प्रियंका सौरभ की कॉलम
“शिक्षा का बाज़ार और कोचिंग की बढ़ती निर्भरता”
जब विद्यालय शिक्षण का केंद्र नहीं रहते, तो शिक्षा व्यापार बन जाती है।
हर तीसरा स्कूली छात्र प्राइवेट कोचिंग ले रहा है। शहरी परिवार औसतन 3988 रुपये सालाना कोचिंग पर खर्च कर रहे हैं। ग्रामीण परिवार औसतन 1793 रुपये सालाना खर्च करते हैं। विद्यालयों की शिक्षण गुणवत्ता कमजोर होने से अभिभावक मजबूर हैं। कोचिंग से शिक्षा असमानता और रटंत संस्कृति बढ़ रही है।
आज शिक्षा का स्वरूप केवल कक्षा-कक्ष तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह एक विशाल बाज़ार का रूप ले चुका है। हाल ही में आए सर्वेक्षण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हर तीसरा स्कूली छात्र प्राइवेट कोचिंग की ओर बढ़ रहा है। यह स्थिति केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गाँवों और कस्बों तक फैल चुकी है। शिक्षा, जो कभी घर-परिवार और समाज की साझा जिम्मेदारी मानी जाती थी, अब पूरी तरह बाज़ारीकरण और व्यवसायीकरण की चपेट में आ चुकी है।
कोचिंग संस्थानों का इतना व्यापक चलन इस बात की ओर इशारा करता है कि हमारे विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर हो चुकी है। शिक्षक-छात्र अनुपात असंतुलित है, स्थायी शिक्षकों की भारी कमी है और सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई का अभाव है। यही कारण है कि अभिभावक अतिरिक्त खर्च उठाकर भी अपने बच्चों को कोचिंग क्लासेज़ भेजने के लिए मजबूर हैं। शिक्षा पर खर्च किसी परिवार के लिए केवल आर्थिक दबाव ही नहीं, बल्कि मानसिक बोझ भी है।
कोचिंग पर खर्च बढ़ने के पीछे कई सामाजिक कारण भी हैं। प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में बढ़ती होड़, नौकरी की असुरक्षा और उच्च शिक्षा में प्रवेश की कठिनाइयाँ बच्चों को प्रारंभिक स्तर से ही अतिरिक्त पढ़ाई की ओर धकेल देती हैं। शहरों में यह प्रवृत्ति और अधिक है क्योंकि वहाँ प्रतियोगिता तीव्र है, वहीं गाँवों में भी धीरे-धीरे यह चलन गहराता जा रहा है।
यह प्रश्न केवल निजी खर्च का नहीं, बल्कि शिक्षा की दिशा और दशा का है। जब बच्चे स्कूल जाकर भी पर्याप्त ज्ञान अर्जित नहीं कर पाते और उन्हें वही विषय दोबारा कोचिंग में पढ़ना पड़ता है, तो इसका सीधा अर्थ है कि विद्यालयों की शिक्षण पद्धति में गंभीर खामियाँ हैं। शिक्षक यदि प्रेरक हों, पाठ्यपुस्तकें उपयोगी हों और वातावरण सकारात्मक हो तो बच्चों को स्कूल से बाहर कोचिंग की आवश्यकता ही न पड़े।
सर्वेक्षण यह भी दर्शाता है कि ग्रामीण परिवार औसतन 1793 रुपये सालाना कोचिंग पर खर्च कर रहे हैं, जबकि शहरी परिवारों का यह खर्च लगभग 3988 रुपये सालाना है। यह अंतर केवल आय स्तर का ही नहीं, बल्कि शिक्षा तक पहुँच की असमानता का भी द्योतक है। शहरों में कोचिंग उद्योग संगठित रूप में कार्य कर रहा है, जबकि गाँवों में यह अधिकतर व्यक्तिगत ट्यूशन तक ही सीमित है।
एक और गंभीर पहलू यह है कि शिक्षा पर यह अतिरिक्त बोझ गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को गहरे संकट में डाल देता है। उच्च वर्ग के बच्चे महंगी कोचिंग और ट्यूशन से अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ा लेते हैं, लेकिन गरीब परिवारों के बच्चे इसी कारण पीछे छूट जाते हैं। यह शिक्षा के लोकतांत्रिक स्वरूप पर आघात है, क्योंकि शिक्षा समान अवसर प्रदान करने का माध्यम होनी चाहिए, न कि असमानता को और बढ़ाने का कारण।
सरकार ने कई बार दावा किया है कि विद्यालयों में शिक्षा का स्तर बेहतर किया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कक्षा-कक्षों में शिक्षण की गुणवत्ता उस स्तर तक नहीं पहुँच पा रही है कि छात्र आत्मनिर्भर हो सकें। विद्यालयों को केवल परीक्षाओं में उत्तीर्ण कराने वाली संस्थाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें विद्यार्थियों में जिज्ञासा, आलोचनात्मक सोच और आत्मविश्वास विकसित करने वाली प्रयोगशालाओं के रूप में विकसित करना चाहिए।
कोचिंग पर निर्भरता एक और संकट खड़ा कर रही है – यह विद्यार्थियों को रटंत संस्कृति की ओर धकेल रही है। कोचिंग संस्थान सामान्यतः परीक्षा परिणाम पर केंद्रित रहते हैं, वहाँ सृजनात्मकता या जीवन मूल्यों की शिक्षा नहीं दी जाती। इस प्रकार विद्यार्थी केवल अंक प्राप्त करने की मशीन बनते जा रहे हैं, न कि संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण कर रहे हैं।
समाधान के रूप में सबसे पहले विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। शिक्षक पदों की रिक्तियाँ तत्काल भरी जानी चाहिएँ, विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता होनी चाहिए और शिक्षण पद्धति को अधिक व्यावहारिक तथा छात्र-केंद्रित बनाया जाना चाहिए। जब तक विद्यालयों में विश्वास नहीं बनेगा, तब तक कोचिंग का यह बाजार यूँ ही बढ़ता जाएगा।
यह भी आवश्यक है कि शिक्षा नीतियों में इस प्रवृत्ति को ध्यान में रखा जाए। नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को समग्र शिक्षा प्रदान करना है, लेकिन यदि कोचिंग का दबाव लगातार बढ़ता गया तो यह नीति भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएगी। शिक्षा को व्यावसायिक बनाने के बजाय सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।
आज समय की मांग है कि शिक्षा का बोझ बच्चों से कम किया जाए। उन्हें कोचिंग संस्थानों की दीवारों के बीच कैद करने के बजाय खुले वातावरण में सीखने का अवसर दिया जाए। प्रतिस्पर्धा की भावना अच्छी है, लेकिन जब यह केवल आर्थिक सामर्थ्य पर आधारित हो जाए तो यह समाज में गहरी खाई पैदा करती है।
शिक्षा का बाज़ार लगातार फैल रहा है और यह हमारी शिक्षा प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। यदि विद्यालयों में शिक्षा का स्तर सुधारा गया, शिक्षकों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय की गई, और अभिभावकों का विश्वास वापस लाया गया, तभी हम कोचिंग पर निर्भरता कम कर पाएँगे। अन्यथा, हर तीसरा नहीं बल्कि हर दूसरा बच्चा भी कोचिंग की ओर भागता नज़र आएगा।
स्कूल छोड़ती बेटियाँ: संसाधनों की कमी या सामाजिक चूक?
(“बेटियाँ क्यों छोड़ रही हैं स्कूल? सवाल सड़कों, शौचालयों और सोच का है” “39% लड़कियाँ स्कूल से बाहर: किसकी जिम्मेदारी?” “‘बेटी पढ़ाओ’ का सच: किताबों से पहले रास्ते चाहिए”)
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने चौंकाने वाला सच उजागर किया है कि 15 से 18 वर्ष की उम्र की लगभग 39.4% लड़कियाँ स्कूल से बाहर हो चुकी हैं। शिक्षा के इस मौन पलायन के पीछे स्कूलों की दूरी, परिवहन की अनुपलब्धता, शौचालयों की कमी और सुरक्षा को लेकर भय जैसे कारण हैं। यह स्थिति केवल एक व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता की कमजोरी को भी दर्शाती है। यह लेख सवाल करता है कि क्या हम सच में बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं या सिर्फ नारे गढ़कर आत्मतुष्टि पा रहे हैं?
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा हर गली-चौराहे, सरकारी इमारतों और बैनरों पर चमकता है, लेकिन यह नारा उन गाँवों और बस्तियों तक नहीं पहुँच पाता जहाँ बेटियाँ रोज़ स्कूल छोड़ रही हैं। हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि 15 से 18 वर्ष की आयु वर्ग की 39.4% लड़कियाँ स्कूल से बाहर हैं। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं, यह हमारे सामाजिक ढांचे पर एक कठोर टिप्पणी है।
घर से स्कूल की दूरी, सुरक्षित परिवहन की कमी, उच्च माध्यमिक विद्यालयों का अभाव, शौचालयों की स्थिति और सामाजिक असुरक्षा – ये सारी बातें किसी शोधपत्र की विषयवस्तु नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत हैं जिनसे रोज़ हज़ारों बच्चियाँ जूझ रही हैं। और अंततः उन्हें शिक्षा से हाथ धोना पड़ता है। सरकारी आंकड़े भले ही बढ़े हुए नामांकन दिखाते हों, लेकिन हकीकत यह है कि नामांकन के बाद लड़कियाँ स्कूल तक टिक नहीं पातीं।
एक आम ग्रामीण परिदृश्य को देखें। पाँचवीं तक की स्कूल तो आसपास है, लेकिन आठवीं के बाद विद्यालय दूर है। परिवहन की कोई सुविधा नहीं। न बस, न साइकिल, न ही कोई महिला सहकर्मी या मार्गदर्शक। माता-पिता अपनी बेटी को पाँच किलोमीटर दूर अकेले भेजने से डरते हैं। उन्हें चिंता होती है कि रास्ते में कोई छेड़छाड़ न हो, कोई हादसा न हो। उस चिंता में स्कूल जाना बंद हो जाता है।
शौचालयों की बात करें तो यह सिर्फ सुविधा नहीं, आत्मसम्मान और स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है। किशोरावस्था में लड़कियाँ उन परिवर्तनों से गुजरती हैं, जहाँ एक स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय उनकी शिक्षा की निरंतरता तय कर सकता है। लेकिन अधिकांश सरकारी स्कूलों में या तो शौचालय हैं ही नहीं, या हैं तो गंदे, असुरक्षित, या क्षतिग्रस्त। माता-पिता के लिए यह एक और कारण बन जाता है अपनी बेटियों को स्कूल से हटाने का।
सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। जिन स्कूलों में कोई महिला शिक्षक नहीं होतीं, कोई सीसीटीवी कैमरा या गार्ड नहीं होता, वहाँ किशोर लड़कियों को भेजना आज भी माता-पिता के लिए जोखिम उठाने जैसा है। यह डर केवल अव्यवस्था से नहीं, समाज की असंवेदनशीलता से भी उपजा है। आए दिन होने वाली घटनाएं, समाचारों में आती छेड़छाड़ की खबरें इस भय को और गहरा करती हैं।
इन सबके अलावा शिक्षा को लेकर समाज की प्राथमिकताएँ भी स्पष्ट नहीं हैं। एक लड़का पढ़े तो ‘परिवार का भविष्य’ बनता है, लेकिन लड़की पढ़े तो ‘शादी की उम्र निकलने का डर’ पैदा होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह मानसिकता अब भी गहराई से मौजूद है। लड़कियों की शिक्षा को ‘लाभ’ से ज्यादा ‘खर्च’ माना जाता है।
अब यदि इन परिस्थितियों में एक बेटी स्कूल छोड़ दे, तो क्या इसमें उसकी गलती है? या यह एक सामूहिक चूक है — व्यवस्था की, समाज की, और हमारी?
इस स्थिति का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, ठोस क्रियान्वयन से होगा। सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि हर गाँव से तीन किलोमीटर के दायरे में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हो। यह बुनियादी शैक्षिक ढांचा हर बच्चे का अधिकार है।
परिवहन की सुविधा उतनी ही ज़रूरी है जितनी शिक्षक की उपस्थिति। यदि बच्चियाँ स्कूल नहीं पहुँच पाएंगी तो पढ़ेंगी कैसे? सरकार को स्कूल वैन, छात्रा साइकिल योजना या सार्वजनिक परिवहन में ‘स्कूल पास’ जैसे विकल्प सुनिश्चित करने होंगे।
हर स्कूल में स्वच्छ और उपयोगी शौचालयों की अनिवार्यता केवल ‘स्वच्छ भारत मिशन’ का हिस्सा नहीं, बल्कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के सच्चे मर्म का आधार होना चाहिए। महिला कर्मचारियों की नियुक्ति, नियमित निरीक्षण और साफ-सफाई के लिए स्थानीय प्रशासन को उत्तरदायी बनाया जाए।
सुरक्षा के लिए प्रत्येक स्कूल में महिला शिक्षकों की उपस्थिति बढ़ाई जाए। सुरक्षा गार्ड, सीसीटीवी कैमरा और स्कूल परिसर में अभिभावकों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए। यह कदम न केवल बेटियों को सुरक्षा का भरोसा देगा, बल्कि अभिभावकों को मानसिक शांति भी।
इसके साथ ही स्कूलों के भवन और अधोसंरचना को केवल औपचारिकता के लिए नहीं, गुणवत्ता के साथ विकसित किया जाना चाहिए। पुस्तकालय, कंप्यूटर कक्ष, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल का मैदान — ये सब स्कूल के मानक हिस्से होने चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण बिंदु डिजिटल शिक्षा है। महामारी ने दिखा दिया कि जिनके पास मोबाइल, इंटरनेट और बिजली नहीं, वे पढ़ाई से बाहर हो जाते हैं। ग्रामीण स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और उपकरण की उपलब्धता अब विलासिता नहीं, अनिवार्यता है।
शिक्षा विभाग को उन लड़कियों की नियमित सूची बनानी चाहिए जो स्कूल छोड़ चुकी हैं। उनके घर जाकर कारण जानना, उन्हें वापस लाने के लिए प्रेरित करना, और माता-पिता को विश्वास में लेना प्रशासन की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
साथ ही समाज को भी आत्मावलोकन करना होगा। हम अपनी बेटियों को क्यों पढ़ाना चाहते हैं — नौकरी के लिए, शादी के लिए या आत्मनिर्भरता के लिए? जब तक समाज का जवाब अस्पष्ट रहेगा, तब तक समाधान भी अधूरा रहेगा।
प्रशासन, समाज और परिवार को मिलकर यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि कोई भी बच्ची शिक्षा से वंचित न हो। इसका अर्थ है केवल विद्यालय खुलवाना नहीं, बल्कि उसमें बेटी के जाने और टिके रहने की पूरी ज़िम्मेदारी लेना।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अगर केवल बैनर की पंक्ति नहीं रहना है तो इसे पंचायतों, स्कूल समितियों, शिक्षक संगठनों, अभिभावकों और छात्रों के साझा प्रयास में बदलना होगा। तभी एक ऐसा समाज बनेगा, जहाँ कोई भी बेटी पढ़ाई से वंचित नहीं होगी।
नौकरी लगते ही पतियों को छोड़ रही हैं आधुनिक औरतें
(रिश्तों की हत्या का आधुनिक ट्रेंड)
“रोज़गार मिला, रिश्ते छूटे,जिसने पढ़ाया, वही पराया हो गया”
विवाह अब त्याग और समर्पण की बजाय स्वार्थ और स्वतंत्रता की शरण में चला गया है। अनेक मामले सामने आ रहे हैं जहाँ पति ने पत्नी को पढ़ाया, नौकरी लगवाई, पर जैसे ही वह आत्मनिर्भर हुई, पति को ठुकरा दिया। यह आधुनिक सोच रिश्तों को तोड़ रही है। शिक्षा और कानून महिलाओं को अधिकार तो दे रहे हैं, पर जिम्मेदारी से दूर कर रहे हैं। सशक्तिकरण तब तक अधूरा है जब तक वह रिश्तों का सम्मान न सिखाए। समाज को अब ऐसे स्वार्थी दृष्टिकोण के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए जो परिवार को तोड़ने का कारण बन रहा है।
एक समय था जब पति-पत्नी का रिश्ता त्याग, प्रेम और परस्पर समर्पण का प्रतीक होता था। विवाह सिर्फ सामाजिक अनुबंध नहीं, एक गहरी भावनात्मक और आध्यात्मिक यात्रा मानी जाती थी। लेकिन आज की आधुनिकता, शिक्षा और तथाकथित “अधिकार चेतना” ने इस पवित्र रिश्ते को भी स्वार्थ की भट्ठी में झोंक दिया है। आज देश में तेजी से बढ़ते ऐसे मामलों पर चिंता ज़ाहिर हो रही है जहाँ एक पति सालों मेहनत करके, मजदूरी करके अपनी पत्नी को पढ़ाता है, उसके सपनों को पंख देता है, और जैसे ही उसकी सरकारी नौकरी लगती है — वह उसी पति से कहती है: “आप कौन जी?”
यह सवाल अकेले एक पुरुष से नहीं पूछा जा रहा, यह सवाल उस समूचे त्याग से पूछा जा रहा है, जो एक रिश्ते को निभाने में लगाया गया था। यह सवाल उस व्यवस्था पर भी है, जिसने शिक्षा को अधिकार तो दिया, मगर ज़िम्मेदारी नहीं सिखाई। यह सवाल कानून से भी है, जिसने स्त्री को संरक्षण तो दिया, पर रिश्तों को निभाने की नैतिकता सिखाने का प्रयास नहीं किया।
आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ एक और विचारधारा ने समाज में गहराई से जड़ें जमा ली हैं — “खुद को पहले रखो”, “रिश्ते बोझ हैं”, “स्वतंत्रता का अर्थ है किसी भी बंधन से मुक्त होना”। यह सोच, विशेषकर महिलाओं को यह सिखा रही है कि विवाह, पति, परिवार केवल एक सामाजिक औपचारिकता हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर त्यागा जा सकता है। और जब शिक्षा, कानून और समाज का एक वर्ग इस सोच को बढ़ावा देता है, तो परिणाम होता है — घर टूटते हैं, विश्वास बिखरता है और पुरुषों का त्याग मज़ाक बन जाता है।
एक गरीब पति जिसने ईंटें ढोकर, दिहाड़ी लगाकर अपनी पत्नी को पढ़ाया, उसका फॉर्म भरा, उसकी फीस दी, परीक्षा केंद्र तक छोड़ा, उसके चयन के बाद मिठाई बांटी — वही पति जब दरवाज़े पर खड़ा होता है तो पत्नी कहती है — “अब आपकी कोई ज़रूरत नहीं रही।” यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं, यह उस संघर्ष की मौत है जिसमें रिश्ते सांस लेते थे। यह आधुनिकता का वह चेहरा है, जो चमकता तो है, पर भीतर से खोखला है।
बिना किसी कारण, बिना किसी उत्पीड़न के यदि कोई पत्नी केवल नौकरी लगने के बाद पति को अस्वीकार कर दे, तो यह न सशक्तिकरण है, न स्वतंत्रता — यह एक सामाजिक अपराध है। यह उन मूल्यों की हत्या है जो भारतीय समाज की नींव हैं। यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि हम उन स्त्रियों की बात नहीं कर रहे जो वाकई उत्पीड़न झेलती हैं, शोषित होती हैं या जिन्हें बचाव की आवश्यकता है। बात उन मामलों की हो रही है जहाँ कानून और अधिकारों का दुरुपयोग करके एक पत्नी अपने पति को केवल इसलिए छोड़ देती है क्योंकि अब वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गई है।
कानून ने महिलाओं को जो संरक्षण दिया है, वह आवश्यक है और होना भी चाहिए, लेकिन वह संरक्षण तभी तक पवित्र है जब तक उसका उपयोग हो, दुरुपयोग नहीं। आज समाज में ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ रही है जहाँ महिलाओं ने झूठे आरोप लगाकर न केवल अपने पतियों को, बल्कि उनके परिवारों को भी जेल भिजवा दिया, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और आर्थिक रूप से तबाह कर दिया। क्या यही है “नवीन भारत” का पारिवारिक चेहरा?
जब एक लड़की कहती है, “अब मैं कमाती हूं, मुझे किसी की जरूरत नहीं”, तो यह स्वतंत्रता नहीं, आत्ममुग्धता है। क्या आत्मनिर्भरता का अर्थ यह है कि रिश्तों को छोड़ दिया जाए? क्या नौकरी लगते ही प्रेम और त्याग की कीमत शून्य हो जाती है? क्यों नहीं यह समझाया जाता कि सशक्त स्त्री वह है जो अपनी उड़ान में भी अपने घोंसले को संजोकर रखे, न कि उड़ते ही उसे जला दे?
शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि सोच में परिपक्वता लाना है। दुर्भाग्यवश आज की पढ़ाई ने यह परिपक्वता नहीं दी, बल्कि कई मामलों में आत्मकेंद्रित सोच को जन्म दिया है। आत्मनिर्भरता अगर स्वार्थ में बदल जाए, तो वह समाज के लिए एक खतरा बन जाती है। पढ़ाई के बाद यदि स्त्री अपने रिश्तों से पलायन करती है, तो यह प्रश्नचिन्ह है उस शिक्षा पर, उस सोच पर, और उस कानून पर जो उसे यह करने की छूट देते हैं।
कई बार जब पत्नी पति को छोड़ती है, तब समाज चुप रहता है। महिलाएं इसे अपना अधिकार मानती हैं, और पुरुषों के पास बोलने तक की जगह नहीं होती। अगर कोई पति यह कह दे कि “मैंने उसे पढ़ाया, बढ़ाया, उसका करियर बनाया”, तो उसे कहा जाता है कि “उसने तुम्हारे ऊपर कोई एहसान नहीं किया, वह अब स्वतंत्र है।” लेकिन जब कोई स्त्री अपने पति के बलिदान से आगे बढ़ती है, तो क्या उस त्याग की कोई कीमत नहीं होती? क्या उसकी कोई भावनात्मक मान्यता नहीं?
यह मानसिकता अब अदालतों तक पहुँच चुकी है। न्यायालयों में ऐसे हजारों केस लंबित हैं जहाँ पुरुष अपने वैवाहिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, अपने बच्चों से मिलने के लिए तरस रहे हैं, और वर्षों तक एक ऐसे रिश्ते का बोझ ढो रहे हैं जो केवल कागज पर बचा है। वे न तलाक ले सकते हैं, न नया जीवन शुरू कर सकते हैं, और न ही समाज उनकी पीड़ा समझता है।
कई मामलों में तो पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ बाहर से प्रेम संबंध जोड़ लेती हैं, पति से दूरी बना लेती हैं, और फिर कानूनी सुरक्षा के पीछे छिप जाती हैं। जब ऐसे मामलों पर कोई प्रश्न उठाता है, तो उसे “महिला विरोधी”, “संकीर्ण सोच वाला” या “पितृसत्तात्मक” कहा जाता है। लेकिन क्या एक समाज को इतना भी अधिकार नहीं कि वह रिश्तों की रक्षा करने वाले पुरुष की आवाज़ को सुने?
