चोरी पकड़ी गई

चोरी पकड़ी गई

स्कूल की कैंटीन में कक्षा एक की 6 साल की इलिशा के हाथ में 500 का नोट देखकर कैंटीन मालिक को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बच्ची कैंटीन से कुछ सामान खरीदने आयी थी। कैंटीन मालिक ने बच्ची से पूछा-

“बेटा, तुम्हें क्या चाहिए? यह 500 का नोट तुम्हें किसने दिया? क्या पापा ने दिया?”

“नहीं, मैं पापा की जेब से ये रुपए चुरा के लेकर आई हूँ। मुझे इन रुपयों से ढेर सारे चिप्स, चॉकलेट्स और कुरकुरे खाने हैं।” इलिशा बोली।

कैंटीन मालिक बच्ची के सच बोलने की क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ। वह इलिशा को लेकर प्रिंसिपल सर के पास पहुँचा और ₹500 का नोट देते हुए… प्रिंसिपल सर को सारा वाकया कह सुनाया। प्रिंसिपल सर ने तुरंत बच्ची के पिता अरुण को कॉल की। कुछ ही समय बाद इलिशा के पिता अरुण जी प्रिंसिपल रूम में थे।

प्रिंसिपल सर ने अरुण जी से पूछा-

“क्या आपको पता है कि आपकी बेटी ने आपकी जेब से₹500 निकाले हैं? वह भी कैंटीन से चिप्स, कुरकुरे, चॉकलेट्स जैसी चीजें खाने के लिए….? क्या आप अपने बच्चों को उनकी पसंद की चीजे नहीं खिलाते या उन्हें बाज़ार से लाकर नहीं देते? क्या वजह है जो आपका बच्चा चोरी पर उतर आया?”

“प्रिंसिपल साहब, ऐसी बात नहीं है। मैं अपनी तीनों बेटियों का बेहद ध्यान रखता हूँ। यह मेरी सबसे छोटी बेटी है। इसकी दो बड़ी बहनें भी इसी स्कूल में पढ़ती हैं। मेरी बच्चियों को जिस चीज का भी खाने का मन होता है, वह चीज शाम को ही मैं घर लाकर बच्चों को देता हूँ।

इनकी हर ख्वाहिश पूरी करता हूँ। कभी किसी चीज के लिए अपनी बेटियों को नहीं तरसाया। बस मेरी गलती यही है कि मैं बच्चियों को खर्च करने के लिए रुपए नहीं देता, बल्कि इनको जिस चीज की भी जरूरत होती है… चाहे वह चीज खाने की हो या फिर कोई और हो… लाकर दे देता हूँ।”

स्कूल में पिता अरुण का आने का सुनकर इलिशा की दोनों बहनें (काव्या और आरोही) भी प्रिंसिपल रूम में आ गई थी। उन्हें भी इलिशा द्वारा 500 रुपये चोरी करने का पता चल गया था।

अब अरुण इलिशा की तरफ मुड़े और उससे सवाल किया-

“बेटा, मैं तुम्हें हर चीज लाकर देता हूँ। रात ही तो तुम सब बहनों को मैंने घर
आकर चॉकलेटस, चिप्स, फल वगैरह खिलाये थे। फिर भी इलिशा… तुम्हें चोरी की जरूरत महसूस हो गई? क्या मैं पूछ सकता हूँ कि तुमने ऐसा क्यों किया?”

इलिशा बोली-

“मैं रोज स्कूल के बच्चों को कैंटीन से नई-नई चीजें खरीदकर खाते हुए देखती थी… तो मेरा भी मन करता था कि मैं भी अपनी पसंद की चीजें खरीदकर खाऊं… लेकिन ऐसा ना हो पता था क्योंकि मेरे पास और दीदी के पास चीज खरीदने को पैसे नहीं होते थे। आज मनपसंद चीजें खाने के लिए मैंने आपकी जेब से रुपए निकाले। आई एम सॉरी पापा। मुझसे गलती हो गई। अब चोरी नहीं करूंगी।” मासूमियत से इलिशा बोली।

“बेटा, आप माफी मत मांगो। गलती मेरी ही है। मुझे समझना चाहिए था कि घर पर सब कुछ मौजूद होने के बाद भी… बच्चों का मन बाहर की चीज खाने पीने का करता ही है। घर की बनी चीजें या घर पर लाकर खाई गई चीजों में वह स्वाद, वह मजा कहाँ आता है जो बाहर जाकर खाने में आता है?

