मुझ से खफा खफा ये सुंदरियाँ

मुझ से खफा खफा ये सुंदरियाँ : भाग.. 1

अचानक मेरे फोन पर कुछ तस्वीरे, कुछ फिल्मे आयी तो मैं चौक पड़ा.. कोई नया नम्बर था.. अपरिचित.. किसी खूबसूरत महिला की तस्वीरे थी.. अलग अलग परिधान में वह बहुत ही सुंदर और लुभावनी लग रही थी.. मैने याददाश्त पर जोर लगाया मगर कुछ याद नही बन पड़ा कि वो कौंन है.. यक़ीनन वह मेरे संपर्क में नही थी.. जवाब में मैने धन्यवाद कहा और पूछा कौन..?

उस ने अपना नाम बताया तो मैने पूछा क्या हम परिचित हैं..? उधर से कोई जवाब नही आया बल्कि फोन ही आ गया.. मैं सकपकाया.. फोन उठाऊ या नही सोचने लगा.. आजकल मोबाइल पर अनजान लड़कियों, महिलाओं के फोन बहुत आते हैं और वे एक प्रकार के लुटेरे धोखेबाज होते हैं.. मोबाईल पर वीडियो कॉल करते हैं और अंगप्रदर्शन की फिल्में बना लेते और फिर ब्लैकमेलिंग का धंधा शुरू कर देते हैं.. मैने फोन नही उठाया।

उसका मैसेज आया कि मुझे आप से बात करनी है आप फोन उठाये.. ओर फिर तुंरत फोन आ गया.. मैने फोन उठाया तो उधर से खनकती सी आवाज आई नमस्कार सर.. आप रमेश जी तोरावत जैन बोल रहे हो न..! मैने प्रतिउत्तर में हा कहा तो बोलने लगी सर, आप बहुत ही  बढ़िया लिखते हो.. मैने आप की कई रचनाएं पढ़ी है. मैने धन्यवाद कह कर पूछा कि आप कौंन हो और मैं आप को नही जानता हूं।

उस ने जो बताया उसका सार यही था कि वह फिल्मो में छोटे मोटे रोल करती है.. कोई बहुत बड़ी सफल फ़िल्म उस के नाम नही थी.. संघर्ष उसका अभी शुरू था.. मुंबई में वह अकेली रहती है.. किसी कवियत्री ने उसे मेरे फिल्मो पर लिखे लेख भेजे थे ओर वह पढ़कर बहुत ही प्रभावित हुई और मुझे फोन कर बैठी.. मैने उसका आभार माना और उसके उज्वल भविष्य की कामना की.. फिर उस ने यह कहकर फोन रख दिया कि अभी उसे कही बाहर जाना है सो बाद में फिर बात करेंगी.

    मैं उसकी भेजी तस्वीरों को गौर से देखने लगा.. वह बहुत ही खूबसूरत तीखे नैन नक्श वाली महिला थी.. कुछ तस्वीरों में उसने आधुनिक परिधान धारण किये थे जिस का की मैं विरोधी हु.. एक तस्वीर में वह साड़ी पहनी हुई थी और एक आदर्श भारतीय नारी की संकल्पना को चरितार्थ कर रही थी.. फिल्मो में वह कुछ एक्शन और नृत्य करते नजर आ रही थी.. नृत्य उसका ऐसा था कि कोई भी पुरुष रीझ जाए.

     कुछ दिनों बाद फिर उसका फोन आया.. इस बार वह इस अंदाज में बात करने लगी कि मानो वह कोई बहुत ही मेरी करीबी हो.. बातचीत में वह बहुत ही बेतकल्लुफ थी.. एक दम बिंदास.. कहने लगी कि उसे मैं फिल्मो में कोई बढ़िया सा रोल दिलाऊ.. मैने हैरानी से कहा मैं भला कैसे उसे रोल दिला सकता हु.. मेरा फिल्मी दुनिया से कोई रिश्ता नही है.. यह मेरे बस की बात नही है.. वह कहने लगी आप फिल्मो पर इतना लिखते हो तो आप की पहचान जरूर बड़े निर्माताओं निर्देशको से होंगी न.. आप मेरी तस्वीरे उन्हें भेजिये न.. मैने उसे समझाने के भाव से कहा यह फिल्मी दुनिया बड़ी ही रंगीन मिजाज है.. यह स्त्रियों के शोषण के लिए बदनाम है.. आप का नुकसान हो सकता है. उस ने नाराजगी के अंदाज में फोन रख दिया.