यदि यही मानसिकता चलती रही, तो आने वाले वर्षों में विवाह संस्था ही खोखली हो जाएगी। पुरुष विवाह से डरेंगे, परिवार टूटेंगे, और समाज में अविश्वास की दीवारें खड़ी होंगी। स्त्रियों को यह समझना होगा कि वे केवल नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों को निभाने के लिए भी उत्तरदायी हैं। जब कोई पति आपकी फीस भरता है, कोचिंग लगवाता है, हौसला देता है, तब वह केवल पति नहीं, एक मार्गदर्शक, एक सहायक, एक संरक्षक बनता है। और जब आप सफलता पाकर उसे छोड़ देती हैं, तो आप सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि विश्वास को ठुकरा देती हैं।
यह समाज अब और अधिक झूठे केस, दिखावटी आज़ादी और स्वार्थ की आड़ में तोड़े गए रिश्ते नहीं झेल सकता। अब वक्त आ गया है कि शिक्षा में नैतिक मूल्य जोड़ें, कानूनों में संतुलन लाएं, और समाज में यह संदेश दें कि सशक्तिकरण का अर्थ जिम्मेदारी से भागना नहीं, बल्कि उसे ईमानदारी से निभाना है।
रिश्तों में अधिकार जितने ज़रूरी हैं, उतने ही ज़रूरी हैं कर्तव्य। सच्चा सशक्तिकरण वही है जो रिश्तों को तोड़े नहीं, उन्हें और मजबूत करे। क्योंकि अगर नौकरी लगते ही कोई पत्नी अपने पति को कहे — “आप कौन?” — तो यह केवल पति की नहीं, पूरे समाज की हार है।
“स्क्रीन का शिकंजा: ऑस्ट्रेलिया से सबक लेता भारत?”
ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए यूट्यूब समेत सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर प्रतिबंध लगाने का साहसिक फैसला लिया है। यह कदम बच्चों को ऑनलाइन दुनिया के नकारात्मक प्रभावों से बचाने के लिए उठाया गया है।
भारत जैसे देशों में, जहां डिजिटल लत तेजी से फैल रही है, वहां इस तरह की नीति बेहद जरूरी हो गई है। यह समय है कि भारत भी बच्चों के डिजिटल अधिकारों की रक्षा के लिए स्पष्ट कानून बनाए, अभिभावकों को जागरूक करे और बच्चों को स्क्रीन की लत से मुक्त करके संतुलित विकास की दिशा में कदम बढ़ाए।ऑस्ट्रेलिया के फैसले से दुनिया के देशों को सबक लेना चाहिए कि बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने का समय अब आ गया है।
“बचपन अब किताबों से नहीं, स्क्रीन की चमक से आकार ले रहा है।” यह वाक्य अब सिर्फ साहित्यिक प्रतीक नहीं रहा, बल्कि हमारे समाज की वास्तविकता बन चुका है। मोबाइल, टैबलेट और इंटरनेट की पहुँच बच्चों तक इतनी सहज हो चुकी है कि चार साल का बच्चा भी यूट्यूब पर कार्टून देख सकता है और दस साल का बच्चा इंस्टाग्राम पर रील्स बनाना जानता है।
ऐसी स्थिति में ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा लिया गया फैसला न सिर्फ साहसिक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम भी है। ऑस्ट्रेलिया ने यह तय कर दिया है कि 16 वर्ष से कम आयु के बच्चे यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म का भी उपयोग नहीं कर सकेंगे। यह नीति 10 दिसंबर से लागू हो रही है, और इसका उल्लंघन करने पर संबंधित प्लेटफार्मों पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
ऑस्ट्रेलिया की संसद पहले ही फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक और एक्स जैसे प्लेटफार्मों को 16 साल से कम आयु के बच्चों के लिए प्रतिबंधित कर चुकी है। अब यूट्यूब को भी इसी दायरे में शामिल किया गया है। यह दुनिया का पहला कानून है जो बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर इतनी स्पष्टता और कठोरता के साथ लागू किया जा रहा है।
नियमों के मुताबिक अगर कोई प्लेटफार्म 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सेवाएं देना जारी रखता है, तो उस पर 5 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाया जाएगा। यह कोई सामान्य चेतावनी नहीं है, बल्कि टेक कंपनियों को जवाबदेह बनाने की एक गंभीर कोशिश है।
ऑस्ट्रेलिया की सरकार का मानना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक विकास और व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने यह स्पष्ट कहा है कि माता-पिता को यह जानने का हक है कि उनके बच्चे क्या देख रहे हैं और किसके प्रभाव में हैं।
यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर जो सामग्री बच्चों के सामने आती है, वह कई बार हिंसा, लैंगिक पूर्वाग्रह, अपशब्दों और अमर्यादित व्यवहार से भरी होती है। इतना ही नहीं, बच्चों को लगातार विज्ञापन, ब्रांडेड कंटेंट और चकाचौंध वाली ज़िंदगी दिखाकर उनकी असल दुनिया से दूरी बढ़ाई जा रही है।
यूट्यूब का कहना है कि वह केवल एक वीडियो होस्टिंग प्लेटफार्म है और उसे सोशल मीडिया की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। यूट्यूब के प्रवक्ता का तर्क है कि 13 से 15 साल के लगभग तीन-चौथाई ऑस्ट्रेलियाई किशोर इसका उपयोग करते हैं और इसे शैक्षणिक, रचनात्मक व मनोरंजक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
पर सवाल उठता है कि क्या यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म बच्चों के लिए वाकई सुरक्षित हैं? क्या वे सुनिश्चित करते हैं कि बच्चों को केवल उपयुक्त और सकारात्मक सामग्री ही दिखाई जाए? वास्तविकता यह है कि अधिकतर टेक कंपनियाँ केवल व्यूज, क्लिक और विज्ञापन राजस्व के लिए काम करती हैं, न कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए।
भारत जैसे देशों में यह मुद्दा और अधिक गंभीर हो जाता है। यहां इंटरनेट यूज़र्स की संख्या करोड़ों में है, जिनमें बड़ी संख्या किशोरों और स्कूली बच्चों की है। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 13 से 17 वर्ष के बच्चे हर दिन औसतन तीन घंटे से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं।
इतनी कम उम्र में जब बच्चों को किताबों, खेल और सामाजिक मेल-जोल में समय बिताना चाहिए, वे अपने कमरे में अकेले बैठकर स्क्रीन से चिपके रहते हैं। इससे न सिर्फ उनकी आँखों और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक विकास भी बाधित होता है।
स्कूलों में शिक्षकों को अब इस बात की चिंता होती है कि विद्यार्थी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि रात भर मोबाइल पर लगे रहते हैं। माता-पिता इस कशमकश में रहते हैं कि बच्चों को मोबाइल दें या न दें, क्योंकि अगर वे न दें तो बच्चा पिछड़ने का डर जताता है, और दें तो स्क्रीन की लत लग जाती है।
डिजिटल लत अब नशे की तरह फैल चुकी है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, नींद की कमी, एकाग्रता में गिरावट और रिश्तों से दूरी जैसी समस्याएँ अब आम हो चुकी हैं। कुछ बच्चे तो सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और साइबर बुलिंग का शिकार हो रहे हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
भारत में अभी तक इस मुद्दे पर कोई ठोस नीति नहीं बन पाई है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर 13 साल की आयु सीमा तो तय है, लेकिन उसका पालन कोई नहीं करता। बच्चे गलत उम्र डालकर खाते बना लेते हैं और बिना किसी निगरानी के उनका इस्तेमाल करते हैं।
माता-पिता की भूमिका भी संदिग्ध है – कुछ अभिभावक खुद ही बच्चों को स्क्रीन थमाकर व्यस्त कर लेते हैं, जबकि उन्हें मार्गदर्शक बनना चाहिए। इसके अलावा, भारत में स्कूल स्तर पर भी डिजिटल नैतिकता की शिक्षा का अभाव है। बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग कैसे करें, फर्जी समाचारों से कैसे बचें, या साइबर खतरों से कैसे सतर्क रहें।
समस्या सिर्फ टेक्नोलॉजी की नहीं है, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक जागरूकता की भी है। जब तक माता-पिता, शिक्षक और सरकारें मिलकर यह तय नहीं करेंगी कि बच्चों को किस तरह की डिजिटल दुनिया में प्रवेश करना है, तब तक कोई भी तकनीकी समाधान प्रभावी नहीं हो सकता। डिजिटल अनुशासन केवल कानून से नहीं, संस्कार और समझ से आता है।
ऑस्ट्रेलिया का यह कदम इस मायने में प्रेरक है कि उसने बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को प्राथमिकता दी और टेक कंपनियों को चुनौती दी। भारत को भी अब इंतज़ार नहीं करना चाहिए। यह समय है जब सरकार एक स्पष्ट और सख्त नीति बनाए कि 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया और मनोरंजक प्लेटफार्म से दूर रखा जाएगा। साथ ही, कंटेंट फिल्टरिंग, स्क्रीन टाइम लिमिट, और आयु सत्यापन जैसी तकनीकों को अनिवार्य किया जाए।
इसके साथ ही अभिभावकों के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएँ, ताकि वे यह समझ सकें कि बच्चों के जीवन में स्क्रीन की भूमिका क्या होनी चाहिए। स्कूलों में डिजिटल नागरिकता की शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। मीडिया और फिल्म जगत को भी यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि वे बच्चों के लिए सकारात्मक, मूल्य-आधारित और प्रेरक सामग्री का निर्माण करें।
याद रखना चाहिए कि आज के बच्चे कल का समाज तय करेंगे। अगर वे अभी से वर्चुअल दुनिया के भ्रम में खो जाएँगे, तो उन्हें वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने की ताकत नहीं मिल पाएगी। एक ऐसा समाज तैयार होगा जो स्क्रीन पर जीता होगा, लेकिन जीवन की सच्चाईयों से दूर होगा।
बचपन केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं होता, वह मानव जीवन की नींव होता है। अगर उस नींव में सोशल मीडिया की दरारें भर जाएँगी, तो ऊपर खड़ी होने वाली इमारत कभी मजबूत नहीं बन सकेगी। ऑस्ट्रेलिया ने यह संदेश दुनिया को दिया है कि बच्चों को संरक्षित करना केवल पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं, राष्ट्र की नीति होनी चाहिए।
भारत को चाहिए कि वह इस चेतावनी को गंभीरता से ले और भविष्य की पीढ़ियों को सिर्फ डिजिटल दक्ष नहीं, बल्कि संतुलित, संवेदनशील और सुरक्षित नागरिक बनाए। अब समय आ गया है कि हम अपने बच्चों को स्क्रीन से थोड़ी दूरी देकर, उनके जीवन में फिर से किताबों, खेलों और संबंधों को जगह दें। वरना, वह दिन दूर नहीं जब बच्चे हमारे साथ नहीं, बल्कि सिर्फ स्क्रीन के साथ बड़े होंगे।
“अगर बचपन स्क्रीन में खो गया,
तो समाज खुद अपने भविष्य से रूठ जाएगा।”
उधम सिंह सरदार: एक गोली, सौ सालों की गूंज
( उधम सिंह: लंदन की अदालत में भारत की गरिमा का नाम )
उधम सिंह केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक विचार थे—संयम, संकल्प और सत्य का प्रतीक। जलियांवाला बाग़ के नरसंहार का प्रत्यक्षदर्शी यह वीर 21 वर्षों तक चुपचाप अपने मिशन की तैयारी करता रहा और लंदन जाकर ओ’डायर को गोली मारकर भारत का प्रतिशोध पूरा किया। उनकी चुप्पी न्याय की गर्जना थी, जो आज भी हमें अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है। आज उनकी याद केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्ममंथन की पुकार है—क्या हम उधम सिंह के उत्तराधिकारी बन पाए हैं?
भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई केवल तलवारों की टंकार या जुलूसों की गूंज नहीं थी, वह उन आंखों में पलते संकल्पों की लड़ाई थी, जो वर्षों तक प्रतिशोध को अपनी आत्मा में पाले रही। वह उन लोगों की कहानी थी, जो नारे नहीं लगाते थे, लेकिन भीतर ही भीतर एक ज्वालामुखी की तरह उबलते रहते थे। उन ज्वालाओं में से एक नाम था — उधम सिंह।
उधम सिंह, जिन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी में अपने साथियों का खून देखा। जिन्होंने अपने जीवन को एक ही लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया — न्याय। यह कहानी है एक ऐसे वीर की, जो किसी अखबार की सुर्ख़ी नहीं बना, लेकिन इतिहास की सबसे करारी चोट साबित हुआ।
13 अप्रैल 1919, अमृतसर। बैसाखी का त्यौहार था। जलियाँवाला बाग में हज़ारों लोग शांतिपूर्वक एकत्र थे। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि यह दिन इतिहास के सबसे रक्तरंजित दिनों में तब्दील हो जाएगा। जनरल डायर की क्रूरता ने मासूमों पर गोलियों की बौछार कर दी। न कोई चेतावनी, न कोई चेतावक विचार। निहत्थे लोगों पर मशीनगनों से फायरिंग हुई। लाशों की चादर बिछ गई। सैकड़ों लोग मारे गए, और हज़ारों ज़ख़्मी। पूरा बाग खून से लाल हो गया।
उसी नरसंहार में एक 20 वर्षीय युवा घायल, लेकिन जीवित बचा—उधम सिंह। उन्होंने न केवल उस घटना को देखा, बल्कि उसे अपने सीने में पत्थर की तरह गड़ा लिया। उन्होंने न शोर मचाया, न कोई शिकायत की। पर उनके अंदर एक ज्वाला धधक रही थी, जो शांति से नहीं बुझने वाली थी।
उधम सिंह ने अपने जीवन को एक ही दिशा दी—इस क्रूरता का बदला लेना। उन्होंने प्रतिशोध नहीं, न्याय की भाषा चुनी। वे वर्षों तक खामोशी से तैयारी करते रहे। अपने देश से दूर जाकर दुश्मन की धरती पर खड़े होकर भारत का परचम लहराने का उन्होंने प्रण लिया। यह कोई आवेश में किया गया कार्य नहीं था, यह एक सुनियोजित नैतिक युद्ध था।
1934 में वे लंदन पहुँचे। वहाँ वे गुमनाम ज़िंदगी जीते रहे। उनका मकसद केवल ओ’डायर तक पहुँचना था—वह व्यक्ति जिसने जनरल डायर के कत्लेआम को समर्थन और सम्मान प्रदान किया था। 13 मार्च 1940 को वह दिन आया, जब उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के एक सभागार में जाकर, कैक्सटन हॉल में ओ’डायर को गोली मारी। वह गोली केवल एक शरीर को नहीं भेदती थी, वह एक साम्राज्य की आत्मा को झकझोर देती थी।
उधम सिंह वहीं गिरफ्तार हुए। उन्होंने भागने की कोई कोशिश नहीं की। अदालत में खड़े होकर उन्होंने गर्व से कहा, “मैंने मारा है। यह प्रतिशोध नहीं, न्याय है। मैं अपने देश के लिए मरने जा रहा हूँ, और मुझे इस पर गर्व है।” उनके चेहरे पर न पछतावा था, न भय। वह एक आत्मा थी, जो न्याय के सिद्धांत पर अडिग थी।
ब्रिटिश शासन की नींव को यह घटना अंदर तक हिला गई। एक भारतीय, साम्राज्य की राजधानी में आकर, खुलेआम न्याय कर गया। यह केवल एक हत्या नहीं थी, यह अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ एक नैतिक घोषणापत्र था। उधम सिंह ने यह दिखा दिया कि भारतवासी केवल लड़ाई के मैदान में ही नहीं, विवेक और साहस के साथ भी लड़ सकते हैं।
आजादी के बाद भारत ने उधम सिंह को “शहीद-ए-आज़म” की उपाधि दी। लेकिन क्या हम सच में उनके विचारों और बलिदान के योग्य उत्तराधिकारी बन पाए हैं?
आज भी हमारे देश में अन्याय मौजूद है। बलात्कारियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है, पत्रकार जेलों में बंद हैं, गरीब किसान आत्महत्या कर रहा है और सत्ता मौन है। क्या यही वह भारत है, जिसकी कल्पना उधम सिंह ने की थी? क्या हममें से किसी के भीतर वैसी आग बची है?
उधम सिंह ने बंदूक चलाई थी, लेकिन वह गोली भारत की चेतना को जगा गई थी। वह गोली एक उदाहरण थी, कि अगर अन्याय को सहा गया, तो वह बार-बार दोहराया जाएगा। उन्होंने यह दिखाया कि सच्चा राष्ट्रभक्त वह नहीं जो तिरंगा लहराकर भाषण देता है, बल्कि वह है जो अन्याय के सामने कभी न झुके।
आज जब हम राष्ट्रवाद के नाम पर नफ़रत का बाज़ार सजते देख रहे हैं, तो उधम सिंह का नाम हमें आइना दिखाता है। उन्होंने कभी किसी धर्म, जाति या पार्टी के नाम पर संघर्ष नहीं किया। उनका उद्देश्य केवल एक था—न्याय और स्वतंत्रता।
उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर हम मोमबत्तियाँ जलाते हैं, प्रतिमाओं पर फूल चढ़ाते हैं। लेकिन यह श्रद्धांजलि तब तक अधूरी है जब तक हम उनके विचारों को अपने जीवन में न उतारें। देशभक्ति केवल एक दिवस की भावना नहीं हो सकती। वह एक निरंतर जागरूकता है, जो हर अन्याय के खिलाफ आवाज़ बनकर उठती है।
आज के युवाओं के लिए उधम सिंह एक आदर्श हैं। एक ऐसा आदर्श जो कहता है — “धैर्य रखो, पर चुप मत रहो। तैयारी करो, पर डर मत खाओ। न्याय माँगो नहीं, उसे प्राप्त करो।”
अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे सच्चे नागरिक बनें, तो हमें उन्हें उधम सिंह की कहानी केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं, बल्कि जीवन के उदाहरणों से सिखानी होगी। उनकी तस्वीर केवल दीवार पर न टांगे, बल्कि उनके सिद्धांतों को अपने आचरण में उतारें।
भारत को आज भी उधम सिंह जैसे लोगों की ज़रूरत है। जो सत्ता से नहीं डरते, जो सत्य के लिए खड़े होते हैं, और जिनकी दृष्टि केवल अपने स्वार्थ तक सीमित नहीं होती। हमें उधम सिंह को केवल ‘अतीत’ नहीं, ‘वर्तमान’ बनाना होगा।
जिस दिन हम अपने चारों ओर अन्याय देखकर चुप नहीं रहेंगे, उसी दिन उधम सिंह का बलिदान सच्चे अर्थों में सार्थक होगा। वह दिन जब हर नागरिक अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ बन जाएगा—वही दिन उधम सिंह के भारत की शुरुआत होगी।
उधम सिंह की एक गोली ब्रिटेन की संसद में चली थी, लेकिन उसकी गूंज आज भी भारत की आत्मा में है। वह गूंज हमें हर रोज़ पूछती है—क्या तुम तैयार हो अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए? क्या तुम केवल श्रद्धांजलि देने आए हो या उनके जैसे कुछ करने का साहस भी रखते हो?
उधम सिंह सरदार केवल एक नाम नहीं, एक विचार हैं। वह विचार जो कहता है कि आज़ादी केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक साहस से मिलती है। वह विचार जो हमें बार-बार याद दिलाता है कि क्रांति केवल तलवार से नहीं, आत्मा के विश्वास से होती है।
उधम सिंह, तुम्हें नमन!
तुम्हारी वह एक गोली आज भी हमें जगाने के लिए काफ़ी है।
हरियाली तीज: परंपरा की जड़ें और आधुनिकता की डालियाँ
हरियाली तीज केवल श्रृंगार, झूला और व्रत का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय स्त्री के आत्मबल, प्रेम और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। आधुनिकता की दौड़ में यह त्योहार भले ही प्रदर्शन का माध्यम बनता जा रहा हो, पर इसकी आत्मा अब भी स्त्री के मन, पर्यावरण और लोकसंस्कृति में जीवित है।
यह पर्व रिश्तों में स्थायित्व, समाज में समरसता और जीवन में हरियाली लाने का संदेश देता है। आवश्यकता है इसे सादगी, सामूहिकता और संवेदना के साथ फिर से जीने की, ताकि परंपरा आधुनिकता के संग आगे बढ़े।
हरियाली तीज का नाम लेते ही आँखों के सामने एक चित्र उभरता है—हरा चूनर ओढ़े खेत, बारिश की बूंदों से भीगी धरती, झूलती बालाएं, मेंहदी रचे हाथ और लोकगीतों की सुमधुर गूंज।
पर यह चित्र अब केवल स्मृति में रह गया है, क्योंकि आधुनिकता की तेज़ रफ्तार ने परंपराओं के रंगों को हल्का कर दिया है। फिर भी हरियाली तीज आज भी भारतीय स्त्रियों के मन में गहरे तक रची-बसी है। यह पर्व आज केवल धार्मिक या पारंपरिक नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी विशेष महत्व रखता है।
हरियाली तीज वर्षा ऋतु में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है, जो शिव-पार्वती के पुनर्मिलन की स्मृति में विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को आता है, जब आसमान बादलों से भर जाता है और धरती पर हरियाली बिछ जाती है। हरियाली तीज का मूल भाव प्रेम, समर्पण, सौंदर्य और प्रकृति के साथ तादात्म्य का है। पहले जहां इस पर्व को गाँवों और कस्बों में सामूहिक रूप से खुले वातावरण में मनाया जाता था, वहीं आज शहरी अपार्टमेंटों, वातानुकूलित हॉलों और सोशल मीडिया की चमक में इसकी आत्मा कहीं खोती जा रही है।
प्रश्न यह नहीं है कि पर्व मनाया जा रहा है या नहीं, प्रश्न यह है कि हम किस भाव से उसे निभा रहे हैं। पहले यह त्योहार स्त्रियों को सालभर की व्यस्तता और परिश्रम से थोड़ी राहत देने वाला, उनके भावनात्मक संसार को सहेजने वाला एक सहज अवसर होता था।
स्त्रियाँ बिना किसी दिखावे के, प्राकृतिक परिवेश में एक-दूसरे से मिलती थीं, अपने सुख-दुख साझा करती थीं, लोकगीतों में अपने अनुभवों को पिरोती थीं। लेकिन अब यह पर्व कहीं-कहीं ‘सर्वश्रेष्ठ श्रृंगार प्रतियोगिता’, ‘तीज क्वीन’ और ‘सेल्फी विद स्विंग’ जैसे आयोजनों में तब्दील हो गया है, जहाँ संवेदना की जगह प्रतियोगिता ने ले ली है।
हरियाली तीज स्त्री मन के उस पक्ष को उजागर करता है जो प्रेम, प्रतीक्षा और पारिवारिक समर्पण से जुड़ा होता है। आज के दौर में जब रिश्ते त्वरित संवाद और क्षणिक भावनाओं में बदलते जा रहे हैं, तब यह पर्व स्थायित्व, आस्था और धैर्य का संदेश देता है।
यह पर्व यह भी सिखाता है कि संबंधों को केवल अधिकार से नहीं, कर्तव्य और भावना से निभाया जाता है। पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखना हो या शिव-पार्वती जैसे दांपत्य संबंधों की कल्पना, इन सबमें एक ऐसा भाव छिपा है जो स्त्री को त्याग का नहीं, बल्कि आत्मबल का प्रतीक बनाता है।
आधुनिक संदर्भ में देखें तो यह पर्व कई नए अर्थों को जन्म देता है। जहां पहले तीज केवल विवाहित स्त्रियों तक सीमित थी, अब कई स्थानों पर इसे अविवाहित लड़कियाँ भी आत्मिक अनुभूति और सामूहिक संस्कृति के रूप में मनाने लगी हैं।
कार्यरत महिलाओं के लिए यह पर्व अपने अस्तित्व और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का एक माध्यम बनता जा रहा है। वही महिलाएं, जो दिनभर कार्यालयों में कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने बैठी रहती हैं, तीज के अवसर पर झूला झूलते हुए कुछ पल के लिए प्रकृति के साथ जुड़ जाती हैं। यह जुड़ाव आज की मानसिक थकान और तनाव के दौर में एक भावनात्मक उपचार जैसा है।
परंतु आधुनिकता की यह यात्रा केवल सकारात्मक बदलाव नहीं लाती। तीज अब एक ‘सोशल मीडिया इवेंट’ बन गया है, जहाँ हर महिला को यह सोचकर श्रृंगार करना पड़ता है कि उसकी फोटो सबसे सुंदर दिखे। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर #TeejLook, #GreenDressChallenge और #TeejVibes जैसे ट्रेंड त्योहार को ग्लैमर से तो भरते हैं, पर उसकी आत्मा को खोखला भी करते हैं।
त्योहार अब मन की खुशी से ज़्यादा दिखावे की होड़ में शामिल हो गया है। यही कारण है कि त्योहार बीतने के बाद भी मन संतुष्ट नहीं होता, क्योंकि वह जुड़ाव, वह सामूहिकता, वह आत्मीयता अब केवल तस्वीरों में सीमित रह जाती है।
हरियाली तीज की सबसे सुंदर बात यह थी कि यह पर्व हमें प्रकृति के करीब ले जाता था। खेतों में लगे झूले, पेड़ों पर टंगे कागज़ के फूल, मिट्टी से बने शिव-पार्वती के स्वरूप — ये सब हमें याद दिलाते थे कि हम प्रकृति के ही अंश हैं। आज जब हम जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वॉर्मिंग, पेड़ों की कटाई और प्रदूषण जैसे संकटों से जूझ रहे हैं, तब तीज जैसे पर्व हमें पर्यावरण संरक्षण की चेतना दे सकते हैं।
अगर हर तीज पर एक पेड़ लगाने की परंपरा शुरू की जाए, अगर बच्चों को झूला झुलाने के साथ-साथ पेड़ से प्रेम करना सिखाया जाए, तो यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, पर्यावरणीय आंदोलन बन सकता है।
तीज में महिलाएं लोकगीत गाती थीं, जिनमें नारी की पीड़ा, उसकी उम्मीदें, उसकी हंसी, और उसका समाज से संवाद छुपा होता था। आज वह लोकगीत मोबाइल की रिंगटोन बन चुके हैं या यूट्यूब के व्यूज तक सिमट गए हैं।
हमें इन गीतों को फिर से जीवन में लाना होगा। नारी की आवाज़ को उसकी भाषा, उसकी धुन, और उसके लोकसंगीत में फिर से पिरोना होगा। यदि हम सच में महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं तो इन सांस्कृतिक मंचों को पुनर्जीवित करना जरूरी है, क्योंकि यही स्त्रियों को आत्म-अभिव्यक्ति की सबसे स्वाभाविक ज़मीन देते हैं।
आज जब महिलाएं शिक्षा, सेवा, राजनीति और विज्ञान के हर क्षेत्र में भागीदारी निभा रही हैं, तब यह आवश्यक है कि त्योहारों को भी उनके नए रूपों में स्वीकार किया जाए। तीज को केवल पारंपरिक श्रृंगार और व्रत तक सीमित न कर, उसे आत्मचिंतन, सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक चेतना से जोड़ना होगा।
तीज केवल घर की चारदीवारी में मनाया जाने वाला त्योहार नहीं होना चाहिए, बल्कि यह महिला जागरूकता, पर्यावरण संरक्षण, लोकसंस्कृति संरक्षण और सामाजिक संवाद का अवसर बन सकता है। अगर एक महिला तीज के दिन वृक्षारोपण करे, कुपोषित बच्चों के लिए भोजन बांटे, घरेलू हिंसा के खिलाफ एक संवाद करे, तो वह इस पर्व को नई चेतना दे सकती है।
शहरीकरण और उपभोक्तावाद ने हमारे त्योहारों को उपहारों, महंगे लहंगे और इंस्टाग्राम-योग्य सजावटों में बदल दिया है। तीज अब रेडीमेड परिधानों, ब्यूटी पार्लरों और ‘फैशन शो विद झूला थीम’ का केंद्र बन गई है। हम भूलते जा रहे हैं कि इस पर्व का सौंदर्य उसकी सादगी में था—माँ के हाथों से बुना गया हरा दुपट्टा, बहन द्वारा सजाया गया झूला, पड़ोसी की दी हुई मेंहदी। यही सादगी त्योहार को उत्सव बनाती थी, यही आत्मीयता इसे जीवंत बनाती थी। अगर आधुनिकता को अपनाते हुए हम सादगी और आत्मीयता को न छोड़ें तो यह पर्व और अधिक समृद्ध बन सकता है।
हरियाली तीज स्त्री मन की वो कविता है, जिसे वह हर वर्ष प्रकृति के पन्नों पर लिखती है। यह पर्व बताता है कि स्त्री केवल त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि सृजन की शक्ति है। जब वह झूला झूलती है, तो वह केवल आनंद नहीं लेती, वह समय से संवाद करती है—बीते हुए पलों से, आने वाले कल से। जब वह शिव-पार्वती की पूजा करती है, तो वह केवल धार्मिक कर्म नहीं करती, वह अपने भीतर की ऊर्जा, समर्पण और शक्ति को पहचानती है। और जब वह हरे वस्त्र पहनती है, तो वह केवल श्रृंगार नहीं करती, वह जीवन की हरियाली को अपनाती है।
इसलिए ज़रूरत है कि हम हरियाली तीज को फिर से उसकी आत्मा के साथ जोड़ें। परंपरा और आधुनिकता को विरोधी ध्रुव नहीं, सहयात्री बनाएं। परंपराओं को संजोते हुए नई पीढ़ी को यह समझाएं कि त्योहार केवल कपड़े पहनने और फोटो खिंचवाने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन के मूल मूल्यों को जीने का नाम है। अगर हम तीज के इस भाव को समझें, तो यह पर्व हमारे समाज को और भी सुंदर, समावेशी और संवेदनशील बना सकता है।
डिग्रियों की दौड़ में दम तोड़ते सपने
(जब शिक्षा डर बन जाए)
संभावनाओं की कब्रगाह बनते संस्थान
संस्थाएं डिग्रियां नहीं, ज़िंदगियां दें — तभी शिक्षा का अर्थ है
भारत में शिक्षा संस्थान अब केवल डिग्रियों की फैक्ट्री बनते जा रहे हैं, जहां बच्चों की संभावनाएं और संवेदनाएं दोनों दम तोड़ रही हैं। कोटा, हैदराबाद, दिल्ली जैसे शहर आत्महत्या के आंकड़ों से दहल रहे हैं। यह संकट केवल परीक्षा का नहीं, हमारी सोच और व्यवस्था का है — जो रैंक को जीवन से ऊपर रखती है। शिक्षा में संवाद, मानसिक परामर्श और मानवीयता की जगह खाली है। जब तक हम शिक्षा को जीवन से नहीं जोड़ेंगे, तब तक यह व्यवस्था सफल नहीं, घातक सिद्ध होती रहेगी।
कभी जिन विद्यालयों और महाविद्यालयों को ज्ञान के मंदिर कहा जाता था, आज वही स्थान धीरे-धीरे उस पीड़ा के पर्याय बनते जा रहे हैं, जहां बच्चों की हँसी नहीं, तनाव भरी चुप्पी गूंजती है। एक दौर था जब शिक्षा का उद्देश्य जीवन को सुंदर बनाना था, आज शिक्षा जीवन का भार बन गई है। हम एक ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां विद्यार्थी शिक्षा से नहीं, शिक्षा के ढांचे से डरने लगे हैं। कोटा, हैदराबाद, दिल्ली, चेन्नई, पुणे — न जाने कितने शहरों में हर साल सैकड़ों छात्र आत्महत्या कर लेते हैं। ये केवल घटनाएं नहीं हैं, ये हमारे तंत्र की हार की घोषणा हैं।
राजस्थान का कोटा शहर, जिसे आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का केंद्र माना जाता है, वह इस समय देश का सबसे बड़ा मानसिक तनाव केंद्र भी बनता जा रहा है। हर साल लाखों विद्यार्थी डॉक्टर, अभियंता, प्रशासनिक अधिकारी या वैज्ञानिक बनने के सपने लेकर यहां आते हैं। लेकिन इन सपनों की कीमत इतनी भारी होती है कि सैकड़ों बच्चे उस बोझ को सह नहीं पाते और जीवन समाप्त कर बैठते हैं।
कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई अब एक मानसिक परीक्षा बन चुकी है। सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक कक्षाएं, गृहकार्य, परीक्षा, फिर परिणाम — इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का कोई द्वार नहीं होता। विद्यार्थियों के लिए न तो खेल-कूद का समय होता है, न साहित्य, संगीत या संवाद का। न दोस्तों के लिए समय होता है, न अपने आप से बात करने का। और ऐसे माहौल में जब कोई बच्चा असफल होता है, तो वह स्वयं को जीवन के अयोग्य समझ लेता है। यह मानसिकता इतनी गहरी है कि वह सोच भी नहीं पाता कि जीवन केवल एक परीक्षा से तय नहीं होता।
एक छात्र की आत्महत्या केवल एक जीवन का अंत नहीं है, वह उस शिक्षा व्यवस्था पर कठोर टिप्पणी है जो विद्यार्थियों को नंबर और रैंक के तराजू में तौलती है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार 2021 में 13,000 से अधिक विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। यह संख्या भारत में शिक्षा के नाम पर होने वाली त्रासदी की भयावहता को दर्शाती है। क्या हमने कभी यह सोचने की कोशिश की कि ये बच्चे क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? क्या केवल परीक्षा में असफल हो जाना किसी को जीवन त्यागने के लिए मजबूर कर सकता है?
दरअसल, समस्या परीक्षा की नहीं है, समस्या उस सोच की है जिसमें असफलता को कलंक माना जाता है। माता-पिता, समाज, शिक्षक, कोचिंग संस्थान — सब इस मानसिकता को पोषित करते हैं कि जो बच्चा प्रतियोगिता में सफल नहीं हुआ, वह निकम्मा है। परिणामस्वरूप, बच्चा स्वयं को दोषी मानने लगता है और धीरे-धीरे अवसाद की गर्त में चला जाता है। किसी से अपनी बात कहने का साहस भी उसमें नहीं रहता।
भारत की शिक्षा प्रणाली में वर्षों से यह कमी रही है कि यहाँ मानसिक स्वास्थ्य को कभी प्राथमिकता नहीं दी गई। विद्यालयों और महाविद्यालयों में न तो स्थायी मानसिक परामर्शदाता होते हैं, न छात्रों के साथ खुला संवाद। माता-पिता भी अक्सर यह नहीं समझ पाते कि उनका बच्चा क्या महसूस कर रहा है। बच्चों से ‘कैसे हो’ पूछने के बजाय ‘कितना पढ़ा’ पूछा जाता है।
शिक्षा व्यवस्था की इस अमानवीयता को और अधिक तीव्र बना दिया है शिक्षा के व्यावसायीकरण ने। आज शिक्षा एक सेवा नहीं, एक उद्योग बन चुकी है। कोचिंग संस्थान करोड़ों का व्यापार करते हैं। उनका उद्देश्य केवल बच्चों को परीक्षा में सफल बनाना है, उन्हें जीवन में सक्षम बनाना नहीं। वे बच्चों को उत्तर याद करवाते हैं, सवाल पूछने की आदत नहीं सिखाते। वे सफलता की मशीनें गढ़ते हैं, इंसान नहीं।
बात केवल कोचिंग की नहीं है। देश के प्रतिष्ठित महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से भी आत्महत्याओं की खबरें आती रही हैं। रोहित वेमुला, एक शोधार्थी, जिसकी आत्महत्या ने पूरे देश को हिला दिया था, वह भी संस्थागत भेदभाव और असंवेदनशीलता का शिकार था। आज भी जातीय, सामाजिक, भाषाई और क्षेत्रीय भेदभाव के अनेक रूप हमारे शैक्षिक संस्थानों में मौजूद हैं। विद्यार्थियों को मानसिक सुरक्षा नहीं मिलती, भावनात्मक सहारा नहीं मिलता, और जब सब रास्ते बंद हो जाते हैं, तो वे जीवन को ही समाप्त करने का निर्णय लेते हैं।
समस्या बहुत गहरी है और इसका समाधान केवल “शोक प्रकट करने” या “नियमन बनाने” से नहीं होगा। हमें शिक्षा की परिभाषा को फिर से गढ़ना होगा। शिक्षा केवल डिग्री, अंक या नौकरी का माध्यम नहीं हो सकती। शिक्षा का उद्देश्य जीवन को समझना, आत्मविश्वास विकसित करना, और हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना होना चाहिए।
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक शिक्षा संस्थान में स्थायी मानसिक परामर्शदाता हों। बच्चों के लिए खुला मंच हो जहां वे अपने विचार, भावनाएं और समस्याएं बिना डर के व्यक्त कर सकें। परीक्षा पद्धति ऐसी हो जो केवल रटंत विद्या को न परखे, बल्कि रचनात्मकता, तर्कशक्ति और संवेदना को भी महत्व दे।
इसके साथ ही, कोचिंग संस्थानों पर कठोर नियंत्रण की आवश्यकता है। उनकी फीस, समय-सारणी, परीक्षा पद्धति — सब कुछ सरकार द्वारा विनियमित किया जाना चाहिए। उन्हें केवल व्यावसायिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत लाना होगा। सरकार को भी इस विषय पर केवल बयानबाज़ी करने के बजाय ठोस नीति बनानी चाहिए जो आत्महत्याओं की घटनाओं को रोक सके।
माता-पिता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। बच्चों से संवाद बढ़ाना होगा, उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि उनकी असफलता कोई अपराध नहीं है। हमें यह समझना होगा कि हर बच्चा अद्वितीय होता है, और हर किसी की सफलता की परिभाषा एक जैसी नहीं हो सकती।
यह भी आवश्यक है कि समाज में असफलता को सहजता से स्वीकार करने की संस्कृति विकसित की जाए। हमें यह सिखाना होगा कि परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल होना नहीं है। यदि कोई बच्चा एक परीक्षा में नहीं सफल हो पाया, तो उसके लिए और भी रास्ते हैं। यह जीवन केवल रैंक की सूची नहीं है, यह भावनाओं, संवेदनाओं और संभावनाओं की यात्रा है।
हमारा देश तभी शिक्षित माना जाएगा जब यहां के शिक्षा संस्थान बच्चों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, जीवन जीने की कला सिखाएं। जब विद्यार्थी केवल डिग्रियां नहीं, उद्देश्य लेकर निकलें। जब शिक्षा बच्चों को नंबरों से नहीं, उनकी पहचान से जोड़ें।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम बच्चों को “किताबें रटवाएं”, बल्कि इस बात की है कि हम उन्हें आत्मविश्वास और आत्मसम्मान देना सीखें। उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि वे जैसे हैं, वैसे ही पर्याप्त हैं। उनकी संभावनाएं अंकतालिकाओं से बड़ी हैं, और उनका जीवन परीक्षा के परिणामों से अधिक मूल्यवान है।
अगर हम यह नहीं कर सके, तो हर वर्ष हजारों रोशनी बुझती रहेंगी, और हम केवल मोमबत्तियां जलाकर अफ़सोस करते रहेंगे। शिक्षा को फिर से जीवनमूल्य आधारित बनाना होगा — जहां विद्यार्थी केवल डिग्री नहीं, उद्देश्य पाएं; केवल नौकरी नहीं, पहचान पाएं; और केवल पढ़ाई नहीं, जीने का विश्वास पाएं।
बदन की नहीं, बुद्धि की बनाओ पहचान बहनों: अश्लीलता की रील संस्कृति पर एक सवाल
हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ स्क्रीन पर दिखना असल में जीने से ज़्यादा जरूरी हो गया है। जहां ज़िंदगी कैमरे के फ्रेम में सिमट गई है, और इंसान का मूल्य उसके ‘लाइक’, ‘फॉलोवर’ और ‘व्यूज़’ से तय होता है। इसी डिजिटल होड़ में स्त्रियों की अभिव्यक्ति भी एक अजीब मोड़ पर आ खड़ी हुई है — जहां रील बनाना कोई बुरा काम नहीं, लेकिन रील के बहाने स्त्री की गरिमा और उसकी सामाजिक छवि का बेशर्म चीरहरण किया जा रहा है।
जिम, मॉल, सड़क, बाथरूम और बेडरूम—हर कोना अब कंटेंट स्टूडियो बन चुका है। कुछ लड़कियाँ सोशल मीडिया पर जिस तरह की अश्लील और भद्दी रील्स बना रही हैं, वह केवल खुद की नहीं, समूची नारी जाति की गरिमा पर धब्बा बन रही है। क्या आपको सच में लगता है कि महज “वायरल” हो जाने से कोई ताक़तवर बनता है?
एक औरत के पास उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसका आत्मसम्मान और विवेक होता है। आज जो लड़कियाँ एक्सरसाइज के नाम पर ऐसे कपड़े पहन रही हैं कि देखना भी शर्मिंदगी पैदा करे, वे शायद यह नहीं जानतीं कि वे नारी मुक्ति नहीं बल्कि नारी बाजारीकरण का प्रचार कर रही हैं। शरीर दिखाकर पहचान बनाना कोई गर्व की बात नहीं। अगर रील्स ही बनानी हैं, तो क्यों न ऐसी रील बनाओ जिसमें आपकी कला, मेहनत, सोच और संवेदना झलके?
आज हर तीसरी रील में “पिछवाड़ा” फ्रेम के बीच में है, कैमरा कमर पर ज़ूम करता है, और कैप्शन होता है — “क्लासी एंड सेक्सी!” क्या यही स्त्री की परिभाषा बनती जा रही है?
स्त्री आंदोलन कभी इस उद्देश्य से नहीं चला था। हमने शिक्षा, समानता, आज़ादी और आत्मनिर्भरता की लड़ाई लड़ी थी, न कि मंच पर खड़े होकर अंग प्रदर्शन की। जो लोग कहते हैं, “ये स्त्रियों की आज़ादी है”, उनसे पूछिए—क्या शरीर को उत्पाद बनाना आज़ादी है या आधुनिक गुलामी?
और यह दोष सिर्फ उन लड़कियों का नहीं है जो ऐसी रील्स बनाती हैं। यह समाज का भी अपराध है—खासतौर पर पुरुषों का। यही पुरुष ऐसी वीडियो पर मिलियन-मिलियन व्यूज देते हैं, लाइक ठोकते हैं, फिर कमेंट में नैतिकता का भाषण भी पेलते हैं। एक ही वीडियो में पुरुष की आँखें भी डोलती हैं और उंगलियाँ भी नैतिकता टाइप करती हैं। यह दोगलापन बंद होना चाहिए।
सोचिए, क्या होगा जब कोई छोटी बच्ची यह सब देखकर बढ़ेगी? जब वह देखेगी कि ज़्यादा अंग दिखाने वाली को ज़्यादा लाइक मिलते हैं, तो वह किस दिशा में जाएगी? यह रील संस्कृति, स्त्रीत्व को छीनने की चुपचाप होती साजिश है। डिजिटल ग्लैमर की इस दौड़ में हम स्त्री को फिर से उस स्थान पर ले जा रहे हैं जहाँ उसे सिर्फ ‘देखे जाने’ की वस्तु बना दिया गया था।
आज़ादी की सही परिभाषा वो होती है जिसमें स्त्री खुद के लिए जीती है, न कि समाज के क्लिकबाज़ी वाले बाजार के लिए। एक लड़की सुंदर हो सकती है, फैशनेबल भी, लेकिन क्या ज़रूरी है कि वह हर बार अपनी देह को ही सेल करे? क्या सोच, क्या विचार, क्या चरित्र, क्या संघर्ष—ये सब सिर्फ उपन्यासों की बातें रह गई हैं?
दूसरी तरफ, जिन प्लेटफॉर्म्स को समाजिक सुधार का औजार माना गया था—जैसे इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक—उन्हें हमने डिजिटल कोठा बना डाला है। यह केवल सरकार की असफलता नहीं है, बल्कि हम सब की चुप्पी का परिणाम है।
यह लड़ाई सिर्फ महिलाओं की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की होनी चाहिए जो एक स्वस्थ, गरिमामय, और नैतिक समाज की कल्पना करता है। जो चाहता है कि उसकी बेटी, बहन, दोस्त या पत्नी डिजिटल दुनिया में अपने टैलेंट से पहचानी जाए, न कि अपनी कमर के घुमाव से।
अब समय आ गया है कि स्त्रियाँ खुद आगे बढ़कर कहें—”बस बहुत हुआ।”
रील्स बनानी हैं, बनाओ, लेकिन सोच से बनाओ।
डांस करो, पर आत्मा से—not कैमरे की भूख से।
हंसाओ, सुनाओ, सिखाओ, जोड़ो—क्योंकि स्त्री सिर्फ आकर्षण नहीं, प्रेरणा होती है।
और पुरुषों से भी यही कहना है—अब अपने क्लिक से समाज को मत चलाओ।
अगर अश्लीलता बंद करनी है, तो उसे देखना बंद करो।
रील्स वायरल तब होती हैं जब उन्हें देखे जाने वाले आंख मूंद लेते हैं और दिल खोल देते हैं।
एक बात और—जो लड़कियाँ यह सोचती हैं कि लोग उन्हें पसंद कर रहे हैं, वे ये समझें कि पसंद और उपभोग में फर्क होता है।
एक को देख कर सम्मान मिलता है, दूसरे को देख कर हवस जागती है।
आप खुद तय करें, आप कौन सी नज़रों में आना चाहती हैं?