इलिशा बेटा, मैंने सोच लिया है कि मैं तुम्हें और तुम्हारी दोनों बहनों… प्रत्येक को सप्ताह में एक बार दस-दस रुपये दिया करूँगा। इन ₹30 से तुम बहनें अपनी पसंद की कोई भी चीज कैंटीन से लेकर खा लिया करना, लेकिन एक शर्त है?”

“शर्त? वह क्या है पापा?” इलिशा ने सवाल किया।

“वह यह है कि तुम तीनों कभी चोरी नहीं करोगी। जिस चीज की भी तुम तीनों बहनों को जरूरत होगी, वह मुझसे निःसंकोच कहोगी। मैं तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी करूँगा, बशर्ते तुम्हारी मांग जायज हो। और हाँ, एक बात और… मुझे तुम सब उन ₹30 का हिसाब भी दोगी कि आखिर उन ₹30 से तुमने क्या खरीदा? क्या खाया? या कह सकते हैं उनका कैसे इस्तेमाल किया? बोलो मंजूर है?”

“हाँ पापा जी। मुझे मंजूर है। मेरे अच्छे पापा। लव यू पापा।” कहकर इलिशा, काव्या व आरोही तीनों पापा अरुण के गले लग गई।

इलिशा व अरुण का वार्तालाप एवं प्रेम देख रहे प्रिंसिपल, कैंटीन मालिक व अन्य लोगों की आंखें खुशी से नम हो गई।

आजकल के बच्चें चाहे वे छोटे हो या बड़े… वे बंधन में जकड़कर रहना पसंद नहीं करते हैं। वे भी आजादी चाहते हैं। अपने मन का खाना-पीना-खेलना चाहते हैं, भले ही आप उन्हें घर पर सब कुछ आसानी से उपलब्ध करवा रहे हों। स्मार्ट मां-बाप वही होते हैं जो बच्चों की इच्छाओं व भावनाओं की कद्र करते हुए उन्हें आजादी दें।

यहाँ आजादी का मतलब यह कतई नहीं है कि हम अपने बच्चों को बिल्कुल खुली छूट दे दें, उनके क्रियाकलापों पर… अच्छी बुरी आदतों पर नजर ना रखें। हमें उन्हें सब कुछ, सब काम करने देना है… लेकिन खुद की निगरानी में ही बच्चों को रखना है और उनके क्रियाकलापों पर नजर रखनी है… आखिर मां-बाप से ज्यादा अच्छे ढंग से बच्चों का कौन ख्याल रख सकता है?

शिक्षा:-

यह कहानी बच्चों के मनोविज्ञान और उनकी जरूरतों को समझने के महत्व को दर्शाती है। इस कहानी में इलिशा के पिता अरुण जी ने अपनी बेटी की जरूरतों को समझा और उसकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए एक अच्छा और संतुलित तरीका निकाला।

उन्होंने इलिशा को अपनी पसंद की चीजें खरीदने के लिए पैसे देने का फैसला किया, लेकिन साथ ही उन्होंने इलिशा को यह भी सिखाया कि पैसे का सही इस्तेमाल कैसे करना है और चोरी करना गलत है।

यह कहानी माता-पिता को यह सिखाती है कि बच्चों को उनकी जरूरतों को समझने और उनकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए एक संतुलित और सही तरीका निकालना चाहिए। साथ ही, यह कहानी बच्चों को भी यह सिखाती है कि चोरी करना गलत है और पैसे का सही इस्तेमाल करना महत्वपूर्ण है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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