नारी का दर्द व संघर्ष की कहानी

नारी का दर्द व संघर्ष की कहानी

नारी, जो सृष्टि की जननी और जीवन का आधार है, उसके जीवन में अनेक रंग और स्वरूप हैं। प्रेम, ममता, त्याग और धैर्य से परिपूर्ण नारी का जीवन अक्सर समाज के नियमों और अपेक्षाओं के तले दब जाता है। परंपराओं और मान्यताओं में बंधी नारी, अपने सपनों और इच्छाओं को अनदेखा कर, अपने परिवार और समाज के लिए त्याग करती रहती है।

भारतीय समाज में नारी को देवी के रूप में पूजा जाता है, लेकिन वास्तविकता में उसे अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक, उसे भेदभाव, अत्याचार और शोषण का सामना करना पड़ता है। बेटा और बेटी के बीच भेदभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य की उपेक्षा, दहेज प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा और कार्यस्थल पर असमानता जैसी समस्याएं उसके जीवन को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती। उन्हें घरेलू कार्यों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाता है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में, जहां महिलाएं आत्मनिर्भर होने की कोशिश करती हैं, उन्हें कार्यस्थल पर असमान वेतन और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है।

इसके अलावा, समाज में महिलाओं को उनकी भूमिका के आधार पर जज किया जाता है। अगर वे परिवार को प्राथमिकता देती हैं, तो उन्हें “असफल प्रोफेशनल” समझा जाता है, और अगर करियर चुनती हैं, तो “अच्छी मां या पत्नी नहीं” कहकर उनकी आलोचना की जाती है।

फिर भी, नारी ने हर युग में संघर्ष करते हुए अपनी पहचान बनाई है। वह रानी लक्ष्मीबाई की तलवार बनकर लड़ी है, मदर टेरेसा की करुणा बनकर सेवा की है, और कल्पना चावला की उड़ान बनकर इतिहास रचा है।

आज आवश्यकता है कि नारी को उसके अधिकार दिए जाएं और समाज उसकी भावनाओं, सपनों और महत्वाकांक्षाओं का सम्मान करे। शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा में समानता देकर ही नारी के दर्द को कम किया जा सकता है। एक सशक्त नारी ही एक सशक्त समाज और राष्ट्र की नींव रख सकती है।

नारी का दर्द केवल उसका नहीं है, यह समाज का आईना है। उसे समझने और उसका समाधान खोजने की जिम्मेदारी हम सबकी है।
साधुवाद!

नारी शक्ति की प्रतीक एवम् हिन्दी साहित्य जगत की ‘दीपशिखा’ – सादर !

कवयित्री : श्रीमती बसंती
प्रतिष्ठित लेखिका, सामाजिक चिंतक (अध्यापिका विभागाध्यक्ष)
हैदराबाद, वाराणसी, भारत।

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