एहसास

“पापा, मैं आपको कुछ बताना चाहता हूँ,” आरव ने अपने पिता राजेश से कहा।

“क्या हुआ बेटा? बताओ,” राजेश ने पूछा।

“आज मैं अपने दोस्त विशाल के घर गया था। उसके पिता शराब पीकर घर आए थे। वे बहुत गुस्से में थे और अपनी पत्नी और बच्चों को डांट रहे थे। मैंने देखा कि विशाल की माँ और बहन बहुत डरी हुई थीं। वे चुपचाप बैठे हुए थे और कुछ नहीं बोल रहे थे।”

“फिर क्या हुआ?” राजेश ने पूछा।

“मैंने देखा कि विशाल के पिता ने खाना फेंक दिया। उसकी माँ को थप्पड़ मारा। विशाल बहुत रो रहा था। उसकी बहन अपने पापा को देखकर डर गयी और बिस्तर में मुँह छिपाकर लेट गयी। मुझे यह सब देखकर बहुत डर लग रहा था। मैंने सोचा कि मैं यहाँ से चला जाऊँ, लेकिन विशाल मुझे रोक लिया। उसने मुझे बताया कि उसके पिता अक्सर ऐसा करते हैं।”

राजेश को यह सुनकर बहुत दुख हुआ। उन्हें एहसास हुआ कि वे भी अपने घर में शराब पीकर कभी कभी ऐसा ही व्यवहार करते हैं।

“बेटा, मुझे माफ़ कर दो।”

“पापा, आप माफी क्यों मांग रहे हो? यहाँ गलत तो विशाल के पिता ने किया।”

“बेटा, तुम्हारी बात सुनकर मुझे यह एहसास हुआ है कि अक्सर मैं भी शराब पीकर, घर पर ऐसा ही व्यवहार करता हूँ… जैसा विशाल के पापा ने किया। इसलिए मैं तुमसे माफी मांगता हूँ।”

“पापा, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप और विशाल के पापा हमेशा के लिए शराब छोड़ दें? अगर ऐसा हुआ तो कितना अच्छा होगा। मैं मम्मी के साथ मंदिर जाकर प्रसाद चढ़ाकर आऊंगा।”

यह सुनकर राजेश खामोश हो गया। उसे बच्चे की बात का जवाब देना उचित न लगा। वह आत्मग्लानि से भर गया। पूरी रात वह आरव की कही बात के बारे में सोचता रहा। उसे यह एहसास हुआ कि उनका यह व्यवहार उनके परिवार के लिए बहुत बुरा है।

अगले दिन राजेश विशाल के पिता महेश से मिला। महेश व राजेश कॉलेज समय के मित्र थे। राजेश ने महेश से मिलकर वे सारी बातें बताई जो आरव ने उनसे कही थी। राजेश ने महेश से परिवार में बच्चों के सामने इस तरह का व्यवहार न करने की अपील की तथा ये भी बताया कि वह भी अपने घर में कभी कभी ऐसा ही व्यवहार करता है।

राजेश ने आगे बोलते हुए कहा-
“कल आरव ने मुझे सोचने व मंथन करने पर मजबूर कर दिया। मुझे सच में एहसास हुआ कि हमारा यह व्यवहार परिवार के प्रति कितना गलत है। यदि हमने अपने परिवार के सदस्यों में डर बैठा रखा है…हम शराब पीकर होश में नहीं रहते… बदतमीजी दिखाते हैं या शराब पीकर घर आते हैं… बात-बात पर गुस्सा करते हैं, पत्नी-बच्चों को पीटते हैं… तो हम गलत कर रहे हैं। यह सब करके यदि हमें क्षणिक खुशी मिलती है तो यह बहुत गलत है।

हमारे लिए हमारा परिवार प्राथमिकता पर होना चाहिए। विचारणीय और महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे घर जाने से या घर में होने से लोग अच्छा फील करें, उनको खुशी हो। मैंने सोच लिया है कि मैं शराब छोड़ दूंगा। मैं यहाँ आपके पास आईना दिखाने आया हूँ और यह बताने आया हूँ कि हमारे लिए हमारे बच्चे सर्वप्रथम हैं।

उन्हीं के लिए हम कमा रहे हैं, सब कुछ कर रहे हैं। अगर उनके मन मस्तिष्क पर गलत प्रभाव पड़ता है तो कहीं न कहीं इसके जिम्मेदार हम ही होंगे। मैं आज के बाद शराब कभी नहीं पियूँगा। आप मेरे दोस्त हो। मेरा तुमसे विनम्र निवेदन है कि आप भी शराब पीना छोड़ दो।”

यह सुनकर खामोश होने की बारी अब महेश की थी। राजेश की कही हुई हर बात सच्ची थी।

राजेश ने महेश से विदा लेते हुए कहा-

“महेश, मेरी यह दिली तमन्ना है कि आज के बाद यदि मैं अपने घर जाऊं तो मेरी पत्नी को मुझे देखकर खुशी हो, वह यह ना सोचे कि अरे, ये आज फिर शराब पीकर आ गए। अब ये सबको परेशान करेंगे, बदतमीजी दिखाएंगे, कामों में, खान पीन में कमी निकालेंगे, बच्चों के सामने मुझे जलील करेंगे, अभद्र व्यवहार करेंगे। सबको टेंशन देंगे। मेरी बेटी-बेटा मुझे देखकर सहम न जाए कि पापा आ गए, अब मुझे पीटेंगे।