    महीनेभर के अंतराल में फिर उस ने मेरा फोन बजाया.. काफी देर उस ने बात की ओर उस की बातों से यही कहानी बाहर आई कि वह कुछ कर दिखाना चाहती है.. वह एक घरेलू पारिवारिक लड़की थी मगर फिल्मो की चकाचौंध ने उस के भीतर के कलाकार को आंदोलित किया और वह गाँव छोड़ दिल्ली चली आयी।

कुछ इक्का दुक्का फिल्मो में वह झलकी भी मगर जिन सफलताओं की लालसा लिए वह घर से निकली थी वह उस से कोसो दूर थी.. इसी दौरान वह किसी पर मोहित हो गयी और काफी समय उस ने उस व्यक्ति के साथ गुजारा.. कुँआरी थी मगर वह कुँआरी नही थी.. शराब को वह खराब नही मानती थी.. उस के अपने जीने के अंदाज थे और वह पूरी मौज के साथ जीवन जीती थी।

अपने ऐब का उसे पता था मगर ईमानदारी इतनी की कुछ भी छुपाना उस की फितरत में नही था.. वह इस अंदाज में सब किस्से बयां कर गयी मानो उसकी मेरी मित्रता बरसो की हो.. महिला होने का उसे आभास था मगर बातचीत में उसकी शैली पुरुषों जैसी दबंग ही थी।

अपने लिव इन रिलेशनशिप पर बोलते हुए वह जरा भी नही सकुचाई.. शादी किये बिना ही हमबिस्तर होना उसकी नजरो में कोई गुनाह नही था.. और फिर अंत मे मैं ऐसी ही हु.. ऐसी ही रहूंगी कह कर अपनी बातों को विराम दिया.. मैने उसे फिर समझाइश दी कि बिना किसी गॉड फादर के वह आगे न बढ़े.. उसका निश्चित ही नुकसान होंगा।

फिल्मी दुनिया मे आबरू के लुटेरे बहुतायत मात्रा में है और अकेली महिला के शोषण की संभावना बहुत अधिक रहती है.. वह घर लौट जाए और शादी कर नए सिरे से जिंदगी को फिर शुरू करे.. मेरी बात सुन वह तल्ख़ स्वर में बोली आप के उपदेश नही सुनने है.. मुझे फिल्मो में कामयाब होना है चाहे उसकी मुझे जो कीमत चुकानी पड़े।

स्पष्टतः वह मुझे इशारों में बता रही थी कि देह की कीमत पर भी उसे फिल्मो में कोई रोल मिलता है तो वह तैयार है.. मैने फोन काट दिया तो उस ने फिर फोन किया मगर मैने फोन नही उठाया.. त्रिया चरित्र के बारे में मैं जानता हूं और समझ रहा था कि वह मुझ पर पासे फेंक रही है मगर मैं भला कहा फंसने वाला था.

     कुछ महीनों बाद उसका फिर फोन आया.. न चाहते हुए भी मैने फोन रिसीव किया.. वह बहुत ही नम्र स्वर में बोली आप मुझे क्षमा कर दीजिए मैने उस दिन आप से बडी ही बदतमीजी के साथ बात की.. मैने कहा नही.. कहा बदतमीजी की आप ने.. मुझे तो कुछ लगा ही नही ऐसा.. मेरी बात सुन वह खुश हो गयी.. कहने लगी आप से बात कर न जाने क्यो ऐसा लगता है कि मैं किसी बहुत ही भरोसेमंद व्यक्ति से बात कर रही हु।

वर्ना अब तक जितनो के साथ भी बात हुई हैं सब के सब मुझे नोंचने की फिराक में थे.. सब मेरे रूप सौंदर्य की तारीफ कर मेरे करीब आने की कोशिश करते थे मगर आप जुदा किस्म के हो.. मैने उसे बीच मे टोका.. मैं बहुत ही डरपोक हु.. वह हंसने लगीं.. हँसते हँसते बोली डरपोक तो आप नही हो मगर बहुत ही सावधानी बरतने वाले जरूर हो.. मैने कहा आज कैसे फोन किया.. आप को पहले ही बता दिया न कि मेरा फिल्मो से ओर फिल्मवालों से कोई नाता नही है.. मैं आप की कोई मदद नही कर सकता.. वह बोली कोई बात नही.. मैने आप को इसलिए फोन किया है ताकि आप की राय जान सकू.. आप बताये की मुझ में हीरोइन वाले सारे गुण है कि नही.. क्या मैं सुंदर नही हु..?  

बड़ा ही अजीब सवाल था उसका.. ओर सच को स्वीकार करने का उसका स्वभाव भी नही.. मगर सच बताना भी जरूरी था उसे.. सच क्या था.. सच तो यही था कि वह बहुत ही सुंदर और मादक थी.. उसके हावभाव फिल्मो की रीत को सार्थक थे मगर मुख्य अभिनेत्री के रूप में उसे कोई भी निर्माता निर्देशक पर्दे पर नही उतार सकता था क्योकि  मासूम ओर कमसिन उम्र को वह लांघ चुकी थी।

उसकी खूबसूरती भाभी माँ के रोल के लिए परिपूर्ण थी.. वह युवा होते बच्चे की माँ का भी किरदार निभा सकती थी.. सुंदर होने के बावजूद भी उस के चेहरे पर विषमताएं की कुछ लकीरें नमूद हो रही थी सो वह खलनायिका के लिए बढ़िया पसंद हो सकती थी मगर उसे मुख्य नायिका बनने का भूत चढ़ा था।

वह असम्भव था.. मैने उसे यह सब बातें कही तो वह थोड़ी देर के लिए सन्न सी रह गयी.. फिर बोली मुझे आजतक किसी ने भी ऐसा नही कहा जैसा कि आप कह रहे हो.. सब दावे करते है कि मैं माधुरी श्रीदेवी की जगह को भर सकती हूं.. क्या सच मे मेरी उम्र इस कदर हो गयी है कि मैं भाभी और माँ के किरदारों को निभाऊ..?