शायद अब वक्त है एक नई डिजिटल क्रांति का,
जहाँ स्त्री के हाथ में मोबाइल हो—पर कैमरे के सामने न शरीर, बल्कि विचार हों।
कांवड़ या हुड़दंग? आस्था की राह में अनुशासन की दरकार
कांवड़ यात्रा का स्वरूप अब आस्था से हटकर प्रदर्शन और उन्माद की ओर बढ़ गया है। तेज़ डीजे, बाइक स्टंट, ट्रैफिक जाम और हिंसा ने इसे बदनाम कर दिया है। इसके विपरीत रामदेवरा जैसी यात्राएं आज भी शांत, अनुशासित और समर्पित होती हैं।
इसका कारण है भक्ति में विनम्रता, प्रशासनिक अनुशासन और राजनीतिक हस्तक्षेप की कमी। अब ज़रूरत है कि भक्ति को भक्ति ही रहने दिया जाए — अनुशासन के साथ, समर्पण के साथ, और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी के साथ।
भारत जैसे धर्मप्रधान देश में तीर्थयात्राओं और धार्मिक यात्राओं का एक गहरा सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व रहा है। इन यात्राओं का उद्देश्य आत्मशुद्धि, समर्पण और शांति की प्राप्ति होता है। परंतु हाल के वर्षों में कुछ तीर्थ यात्राएँ, विशेषकर कांवड़ यात्रा, अपने मूल स्वरूप से भटक कर हंगामा, शोर-शराबा और अनुशासनहीनता का पर्याय बनती जा रही हैं।
जहाँ एक ओर लाखों श्रद्धालु राजस्थान के रामदेवरा जैसे स्थानों पर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर शांति और श्रद्धा से पूजा-अर्चना करते हैं, वहीं दूसरी ओर कांवड़ यात्रा के दौरान अक्सर सड़कों पर कब्ज़ा, डीजे की धुनों पर नाचना, ट्रैफिक जाम, तोड़फोड़ और मारपीट की खबरें आती रहती हैं। सवाल उठता है — क्या आस्था का मतलब अराजकता है? कांवड़िये ही हुड़दंग क्यों करते हैं, जबकि अन्य तीर्थयात्राएँ शांति से होती हैं?
श्रद्धा का स्वरूप: विनम्रता या प्रदर्शन?
भारत में धार्मिक यात्राओं का इतिहास पुराना है — पदयात्रा, व्रत, नियम और तपस्या इनका मूल हिस्सा रहे हैं। लेकिन कांवड़ यात्रा, खासकर उत्तर भारत के कुछ इलाकों में, अब एक शक्ति प्रदर्शन में बदलती जा रही है।
श्रद्धालु अब भक्त कम, और “रौबदार शिवभक्त” ज़्यादा नज़र आते हैं। बाइक पर 10-15 लोग, डीजे बजाते ट्रक, और शोर-शराबे में हर-हर महादेव का नारा — यह सब आस्था से अधिक दिखावे और गुटबाज़ी का प्रतीक लगता है।
इसके विपरीत रामदेवरा की यात्रा में न कोई सुरक्षा खतरा, न सरकारी तामझाम, फिर भी वहां अनुशासन और सेवा का वातावरण होता है। ऐसा क्यों?
मर्दानगी और “हर-हर महादेव” का नया संस्करण
कांवड़ यात्रा में आज जो हुड़दंग दिखाई देता है, वह भक्ति का नहीं, मर्दानगी का अवतार है। “हर-हर महादेव” जैसे पवित्र नारे को कई बार उग्रता और हिंसा के साथ जोड़ दिया गया है।
यह माचो मर्दानगी का ऐसा संस्करण है जिसमें भक्त बाइक पर स्टंट करता है, तेज़ म्यूज़िक पर झूमता है और किसी ने कुछ कहा तो झगड़े पर उतर आता है।
रामदेवरा में लोग अपने परिवार के साथ, बड़ों के आशीर्वाद के साथ जाते हैं। वहाँ शांति, सेवा और दर्शन ही उद्देश्य होता है, न कि सोशल मीडिया रील्स और तड़क-भड़क।
प्रशासनिक ढिलाई और राजनीतिक मजबूरी
प्रशासन के लिए कांवड़ यात्रा अब आस्था का नहीं, सिरदर्द का विषय बन गई है। रास्तों को बंद करना पड़ता है, ज़बरदस्ती स्कूल-कॉलेज की छुट्टियाँ करनी पड़ती हैं और पुलिस को कांवड़ियों को “मना करने” की हिम्मत नहीं होती।
इसके पीछे एक बड़ा कारण है — राजनीतिक संरक्षण। कोई भी सरकार कांवड़ियों को नाराज़ नहीं करना चाहती, विशेषकर जब धार्मिक भावनाएं उबाल पर हों। नतीजा यह होता है कि कुछ असामाजिक तत्व इस ढील का फायदा उठाकर पूरे आयोजन को बदनाम कर देते हैं।
सोशल मीडिया: भक्ति या ब्रांडिंग?
आजकल कांवड़ यात्रा का एक और बड़ा आयाम है — सोशल मीडिया प्रमोशन। भक्त कम, “इन्फ्लुएंसर” ज़्यादा हैं। कोई रील बना रहा है, कोई फेसबुक लाइव कर रहा है, कोई अपने ट्रक की सजावट दिखा रहा है।
भक्ति अब कैमरे के सामने “पोज़” करने की प्रक्रिया बन गई है। रामदेवरा जैसे स्थलों पर ऐसी कोई प्रवृत्ति नहीं दिखती। वहाँ लोग अपने मन और आत्मा से जुड़ते हैं, न कि अपने इंस्टाग्राम अकाउंट से।
समूह की ताकत और मनोवैज्ञानिक भ्रम
कांवड़ यात्रा का एक बड़ा पहलू है — भीड़ की ताकत और समूह मनोविज्ञान। जब सैकड़ों-हज़ारों लोग एक साथ चलते हैं तो व्यक्ति की जिम्मेदारी गायब हो जाती है। कोई एक गलती करता है, और पूरी भीड़ प्रतिक्रिया में उग्र हो जाती है।
रामदेवरा जैसी यात्राओं में लोग छोटे-छोटे समूहों में या व्यक्तिगत रूप से जाते हैं। वहाँ अनुशासन भी व्यक्तिगत होता है और उत्तरदायित्व भी।
आस्था और उन्माद में अंतर
कांवड़ यात्रा में जो देखा जा रहा है, वह भक्ति नहीं, उन्माद है। यह वह धर्म नहीं है जिसकी शिक्षा भगवान शिव देते हैं। वे तो योगी हैं, शांति और तपस्या के प्रतीक हैं।
उन्हीं शिव के नाम पर सड़कें कब्ज़ा करना, गाड़ियों में तोड़फोड़ करना, दुकानें बंद करवाना — यह कहां की भक्ति है? क्या यह ईश्वर को प्रसन्न करता है या समाज को संकट में डालता है?
समाधान: भक्ति में अनुशासन और प्रशासन में दृढ़ता
समस्या की पहचान जरूरी है, लेकिन समाधान भी उतना ही ज़रूरी है। इस दिशा में निम्नलिखित सुझाव कारगर हो सकते हैं:
धार्मिक संगठनों को आगे आना चाहिए जो कांवड़ यात्रा का संयोजन करते हैं, उन्हें स्वयं अनुशासन और संयम का संदेश देना होगा।
प्रशासन को राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर कानून का पालन करवाना चाहिए, चाहे वह कोई भी समुदाय हो।
भक्तों को आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या उनकी यात्रा भगवान शिव को प्रसन्न कर रही है या बदनाम कर रही है।
सोशल मीडिया पर फालतू दिखावे की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना चाहिए, और असामाजिक तत्वों की पहचान कर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
“पीछे नहीं, बराबरी में: केरल के स्कूलों की नई बैठने की व्यवस्था एक क्रांतिकारी कदम”
भारत के शिक्षा तंत्र में दशकों से एक अदृश्य रेखा बनी रही है — आगे की बेंच और पीछे की बेंच। जहाँ आगे की बेंच पर बैठने वाले छात्र अक्सर “मेधावी” माने जाते हैं, वहीं पीछे की बेंच को उपेक्षा और उपहास का प्रतीक समझा जाता है। लेकिन केरल के सरकारी स्कूलों में हाल ही में जो बदलाव लाया गया है, वह इस मानसिकता को जँड से चुनौती देता है। अब वहां “बैक बेंचर्स” नाम की कोई चीज़ नहीं है।
केरल के स्कूलों में अब छात्रों को गोल घेरे में या यू-शेप में बैठाया जा रहा है, जिससे हर बच्चा शिक्षक के सामने होता है, न कोई आगे, न कोई पीछे। यह केवल एक बैठने की शैली नहीं, बल्कि एक वैचारिक क्रांति है — यह इस सोच को तोज़ता है कि सीखने का अधिकार कुछ बच्चों तक सीमित है।
इस बदलाव का उद्देश्य स्पष्ट है: बराबरी, भागीदारी और समावेशिता। हर बच्चा अब शिक्षक से आँख मिलाकर संवाद कर सकता है, अपने सवाल पूछ सकता है और खुद को महत्वपूर्ण महसूस कर सकता है।
बताया जाता है कि यह नई व्यवस्था एक फिल्म में दिखाई गई कल्पना से प्रेरित है। कभी-कभी सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि बदलाव की प्रेरणा भी बन जाता है। जिस तरह “तारे ज़मीन पर” ने विशेष बच्चों को लेकर दृष्टिकोण बदला, वैसे ही इस फिल्म ने शिक्षा व्यवस्था पर सोचने को मजबूर किया। केरल ने उस कल्पना को ज़मीन पर उतारा — और यही वह दृष्टिकोण है जो भारत के शिक्षा क्षेत्र में एक नयी रोशनी बन सकता है।
शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं, वह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। एक बच्चा जो हमेशा पीछे बैठाया जाता है, उसके आत्मविश्वास पर इसका असर पड़ता है। उसे लगता है कि वह “कमतर” है, “गैर ज़रूरी” है। लेकिन जब वही बच्चा शिक्षक के सामने बैठता है, चर्चा का हिस्सा बनता है, तो उसके भीतर एक नयी ऊर्जा जन्म लेती है।
नई बैठने की व्यवस्था केवल छात्रों के लिए नहीं, शिक्षकों के लिए भी एक चुनौती और अवसर दोनों है। अब शिक्षक को केवल सामने खड़े होकर भाषण देने वाला नहीं, बल्कि बातचीत और सहभागिता में विश्वास रखने वाला मार्गदर्शक बनना होगा। यह “एक तरफा शिक्षा” को “दो तरफा संवाद” में बदलता है।
यह नई व्यवस्था शिक्षा में लोकतंत्र लाने की शुरुआत है। जहाँ सभी बच्चों को समान दृष्टि से देखा जाता है। यह भारत के संविधान की उस मूल भावना के अनुरूप है, जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की बात करता है।
भारत में शिक्षा को लेकर अक्सर यह शिकायत रहती है कि कक्षा का वातावरण असमानता को बढ़ावा देता है। कुछ बच्चों को ही शिक्षक का ध्यान मिलता है, जबकि अन्य बच्चे पीछे छूट जाते हैं। केरल की यह पहल इस असंतुलन को खत्म करने का प्रयास है। जब हर बच्चा एक जैसे स्थान पर बैठेगा, तो शिक्षक की दृष्टि और संवाद में भी समता आएगी।
शिक्षा के समाजशास्त्र के नजरिए से देखें तो यह व्यवस्था वर्ग, जाति और आर्थिक स्थिति से जुड़ी भेदभावपूर्ण मानसिकता को भी चुनौती देती है। पिछली पंक्तियों में अक्सर वे बच्चे बैठते थे जो या तो सामाजिक रूप से दबे हुए होते थे या जिनका आत्मविश्वास कम होता था। अब जब वे केंद्र में होंगे, तो उनके आत्म-सम्मान में वृद्धि होगी।
केरल का यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल नीति-निर्माताओं द्वारा ऊपर से थोपा गया बदलाव नहीं है, बल्कि शिक्षकों, छात्रों और स्कूल प्रशासन की सामूहिक सोच और सहमति से उपजा विचार है। यह समावेशी शिक्षा के वैश्विक सिद्धांतों के अनुकूल है, जिसमें हर बच्चे को समान अवसर देना प्राथमिकता है।
नई व्यवस्था बच्चों को पारंपरिक अनुशासन की जज़गह से निकालती है और उन्हें संवाद, सहयोग और सहभागिता की दुनिया में लाती है। यह शिक्षण पद्धति को अधिक संवादात्मक, जीवंत और व्यावहारिक बनाती है।
इस मॉडल का एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है: जब बच्चा खुद को महत्वपूर्ण महसूस करता है, तो उसकी सीखने की क्षमता बढ़ जाती है। आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास और कक्षा में सक्रियता आपस में जुड़े हुए हैं। इसलिए यह व्यवस्था केवल बैठने की शैली नहीं, बल्कि सीखने की संस्कृति में बदलाव है।
व्यवहारिक दृष्टि से यह व्यवस्था आसान नहीं है। देश के अधिकांश स्कूलों में कक्षाएं छोटी हैं, छात्र संख्या अधिक है और फर्नीचर सीमित। लेकिन यह असंभव भी नहीं है। यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो और शिक्षक समुदाय इस दिशा में तैयार हो, तो यह मॉडल अन्य राज्यों में भी अपनाया जा सकता है।
देशभर में शिक्षा बजट का एक हिस्सा कक्षा के पुनर्गठन में लगाया जाए तो यह केवल भौतिक परिवर्तन नहीं, मानसिक और शैक्षणिक बदलाव भी लेकर आएगा। इसके लिए शिक्षक प्रशिक्षण, स्कूलों की संरचना और पाठ्यचर्या में भी सुधार जरूरी है।
निजी स्कूलों को भी इस पहल से सीख लेनी चाहिए। अक्सर निजी स्कूल केवल रैंकिंग और परीक्षा परिणामों पर ध्यान देते हैं, लेकिन समावेशी, संवेदनशील और संवाद आधारित शिक्षा की ज़रूरत उन्हें भी है। अगर वे वास्तव में छात्रों का सम्पूर्ण विकास चाहते हैं, तो इस मॉडल को अपनाना न केवल उचित होगा बल्कि ज़रूरी भी।
माता-पिता, अभिभावकों और समाज को भी इस पहल का स्वागत करना चाहिए। उन्हें यह समझना होगा कि शिक्षा केवल अंक लाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक सामाजिक, मानसिक और नैतिक विकास की प्रक्रिया है। जब बच्चा बराबरी में बैठेगा, सुनेगा और सुनेगा जाएगा, तभी वह एक जिम्मेदार नागरिक बनेगा।
यह व्यवस्था उस सोच को भी चुनौती देती है कि शिक्षक सर्वोपरि है और छात्र केवल एक श्रोता। अब शिक्षक और छात्र दोनों संवाद के भागीदार हैं। यह आधुनिक शिक्षा की मूल भावना है, जहाँ शिक्षा ‘सत्ता’ नहीं बल्कि ‘साझेदारी’ है।
केरल का यह प्रयोग भारत की शिक्षा नीति 2020 के विजन के भी अनुरूप है, जो रटंत विद्या से हटकर सोचने, संवाद करने और रचनात्मक बनने पर बल देती है। जब छात्र संवाद के केंद्र में होंगे, तो उनकी सोचने की क्षमता और आत्म-अभिव्यक्ति का स्तर भी बढ़ेगा।
इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। एक ऐसा बच्चा जो आज अपने शिक्षक से बिना डरे बात कर पा रहा है, कल समाज में भी अपनी बात कहने का साहस रखेगा। वह सिर्फ नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला बन सकता है।
शिक्षा को लेकर हमारे समाज में अक्सर एक डर का माहौल बना रहता है — परीक्षा का डर, अंक का डर, असफलता का डर। लेकिन जब कक्षा का वातावरण सहभागी और संवादात्मक होता है, तो ये डर धीरे-धीरे खत्म होते हैं। यही डर-मुक्त शिक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है।
संक्षेप में कहें तो केरल के स्कूलों में बैठने की इस नई व्यवस्था ने केवल कुर्सी-मेज़ें नहीं बदली हैं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के सोचने, सीखने और समाज से जुड़ने के तरीके को बदला है। यह परिवर्तन छोटे स्तर पर शुरू हुआ है, लेकिन इसके परिणाम बहुत बड़े हो सकते हैं।
आशा है कि भारत के अन्य राज्य भी इस प्रयोग से प्रेरणा लेकर शिक्षा को ‘प्रतियोगिता’ से निकालकर ‘समावेशिता’ की ओर ले जाएंगे। जब हर बच्चा केंद्र में होगा, तभी समाज का केंद्र भी न्याय, समानता और सहभागिता पर टिकेगा।
जब छात्र हत्यारे बन जाएं: चेतावनी का वक्त
“संवाद का अभाव, संस्कारों की हार, स्कूलों में हिंसा समाज की चुप्पी का फल”
हिसार में शिक्षक जसवीर पातू की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि हमारे समाज की संवादहीनता, विफल शिक्षा व्यवस्था और गिरते नैतिक मूल्यों का कठोर प्रमाण है। आज का किशोर मोबाइल की आभासी दुनिया में जी रहा है, जबकि घर और विद्यालय दोनों में उपेक्षित है।
मानसिक तनाव, संवाद की कमी और नैतिक शिक्षा के अभाव ने उसे असंवेदनशील बना दिया है। यह घटना एक चेतावनी है कि यदि अब भी हम माता-पिता, शिक्षक और समाज मिलकर समाधान नहीं खोजे, तो शिक्षा का भविष्य गहरे संकट में है।
हिसार में शिक्षक जसवीर पातू की निर्मम हत्या ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। यह घटना कोई साधारण आपराधिक कृत्य नहीं है, बल्कि यह हमारे गिरते नैतिक मूल्यों, संवादहीन परिवार व्यवस्था, और संवेदनहीन शिक्षा प्रणाली का कठोर दर्पण है। जब एक छात्र ही अपने शिक्षक का हत्यारा बन जाए, तो यह केवल व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि पूरे समाज का पतन है।
आज विद्यालय शिक्षा का मंदिर नहीं, बल्कि हिंसा, डर और असुरक्षा का केंद्र बनते जा रहे हैं। शिक्षक, जो कभी मर्यादा, संयम और अनुशासन के प्रतीक माने जाते थे, अब अपने ही छात्रों से भयभीत रहने लगे हैं। क्या यही है आधुनिक शिक्षा की सफलता? क्या इसी दिन के लिए हमने विद्यालयों में स्मार्ट कक्षाएं और डिजिटल पठन-पाठन का विस्तार किया था?
इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि हमारे बच्चे इतने क्रूर कैसे हो गए? उनके भीतर सहनशीलता, करुणा और विवेक की जगह गुस्सा, हिंसा और प्रतिशोध ने क्यों ले ली है? इसका उत्तर हमें विद्यालयों या सरकार से नहीं, बल्कि अपने घरों और आत्मचिंतन में खोजना होगा।
आज का बच्चा मोबाइल की स्क्रीन में दुनिया ढूंढ रहा है। माता-पिता उसके पास होते हुए भी उसकी दुनिया से दूर हैं। भोजन करते समय, यात्रा करते समय या घर पर बैठते समय भी वह किसी वीडियो, खेल या आभासी मित्र के साथ जुड़ा होता है। उसका वास्तविक जीवन धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है और वह एक कृत्रिम आक्रोशपूर्ण दुनिया में जी रहा है।
विद्यालयों में नैतिक शिक्षा अब केवल पुस्तकों तक सीमित रह गई है। ‘सत्य’, ‘अहिंसा’, ‘क्षमा’ जैसे शब्द अब पाठ्यपुस्तकों की शोभा बनकर रह गए हैं। न शिक्षक के पास समय है, न पालकों के पास धैर्य, और न समाज के पास कोई दिशा। बच्चों के भीतर जो आक्रोश पनप रहा है, वह इसी उपेक्षा और संवादहीनता की उपज है।
मन के भीतर जब दर्द, कुंठा और अस्वीकार का जहर भरता है, तो वह या तो आत्मघात की ओर ले जाता है या फिर हत्या की ओर। और जब यह जहर एक किशोर के भीतर भर जाए, तो परिणाम वही होता है जो हमने जसवीर पातू की हत्या के रूप में देखा।
मनोरोग विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि किशोरों में बढ़ती हिंसा का कारण संवाद की कमी है। वे अपनी बात कहने, ग़लतियों को साझा करने, और मदद मांगने में संकोच करते हैं। माता-पिता अक्सर बच्चों को डांटते हैं या नकारते हैं, जिससे बच्चा आंतरिक रूप से विद्रोही बनता चला जाता है। विद्यालय में भी उसे एक अंक, एक परीक्षा, एक प्रदर्शन से ही मापा जाता है। उसके मनोभावों, उसकी मानसिक स्थिति और उसके व्यवहार पर कोई ध्यान नहीं देता।
क्या हम यह भूल गए हैं कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री दिलवाना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण भी है? और चरित्र निर्माण तब तक संभव नहीं जब तक शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास न हो, माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद न हो, और समाज के भीतर मूल्य आधारित सोच का विस्तार न हो।
प्रशासन की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगते हैं। जब तक कोई घटना नहीं होती, तब तक सब कुछ सामान्य माना जाता है। लेकिन जब कोई शिक्षक मारा जाता है, तब ज्ञापन दिए जाते हैं, धरने होते हैं, और कुछ समय बाद फिर सब भुला दिया जाता है। यही चक्र लगातार दोहराया जा रहा है।
शिक्षक अब अपने सम्मान और सुरक्षा के लिए प्रशासन से गुहार कर रहे हैं। विद्यालय संचालक बोर्ड अधिकारियों से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। लेकिन क्या केवल कार्रवाई से यह समस्या सुलझ जाएगी? हमें मूल में जाकर देखना होगा कि बच्चों के मन में यह हिंसा कैसे जन्म लेती है।
हमारे विद्यालयों में मानसिक परामर्शदाता होना चाहिए, प्रत्येक छात्र की मानसिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए, परिवारों को बच्चों के साथ संवाद का प्रशिक्षण देना चाहिए। विद्यालयों में केवल परीक्षा की तैयारी ही नहीं, जीवन के लिए तैयार करने की भी आवश्यकता है।
आज आवश्यकता है एक “संवाद पुनरुद्धार अभियान” की, जो घर-घर तक पहुंचे। हमें माता-पिता, शिक्षक और छात्र — इन तीनों के बीच विश्वास और सहअस्तित्व की भावना को पुनः जागृत करना होगा। अगर हम बच्चों से सुनना नहीं चाहेंगे, तो वे हिंसा से बोलना सीख जाएंगे।
शिक्षक अब अपने अधिकारों और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह स्थिति शर्मनाक है। एक समाज जो अपने गुरु को सम्मान नहीं दे सकता, वह कभी समृद्ध नहीं हो सकता। अगर हमने अब भी नहीं समझा कि यह शिक्षक की नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी की हत्या है, तो वह दिन दूर नहीं जब हर विद्यालय एक युद्धभूमि बन जाएगा।
हमें यह समझना होगा कि बच्चे गलत नहीं होते, वे केवल अनसुने होते हैं। अगर वे प्यार, समझ और सही दिशा पाएँ तो वही बच्चा दुनिया बदल सकता है। परंतु अगर वह उपेक्षा, अस्वीकार और हिंसा का शिकार बने तो वही बच्चा एक शिक्षक का हत्यारा भी बन सकता है।
सरकार को चाहिए कि वह विद्यालयों में नियमित रूप से मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण, संवाद सत्र, और अभिभावक-शिक्षक सम्मेलनों का आयोजन करवाए। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को केवल आज्ञा न दें, बल्कि उनकी बातें भी सुनें। और समाज को चाहिए कि वह शिक्षा को केवल नौकरी पाने का माध्यम न माने, बल्कि एक संवेदनशील, जिम्मेदार नागरिक बनाने की प्रक्रिया के रूप में देखे।
यह घटना हमें नींद से जगाने आई है। यह कोई समाचार पत्र की एक ख़बर नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक चेतावनी है। अगर हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाले वर्षों में हमारे विद्यालयों में पुस्तकों से अधिक हथियार मिलेंगे, और शिक्षकों से अधिक सुरक्षा कर्मी।
आज भी समय है कि हम इस चेतावनी को गंभीरता से लें। हम संवाद को पुनर्जीवित करें, शिक्षा को पुनरर्थित करें, और अपने बच्चों को हिंसा से नहीं, समझ से जीतना सिखाएं। तभी हम एक सुरक्षित, संवेदनशील और सशक्त भारत की कल्पना कर सकेंगे।
गुरु दक्ष प्रजापति: सृष्टि के अनुशासन और संस्कारों के प्रतीक
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के पुत्र गुरु दक्ष प्रजापति वेदों, यज्ञों और परिवार प्रणाली के आधार स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने अनुशासन और मर्यादा को समाज में स्थापित किया, किन्तु शिव-सती प्रसंग के माध्यम से यह भी दिखाया कि कठोरता से प्रेम मर जाता है। आज की पीढ़ी के लिए उनका जीवन-संदेश यह है—“कर्तव्य, सहिष्णुता और संतुलन ही सच्चे धर्म का स्वरूप है।
भारतीय वैदिक परंपरा में “दक्ष प्रजापति” एक ऐसा नाम है, जो सृष्टि के आरंभ से ही जुड़ा हुआ है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, प्रजापतियों में सर्वश्रेष्ठ, जिनका नाम ही ‘दक्ष’ अर्थात ‘कुशलता’ का प्रतीक है। गुरु दक्ष केवल एक ऋषि या सृष्टिकर्ता नहीं थे, वे वेद, यज्ञ, अनुशासन, मर्यादा और पारिवारिक मूल्य प्रणाली के प्रणेता भी माने जाते हैं। वेदों, पुराणों और उपनिषदों में उनका उल्लेख किसी देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे मनीषी के रूप में हुआ है जिनका जीवन अनुकरणीय था और जिनकी जीवन दृष्टि आज भी सामाजिक संतुलन और नैतिकता का मार्गदर्शन करती है।
ब्रह्मा के पुत्र, सृष्टि के विस्तारक
दक्ष प्रजापति को ब्रह्मा जी ने सृष्टि के विस्तार के लिए नियुक्त किया था। वे उन 21 प्रजापतियों में से एक हैं जिन्हें ब्रह्मा ने विविध जीवों की उत्पत्ति और उनके संचालन हेतु सृजित किया। ‘दक्ष’ का शाब्दिक अर्थ होता है—जो दक्ष है, कुशल है, अनुशासित है। और यह नाम उनके आचरण, कार्यों और योगदानों के अनुकूल भी है। उन्होंने सृष्टि के विविध तत्वों में संतुलन बनाए रखने हेतु अपनी कन्याओं का विवाह विभिन्न ऋषियों और देवताओं से किया। उनकी 27 कन्याओं का विवाह चंद्रमा से हुआ, जो कालगणना और प्रकृति चक्र के संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक माना गया।
यज्ञ परंपरा के मूल स्रोत
दक्ष प्रजापति को वैदिक परंपरा में यज्ञाचार्य की सर्वोच्च उपाधि प्राप्त है। यज्ञ, जिसे हम कर्मकांड या धार्मिक कृत्य के रूप में जानते हैं, उसका उद्देश्य मात्र देवताओं की तुष्टि नहीं, बल्कि प्राकृतिक और सामाजिक संतुलन था। दक्ष के यज्ञों में वेदों की ऋचाओं का उच्चारण, मर्यादा और नियम का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने समाज में यज्ञ को केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि सामाजिक कर्तव्य के रूप में स्थापित किया।
पारिवारिक मर्यादा बनाम व्यक्तिगत अहं
गुरु दक्ष का जीवन एक अद्भुत दार्शनिक ग्रंथ की तरह है। वह अध्याय जहाँ उन्होंने अपनी पुत्री सती और शिव के विवाह का विरोध किया, हमारे सामाजिक मनोविज्ञान पर गहरी रोशनी डालता है। दक्ष को शिव का आसामाजिक, भस्मधारी, स्मशानवासी स्वभाव स्वीकार नहीं था। वे मर्यादा, अनुशासन, और वेदों के विधानों के अनुकूल जीवन को ही श्रेष्ठ मानते थे। जबकि शिव इस परंपरा से इतर एक मुक्त योगी, एक तटस्थ महादेव थे, जो सामाजिक मान्यताओं से परे थे।
यह विरोध एक ऐसी त्रासदी में बदल गया जिसने सती के आत्मदाह, यज्ञ के विध्वंस और अंततः शिव के तांडव रूपी विनाश का मार्ग प्रशस्त किया। यह प्रसंग केवल पारिवारिक संघर्ष नहीं था, बल्कि ‘संस्कृति बनाम साधना’, ‘परंपरा बनाम स्वतंत्रता’, ‘आस्था बनाम तर्क’ के गहरे द्वंद्व को उजागर करता है।
यज्ञ की विनाशगाथा: प्रतीक और संदेश
दक्ष द्वारा शिव को आमंत्रण न देना, सती का अपमान, और फिर यज्ञ का विनाश — यह त्रयी केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि यह बताती है कि जब अहंकार, मर्यादा से बड़ा हो जाए, तो धर्म भी विनष्ट हो जाता है। दक्ष का यज्ञ विनाश एक सीख है कि धर्म केवल विधियों से नहीं, विनम्रता और समावेश से चलता है। शिव ने केवल यज्ञ विध्वंस नहीं किया, उन्होंने यह सिखाया कि एक पक्षीय धार्मिकता अधूरी होती है।
दक्ष का अंत भी शिक्षा देता है। शिव ने अंततः उन्हें पुनर्जीवन दिया — किन्तु एक बकरी के सिर के साथ। यह प्रतीक है, कि यदि हम सिर यानी विवेक खो बैठें, तो हमारी पहचान भी बदल जाती है। लेकिन यदि हम पुनरुद्धार की इच्छा रखें, तो पुनर्जन्म संभव है।
आज के युग में गुरु दक्ष की प्रासंगिकता
आज जब आधुनिक समाज अनुशासनहीनता, पारिवारिक विघटन और आध्यात्मिक खोखलेपन से जूझ रहा है, तब गुरु दक्ष की शिक्षाएँ और दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक हो जाती हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि जीवन में केवल स्वतंत्रता नहीं, अनुशासन भी आवश्यक है। केवल अधिकार नहीं, कर्तव्य भी आवश्यक हैं। केवल यश नहीं, मर्यादा भी महत्वपूर्ण है।
आज के युवा जो आकर्षण और स्वच्छंदता के नाम पर सामाजिक दायित्वों से कटते जा रहे हैं, उनके लिए गुरु दक्ष का जीवन अनुकरणीय है। उन्होंने अपने कर्तव्यों, पुत्रियों के विवाह, यज्ञ के आयोजन और समाज संचालन में अनुशासन का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह आज भी मार्गदर्शन करता है।
सामाजिक समरसता के प्रेरक
गुरु दक्ष ने अपनी कन्याओं के विवाह विभिन्न ऋषियों, देवताओं, ग्रहों और नक्षत्रों से कराकर यह संकेत दिया कि सृष्टि में सभी का आपसी सहयोग आवश्यक है। नक्षत्र चंद्रमा के विवाह का ही उदाहरण लें—उन्होंने 27 कन्याओं को एक ही देवता को सौंपा। यह केवल खगोल विज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, संतुलन और सह-अस्तित्व की भावना का प्रतीक है।
समरसता और संतुलन का पथ
गुरु दक्ष एक ही समय में अनुशासन और त्रुटियों के प्रतीक हैं। उन्होंने हमें यह भी दिखाया कि मर्यादा जब कठोर हो जाए, तो प्रेम का गला घुट जाता है, लेकिन साथ ही यह भी सिखाया कि त्रुटियों से शिक्षा लेकर पुनः धर्म पथ पर लौटा जा सकता है।
उनकी जयंती पर हम यदि केवल दीप जलाकर, शोभायात्रा निकालकर रह जाएँ, तो यह उस ऋषि का अपमान होगा जो कर्म, संस्कार, त्याग और संतुलन का मूर्त रूप था। हमें उनके जीवन से वह दृष्टि ग्रहण करनी चाहिए जो समाज को जोड़ती है, न कि तोड़ती है; जो धर्म को आडंबर नहीं, उत्तरदायित्व बनाती है।
बचपन में दिल का दर्द: क्या हमारी जीवनशैली मासूम धड़कनों की दुश्मन बन गई है?
भारत में बच्चों में हार्ट अटैक की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसका संबंध बच्चों की बदलती जीवनशैली, खान-पान, मानसिक तनाव और स्क्रीन टाइम से है। स्कूलों में नियमित हेल्थ जांच, योग, पोषण शिक्षा और अभिभावकों की जागरूकता से ही इस खतरे को रोका जा सकता है। यह केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चेतावनी है।
जब भी हम “हार्ट अटैक” शब्द सुनते हैं, हमारे ज़ेहन में पचास-पैंसठ साल का कोई अधेड़ उम्र का व्यक्ति सामने आता है—भागदौड़ भरी ज़िंदगी में उलझा, तनाव और थकान से लदा हुआ। पर आज हकीकत इससे कहीं अधिक डरावनी और चौंकाने वाली है। आज दिल के दौरे सिर्फ बड़ों का ही नहीं, बल्कि मासूम बच्चों का भी पीछा कर रहे हैं। देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं, जहां स्कूल जाते बच्चे अचानक गिर जाते हैं और डॉक्टर उसे “कार्डियक अरेस्ट” या “सडन हार्ट फेल्योर” बता देते हैं। क्या यह केवल संयोग है? या फिर हमारी जीवनशैली ने नन्हे दिलों पर हमला बोल दिया है?
पिछले कुछ महीनों में देशभर से कई ऐसी घटनाएं सामने आईं हैं, जो इस खतरे की गंभीरता की पुष्टि करती हैं। ताजा मामला मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले का है, जहां आठ साल की मासूम बच्ची स्कूल गेट पर पहुंचते ही गिर पड़ी और उसकी मौत हो गई। इससे पहले गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी स्कूली बच्चों की हार्ट अटैक से हुई मौत की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
इंडियन मेडिकल जर्नल्स के अनुसार, 2021 और 2022 के बीच 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों में अचानक कार्डियक अरेस्ट से मौत के मामलों में 35% की वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2022 में अकेले भारत में 32,457 युवाओं की मौत हृदयाघात से हुई। इनमें बड़ी संख्या 10 से 18 वर्ष के बीच के किशोरों की थी।
सवाल यह है कि ऐसा हो क्यों रहा है? क्या यह सिर्फ अनुवांशिकता का मामला है? क्या बच्चों में जन्मजात हृदय रोग अचानक सक्रिय हो रहे हैं? या फिर इसके पीछे हमारी बदलती जीवनशैली, खान-पान, स्क्रीन टाइम, मोटापा, मानसिक तनाव और शारीरिक निष्क्रियता का कोई बड़ा योगदान है?
विशेषज्ञ कहते हैं कि इसका कारण “मल्टी फैक्टोरियल” है—अर्थात यह कई कारकों का मिश्रण है। आज के बच्चे ब्रेड-बर्गर, पिज़्ज़ा, कोल्ड ड्रिंक और पैकेज्ड स्नैक्स पर निर्भर हैं। पौष्टिक आहार, जैसे हरी सब्जियाँ, दालें, फल, दूध अब उनके भोजन का हिस्सा नहीं रह गया है। पहले बच्चे गली-मोहल्ले में दौड़ते-खेलते थे।
अब मोबाइल और गेमिंग कंसोल्स ने उनका बचपन छीन लिया है। खेल के मैदानों की जगह टैबलेट ने ले ली है। स्कूलों में अत्यधिक होमवर्क, कोचिंग की दौड़, माता-पिता की अपेक्षाएं और हर क्षेत्र में ‘बेस्ट’ बनने का दबाव बच्चों में मानसिक तनाव पैदा कर रहा है। यह तनाव शरीर में कोर्टिसोल और अन्य हॉर्मोन को असंतुलित कर देता है, जिससे हृदय पर असर पड़ता है।
देर रात तक मोबाइल चलाना, रील्स देखना और ऑनलाइन गेम खेलना बच्चों की नींद को प्रभावित करता है। नींद की कमी सीधे दिल की सेहत से जुड़ी है। बाल हृदय रोग विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों में हार्ट अटैक आमतौर पर “कॉन्जेनिटल हार्ट डिजीज”, “कार्डियोमायोपैथी”, “इलेक्ट्रिकल डिसऑर्डर्स” या “मायोकार्डिटिस” के कारण होता है।
लेकिन इनका समय पर पता न चलने के कारण बच्चे अचानक मौत का शिकार हो जाते हैं। दुर्भाग्यवश, हमारे देश में बाल स्वास्थ्य की जांच प्रणाली बहुत कमजोर है। अधिकतर स्कूलों में नियमित हेल्थ चेकअप नहीं होते, और माता-पिता भी बच्चों के थकान या सांस फूलने जैसे लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
इस संकट से निपटने के लिए हमें एक बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। सरकार को सभी निजी और सरकारी स्कूलों में हर 6 महीने में हृदय जांच, ईसीजी और सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य करना चाहिए। स्कूलों में ‘फिट इंडिया’ जैसे अभियानों को गंभीरता से लागू किया जाए।
बच्चों को योग, प्राणायाम, ध्यान और नियमित शारीरिक व्यायाम के लिए प्रेरित किया जाए। माता-पिता को अपने बच्चों के खान-पान, नींद और स्क्रीन टाइम पर सतर्क निगरानी रखनी होगी। बच्चे की थकान, चिड़चिड़ापन या किसी भी असामान्य शारीरिक लक्षण को गंभीरता से लें।
विद्यालयी पाठ्यक्रम में ‘पोषण शिक्षा’ को शामिल किया जाए ताकि बच्चे कम उम्र से ही हेल्दी फूड और शरीर के महत्व को समझ सकें। टेलीविजन और डिजिटल मीडिया को केवल उत्पाद बेचने के बजाय समाज को स्वस्थ जीवनशैली के लिए शिक्षित करने की भूमिका निभानी चाहिए।
यह विडंबना ही है कि जब भारत “विकसित राष्ट्र” बनने की दौड़ में है, तब उसका भविष्य यानी बच्चे हृदय रोगों से जूझ रहे हैं। नीति आयोग, स्वास्थ्य मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय को मिलकर एक समन्वित नीति बनानी चाहिए, ताकि बच्चों की स्क्रीनिंग, हेल्थ एजुकेशन और इमरजेंसी सुविधाएं हर स्कूल में सुनिश्चित हो सकें। यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मानव संसाधन विकास का मामला है।
बचपन धड़कनों का त्योहार होता है, न कि जीवन का अंतिम पड़ाव। जब कोई बच्चा दिल के दौरे से दम तोड़ता है, तो केवल एक जीवन नहीं जाता—एक भविष्य, एक सपना और एक परिवार उजड़ जाता है। हमें यह स्वीकारना होगा कि बच्चों का दिल अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा—क्योंकि हमने उसे कमजोर बना दिया है। अब समय आ गया है कि हम सिर्फ ‘हार्ट डे’ पर भाषण न दें, बल्कि हर दिन बच्चों के दिल की चिंता करें। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब स्कूल का बस्ता नहीं, स्ट्रेचर उठाना पड़ेगा।
“बचपन को अख़बारों में जगह क्यों नहीं?”
रविवार की सुबह बेटे प्रज्ञान को गोद में लेकर अख़बार से कोई रोचक बाल-कहानी पढ़ाने की इच्छा अधूरी रह गई। किसी भी प्रमुख अख़बार में बच्चों के लिए एक भी रचना नहीं थी। समाज बच्चों को पढ़ने के लिए कहता है, पर उन्हें पढ़ने को क्या देता है? यह संपादकीय हमारे समाचार पत्रों की बच्चों के प्रति उपेक्षा पर गहरी चोट करता है और मांग करता है कि समाचार पत्रों में बच्चों के लिए नियमित स्थान आरक्षित हो — ताकि बचपन शब्दों से जुड़े, संवेदना से सींचा जाए और विचारों से पल्लवित हो।
रविवार की सुबह थी। मन हुआ कि बेटा प्रज्ञान गोद में आए और हम दोनों मिलकर अख़बार में से कोई रोचक कहानी पढ़ें — ताकि आधुनिक स्क्रीन युग में भी शब्दों की मिठास उसे मिल सके। परंतु खेदजनक आश्चर्य हुआ कि प्रतिष्ठित अख़बारों में बच्चों के लिए एक भी कहानी, चित्रकथा, या बाल संवाद उपलब्ध नहीं था। इस पीड़ा से उपजा यह सवाल एक सामूहिक चिंतन की मांग करता है —“जब हम अपने अख़बारों में बच्चों के लिए छापते ही कुछ नहीं, तो हम उनसे पढ़ने की उम्मीद किस अधिकार से करते हैं?”
बाल मन: एक रिक्त पन्ना
हमारी शिक्षा व्यवस्था, अभिभावक वर्ग और समाज तीनों ही अक्सर एक स्वर में कहते हैं कि आज के बच्चे किताबें नहीं पढ़ते। वे मोबाइल, इंस्टाग्राम और गेमिंग की दुनिया में खो चुके हैं। पर कोई ये क्यों नहीं पूछता कि उन्हें क्या पढ़ने के लिए दे रहे हैं हम? अख़बार, जो एक समय में हर घर की सुबह का हिस्सा हुआ करता था — अब बच्चों के लिए पूरी तरह से एक “वयस्कों का युद्धक्षेत्र” बन चुका है, राजनीति के झगड़े, नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप, बलात्कार, हत्याएं, भ्रष्टाचार, क्रिकेट, फिल्में और योगा टिप्स। कहाँ हैं राजा की बात, हाथी की सवारी, विज्ञान की कल्पना, चाँद की कविता, और जीवन मूल्य सिखाती छोटी कहानियाँ?
जब बच्चे दिखते ही नहीं
आज के समाचार पत्रों में बच्चे सिर्फ दो तरह से “दिखते” हैं —
जब कोई बच्चा यौन हिंसा या हत्या का शिकार होता है। या जब कोई बच्चा बोर्ड परीक्षा में 99.9% अंक लाकर मीडिया का ताज बन जाता है। क्या इतने सीमित संदर्भों में बच्चे होने का अनुभव समझा जा सकता है? अख़बारों ने बच्चों को समाज से अलग करके एक ऐसी चुप्पी में डाल दिया है, जहां उनका न तो रचनात्मक स्वर सुनाई देता है, न जिज्ञासु आंखें दिखाई देती हैं।
संपादकीय दूरदर्शिता की अनुपस्थिति
किसी भी अखबार का मुख्य उद्देश्य होता है –”समाज को जागरूक बनाना और उसकी सोच को दिशा देना।” तो फिर एक पूरे समाज की नींव यानी बच्चों के लिए कोई पन्ना क्यों नहीं? क्या आज का संपादक इतना व्यस्त हो गया है कि उसे यह भी याद नहीं कि उसकी जिम्मेदारी अगली पीढ़ी तक संस्कार और विचार की मशाल पहुँचाने की भी है? एक समय में “बाल-जगत”, “बाल प्रभा”, “बाल गोष्ठी”, “बाल मेल” जैसे खंडों से अख़बार बच्चों को भी संवाद में शामिल करते थे। आज वे या तो बंद हो गए या ऑनलाइन लिंक की बेगानी भीड़ में खो गए।
विज्ञापन और बाजारवाद का हमला
बच्चे आज अख़बार के लिए ‘ग्राहक’ नहीं हैं। वे शैंपू या रेफ्रिजरेटर नहीं खरीदते। इसी कारण “बाजार” की भाषा में उनकी कोई ‘विज्ञापन वैल्यू’ नहीं है। और जहाँ विज्ञापन की भाषा नीति तय करने लगे, वहाँ बचपन बेमानी हो जाता है।
प्रत्येक अख़बार का लगभग 40% भाग विज्ञापनों से भरा रहता है — रियल एस्टेट, कपड़े, कोचिंग सेंटर, हॉस्पिटल, ब्रांडेड घड़ियाँ… कहीं भी यह नहीं दिखता कि कोई अख़बार यह पूछ रहा हो। “बच्चों को हम क्या पढ़ा रहे हैं?”
जब बाल साहित्य का विलोपन होता है
बाल साहित्य केवल मनोरंजन नहीं है —यह बच्चों को सोचने, सवाल करने, कल्पना करने और समाज से जुड़ने की प्राथमिक पाठशाला है। एक कहानी जिसमें एक पेड़ अपने फल देता है, एक चिड़िया घोंसला बनाती है, एक बच्चा अपने दोस्त के साथ पक्षियों को पानी पिलाता है —ये सब बच्चों को मानवता का बीज देते हैं। जब ये कहानियाँ हट जाती हैं, तो वहां केवल ड्रामा, सनसनी, और डाटा बचता है। और यही संवेदनहीनता आने वाली पीढ़ी में पनपती है।
क्या पढ़ाई और ज्ञान सिर्फ स्कूल का काम है?
हमारे समाज ने बच्चों के ज्ञान का ठेका सिर्फ स्कूलों को दे रखा है। अख़बार, जो कभी ‘घर की पाठशाला’ हुआ करता था, अब स्वयं को ‘वयस्कों की गॉसिप’ तक सीमित कर चुका है। क्या बच्चे समाचारों के योग्य नहीं? क्या विज्ञान, पर्यावरण, नैतिकता, और समाज की बातें उन्हें नहीं बताई जानी चाहिए?
यदि हम चाहते हैं कि बच्चे “समझदार नागरिक” बनें तो
हमें उन्हें शुरुआत से ही संवाद और सवालों से जोड़ना होगा — और अख़बार इसकी सशक्त जगह हो सकती है।
क्या किया जा सकता है?
साप्ताहिक ‘बाल संस्करण’ पुनः शुरू किए जाएं – हर रविवार या महीने में दो बार बच्चों के लिए विशेष खंड हो। बाल संवाद और चित्रकथाएँ हों – जिनमें नैतिक मूल्य, विज्ञान की जिज्ञासा और समाज का परिचय हो। बच्चों की रचनाएँ छापी जाएं – कविताएँ, चित्र, सवाल, विचार। बाल पत्रकारिता को बढ़ावा दिया जाए – विद्यालय स्तर पर बच्चों से लिखवाया जाए, जो छपे भी। प्रेरणादायक ‘बच्चों के नायक’ दिखाए जाएं – जो स्क्रीन के बाहर भी उपलब्ध हों।
बेटा प्रज्ञान उस दिन सुबह मुझसे बोला :–
“माँ, क्या आपके अख़बार में बच्चों के लिए कुछ नहीं होता?”
मैं चुप रह गई। ये चुप्पी सिर्फ एक माँ की नहीं, एक पूरे समाज की चुप्पी है। और जब अख़बार समाज का दर्पण होते हैं, तो इस दर्पण में प्रज्ञान जैसे लाखों बच्चों की मासूम जिज्ञासा को जगह मिलनी ही चाहिए। यदि हम चाहते हैं कि कल के भारत में पाठक, लेखक और संवेदनशील नागरिक जन्म लें —
तो आज के समाचार पत्रों में प्रज्ञान के लिए भी एक पन्ना आरक्षित करना होगा।
“कृत्रिम बुद्धिमत्ता: नवाचार की उड़ान या बौद्धिक चोरी का यंत्र?”
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आज नई रचनात्मकता का माध्यम बन चुकी है, पर यह बहस का विषय है कि क्या यह नवाचार, रचनाकारों की मेहनत की चोरी पर टिका है? अमेरिका में अदालतों ने एआई द्वारा ‘सीखी गई’ सामग्री को उचित प्रयोग माना, पर रचनाकार असंतुष्ट हैं। भारत में समाचार एजेंसी एएनआई ने ओपनएआई के खिलाफ कॉपीराइट उल्लंघन की शिकायत की है। देश में मौजूदा कानून इस तकनीकी चुनौती के लिए नाकाफी हैं। भारत को चाहिए कि वह अपने बौद्धिक संपदा कानूनों को अद्यतन करे ताकि तकनीकी विकास के साथ रचनात्मक अधिकारों की भी रक्षा हो सके।
इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी तकनीकी छलांगों में से एक है जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता — यानी ऐसा कंप्यूटर मस्तिष्क जो कहानी से लेकर समाचार रिपोर्ट, चित्र से लेकर कविता, और अदालत के निर्णय से लेकर संवाद तक खुद रच सकता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि इस मशीनी रचनात्मकता की नींव क्या किसी और की मेहनत पर टिकी है? क्या यह नई तकनीक रचनाकारों, लेखकों, पत्रकारों, चित्रकारों और संगीतकारों की बनाई सामग्रियों को चुपचाप अपने ज्ञान का हिस्सा बना रही है — बिना उनकी अनुमति, बिना कोई श्रेय दिए?
हाल ही में अमेरिका की दो अदालतों में ऐसे ही मामलों पर निर्णय हुआ। इन फैसलों ने फिलहाल तकनीकी कंपनियों को राहत दी है, पर यह विषय अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। इन फैसलों ने पूरी दुनिया में बहस छेड़ दी है — और भारत भी इससे अछूता नहीं है।
जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले मॉडल — जैसे कि ओपनएआई का चैटजीपीटी या मेटा का लामा — करोड़ों पुस्तकों, वेबसाइटों, गीतों, समाचारों और चित्रों का अध्ययन करके प्रशिक्षित किए जाते हैं। इनका प्रशिक्षण इस तरह होता है जैसे कोई छात्र पुस्तकें पढ़कर ज्ञान प्राप्त करता है, लेकिन यह छात्र उस पुस्तक को पढ़ने से पहले लेखक से न अनुमति लेता है, न ही लेखक को श्रेय या पारिश्रमिक देता है। यही से विवाद आरंभ होता है।
2024 में अमेरिका में पहला मामला आया जिसमें कुछ उपन्यासकारों ने कंपनी ‘एंथ्रॉपिक’ पर आरोप लगाया कि उसने उनकी पुस्तकों का उपयोग अपने कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया। लेखकों का कहना था कि यह उनकी बौद्धिक संपदा का उल्लंघन है। परंतु अदालत ने निर्णय दिया कि यह मॉडल जो नई सामग्री उत्पन्न कर रहा है, वह मूल रचना से अलग, नया और परिवर्तित है। इसलिए यह ‘उचित प्रयोग’ की श्रेणी में आता है और कंपनी को अपराधी नहीं माना जा सकता।
दूसरे मामले में कंपनी मेटा पर साहित्य और पत्रकारिता सामग्री को बिना अनुमति इस्तेमाल करने का आरोप था। अदालत ने माना कि कंपनी ने सचमुच संरक्षित रचनाएं पढ़ी थीं, लेकिन उसका उद्देश्य कुछ नया सीखना और बनाना था, इसलिए इसे भी ‘परिवर्तनकारी उपयोग’ मानते हुए मेटा को दोषमुक्त कर दिया गया।
इन दोनों फैसलों से एक संदेश यह गया कि न्यायालय फिलहाल तकनीकी नवाचार को प्राथमिकता दे रहे हैं, लेकिन लेखक समुदाय और बौद्धिक श्रमिकों के मन में यह सवाल घर करता जा रहा है कि यदि यह ‘उचित प्रयोग’ है, तो उनकी मेहनत, मौलिकता और अधिकारों का क्या?
अब दृष्टि भारत की ओर मोड़ते हैं। समाचार एजेंसी एएनआई ने वर्ष 2024 में ओपनएआई पर आरोप लगाया कि उसके संवाद आधारित मॉडल (जैसे चैटजीपीटी) उनकी समाचारों की भाषा, शैली और विषय-वस्तु की हूबहू नकल कर रहा है। इसके अलावा प्रकाशक संघों ने भी आरोप लगाए कि भारत में कॉपीराइट पंजीकरण की अनदेखी कर इन एआई कंपनियों ने भारतीय सामग्री का व्यावसायिक दोहन किया।
ओपनएआई का पक्ष यह था कि वह भारत में न तो अपने सर्वर चलाता है, न ही उसका कोई स्थायी कार्यालय है। उसका तर्क था कि उसकी तकनीक कुछ नया, परिवर्तित और जनहित में उपयोगी सामग्री तैयार करती है — और यह बौद्धिक चोरी नहीं कहलाती।
यह मामला अब दिल्ली उच्च न्यायालय में विचाराधीन है, और इसकी सुनवाई जुलाई के पहले सप्ताह में निर्धारित है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में अब यह बहस न्यायिक गलियारों में पहुंच चुकी है।
प्रश्न यह है कि क्या भारत का मौजूदा बौद्धिक संपदा कानून इस नई तकनीकी चुनौती के लिए तैयार है? 1957 में बनाए गए कॉपीराइट अधिनियम में ‘उचित प्रयोग’ की धारणा है, पर उसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे मामलों की स्पष्ट व्याख्या नहीं है। ना ही भारत में ऐसा तंत्र है जो यह जांच सके कि कोई एआई मॉडल प्रशिक्षण के लिए किन सामग्रियों का उपयोग कर रहा है और वे सामग्री कॉपीराइट के अंतर्गत आती हैं या नहीं।
आज लेखक, कवि, चित्रकार, संगीतकार, फोटोग्राफर और पत्रकार यह महसूस कर रहे हैं कि उनका सृजन कार्य मशीनों के पेट में डाला जा रहा है, और बदले में उन्हें न कोई श्रेय मिल रहा है, न ही पारिश्रमिक। यह न केवल कानूनी बल्कि नैतिक चिंता का विषय है।
इस विषय पर बहस यह नहीं है कि तकनीक को रोका जाए। नवाचार और प्रौद्योगिकी की प्रगति आवश्यक है, लेकिन वह प्रगति ऐसी न हो जो मानवीय रचनात्मकता को निगल जाए। अगर कोई लेखक दस वर्षों की मेहनत से एक उपन्यास रचता है, और कोई मशीन दो सेकंड में उसकी शैली की नकल करके नया ‘उत्पाद’ बनाती है, तो यह न तो न्यायसंगत है, न ही सम्मानजनक।
न्यायालयों की जिम्मेदारी अब केवल यह नहीं रह गई कि वे कंपनियों और व्यक्तियों के बीच विवाद सुलझाएं, बल्कि उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य का तकनीकी विकास समान रूप से सभी के हित में हो। केवल पूंजी और तकनीक के सहारे अगर किसी का बौद्धिक श्रम मुफ्त में हड़पा जा रहा है, तो वह लोकतांत्रिक और नैतिक मूल्यों का उल्लंघन है।
भारत को चाहिए कि वह अपने कॉपीराइट कानूनों की पुनर्रचना करे — विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग के अनुरूप। ऐसी व्यवस्था बने जिसमें रचनाकारों की रचनाओं को यदि तकनीक द्वारा उपयोग किया जा रहा है तो उन्हें उसका पारिश्रमिक मिले, उनके नाम का उल्लेख हो, और उनकी अनुमति अनिवार्य हो।
यह केवल न्याय की बात नहीं है, यह साहित्य, संस्कृति और रचनात्मकता की रक्षा की बात है। यदि हम अपने समय के रचनाकारों की अनदेखी करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ तकनीक तो पाएंगी — पर संवेदना नहीं, आत्मा नहीं।
मशीनों को दी उड़ान, पर कलम से छीना आसमान,
बिना श्रेय के ज्ञान अगर, तो कैसा विज्ञान?
सोशल मीडिया: नया नशा, टूटते रिश्ते और बढ़ता मानसिक तनाव
आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहाँ एक तरफ़ तकनीकी प्रगति ने जीवन को सहज और तेज़ बना दिया है, वहीं दूसरी ओर यही तकनीक धीरे-धीरे सामाजिक ताने-बाने को चुपचाप खोखला कर रही है। सोशल मीडिया, जो कभी सूचना और संपर्क का सशक्त माध्यम था, आज एक ऐसा नशा बन चुका है जिसने परिवार, संबंध और मानसिक स्वास्थ्य तीनों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
पहले के समय में संवाद का अर्थ था – बैठ कर बात करना, साथ हँसना, रोना, बहस करना और समझना। आज यह सब कुछ “टाइप” और “स्क्रॉल” में बदल गया है। बच्चे हों या बुज़ुर्ग, महिलाएं हों या पुरुष – सबके हाथ में स्मार्टफोन है और निगाहें स्क्रीन पर। कभी जो बातें रसोई, आँगन या बैठक में होती थीं, आज वो ‘स्टेटस अपडेट’, ‘रील’ या ‘ट्वीट’ में समा गई हैं।
जिस रफ्तार से इंटरनेट की पहुँच और स्मार्टफोन का प्रसार हुआ है, उसी रफ्तार से हमारी असल दुनिया सिमटती जा रही है। सोशल मीडिया ने रिश्तों की परिभाषा बदल दी है – अब दोस्त वो हैं जिनके पोस्ट पर हम हार्ट भेजते हैं, परिवार वो है जिसके मैसेज को हमने “सीन” किया हो, और सुख-दुख वो है जो हमने “स्टोरी” पर साझा किया हो।
बच्चे अब खेल के मैदान में नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर ‘गेमिंग’ कर रहे हैं। स्कूलों से लौटकर माँ-बाप से बात करने की बजाय वे इंस्टाग्राम खोलते हैं। किशोरावस्था, जो कभी आत्म-अन्वेषण और सामाजिक अनुभवों का समय हुआ करता था, आज वह सेल्फी, फ़िल्टर और वर्चुअल पहचान की दौड़ में उलझ गया है।
सोशल मीडिया के इस अति-उपयोग ने एक ऐसा द्वंद्व पैदा किया है जहाँ व्यक्ति दिखने में बहुत व्यस्त है पर भीतर से बेहद अकेला है। रिश्ते जो कभी जीवन का आधार होते थे, अब ‘टैग’ और ‘मेंशन’ में बदल चुके हैं। पति-पत्नी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन बातचीत व्हाट्सएप पर होती है। माँ-बाप बच्चों को खाना परोसते हैं, और बच्चे खाने से पहले उसकी तस्वीर खींचकर पोस्ट करते हैं।
यह आदत अब लत बन चुकी है – सुबह उठते ही सोशल मीडिया चेक करना, रात को सोने से पहले स्क्रॉल करना, हर क्षण को लाइव करना या कम से कम फ़ोन में कैद करना। यह व्यवहार अब केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि मानसिक विकारों का बीज भी बन चुका है।
डिजिटल लाइफस्टाइल ने न केवल नींद, आहार, एकाग्रता को प्रभावित किया है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाला है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफेक्ट ज़िंदगी’ का निरंतर सामना आम इंसान को हीन भावना से भर देता है। दूसरों की सफलताओं, सुंदरताओं, यात्रा और जीवनशैली की तस्वीरें देखकर व्यक्ति अपने जीवन को तुच्छ समझने लगता है। यही वह क्षण होता है जब तनाव, अवसाद और आत्मग्लानि जैसे विकार जन्म लेने लगते हैं।
खासकर किशोरों और युवाओं में यह प्रभाव और भी तीव्र है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स ने आत्ममूल्यांकन का नया पैमाना बना दिया है। एक पोस्ट पर कम लाइक आए तो आत्म-सम्मान को ठेस लगती है, ट्रोलिंग हो जाए तो महीनों तक अवसाद की स्थिति बनी रहती है।
दूसरी ओर, इस प्लेटफॉर्म पर ‘फेक आईडेंटिटी’ और ‘वर्चुअल ग्लैमर’ का जाल इतना घना हो गया है कि लोग वास्तविकता से कटते जा रहे हैं। एक तरफ जहां व्यक्ति दूसरों को दिखाने के लिए महंगे कपड़े, कारें और कैफे में फोटो पोस्ट करता है, वहीं असल ज़िंदगी में वह कर्ज़ और तनाव से घिरा होता है।
परिवारों में संवाद की जगह अब संदेह, दूरी और झगड़े ने ले ली है। शादीशुदा ज़िंदगियों में सोशल मीडिया पर गैरज़रूरी बातचीत और अफेयर्स ने तलाक के मामलों में वृद्धि की है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, सोशल आइसोलेशन और एकांतप्रियता बढ़ी है। बुज़ुर्ग अपने ही घर में उपेक्षित महसूस करते हैं क्योंकि बच्चे मोबाइल में खोए रहते हैं।
इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर झूठे आदर्शों और हानिकारक कंटेंट की भरमार भी है। लड़कियों को परफेक्ट फिगर के दबाव में डाला जाता है, युवाओं को सफलता के झूठे मॉडल दिखाकर भ्रमित किया जाता है, और छोटे बच्चे हिंसक या भ्रामक गेम्स में उलझ जाते हैं।
आज जब हम ‘फैक्ट चेकिंग’ और ‘डिजिटल लिटरेसी’ की बात करते हैं, तब यह समझना ज़रूरी है कि सोशल मीडिया सिर्फ सूचना या मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है – यह अब हमारी सोच, व्यवहार और संबंधों को गहराई से प्रभावित करने वाली शक्ति बन चुका है।
भारत जैसे देश में, जहाँ संयुक्त परिवार की परंपरा रही है, वहाँ सोशल मीडिया ने “संयुक्तता” की भावना को गहराई से चुनौती दी है। लोग अब त्यौहारों में साथ बैठकर मिठाई खाने की बजाय उस मिठाई की तस्वीर इंस्टाग्राम पर पोस्ट करने में लगे रहते हैं। रिश्तों का स्पर्श, संवाद की गर्माहट और एक-दूसरे की मौजूदगी की जो भावना होती थी, वह डिजिटल एल्गोरिद्म के पीछे छिप गई है।
यह सच है कि सोशल मीडिया ने कई सकारात्मक चीजें भी दी हैं – आवाज़ उठाने का मंच, जागरूकता फैलाने का साधन, और कई मामलों में न्याय की दिशा में जनदबाव बनाने का माध्यम। लेकिन जब यही साधन साध्य बन जाए, तो समस्या खड़ी होती है।
अब यह समय है जब हमें व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर आत्मचिंतन करने की ज़रूरत है। हमें यह समझना होगा कि हम सोशल मीडिया के उपयोगकर्ता हैं, उसके दास नहीं। तकनीक का उपयोग जीवन को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए, न कि उसे निगल जाने के लिए।
हमें अपने बच्चों को बताना होगा कि लाइफ का मतलब लाइक्स नहीं होता। हमें उन्हें यह सिखाना होगा कि रील लाइफ से ज़्यादा कीमती रियल लाइफ होती है। हमें खुद से पूछना होगा कि आखिरी बार जब हम अपने माता-पिता के पास बैठकर बिना मोबाइल के बात किए, वह कब था।
संघर्ष यह नहीं है कि सोशल मीडिया को छोड़ देना चाहिए, संघर्ष यह है कि इसे कैसे संतुलित किया जाए। हमें “डिजिटल डिटॉक्स” की आदत डालनी होगी – एक दिन बिना सोशल मीडिया के बिताना, भोजन करते समय मोबाइल को दूर रखना, रात को सोने से पहले स्क्रीन नहीं देखना, सुबह उठते ही ईश्वर या परिवार को याद करना, न कि इंस्टाग्राम को।
सरकारों और संस्थानों को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। स्कूलों में डिजिटल संतुलन की शिक्षा, माता-पिता के लिए कार्यशालाएँ, और सोशल मीडिया कंपनियों पर बच्चों के लिए सुरक्षित सामग्री सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
मनुष्य का मस्तिष्क तकनीक से तेज़ है, लेकिन अगर वह तकनीक का गुलाम बन जाए, तो मानवता खो बैठता है। सोशल मीडिया एक शक्तिशाली औजार है, बशर्ते हम उसे नियंत्रित करें, न कि वह हमें।
अब समय है कि हम डिजिटल दुनिया में खुद को फिर से खोजें – सच्चे रिश्तों के लिए, मानसिक शांति के लिए और एक ऐसे समाज के लिए जो तकनीक से सशक्त हो लेकिन संवेदनाओं से जुड़ा भी हो। सोशल मीडिया का यह नया नशा तभी टूटेगा जब हम आत्मनियंत्रण, संवाद और समझदारी से इसे अपनाएँगे। वरना यह नशा हमारे बच्चों से उनकी मासूमियत, हमारे परिवार से उसकी गर्माहट और हमारे समाज से उसकी आत्मा छीन लेगा।
महिला आरक्षण की दहलीज़ पर लोकतंत्र: अब दलों को जिम्मेदारी उठानी होगी
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत में राजनीति के स्वरूप को बदलने का ऐतिहासिक अवसर है। हालांकि इसका क्रियान्वयन 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले संभव है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब राजनीतिक दल अभी से महिलाओं के लिए अनुकूल वातावरण बनाएँ।
केवल आरक्षित सीटें देना पर्याप्त नहीं; दलों को आंतरिक कोटा, वित्तीय सहयोग, प्रशिक्षण, मेंटरशिप और निर्णयकारी भूमिका में महिलाओं को प्राथमिकता देनी होगी। अगर यह मौका चूक गया तो आरक्षण भी दिखावा बन जाएगा। समावेशी और सशक्त लोकतंत्र के लिए अब निर्णायक और नीतिगत पहल ज़रूरी है।
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम, यानी संविधान का 106वां संशोधन, भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का ऐतिहासिक प्रयास है।
यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है, लेकिन इसकी सफलता महज संविधान में दर्ज होने से नहीं होगी—बल्कि इस पर अमल करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होगी। वर्ष 2029 के आम चुनावों में यदि यह आरक्षण प्रभावी होता है, तो यह न केवल भारत के लोकतंत्र के लिए निर्णायक मोड़ होगा, बल्कि महिलाओं के नेतृत्व की दिशा भी तय करेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को अभी से व्यापक और दूरदर्शी कदम उठाने होंगे।
भारतीय राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति हमेशा सीमित रही है। 2024 में चुनी गई 18वीं लोकसभा में सिर्फ 74 महिलाएं चुनकर आईं, जो कुल सीटों का मात्र 13.6% हैं। यह आंकड़ा 2019 की तुलना में भी घटा है और वैश्विक औसत 26.9% से काफी पीछे है। राज्य विधानसभाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां औसतन केवल 9% ही महिलाएं विधायक हैं। यह न केवल लैंगिक असमानता को दर्शाता है बल्कि नीति-निर्धारण की उस प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है जिसमें आधी आबादी की हिस्सेदारी नगण्य है।
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के निम्न स्तर के कई सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है भारतीय समाज की गहरी पैठी हुई पितृसत्तात्मक सोच। महिलाओं को पारिवारिक भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है, जिससे नेतृत्व के अवसर स्वाभाविक रूप से पुरुषों को मिलते हैं। ‘सरपंच पति’ जैसी प्रथाएँ इस सोच को और भी स्पष्ट करती हैं।
राजनीतिक दलों के भीतर भी यह धारणा प्रचलित है कि महिलाएं चुनाव जीतने की दृष्टि से कमज़ोर प्रत्याशी होती हैं। लेकिन यह एक मिथक है, जिसे हाल के आंकड़े खारिज करते हैं। उदाहरण के लिए, 2024 लोकसभा चुनाव में महिलाएं केवल 9.6% उम्मीदवार थीं, लेकिन उनकी सफलता दर पुरुषों से अधिक थी – उन्होंने 13.6% सीटें जीतीं।
महिलाओं के सामने आर्थिक संसाधनों की कमी भी एक बड़ी बाधा है। भारत में चुनाव लड़ना अत्यंत महंगा है, और अधिकांश महिलाएं—खासकर ग्रामीण व पिछड़े वर्गों से—स्वतंत्र रूप से इतने संसाधन नहीं जुटा सकतीं। इसके अलावा, राजनीति का वातावरण भी महिलाओं के लिए असुरक्षित और शत्रुतापूर्ण रहता है। उन्हें ट्रोलिंग, चरित्र हनन, और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका आत्मविश्वास डगमगाता है।
राजनीतिक दलों में महिलाओं के लिए मार्गदर्शन, प्रशिक्षित नेतृत्व विकास, और निर्णय लेने वाली इकाइयों में शामिल करने जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ भी अक्सर अनुपस्थित रहती हैं। महिला मोर्चा बनाकर उन्हें पार्टी के मुख्य ढांचे से अलग कर दिया जाता है, जिससे वे सत्ता के निर्णायक केंद्रों से दूर रह जाती हैं।
2029 के आरक्षण को सार्थक बनाने के लिए राजनीतिक दलों को अब से ही तैयारी करनी होगी। सबसे पहला कदम है—स्वैच्छिक आंतरिक कोटा। टिकट वितरण में 33% महिला उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना केवल आरक्षण की तैयारी नहीं, बल्कि समावेशी लोकतंत्र की दिशा में पहल होगी। ऑस्ट्रेलिया की लेबर पार्टी जैसी मिसालें बताती हैं कि आंतरिक कोटा राजनीति की संस्कृति को सकारात्मक रूप से बदल सकते हैं।
दूसरा आवश्यक कदम है—वित्तीय सहायता और संरचित प्रशिक्षण। राजनीतिक दलों को महिला उम्मीदवारों के लिए अलग चुनावी फंड बनाना चाहिए ताकि वे चुनावी खर्च का बोझ उठा सकें। कनाडा का जूडी लामार्श फंड इसका अच्छा उदाहरण है। साथ ही, पंचायतों और नगरपालिकाओं में सक्रिय महिला प्रतिनिधियों को विधानसभा और संसद स्तर के लिए तैयार करने का नेतृत्व कार्यक्रम भी चलाया जाना चाहिए।
महिलाओं को पार्टी की कोर कमेटियों, नीति निर्माण इकाइयों और प्रवक्ता मंडल में भी सक्रिय भूमिका देनी चाहिए। केवल महिला मोर्चा या सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित रखकर नेतृत्व नहीं उभरेगा। IUML जैसी पार्टियों ने हाल ही में कोर नेतृत्व में महिलाओं को शामिल किया है—अन्य दलों को भी यही दिशा लेनी चाहिए।
मेंटोरशिप भी एक सशक्त उपकरण हो सकता है। अनुभवी महिला नेता अगर नवोदित उम्मीदवारों को मार्गदर्शन दें, तो आत्मविश्वास, नीति की समझ, और रणनीतिक कौशल विकसित हो सकता है। इसके साथ ही, पार्टी के भीतर महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न या असम्मानजनक व्यवहार को रोकने के लिए सख्त आचार संहिता और त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था ज़रूरी है।
राजनीतिक दलों के प्रयासों के साथ-साथ मीडिया और नागरिक समाज की भी भूमिका अहम है। मीडिया को महिला नेताओं की नीतिगत भूमिका, वैचारिक दृष्टिकोण और सामाजिक योगदान पर केंद्रित करना चाहिए—ना कि उनके पहनावे, निजी जीवन या विवादों पर। नागरिक संगठनों को भी प्रशिक्षण, जनजागरण और महिला नेतृत्व को प्रोत्साहित करने की दिशा में पहल करनी चाहिए।
महिलाओं का राजनीति में प्रतिनिधित्व केवल लैंगिक समानता का सवाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता का भी मापदंड है। यदि प्रतिनिधित्व का आधार केवल पुरुषों की पहुंच और दबदबे तक सीमित रहेगा, तो लोकतंत्र का स्वरूप अधूरा ही रहेगा। महिला आरक्षण केवल एक नीति नहीं, बल्कि नेतृत्व को समावेशी, संवेदनशील और संतुलित बनाने का औजार है।
2029 का चुनाव भारत के लिए एक ऐतिहासिक अवसर लेकर आएगा। लेकिन यदि राजनीतिक दल अभी से महिला नेतृत्व को गढ़ने में निवेश नहीं करते—तो यह आरक्षण भी केवल सत्ता में वंशवाद और प्रतीकात्मकता का विस्तार बनकर रह जाएगा।
अब वक्त है कि दल “औरतों के लिए सीट छोड़ने” की बात नहीं करें, बल्कि “औरतों को नेतृत्व के लिए खड़ा करने” की पहल करें। लोकतंत्र को मजबूत बनाने का यही असली रास्ता है।
साहित्य का मंच या शिकार की मंडी?
नई लेखिका आई है — और मंडी के गिद्ध जाग उठे हैं
नई लेखिकाओं के उभार के साथ-साथ जिस तरह साहित्यिक मंडियों में उनकी रचनात्मकता की बजाय उनकी देह, उम्र और मुस्कान का सौदा होता है — यह एक गहरी और शर्मनाक सच्चाई है। मंच, आलोचना, भूमिका, सम्मान – सब कुछ एक जाल बन जाता है। यह संपादकीय स्त्री लेखन के नाम पर चल रही पाखंडी व्यवस्था को आईना दिखाता है, जहाँ लेखिका की कलम से ज़्यादा उसकी ‘उपस्थिति’ बिकती है। अब समय आ गया है कि साहित्य की दुनिया इस अंदरूनी शोषण को पहचाने और बदलने का साहस करे।
नई लेखिका जैसे ही साहित्य के आंगन में प्रवेश करती है, एक उत्सव-सा माहौल बनता है। वह कलम लेकर आई है — शब्दों को जीवन देने, अनुभवों को साझा करने और संवेदनाओं को स्वर देने के लिए। पर क्या केवल शब्दों की शक्ति ही काफी है इस जगत में टिके रहने के लिए?
नहीं। इस मंडी में उसकी लेखनी से पहले उसका चेहरा देखा जाता है। किताब से पहले उसकी उम्र पूछी जाती है। विचारों से पहले उसकी वाणी और मुस्कान पर चर्चा होती है। और दुर्भाग्यवश, यही वह बिंदु है जहाँ साहित्यिक क्षेत्र का स्याह सच उभरता है।
आज भी देश के तमाम साहित्यिक मंचों, गोष्ठियों और पत्रिकाओं में एक नारी लेखिका को ‘रचनाकार’ कम और ‘सौंदर्य’ अधिक समझा जाता है। वरिष्ठों की प्रशंसा के शब्दों में सराहना से अधिक ‘संकेत’ होते हैं। मंच पर बुलावा केवल कविता पाठ के लिए नहीं होता, बल्कि उस ‘नवयौवना’ ऊर्जा को भुनाने की एक शातिर कोशिश होती है।
“आप बहुत अच्छा लिखती हैं” कहने वाले बहुत होते हैं। लेकिन उनमें से कई की नज़रों में लफ्ज़ नहीं, लार होती है। गोष्ठी के बाद की पार्टियों में कविता का नहीं, शरीर का मूल्यांकन होता है। और जो लेखिका इन सबके लिए ‘ना’ कहती है, उसे ‘घमंडी’, ‘असहयोगी’, और ‘बदतमीज़’ कहा जाता है।
साहित्य की यह मंडी उस बौद्धिक आज़ादी की कब्रगाह बन चुकी है, जिसका स्वप्न लेकर कई स्त्रियाँ अपनी कलम उठाती हैं। नई लेखिका को मंच नहीं, मौन मिलते हैं। समर्थन नहीं, संशय मिलते हैं। उसके हर शब्द के पीछे मंशा तलाशने की कोशिश होती है — “किसके लिए लिखा?”, “किसके कहने पर?”, “किस इरादे से?”
यह वही समाज है जो एक ओर ‘मी टू’ आंदोलनों पर अख़बारों में कॉलम लिखता है, और दूसरी ओर साहित्यिक सम्मेलनों में युवा लेखिकाओं को एकांत में बुलाकर “व्यक्तिगत मार्गदर्शन” देने को तैयार हो जाता है।
इस मानसिकता ने न केवल नई प्रतिभाओं को कुचला है, बल्कि साहित्य के प्रति महिलाओं के विश्वास को भी तोड़ा है। लेखन की दुनिया को जिनका घर बनना था, वहां दरवाज़े बंद मिलते हैं — अगर वे ‘समझौता’ नहीं करतीं।
इतिहास गवाह है — अमृता प्रीतम, महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी, मृणाल पांडे, वंदना राग जैसी लेखिकाओं ने न केवल कलम चलाई, बल्कि उस पितृसत्ता के खिलाफ भी लिखीं जो साहित्य की गली में भी घर बनाए बैठी थी। उन्होंने यह रास्ता संघर्षों से सींचा, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतना छोड़ी।
लेकिन फिर भी सवाल खड़ा होता है — क्यों आज भी नई लेखिका को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए चुप रहना पड़ता है या लड़ना पड़ता है? क्यों अब भी वरिष्ठ पुरुष लेखकों के लिए ‘नारी-लेखन’ एक ‘आसान निशाना’ बना हुआ है?
कई बार तो लेखिका की लेखनी को ही पुरुष संरचना में ढालने की कोशिश की जाती है। “थोड़ा कम उग्र लिखो, ज्यादा संवेदनशील बनो, रोमांटिक कविताएं ज्यादा सराही जाती हैं” — ये सब नए नामों को सिखाने वाले ‘गुरुजन’ के परामर्श होते हैं। लेकिन सच तो ये है कि यह ‘अनुरूपता’ नहीं, बल्कि ‘अनुनय’ की मांग होती है।
एक अन्य पक्ष यह भी है कि जब कोई लेखिका सफल हो जाती है — तो उसकी सफलता का श्रेय उसके किसी ‘पुरुष मार्गदर्शक’ को दे दिया जाता है। जैसे उसकी प्रतिभा खुद उसकी नहीं थी, बल्कि किसी के ‘संपर्क’ और ‘संरक्षण’ से मिली हुई थी।
और जब वह इन चीज़ों से इनकार करती है — तो उसकी कविताओं की समीक्षा नहीं होती, बल्कि उसके चरित्र की। यही दोहरा मापदंड इस मंडी की रीढ़ बन गया है।
अब ज़रूरत है — इस व्यवस्था को सवालों के कटघरे में खड़ा करने की।
अब ज़रूरत है — कि हर नई लेखिका अपनी कविता में यह लिखे कि “मैं कोई गुलाब नहीं, जो सिर्फ़ सजने के लिए खिला हूँ — मैं वो काँटा हूँ जो तुम्हारे इरादों को चीर देगा।”
लेखिकाओं को एक-दूसरे की आवाज़ बनना होगा। उन्हें मंच साझा करने से अधिक, स्पेस साझा करना होगा — जहां वे एक-दूसरे को सुनें, समर्थन दें, और किसी को भी अकेले न छोड़ें।
प्रकाशक, संपादक, आयोजक — अब तुम्हारे लिए भी चेतावनी है। अगर तुम अपनी नीतियों को साफ़ नहीं करोगे, तो ये कलमें तुम्हारे नाम को स्याही से नहीं, आग से लिखेंगी।
यह मंडी, जो कभी विचारों की थी, आज बाजार बन गई है — जहां ‘स्त्री उपस्थिति’ बिकती है, ‘लेखनी’ नहीं।
पर यह बाज़ार भी एक दिन ढहेगा — जब हर लेखिका अपने भीतर के डर को मिटाकर मंच पर सिर्फ़ कविता नहीं, हक़ मांगेगी।
“मेरे शब्द मेरे होंठों से नहीं, मेरी आत्मा से निकले हैं — और तुमने मेरी आत्मा को रौंदा है, तो अब यह कलम चुप नहीं बैठेगी।”
अंतरिक्ष की नई उड़ान: एक्सिओम-4 और भारत की वैश्विक पहचान
एक्सिओम-4 मिशन भारत के अंतरिक्ष इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण है। वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ल की सहभागिता से यह मिशन सिर्फ तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की उपस्थिति का प्रतीक बन गया है।
अमेरिका की एक्सिओम-4 स्पेस और नासा के सहयोग से हुआ यह अभियान भारत को मानव अंतरिक्ष यात्रा के क्षेत्र में नई ऊंचाईयों पर ले गया है। वैज्ञानिक प्रयोगों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर यह मिशन आने वाले गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की नींव मजबूत करता है।
41 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब भारत का कोई प्रतिनिधि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की ओर रवाना हुआ, तो यह महज़ एक मिशन नहीं था, बल्कि भारत के अंतरिक्ष विज्ञान, वैश्विक कूटनीति और वैज्ञानिक प्रतिष्ठा का पुनर्जन्म था।एक्सिओम-4 मिशन में भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ल की भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अंतरिक्ष की दौड़ में सिर्फ एक सहभागी नहीं, बल्कि एक संभावित नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा जा रहा है।
इस मिशन के माध्यम से भारत ने एक साथ कई स्तरों पर उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। सबसे पहले, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बात करें तो भारत ने इस मिशन के तहत सात प्रमुख वैज्ञानिक प्रयोग अंतरिक्ष में भेजे। ये सभी प्रयोग सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण पर आधारित थे और इनका उद्देश्य जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझना था।
मेथी और मूंग जैसे बीजों पर किया गया अध्ययन भारतीय कृषि तकनीकों की विशिष्टता को अंतरिक्ष तक ले गया। इससे यह प्रमाणित होता है कि भारत की पारंपरिक खेती भी वैज्ञानिक शोध के लिए प्रासंगिक और आधुनिक है।
इसके अतिरिक्त, सूक्ष्मजीवों, माइक्रोएल्गी और मांसपेशियों के पुनरुत्पादन पर आधारित प्रयोगों ने दीर्घकालिक अंतरिक्ष यात्रा में जीवन समर्थन प्रणालियों के विकास में भारत की उपयोगिता को सिद्ध किया। इससे स्पष्ट है कि भारत केवल अंतरिक्ष में मौजूदगी दर्ज कराने नहीं बल्कि उसमें नवाचार और अनुसंधान के स्तर पर योगदान देने आया है।
शुभांशु शुक्ल का स्पेसएक्स के क्रू ड्रैगन यान को सफलतापूर्वक डॉक करना और अंतरिक्ष में आपातकालीन स्थितियों का प्रशिक्षण प्राप्त करना, आने वाले गगनयान मिशन के लिए अमूल्य अनुभव है। यह भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए एक मजबूत बुनियाद का कार्य करेगा।
एक्सिओम-4 ने यह भी दिखा दिया कि भारत अब व्यावसायिक अंतरिक्ष उड़ानों में भी प्रवेश कर चुका है। एक्सिओम-4 स्पेस और भारतीय स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस के बीच हुआ समझौता दर्शाता है कि भारत अब केवल सरकारी संसाधनों पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि निजी क्षेत्र के सहयोग से सस्ते और नवीन समाधान विकसित करने की दिशा में अग्रसर है। यह भारतीय अंतरिक्ष नीति की आत्मनिर्भरता और स्टार्टअप संस्कृति की सफलता की कहानी है।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो एक्सिओम-4 भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते सहयोग का प्रतीक है, विशेषकर आईसीईटी और आर्टेमिस समझौते जैसी व्यवस्थाओं के अंतर्गत। भारत ने इस मिशन के ज़रिए न केवल अमेरिका बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तर सहयोग की भावना को भी मज़बूती दी। इस मिशन में भारत के साथ पोलैंड और हंगरी जैसे देशों के अंतरिक्ष यात्री भी शामिल थे। यह वैश्विक समावेशिता और साझेदारी का प्रतीक था।
यह मिशन भारत की “सॉफ्ट पावर” को भी बढ़ावा देता है। जब दुनिया के समाचार चैनलों पर भारत का नाम मानव अंतरिक्ष यात्रा के साथ जोड़ा गया, तो यह सिर्फ तकनीकी नहीं, कूटनीतिक जीत भी थी। भारत ने यह दिखा दिया कि वह केवल उपग्रह भेजने वाला देश नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में मानव भेजने और सहयोग करने वाला देश बन चुका है।
एक्सिओम-4 मिशन से भारत के निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप्स को भी नया आत्मविश्वास मिला है। स्काईरूट और अग्निकुल कॉसमॉस जैसी कंपनियाँ अब वैश्विक सहयोग की दिशा में अपने कदम बढ़ा रही हैं। यह भारत के लिए निवेश, तकनीकी सहयोग और वैज्ञानिक नवाचार के नए द्वार खोलने वाला साबित हो सकता है।
इसके अतिरिक्त, इस मिशन ने भारत को गगनयान के लिए आवश्यक अनुभव प्रदान किया है। एक्सिओम-४ को विशेषज्ञों ने “बीमा नीति” की संज्ञा दी है, जिसका तात्पर्य है कि इस मिशन से भारत को उन जोखिमों को समझने और नियंत्रित करने का अवसर मिला जो गगनयान जैसे जटिल मिशनों में सामने आ सकते हैं। साथ ही, यह अनुभव भारत के भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशन “भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन” के निर्माण की दिशा में भी सहायक होगा।
यह भी महत्वपूर्ण है कि शुभांशु शुक्ल को नासा में आठ महीने का कठोर प्रशिक्षण मिला, जिससे भारत को अब अंतरिक्ष यात्रियों की प्रशिक्षण क्षमता को लेकर एक नया मानक मिल गया है। भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को इसी स्तर पर प्रशिक्षित किया जा सकता है।
एक्सिओम-4 मिशन ने भारत को संयुक्त राष्ट्र के “संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर समिति” जैसे वैश्विक मंचों पर अधिक प्रभावी आवाज़ प्रदान की है। जब कोई देश मानव अंतरिक्ष उड़ान करता है, तो वह न केवल विज्ञान में बल्कि वैश्विक नीति निर्माण में भी एक नई भूमिका निभाने लगता है।
इस पूरे अभियान ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत अब केवल प्रेक्षक नहीं, बल्कि भागीदार है। यह मिशन भारत के लिए एक ‘लिफ्ट-ऑफ मोमेंट’ साबित हुआ है — एक ऐसा क्षण जब एक राष्ट्र केवल तकनीकी क्षेत्र में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, रणनीति और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में भी उड़ान भरता है।
अब यह आवश्यक है कि भारत इस उपलब्धि को गगनयान जैसे आगामी मिशनों और अंतरिक्ष क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीतियों के साथ जोड़कर आगे बढ़े। नीति निर्माण से लेकर बजट आवंटन तक और अंतरिक्ष शिक्षा से लेकर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तक —एक्सिओम-4 जैसे मिशनों को भारत की दीर्घकालिक अंतरिक्ष रणनीति का हिस्सा बनाना होगा।
अंततः एक्सिओम-४ केवल एक उड़ान नहीं थी, यह भारत की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा, वैश्विक सहभागिता और भविष्य की अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की संभावनाओं की घोषणा थी। भारत अब अंतरिक्ष की दौड़ में पीछे नहीं, बल्कि अगली पंक्ति में खड़ा है।
“कॉलर ट्यून की विदाई: जनता की सुनवाई या थकान की जीत?”
“कॉलर ट्यून को अलविदा कहा गया।”
6 दिन पहले प्रकाशित हुआ मेरा लेख — “कॉलर ट्यून या कलेजे पर हथौड़ा: हर बार अमिताभ क्यों? जब चेतावनी बन गई चिढ़” अमिताभ बच्चन की कोविड कॉलर ट्यून ने देश को जागरूक किया, पर समय के साथ वह झुंझलाहट में बदल गई।
जनभावनाओं की अनदेखी नीतियों के विरुद्ध यह लेख देशभर में पढ़ा गया और चर्चा में आया। धन्यवाद उन सभी पाठकों का जिन्होंने इस विषय पर प्रतिक्रिया दी। लेख को 6 दिन पहले अख़बारो ने स्थान दिया — यह कलम के विश्वास का सम्मान है।
“नमस्कार, हमारा देश कोविड-19 से लड़ रहा है…”
इस आवाज़ को पिछले तीन सालों में 140 करोड़ भारतीयों ने लाखों बार सुना। कॉल लगाओ, तो अमिताभ बच्चन की चेतावनी पहले—बात बाद में। किसी के बीमार होने पर कॉल करो, OTP भूल जाओ तो कॉल करो, एम्बुलेंस बुलानी हो तब भी यही आवाज़, यही स्क्रिप्ट, वही धीमा, गंभीर, थोप दिया गया उपदेश।
सरकार के इस निर्णय के पीछे मंशा सही रही हो सकती है—लेकिन हर कॉल से पहले वही आवाज़ सुनने की मजबूरी कब एक ‘नैतिक संदेश’ से ‘मानसिक उत्पीड़न’ में बदल गई, किसी ने गौर नहीं किया। और शायद किसी ने सोचा भी नहीं कि जनता भी कभी जवाब देगी।
लेकिन जनता ने जवाब दिया। और सरकार ने—शायद पहली बार—जनता की थकान, झुंझलाहट और असहमति को सुना। 6 दिन पहले, आखिरकार यह ‘चेतावनी ट्यून’ हटा दी गई। और तब लोगों ने राहत की साँस ली — कुछ ने हँसी में, कुछ ने गुस्से में और कुछ ने व्यंग्य में।
प्रारंभिक मंशा: जब कॉलर ट्यून बना था जीवन रक्षक संदेश
2020 की शुरुआत में जब कोरोना का पहला केस भारत में आया, तब सरकार की चिंता वाजिब थी। एक अदृश्य वायरस था, जनता में डर था, जानकारी अधूरी थी और भ्रम फैला हुआ था। ऐसे में अमिताभ बच्चन जैसे विश्वसनीय चेहरे की आवाज़ को हर मोबाइल यूज़र तक पहुँचाने का विचार असरदार लगा।
“मास्क पहनें, बार-बार हाथ धोएं, भीड़ से बचें, और OTP किसी से साझा न करें”—ये सब बातें सही थीं। और जब एक ऐसी आवाज़ यह कहे जिसे आपने दशकों से परदे पर देखा-सुना हो, तो उसका असर होता है। कॉलर ट्यून एक महामारी काल का डिजिटल नैतिक उपदेश बन गया था।
पर एक नैतिक संदेश कब ‘एकतरफा सरकारी अनिवार्यता’ बन जाए, इसका एहसास न सरकार को हुआ, न उससे जुड़े नीतिनिर्माताओं को।
अवधि का विस्तार: जब चेतावनी बन गई झल्लाहट
समय बीता। कोरोना की लहरें कम हुईं, फिर बढ़ीं, फिर वैक्सीनेशन हुआ, फिर धीरे-धीरे जीवन पटरी पर आने लगा।
लेकिन कॉलर ट्यून नहीं हटी।
हर कॉल पर वही ‘नमस्कार, हमारा देश…’।
हर बार वही धीमी आवाज़, वही 30 सेकंड की बंदिश।
अब कल्पना कीजिए कि आपकी गाड़ी एक्सीडेंट हो गई है और आप एम्बुलेंस को कॉल कर रहे हैं — और वहाँ अमिताभ बच्चन पहले OTP साझा न करने की सलाह दे रहे हैं।
या आपके किसी प्रियजन को दिल का दौरा पड़ा है — और आपकी कॉल को रोक रही है एक सरकारी आवाज़।
इस ट्यून का प्रभावी होना अब एक तकनीकी अवरोध में बदल चुका था। यह अब न तो शिक्षित कर रही थी, न ही चेतावनी दे रही थी — यह बस एक दैनिक मानसिक अवरोध बन चुकी थी।
जनता का गुस्सा और सोशल मीडिया का व्यंग्य
किसी नीतिगत गलती की सबसे तीखी प्रतिक्रिया अब सोशल मीडिया देता है। ट्विटर पर #StopCallerTune ट्रेंड करने लगा।
लोगों ने लिखा:
“मुझे लगता है मेरी शादी से पहले भी अमिताभ जी की अनुमति चाहिए।”
“OTP तो नहीं दिया, पर धैर्य ज़रूर दे दिया अमिताभ जी ने।”
“अब बच्चा पैदा होते ही बोलेगा — नमस्कार, हमारा देश…”
मीम्स की बाढ़ आ गई। और तब सरकार को पहली बार अहसास हुआ कि यह जनता की नाराज़गी की हँसी है, स्वागत नहीं।
ट्यून का हटना: एक नीतिगत सुधार या जनदबाव?
6 दिन पहले जब यह कॉलर ट्यून हटाई गई, तो खबर बन गई। मीडिया ने इसे राहत बताया, कुछ ने इसे देर से लिया गया निर्णय कहा।
लेकिन जो बात सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण थी, वह यह कि सरकार ने जनता की बात सुनी। यह आज के समय में दुर्लभ है — खासकर तब, जब जनता की बात कोई ‘चुनाव’ नहीं, केवल एक ‘झुंझलाहट’ हो।
यह निर्णय दिखाता है कि नीतियाँ स्थायी नहीं होतीं — वे जनता के अनुभव से आकार लेती हैं।
अमिताभ बच्चन की आवाज़ चाहे कितनी ही विश्वसनीय रही हो, वह जबरन हर कॉल पर न बुलाई जाए — यह समझना ही संवेदनशील प्रशासन का संकेत है।
प्रश्न जो शेष हैं: क्या सरकार को इतना हस्तक्षेप करना चाहिए?
यह कॉलर ट्यून विवाद केवल एक आवाज़ हटाने का मामला नहीं है — यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है:
क्या सरकार के पास यह अधिकार है कि वह हर नागरिक की निजी कॉल के बीच में अपनी बात कहे?
क्या तकनीकी माध्यमों से ऐसी अनिवार्य घोषणाएँ निजता का उल्लंघन नहीं हैं?
और सबसे बड़ा सवाल: जब लोग थक जाएं, तब भी क्या नीति तब तक जारी रहे जब तक वह ‘ऊपर से हटाई न जाए’?
जन-नीति बनाम जन-संवेदना
इस पूरे प्रकरण में एक सबक है — सरकार चाहे तो कितनी भी प्रभावशाली योजना लागू करे, लेकिन हर योजना का जीवनकाल होता है।
जनसंवेदना, तकनीकी बदलाव और ज़मीनी अनुभव — इन सबको समय रहते समझना ही असल शासन है।
OTP साझा न करने की बात अब जनता जान चुकी है।
मास्क पहनना अब एक स्वचालित आदत बन चुकी है।
पर यह भी याद रखना होगा कि अधिकार और जानकारी के बीच संतुलन जरूरी है।
कलेजे पर हथौड़ा क्यों लगा यह ट्यून?
क्योंकि यह हर बार अनचाहे हस्तक्षेप की तरह सामने आई।
क्योंकि यह हर बार उस व्यक्ति की प्राथमिकता को नज़रअंदाज़ करती रही जो कॉल करने जा रहा था।
क्योंकि यह ट्यून अब सूचना नहीं, एक चेतावनी की जबरदस्ती बन गई थी।
अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार को भी शायद नहीं पता कि उनकी आवाज़ अब लोगों के लिए ‘उपदेश’ नहीं बल्कि ‘अवरोध’ बन चुकी थी।
जब किसी आवाज़ से ‘सम्मान’ से ज़्यादा ‘असहायता’ जुड़ जाए — तो समय आ जाता है उसे विश्राम देने का।
टेक्नोलॉजी का उपयोग करें, दुरुपयोग नहीं
कॉलर ट्यून हटाना केवल एक तकनीकी निर्णय नहीं था।
यह एक संकेत है — कि जनता की आवाज़ सुनी गई।
यह याद दिलाता है कि सरकार को सूचना देना है, आदेश नहीं थोपना है।
जनता केवल वोट नहीं देती, वह अनुभव भी करती है। और जब अनुभव चुभने लगें, तब कलम, कैम्पेन और व्यंग्य आवाज़ बन जाते हैं।
लैंगिक समानता की राह में भारत की गिरावट: एक चिंताजनक संकेत
विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम) की वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट 2024 में भारत को 148 देशों में 131वाँ स्थान प्राप्त हुआ है। यह न केवल दो पायदान की गिरावट है, बल्कि भारत की विकास यात्रा में छुपी उस असमानता का पर्दाफाश भी करती है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
जब पूरी दुनिया लैंगिक असमानता को घटाने में धीमी किंतु स्थिर प्रगति कर रही है, तब भारत का पिछड़ना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि नीति, सोच और संस्थागत व्यवस्था की विफलता का प्रतिबिंब है।
वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक (ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स), जिसे 2006 में शुरू किया गया था, चार प्रमुख क्षेत्रों में पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता को मापता है—आर्थिक भागीदारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक सशक्तिकरण। भारत का कुल स्कोर 64.1% है, जो वैश्विक औसत 68.5% से काफी कम है। यही नहीं, दक्षिण एशिया में भी भारत बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और भूटान जैसे पड़ोसी देशों से पीछे है।
आर्थिक भागीदारी के क्षेत्र में भारत ने मामूली सुधार किया है, लेकिन महिलाओं की श्रम भागीदारी दर अभी भी 45.9% पर अटकी हुई है। महिलाएँ मुख्यतः देखभाल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे कम वेतन वाले क्षेत्रों में केंद्रित हैं। घरेलू और अवैतनिक श्रम, जो देश की असंगठित अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, अभी तक किसी राष्ट्रीय लेखांकन में शामिल नहीं किया गया है। महिलाओं को पुरुषों की तुलना में समान कार्य के लिए 20–30% कम वेतन प्राप्त होता है। यह आर्थिक असमानता केवल आँकड़ों की नहीं, सोच की समस्या है।
शिक्षा के क्षेत्र में कुछ प्रगति तो हुई है, परंतु महिला साक्षरता दर अभी भी लगभग 70% है, जो वैश्विक औसत 87% से बहुत कम है। उच्च शिक्षा, विशेषकर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित (एसटीईएम) क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। ग्रामीण क्षेत्रों, आदिवासी इलाकों और निम्नवर्गीय परिवारों की लड़कियों को शिक्षा से वंचित करने वाली सामाजिक बाधाएँ—जैसे बाल विवाह, रुढ़िवादी सोच और विद्यालयों की दूरी—अब भी मौजूद हैं।
स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा के पैमाने पर भी भारत पिछड़ा हुआ है। जन्म के समय लिंग अनुपात अब भी 929 लड़कियाँ प्रति 1000 लड़कों के आसपास है। मातृत्व से जुड़ी समस्याएँ, कुपोषण, रक्ताल्पता (एनीमिया), और प्रसवकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। घर की चारदीवारी में महिलाओं की सेहत को प्राथमिकता न मिलना हमारी पारिवारिक व्यवस्था की कमजोरी है।
राजनीतिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में भारत की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व घटकर 13.8% रह गया है और केंद्रीय मंत्रिमंडल में केवल 5.6% महिलाएँ हैं।
यह तब और विडंबनापूर्ण हो जाता है जब हम जानते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक 2023 पारित हो चुका है, परंतु जनगणना और निर्वाचन क्षेत्र पुनःनिर्धारण की प्रक्रिया के विलंब के कारण उसका क्रियान्वयन अटका हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल कानून पारित करना पर्याप्त नहीं, उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति भी आवश्यक है।
भारत को अपने पड़ोसी देशों से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। बांग्लादेश जैसे देश ने सूक्ष्म वित्त, महिला शिक्षा प्रोत्साहन, और निरंतर राजनीतिक भागीदारी जैसे उपायों से सकारात्मक सुधार किए हैं।
नेपाल में संविधान द्वारा स्थानीय निकायों में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित की गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि कई निम्न आय वाले देशों ने धनी देशों की तुलना में लैंगिक समानता में अधिक तेजी से प्रगति की है, जो यह दर्शाता है कि बदलाव के लिए धन नहीं, दृढ़ नीयत चाहिए।
लैंगिक समानता केवल एक सामाजिक उद्देश्य नहीं, भारत की आर्थिक प्रगति के लिए भी अनिवार्य है। मैकिंज़ी ग्लोबल संस्थान का अनुमान है कि यदि भारत कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाता है, तो 2025 तक अपनी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 700 अरब डॉलर तक की वृद्धि कर सकता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और शासन में महिलाओं की भागीदारी से सामाजिक परिणाम भी अधिक न्यायसंगत और समावेशी होते हैं। भारत की जनसांख्यिकीय क्षमता तभी सार्थक होगी, जब उसमें महिलाओं की पूरी और समान भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
किन्तु चुनौतियाँ गहरी हैं। पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्य, कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए सुरक्षा की कमी, डिजिटल उपकरणों तक सीमित पहुँच और नीतियों के क्रियान्वयन में ढिलाई—ये सभी मिलकर लैंगिक असमानता को टिकाऊ बना रहे हैं।
अब समय आ गया है कि भारत केवल योजना बनाने तक सीमित न रहे, बल्कि उन्हें ज़मीन पर उतारे। महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने हेतु जनगणना और निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। घरेलू और अवैतनिक श्रम को राष्ट्रीय आर्थिक लेखा-जोखा में शामिल कर उसे सम्मान और सामाजिक सुरक्षा दी जानी चाहिए। महिलाओं के लिए लचीले और सुरक्षित कार्यस्थलों की व्यवस्था की जाए, विशेषकर ग्रामीण एवं अर्ध-नगरीय क्षेत्रों में।
निजी क्षेत्र में महिलाओं के नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए कंपनियों में महिला निदेशक की अनिवार्यता हो। विज्ञान, राजनीति और उद्यमिता में महिलाओं के लिए परामर्श (मेंटॉरशिप) कार्यक्रम चलाए जाएँ। डिजिटल विभाजन को पाटने के लिए महिलाओं को सस्ते मोबाइल व इंटरनेट सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ, और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों को पंचायत स्तर तक पहुँचाया जाए।
हर योजना और सर्वेक्षण में लैंगिक रूप से अलग आँकड़े संकलित करना अनिवार्य हो ताकि राज्य और जिले स्तर पर प्रगति की निगरानी की जा सके और नीति निर्माण अधिक लक्षित हो सके।
भारत की लैंगिक समानता में यह गिरावट केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि हमने विकास की दौड़ में आधी आबादी को पीछे छोड़ दिया है। यह भूल केवल सामाजिक न्याय की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय समृद्धि की भी कीमत वसूलती है।
समानता की राह लंबी है, पर असंभव नहीं। नीति बन चुकी है, दिशा स्पष्ट है, अब आवश्यकता है राजनीतिक संकल्प, सामाजिक सहमति और संस्थागत क्रियान्वयन की। जब तक भारत अपनी आधी आबादी को बराबरी का स्थान नहीं देगा, तब तक “विकसित राष्ट्र” का सपना अधूरा रहेगा।
(प्रियंका सौरभ एक स्वतंत्र स्तंभकार, कवयित्री और सामाजिक विषयों पर मुखर लेखिका हैं। वे विशेष रूप से महिला अधिकार, शिक्षा और ग्रामीण भारत की आवाज़ को अपने लेखन में प्राथमिकता देती हैं।)
नया लोकतंत्र? (संपादकीय स्थान रिक्त है)
“जब कलम चुप हो जाए: लोकतंत्र का शोकगीत”
आपातकाल के दौरान अख़बारों ने विरोध में अपना संपादकीय कॉलम ख़ाली छोड़ा था। आज औपचारिक सेंसरशिप नहीं है, लेकिन आत्म-सेन्सरशिप, भय और ‘राष्ट्रभक्ति’ के नाम पर विचारों का गला घोंटा जा रहा है। सवाल पूछना देशद्रोह बन गया है, और संपादकीय अब सत्ता के प्रवक्ता हो गए हैं। ऐसे समय में जब हर शब्द जोखिम बन चुका है, तब एक रिक्त संपादकीय शायद सबसे शक्तिशाली चीख है — यह कहता है, “हम अभी मौन हैं, लेकिन गूंगे नहीं हुए हैं।”
“आपातकाल में अख़बारों ने विरोध में अपने संपादकीय स्तंभ ख़ाली छोड़ दिए थे। आज संपादकीय लिखे जा रहे हैं — लेकिन जैसे ख़ालीपन भीतर भर गया है।”
1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित किया था, तब विरोध का मतलब जेल जाना था, कलम उठाना मतलब कागज़ छिन जाना था। फिर भी ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘जनसत्ता’, ‘प्रतिपक्ष’ और कई क्षेत्रीय अख़बारों ने अपना संपादकीय कॉलम रिक्त छोड़कर सत्ता के विरुद्ध मौन का सबसे मुखर रूप चुना था।
आज आपातकाल घोषित नहीं है। प्रेस की आज़ादी का कोई औपचारिक निलंबन नहीं हुआ। फिर भी पत्रकार जेल में हैं। कुछ मारे गए, कुछ बिक गए, कुछ खामोश हो गए। एक पूरी पीढ़ी है जिसे मालूम ही नहीं कि लोकतंत्र में अख़बार सरकार से सवाल पूछते हैं, आरती नहीं।
नया लोकतंत्र वह है जहाँ सरकार बोलती है, जनता सुनती है। सत्ता झूठ बोले, मीडिया उसे स्लोगन बना दे। कोई किसान मर जाए, कोई छात्र रो ले, कोई स्त्री चीखे — तो कैमरे का एंगल बदल दिया जाए। नया लोकतंत्र वह है जहाँ “देशद्रोह” अब अभिव्यक्ति की सीमा नहीं, असहमति की परिभाषा है। जहाँ “राष्ट्रवाद” अब जनहित नहीं, सत्ता हित की पोशाक बन चुका है।
क्योंकि जब सब लिखा जा चुका हो, लेकिन कुछ भी छपने लायक न बचे — तब स्याही सूख जाती है। 1975 में डर बाहर था, टैंक और वर्दियों में। आज डर भीतर है, टीआरपी और फंडिंग के नाम पर। 1975 में सेंसर अफसर बिठाए गए थे। आज पत्रकारों ने खुद ही सेंसरशिप को आत्मसात कर लिया है। जो लिखते थे, अब ‘जुबान फिसलने’ के दोषी बना दिए गए हैं। जो सोचते हैं, उन्हें आईटी सेल के शोर में दबा दिया गया है। जो सच दिखाते हैं, उनकी स्क्रीन ‘ब्लैकआउट’ कर दी जाती है।
कभी यह अनुरोध होता था — “कृपया शांत रहें।” अब यह सत्ता का आदेश है — “चुप रहो, वरना देशद्रोही कहलाओगे।” बोलना अब खतरनाक नहीं, अवैध हो गया है। कविता लिखना अब भाव नहीं, ‘विचारधारा’ कहलाता है। सवाल पूछना अब नागरिक कर्तव्य नहीं, गुनाह है। “शांत रहिए” अब सिर्फ रेल स्टेशनों पर नहीं बजता, यह हर न्यूज़ चैनल, हर अख़बार, हर सोशल मीडिया पोस्ट की चेतावनी बन चुका है।
आपातकाल में जनता ने आवाज़ उठाई। जेल गए, आंदोलन किए। लेकिन आज हम एक अघोषित आपातकाल के भीतर हैं — और चुप हैं। शायद क्योंकि आज की सेंसरशिप हिंसा की नहीं, सुविधा की है। शायद इसलिए कि अब डर नहीं दिखता, वो आकर्षक पैकेज में छिपा है — “सब अच्छा है”, “बढ़ता भारत”, “विश्वगुरु”। हम वह पीढ़ी हैं जिसने सत्य की जगह नैरेटिव चुन लिया है। जिसने अख़बार से खबर हटाकर इवेंट बना दिया है। जिसने संविधान की प्रस्तावना पढ़ी भी है, पर समझी नहीं।
क्योंकि शब्द अब प्रभावहीन हैं? नहीं। क्योंकि अब कोई सुनने वाला नहीं? नहीं। बल्कि इसलिए कि कभी-कभी चुप्पी खुद एक चीख बन जाती है। “रिक्त संपादकीय” आज फिर ज़रूरी है — क्योंकि हर शब्द अब रेखांकित हो रहा है, हर वाक्य विश्लेषित हो रहा है, और हर असहमति पर मुकदमा दर्ज हो रहा है। कभी-कभी खाली पन्ना वो कह देता है जो शब्द नहीं कह सकते।
हमारा पाठक अब बस मनोरंजन चाहता है। संपादकीय पढ़ना उसकी रुचि में नहीं रहा। वह सत्य की खोज में नहीं, ‘रिलेट करने लायक’ कंटेंट में रुचि रखता है। वह “ट्रेंड” में जीता है, “तथ्य” में नहीं। तो अख़बार भी अब वही परोसते हैं — वही चेहरे, वही घिसे-पिटे विचार, वही सत्तानुकूल भाषा।
अगर आप संपादकीय रिक्त देखते हैं — चौंकिए मत। समझिए, कोई कुछ कह नहीं पा रहा। अगर आप संपादकीय में ‘भक्ति’ पढ़ते हैं — समझिए, कलम मजबूरी में झुकी है या बिक चुकी है। अगर आप अभी भी लिख रहे हैं — तो अपने भीतर एक सवाल ज़रूर उठाइए: क्या मेरी कलम सत्ता के हित में चल रही है या समाज के?
जब किसी गांव की दलित औरत को पीट दिया जाएगा — और उसका वीडियो वायरल होगा, जब किसी छात्र को नारेबाज़ी के आरोप में जेल भेजा जाएगा, जब किसी कवि की किताब पर प्रतिबंध लग जाएगा, या जब किसी संपादक को सिर्फ इसलिए नौकरी से निकाला जाएगा क्योंकि उसने सच छाप दिया… तब शायद कोई फिर से बोलेगा:
“संपादकीय रिक्त है — क्योंकि लोकतंत्र अभी मौन है।”
लेखिका परिचय:
प्रियंका सौरभ एक स्वतंत्र लेखिका, कवयित्री और पत्रकार हैं, जो समकालीन भारत में लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और महिला मुद्दों पर मुखर लेखन के लिए जानी जाती हैं।
दुर्घटना पीड़ितों के लिए “कैशलेस” उपचार : नीयत नेक, व्यवस्था बेकार
इस देश में जब कोई सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त होता है, तो सबसे पहले यह नहीं पूछा जाता कि ज़ख्म कितना गहरा है — पहले यह पूछा जाता है कि “पहचान पत्र है?”, “बीमा है?”, “अस्पताल पंजीकृत है?” और फिर अंत में — “बचा पाएँगे या नहीं?”। मानो पीड़ित की जान से पहले कागज़ ज़रूरी हो।
ऐसे देश में जब सरकार यह कहती है कि “अब किसी भी सड़क हादसे में घायल को पहले सात दिन ₹1.5 लाख तक मुफ्त इलाज मिलेगा”, तो लगता है जैसे व्यवस्था ने कोई इंसानी चेहरा पहन लिया है। लेकिन जब ज़मीन पर उतरकर इस योजना की हकीकत देखते हैं, तो वो चेहरा धुंधला दिखता है — कभी फाइलों में खोया, कभी पोर्टल में अटका, और कभी अस्पताल की बेरुखी में दम तोड़ता।
यह नकदरहित उपचार योजना मोटर वाहन अधिनियम की धारा 162 के तहत शुरू की गई थी। उद्देश्य यही था कि किसी गरीब या अमीर को इलाज के लिए अपनी जेब नहीं टटोलनी पड़े। पहली दृष्टि में यह लगता है कि सरकार ने आम जन की पीड़ा को समझा है। लेकिन फिर वही पुराना सवाल उठता है — क्या नीयत और नीति के बीच की दूरी को व्यवस्था कभी पाट पाएगी?
अभी तक कई राज्यों ने तो इस योजना को लागू करने के आदेश ही नहीं दिए हैं। राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा और गाजियाबाद जैसे विकसित क्षेत्रों में भी जून 2025 तक अस्पतालों को पता ही नहीं था कि योजना चालू हो चुकी है। क्या ये हास्यास्पद नहीं कि योजना चालू हो गई है लेकिन अस्पताल और डॉक्टर उसे ढूंढ़ रहे हैं जैसे कोई खोया हुआ यातायात संकेत?
और जो अस्पताल योजना से जुड़े भी हैं, वहाँ इलाज की सीमा ₹1.5 लाख की है। अब ज़रा सोचिए — एक गंभीर सड़क हादसे में भर्ती मरीज़ का आईसीयू, सर्जरी, दवाइयाँ, जांच — क्या ये सब ₹1.5 लाख में सिमट सकते हैं? निजी अस्पतालों ने तो साफ कहा है — “हमें घाटे में क्यों काम करना चाहिए?” और सरकार जवाब देती है — “देशसेवा!” लेकिन क्या देशसेवा खाली डॉक्टरों की ज़िम्मेदारी है? नीति निर्धारकों की नहीं?
संकट सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है। पोर्टल — हाँ वही कम्प्यूटर पर बना पोर्टल — जिसे देखकर अस्पताल का बाबू भी माथा पकड़ ले। कभी दस्तावेज़ अपलोड नहीं होते, कभी फार्म अधूरा रह जाता है, और कभी पूरा क्लेम “त्रुटि” में चला जाता है। मरीज तो क्या, अस्पताल तक को नहीं मालूम होता कि किससे संपर्क करें, कहाँ सुधार करवाएँ।
अस्पताल, पुलिस, बीमा एजेंसियाँ और राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण — सबके पास अलग-अलग नियम, अलग-अलग समझ, और एक जैसी असमंजस है। कोई नहीं जानता किसका क्या काम है। लगता है जैसे योजना एक मंचन है जिसमें सभी पात्र हैं, लेकिन किसी को पटकथा नहीं दी गई।
और तो और, कई बार दुर्घटना इतनी गंभीर होती है कि आसपास के जो अस्पताल हैं, वे योजना में पंजीकृत नहीं होते। ऐसे में वे “स्थिति स्थिरीकरण” (Stabilization) भी करने से डरते हैं — उन्हें डर है कि कहीं पैसा न फँस जाए! परिणाम — घायल मरीज एंबुलेंस में इधर से उधर ढोया जाता है, और उसका “गोल्डन ऑवर” यानी जीवन बचाने का सबसे कीमती समय — रास्तों में ही बीत जाता है।
अब बात करें सबसे बुनियादी लेकिन सबसे उपेक्षित पक्ष की — जागरूकता। जनता को नहीं पता कि ऐसी कोई योजना है। सड़क पर पड़ी एक घायल महिला को देखकर लोग कैमरा तो निकाल लेते हैं, लेकिन इलाज के लिए योजना का नाम नहीं बता पाते। अस्पताल में कार्यरत स्टाफ तक को नहीं मालूम होता कि कैसे योजना को लागू किया जाए। योजना का लाभ तब मिलेगा जब लाभार्थी को पता ही नहीं कि वो लाभार्थी है?
हास्य तब और गहरा हो जाता है जब सरकार ‘राहवीर योजना’ के तहत ₹25,000 तक इनाम देती है किसी घायल की मदद करने पर — लेकिन योजना की जानकारी लोगों को रेडियो या सरकारी पोस्टर तक सीमित है। सोशल मीडिया पर जहाँ लोग नाचते-गाते दिखते हैं, वहाँ ये योजना अदृश्य है।
योजना को ज़मीन पर सफल बनाने के लिए बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। सबसे पहले — राज्य सरकारें आलस्य त्यागें और स्पष्ट दिशानिर्देश दें। अस्पतालों को स्पष्ट समय सीमा में पंजीकरण अनिवार्य किया जाए। इंदौर का उदाहरण अच्छा है जहाँ जून 2025 में तीन दिन के भीतर अस्पतालों को योजना में शामिल कर लिया गया।
दूसरे, योजना की वित्तीय सीमा वास्तविक चिकित्सा लागतों के अनुसार तय की जाए। अगर सरकार लोगों की जान बचाना चाहती है, तो अस्पतालों को घाटे में क्यों धकेल रही है?
तीसरे, पोर्टल को “डिजिटल इंडिया” का मज़ाक बनने से बचाना होगा। यह सरल, स्पष्ट और तकनीकी रूप से सक्षम बनाया जाए। क्लेम प्रक्रिया पारदर्शी हो — ताकि अस्पताल को भुगतान समय पर मिले, और मरीज को राहत।
इसके साथ ही गैर-पंजीकृत अस्पतालों को भी स्थिति स्थिरीकरण का अधिकार और भुगतान की गारंटी दी जाए। इससे जीवन रक्षा का अवसर बढ़ेगा।
अंततः — जागरूकता। जनता को पता होना चाहिए कि सड़क पर पड़ी हर जान, एक योजना से जुड़ी हुई है। पोस्टरों से लेकर मोबाइल संदेश तक, स्कूलों से लेकर पंचायतों तक — हर जगह इस योजना की जानकारी दी जानी चाहिए। क्योंकि जब जनता को पता होगा, तभी अस्पताल जवाबदेह होंगे।
यह नकदरहित उपचार योजना, अगर सही मायनों में लागू हो जाए, तो भारत में सड़क दुर्घटनाओं से जुड़ी मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन जब तक यह योजना कागज़ी ही बनी रहती है, तब तक यह एक और ‘योजना’ बनकर रह जाएगी — जो स्लोगन में चमकेगी, लेकिन सड़क पर बहे खून से बेखबर रहेगी।
इस देश की सड़कों पर खून बहता है — और व्यवस्था पोर्टल लोड होने का इंतज़ार करती है।

प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)-127045
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