वह डरकर पढ़ने के लिए ना बैठ जाए या चुपके से सोने के लिए बेड में न घुस जाए। वे डरकर कांपने न लगे। इससे हम घर में मर्द तो कहलाएंगे लेकिन कोई हमें प्यार न करेगा। जब कोई हमको प्यार करेगा नहीं… तो हम खुद को बहुत अकेला महसूस करेंगे।

इससे बड़ा अकेलापन कोई नहीं है कि हम भावनात्मक रूप से किसी से जुड़े हुए नहीं है, जबकि हमें सभी का ध्यान रखना चाहिए, भावनात्मक लगाव रखना चाहिए ताकि निसंकोच, बेहिचक वे अपनी सब समस्याओं, परेशानियों को बता सकें… तभी हमारे होने की सार्थकता है। तभी हम सबका प्यार पाकर अपनी व अपने लोगों की जिंदगी खूबसूरत बना सकते हैं।”

यह कहकर राजेश आगे बढ़ गया। उस दिन राजेश बच्चों के लिए खाने की ढेरों चीजें लेकर घर गया। उसने बच्चों को, परिवार को समय देना शुरू कर दिया था। परिवार के सब लोग अब राजेश के इस तरह बदले व्यवहार को देखकर खुश थे।
महेश ने शराब छोड़ी या नहीं छोड़ी… यह तो नहीं पता लेकिन आरव की बात सुनकर राजेश जरूर सम्भल गया था। जब कोई व्यक्ति राजेश की तरह अपने गलत व्यवहार को सुधारता है और अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी को समझता है, तो निश्चित तौर पर उसके परिवार के सदस्यों के जीवन में खुशियाँ और संतुष्टि आती है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है

           दुल्हेराजा घोड़ी पर सवार थे.. बाराती नाच रहे थे.. डीजे का शोर सुस्त कदमो को भी थिरकने के लिए मजबूर कर रहा था.. महिलाएं पुरुष पसीने से लथपथ हो रहे थे.. धीरे धीरे बारात आगे बढ रही थी तभी किसी ने मेरा हाथ पकड़ा ओर बारातीयो की भीड़ से मुझे बाहर खींच लिया.. मैं चौका…..

  • निशाना

    तीव्र बुद्धि की सानिया एक गरीब लड़की थी। वह कक्षा 5 में पढ़ती थी। उसको जो भी सिखाओ या पढ़ाओ वह तुरंत सीख जाती थी और याद कर लेती थी। उसकी मैडम संध्या उसको बहुत प्यार करती थी। सानिया के पिता मजदूरी करते थे। पिछले 6 माह से सानिया विद्यालय बेहद कम आने लगी थी…

  • अनाथ

    “कहाँ मर गयी? और कितनी आवाज लगानी पड़ेगी? जल्दी से भैया का दूध गर्म करके लेकर आ। देख नहीं रही कि भैया भूख के कारण लगातार रोता जा रहा है।” राधा ने गुस्से से तेज़ आवाज में दस वर्षीय आराध्या से कहा। “बस अभी लायी मम्मी। थोड़ा सा स्कूल का काम बाकी रह गया था,…

  • मज़हब की दीवारें | Mazhab ki Deewaren

    आज दीपावली का त्यौहार है। प्रकृति में हर तरफ़ नव उत्साह एवं दिवाली का परमानंदित प्रकाश फैला हुआ है। यह दिव्य प्रकाश बिजली से जलने वाली लड़ियों एवं दीपों से आ रहा है अथवा लोगों के अंतर से-कह पाना बड़ा कठिन है, क्योंकि दोनों ने अपने-अपने स्वरूप को बिना किसी व्यवधान के एक-दूसरे में बड़ी…

  • लक्ष्मी | Laxmi

    अरे सुनते हो दीपावली का दिवस आ गया है एन वक्त पर बहुत भीड़भाड़ हो जाती है देखो धन्वंतरि पूजा चतुर्दश धनतेरस छोटी दीवाली बड़ी दिवाली भैया दूज मनाने तक बहुत सारे दिए चाहिए, इसलिए जल्दी चलकर हम लोगों को दिए और जरूरत के सामान खरीद लेने चाहिए। शारदा जी ने थोड़ी तेज आवाज में…

  • आराम

    “यहाँ क्या कर रहे हो?” अस्पताल में वेंटिलेटर पर अशोक को लेटा देखकर विनोद ने पूछा। “आराम” अशोक ने जवाब दिया “वो तो दिख रहा है। यह सब कैसे हुआ?” “बड़े भाई, हर समय काम, काम और काम। काम के सिलसिले में मैंने आराम करने का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा। नतीजा यह हुआ कि अब…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *