छोड़ दो लड़ना | Poem chod do ladna
छोड़ दो लड़ना ( Chod do ladna ) गोलियां पत्थर चले है देखो ऐसे बेपनाह हो गये है नाम पर महजब के दंगे बेपनाह मासूमों के जिस्म पर थे जालिमों के ही नशा दिल्ली की हर गली में दर्द छलका बेपनाह कौन जाने क्या यहाँ होगा भला अब ऐ लोगों घूम रहे…