मैं कुछ नही बोला.. चुप ही रहा.. वह बोलती रही.. आज आप ने मेरे सपनों पर पानी फेर दिया.. मुझे निराश कर दिया.. आप से यह उम्मीद नही थी.. आप को हीरोइनों की परख ही नही है.. मेरी जैसी जवान खूबसूरत को माँ के रोल में देखना चाहते है.. मेरी ही गलती थी जो कि  मैं गलत दरवाजे पर दस्तक दे रही थी.. चलो बाय.. नमस्कार।

कह कर उस ने फोन काट दिया.. कही भीतर से मेरे आवाज आई अब वह कभी फोन नही करेंगी.. यह उसका आखिरी फोन है.. मैने उसका व्हाट्सएप्प देखा.. गालों तक आती उसकी लटाओं वाला दिलकश चेहरा अब मुझे दिख नही रहा था.. उस ने मुझे ब्लॉक कर दिया था.. मैने एक गहरी सांस ली और बुदबुदाया है भगवान तेरा लाख लाख शुक्र है.. अनेक अनेक धन्यवाद.

रमेश तोरावत जैन
अकोला
मोब 9028371436

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • दे मॉं सरस्वती ऐसा वरदान

    मेरे को वह हम सबको माँ सरस्वती ऐसा वरदान दे कि हम सबके जीवन में सदैव विद्या के संग विनय का ज्ञान होता रहे । वह माँ सरस्वती मेरे को ऐसा आशीर्वाद प्रदान करती रहना की मैं सदैव अपने लेखन को उत्कृष्टता पर लिख आध्यात्मिक संतुष्टि प्राप्त करता रहूँ। मेरे दिवंगत आध्यात्मिक शिक्षक शासन श्री…

  • मदर्स डे | Mother’s day

    जब ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई, तो सृजनकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि को संवारने के लिए अनेक रूप रचे। देव, असुर, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, मानव — सब अस्तित्व में आए। परंतु जब उसने देखा कि हर जीव अपनी सुरक्षा, पोषण और संवेदना के लिए किसी शक्ति की तलाश में है, तो ब्रह्मा ने अपनी करुणा से एक…

  • ढाट इतिहास

    ढाट इतिहास ढाट का ढंग निराला मन भावन पावन,ढाट का रंग निराला चित्त चित्र पावन। खावड़ में खोदते ख़ूब पार खेतों में ,मीठा मन भावन धोरा धरती रेतों में। झाड़ जंगल पहाड़ नहीं आकड़े उगते अपार,बूहड़ा फोग सिणिया खीप खड़े कर क़त़ार। मनख महमानों की करते मान मनोहार मोकली,जीमण को रोटी राबड़ी झण मखण ढोकली।…

  • नारी का दर्द व संघर्ष की कहानी

    नारी, जो सृष्टि की जननी और जीवन का आधार है, उसके जीवन में अनेक रंग और स्वरूप हैं। प्रेम, ममता, त्याग और धैर्य से परिपूर्ण नारी का जीवन अक्सर समाज के नियमों और अपेक्षाओं के तले दब जाता है। परंपराओं और मान्यताओं में बंधी नारी, अपने सपनों और इच्छाओं को अनदेखा कर, अपने परिवार और…

  • शरारत भरी होली

    गाँव की होली का रंग हर साल कुछ अलग ही होता था। हर गली-मोहल्ले में गुलाल उड़ता, ढोल की थाप पर ठुमके लगते, और सबसे ज्यादा मस्ती होती थी बच्चों की टोली में। इस बार भी बबलू गैंग—बबलू, सोनू, चिंटू और पिंकी—ने कुछ नया करने की सोची। गाँव के चौपाल पर हर साल ठंडाई बनती…

  • नारी की वेदनाएं

    भारत को पुरुष प्रधान देश माना जाता है। प्राचीन काल से ही भारत में महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता रहा है। उनके साथ हमेशा भेदभाव किया जाता है. महिलाओं के साथ हमेशा दुर्व्यवहार किया जाता है। यह पुरुष प्रधान संस्कृति के कारण हुआ है। इसके साथ ही, पारंपरिक पुरुष-प्रधान संस्कृति के प्रभाव में…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *