“कर भला, हो बुरा”

दोपहर की चिलचिलाती धूप में एक वृद्ध महिला को स्कूल के गेट पर खड़ा देख सहायक जसवंत ने आयुष सर से कहा-

​”सर, यह बुढ़िया कई दिनों से लगातार आपको पूछने आ रही है। आप ट्रेनिंग पर गए हुए थे। आप इसकी मदद कीजिए। हाल ही में इसके जवान इकलौते बेटे की संदिग्ध हालत में मौत हो गई है। अब से 15 साल पहले इनके पति की भी मृत्यु हो चुकी है। इनकी बहू इनको खाने-पीने को नहीं देती है। इनको परेशान कर रखा है। बेचारी बहुत दुःखी हैं। अगर बुढ़िया बहू से कुछ मांगती है तो बहू डंडा लेकर मारने को दौड़ती है।”

​बुढ़िया को पास आता देख आयुष सर का हृदय पसीज गया। उन्होंने आदरपूर्वक पूछा-

​”अम्मा जी, सुना है कि आप मुझसे मिलने पहले भी दो बार आ चुके हो। बताओ, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?”

​बुढ़िया रुआंसे स्वर में बोली-
​”बेटा, मेरी पेंशन चालू करवा दे। पहले आती थी, 6 महीने से एक पैसा नहीं आया। किसी ने बंद करवा दी है। एक-एक पैसे से मोहताज हूँ। बहू खाने को नहीं देती। मेरी पेंशन बनवा दे। बड़ी मेहरबानी होगी। मेरा कोई नहीं है। बड़ी आस लेकर तेरे पास आई हूँ। मुझे किसी ने बताया कि मास्टर साहब बहुत भले आदमी हैं। उनकी काफी जान पहचान है। सब उनकी इज्जत करते हैं। इसलिए तुम्हारे पास आई हूँ। मुझ दुखियारी की मदद करोगे तो दुआ लगेगी।”

​आयुष सर ने उसे सांत्वना दी-
​”ठीक है अम्मा। कोशिश करूंगा आपकी पेंशन चालू करवाने की। मेरे एक परिचित सज्जन समाज कल्याण विभाग में है। आज ही उनसे बात करके बताता हूँ कि आखिर पेंशन रुकी क्यों? कोशिश करूंगा कि पुनः चालू हो जाये। आप एक दो दिन में मुझसे पेंशन के बारे में पता कर लेना।”

​उन्होंने अम्मा को स्कूल का मध्यान्ह भोजन खिलाकर विदा किया। बुढ़िया दुआएं देती हुई चली गयी।

​आयुष सर ने अपने परिचित महिपाल जी से बात कर वृद्धा की रुकी हुई पेंशन फिर से शुरू करवा दी। कुछ दिनों बाद वही बुढ़िया अपनी बहू के साथ फिर स्कूल आई। इस बार नजारा बदला हुआ था। बुढ़िया बोली—

​”बेटा, यह मेरी बहू है। मेरे जवान बेटे की मृत्यु हो चुकी है। हमें बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी नसीब होती है। ये ही अब मेरा ध्यान रखती है। इसके चार बच्चे हैं जिसमें सबसे बड़ी लड़की है। शादी लायक हो गई है। मैंने सुना है कि जो लोग 40 से कम उम्र में मर जाते हैं, उनको सरकार से मुआवजा मिलता है। हो सके तो मेरे बेटे की मौत का कुछ मुआवजा मुझे या बहू को मिल जाता तो राहत मिल जाती।

वे रुपये बच्चों के काम आ जाते। बेटी की शादी में मदद मिल जाती। तेरी तो विभाग में अच्छी जान पहचान है। तू ही हमारा काम करवा सकता है। इसलिए इसको लेकर तेरे पास आई हूँ। बेटा, मेरे पास कोई कागज वगैरह भी नहीं है। तुम्हें ही सब कागज, प्रमाण पत्र बनवाने होंगे। जो भी तुम्हारा खर्चा होगा, मैं रुपये मिलने के बाद चुका दूंगी।”

​आयुष सर चकित थे कि जो बहू कल तक डंडा मारती थी, आज वह प्यारी कैसे हो गई? पर उन्होंने परोपकार की भावना से कहा-

​”ठीक है, अम्मा जी। मैं समाज कल्याण विभाग में महिपाल जी से बात करके देखता हूँ कि क्या ऐसी कोई योजना है? क्या क्या कागजात लगेंगे? कितना खर्चा आएगा? वगैरह और फिर आपको बताता हूँ।”

​समाज कल्याण विभाग के महिपाल जी ने आयुष सर को कड़वी सच्चाई बताई-

​”सर, 40000 तक की मदद तो मैं अगले 3 महीने में दिलवा सकता हूँ लेकिन एक बात मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि इस तरह की रकम को पाने के लिए पहले शुरू में अपने पास से कुछ रुपए आपको खर्च करने पड़ेंगे। लोग ऐसे कामों के रुपए दिलाने के लिए 50% तक का ठेका कर लेते हैं।

