ज़लें कहा करूं नज़्में कहा करूं न मैं ग़ज़लें कहा करूं।वो चाहते हैं उन पे क़स़ीदे पढ़ा करूं। उन पर कहां ये ज़ोर वो मेरी सुनें कभी।मुझको ये ह़ुक्म है के मैं उनकी सुना करूं। आंखों की आर्ज़ू है के देखूं जहांन को।दिल चाहता है उनके ही दर पर रहा…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *