समाज का अंत होना

समाज का अंत होना

बहुत दिनों से सोच रहा था की समाज के प्रति कुछ लिखूँ। फिर सोचा क्यों इस झमेले में हमें पड़ना चाहिए। आज वर्षो पुराना लेख पड़ने को मिला जिसमें पुराने जमाने के लोगों ने किस तरह से समाज का संगठन और एक ढाचा को तैयार किया था।

जिसके अधीन सभी लोगों को एक छत के नीचे लाया गया था। पहले के लोग ज्यादा पढ़े लिखे न होते हुए भी सब कुछ आज के प्रंधकगणों से भी बेहतर प्रबंध करते थे और अपने समाज का नाम देश में रोशन करते थे। समयानुसार परिवर्तन हुआ और पुराने लोगो से नये जमाने के लागों ने प्रबंधन छीन लिया और आधुनिकता की चकाचौँध में बहना आरंभ कर दिया। समाज को सबसे बड़ी छती जो हुई उसको भर पाना अब बहुत मुश्किल है।

क्योंकि धन दौलत मान सम्मान तो इंसान कमा सकता है। परंतु मौलिक चीज को अब कभी भी हासिल नही कर पाएंगे
और वो मौलिक चीज है लोगों में एक दूसरो को सम्मान देना व्यवहरिकता मान मर्यादाएं संस्कार ज्ञान ऐसी बहुत सी चीजे है जो हम लोगों ने खो दी है।

आज कल व्यमनुष्यता दूसरो को नीचे दिखाने के लिए कुछ भी करना..। पद क्या मिला की स्वयं को भगवान समझने लगते है। अहंकार में इतना डूब जाते है की अपने कार्यों से अपने समाज का पतन कर देते है। एक जुट समाज खंड खंड में बाट जाती है।

जो आज कल हर शहर नगर और गाँवो में देखने को मिल रहा है। हमारे पूर्वज लोग समाज को सगठित रहने और रोज मिलने मिलाने के लिए मंदिरों का निर्माण आदि करते थे ताकि समाज के लोग संगठित दिखे और देश में अपना और समाज का नाम रोशन करे।

इसलिए तो इतने सारे मन्दिर मस्जिद और गुरुद्वारे चर्चा आदि का निर्माण किया गया था परंतु समय और काल ने इन्हें अखड़ा आदि बन दिया। चारो तरफ सिर्फ पद का लोभ लोगो को कहाँ से कहाँ ले जा रहा है। एक मंदिरों में होकर भी अलग अलग पूजा पाठ आदि करते है।

समाज के ट्रस्ट में या मंडल में अंहकार अभिमान नाम की लड़ाई चरम सीमा आदि पर चल रही है। किसी भी ट्रस्ट में यदि महिला पुरुष है तो आप मानकर चले की वो ट्रस्ट का पतन या विघटन बहुत ही जल्दी होने वाला रहेगा। इसलिए पुराने लोगों ने दोनो तरह के मंडल अलग अलग बनाये थे।

जिसके कारण समाज मे अच्छा समंजस् बना रहता था। परंतु वर्तमान काल में तो देखो कैसे समाज का पतन हो रहा है। धार्मिक भावनाएं वाले लोग सिर्फ मंदिरों में आज कल दर्शन पूजा पाठ आदि करके निकल जाते है। सामाजिक गतिविधियों से किसी को कोई सरोकार नही बचा है क्योंकि इन सब का ठेका अब समाज के ठेकेदारों ने ले लिया है। यह सब पद लोभ और अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए कर रहे है।

यदि इन लोगों को समाज के ऊपर बोलने और करने को कहें तो साँसे फूल जाती है। माला पहनना स्वागत करवा बस ये चहाते है परंतु सेवा करना मदद करना आदि की उम्मीदे आप इन लोगों से नही कर सकते। हाँ पर मुँह चलना आग लगाना बनी बनाई व्यवस्थाओं का सत्यानाश करना, ये सब बहुत अच्छे से आता है।

श्रम व परिश्रम करना बिल्कुल नही आता। उसके लिए तो समाज आगे आये इस तरह के कथन इन लोगों के होते है। अपने मियामिठु बनना बहुत अच्छे से आता है। जबकि सेवा भाव तो दिखाई नही देता है। बस समाज को बाटना बहुत अच्छे से आता है।

कुछ लोग तो सिर्फ सुर्रु छोड़ने ही मंदिरों में आते है ताकि समाज की एक जुटता न बन जाए या न बनी रहे। इसलिए कुछ न कुछ रोज…. । समाज को संगठित करना और साथ रहना आज के समय में बहुत जरूरी है।

इसलिए अपने मान अभिमान और उच्च आकांक्षाओं को एक किनारे करके समाज के हित में सोचो तो ही समाज का स्वरूप आगे बचेगा वरना समाज का पतन इसी तरह से होता रहेगा और अकुशल लोग अनुभव वालों पर थोपे जाते रहेंगे।

मेरा लेख किसी व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए नही है यदि किसी को बुरा लगे या चुभे तो मैं उनसे क्षमा चाहता हूँ। समाज के हित में मेरा लेख समर्पित है।

Sanjay Jain Bina

जय जिनेंद्र
संजय जैन “बीना” मुंबई

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