सर आपको तो पता है कि ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। हर जगह दक्षिणा देनी होती है… मैं एक काम कर सकता हूँ कि जो ₹40000 मैं उनको दिलवाता उनमें से मुझे 50% ना दिलवा के सिर्फ 25 परसेंट ही मतलब ₹10000 ही दिलवा देना। करीब ₹5000 तो मुझे धनराशि ट्रांसफर करवाने के लिए अधिकारियों को देने पड़ेंगे और लगभग इतने ही रुपए उनके सभी कागजात पूरे करवाने में खर्च हो जाएंगे। यह ₹10000 दिलवाने की जिम्मेदारी आपकी होगी।”

​आयुष सर ने बुढ़िया और उसकी बहू को बुलाकर पूरी शर्त बताई। वे तुरंत तैयार हो गईं—
​”हमारे लिए 30000 की रकम भी काफी मदद होगी। अनुदान राशि आते ही हम बैंक से निकाल कर तुम्हें 10000 रुपये दे देंगे। हमारा यह काम करवा दो। हम तुम्हारा एहसान जिंदगी भर नहीं भूलेंगे।”

​आयुष सर ने स्पष्ट किया
​”एहसान वाली कोई बात नहीं है अम्मा जी। इंसान को इंसान के काम आना ही चाहिए। बस जब आपका काम हो जाए तो आप याद से ₹10000 महिपाल जी को जरूर दे देना। वे मेरे विश्वास पर आपका काम करने को तैयार हो गए हैं। मेरी बात खराब नहीं होनी चाहिए।”

​सारे कागजात तैयार हुए और 2 महीने के भीतर 40,000 रुपये बहू के खाते में आ गए। 15 दिन बाद जब महिपाल जी का फोन आया कि रुपये ट्रांसफर हो चुके हैं, तो आयुष सर बुढ़िया के घर पहुँचे

​”अम्मा जी, आपका काम हो गया है। ₹40000 आपके खाते में आ गए हैं। अब आप अपने वायदे के मुताबिक बैंक से ₹10000 निकाल कर महिपाल जी को उनके कागज तैयार करवाने और रिश्वत देकर काम करवाने के उनको दे दीजिए।”

​बुढ़िया ने सफेद झूठ बोला—
​”बेटा, मैं कल ही बैंक गई थी। अभी रुपये नहीं आये हैं।”

​आयुष सर ने पासबुक में एंट्री करवाने को कहा, तो फिर बहाना मिला—
​”पासबुक तो गांव के एक सज्जन को एंट्री के लिए दे रखी है। जैसे ही एंट्री होगी, वह मुझे वापस लाकर दे देंगे।”

​हफ्ता भर बीत गया। जब आयुष सर को यकीन हो गया कि उनकी नीयत खराब हो चुकी है, तब उन्होंने गुस्से में कहा—
​”भलाई का तो जमाना ही नहीं है। एक तो पेंशन बनवाओ, ऊपर से अनुदान दिलवाओ। जहाँ तुम्हारे पास खर्च करने को एक रुपया नहीं था, वहां बिना एक रुपया खर्च करे 40000 आपको मिल गए हैं। आपका दिमाग, नीयत तो खराब होनी है, लालच तो आना है। ये तुम अच्छा नहीं कर रहे हो। मैं महिपाल जी को क्या जवाब दूंगा।”

​तब बुढ़िया ने अपना असली चेहरा दिखाया
​”मास्टर साहब ऐसा है कि यह हमारा काम फ्री में हुआ है। यह हमें पता चल चुका है। यह काम आपने नहीं करवाया है। हमने किसी और से करवाया है। हम आपको रुपए क्यों दें? वैसे भी हमने तो सारे रुपए खेत में समरसेबल लगवाने और चाहरदीवारी करवाने में खर्च कर दिए हैं।”

​आयुष सर बिना कुछ कहे वहाँ से निकल गए। उनके कानों में बुढ़िया के वे पुराने शब्द गूँज रहे थे जब वह गिड़गिड़ाती थी। उन्होंने अपनी साख बचाने के लिए अपनी जेब से 10,000 रुपये महिपाल जी को दिए। रास्ते भर वे बस यही सोचते रहे

​”इंसान तब तक ईमानदार है जब तक उसको बेईमानी का मौका नहीं मिल जाता। अक्सर देखा गया है कि इंसान खुद की जरूरत पर मदद मांगते समय, विनती करते समय कुछ और होता है तथा जब उसका काम निकल जाए तो कुछ और होता है। लोग कहते हैं कि ‘कर भला तो हो भला’, लेकिन कोई यह नहीं जानता कि जिसका वे भला कर रहे हैं, वह भला इंसान नहीं है। हमारा ‘कर भला हो बुरा’ भी हो सकता है।”

“मदद करते समय चेहरा नहीं, चरित्र देखना ज़रूरी है। कभी-कभी हमारी उदारता ही दूसरों की कृतघ्नता (unthankfulness) का आधार बन जाती है। इंसान की असली परीक्षा तब होती है जब उसके पास देने के लिए कुछ हो, माँगने के लिए नहीं। परोपकार करना न छोड़ें, बस अपेक्षा की डोर काट दें, ताकि किसी की बुराई आपकी अच्छाई को न छीन सके।”

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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