यमराज के पत्र शुरू हो गए है

आज सुबह आइने मे जब मै खुद को निहार रहा था अचानक चौक पड़ा.. देखा की बालो में सफेदी कुछ बढ़ सी गयी है.. ओह ये क्या..? यमराज ने पत्र भेजने शुरू कर दिए है।

यमराज का स्मरण मात्र ही रूह को कँपा देने वाला होता है.. मौत के देवता से भला कौन प्यार करता है.. कोई नही.. आप भी नही.. मै भी नही.. यमराज की चिठ्ठी वाली बात मैने एक प्रवचन में सुनी थी.. कहानी का सार यही है की यमराज का कोई साथी या मित्र नही होता है।

धरती पर वह एक वयक्ति से मित्रता का निवेदन करते है मगर साक्षात् मौत के देवता से भला कौन यारी करेंगा..? वह व्यक्ति नकार देता है मगर यमराज जिद करते है तो वह इस शर्त पर राजी होता है की यम कभी उसके प्राण नही हरेंगे।

मगर यमराज की अपनी मजबूरिया होती है और वह कहते है की मारना ही मेरी प्रकति है सो यह बात नही मानी जा सकती मगर हा यह हो सकता है की जब भी मारने आऊंगा उसके पहले पत्र जरूर लिखूंगा.. वह इंसान यम की बात मान उन से मित्रता कर लेता है।

उनकी दोस्ती के ऐसे कई बरस बीत जाते है और एक दिन अचानक यम आ कर उस व्यक्ति का हाथ पकड़ लेते है की चल आज तेरी मौत की तारीख है.. यमराज की बात सुन वह व्यक्ति नाराज होता है की यम ने मौत से पहले चिठ्ठी लिखने का वादा किया था मगर चिठ्ठी नही लिखी।

यह सुन यमराज मुस्कराते है और कहते है मित्र मैने चिठ्ठी लिखने का वादा किया था और मैने चिठ्ठी लिखी भी की मेरा समय हो रहा है.. मै आने वाला हु.. मैने मित्रता का ख्याल करते हुए एक नही अनेक चिठ्ठीया लिखी।

इस पर वह वयक्ति हैरान होता है की उसे तो कोई भी चिठ्ठी नही मिली.. तब यम मन्द मन्द मुस्कराते है और कहते है की उसे सभी चिठ्ठीया मिली है मगर ये अलग बात है की वह उन पत्रो को पढ़ न पाया।

अपनी बातो को और अधिक स्पष्ट करते हुए मौत के देवता यम कहते है की बालो का सफ़ेद होना.. चेहरे पर झुर्रियों का आना.. दांतो का गिरना आदि आदि उनके द्वारा भेजी गयी चिठ्ठीया ही तो थी जिसे की वह समज नही पाया।

कहानी का स्मरण मेरी सोच को अनंत गहराईयो में ले गया.. सर में बढ़ती सफेदी क्या मेरी मौत की पहली चिठ्ठी है..? क्या यम की निगाहो में मै आ चूका हु..? क्या मै अपनी जिंदगी जी चूका हु..?

न जाने कितने सवाल मेरे दायें बायें मंडरा रहे है.. मैने और भी अधिक गौर से देखा.. चेहरे पर सलवटों का दौर शुरू होने की कगार पर है.. पास की निगाहे भी कमजोर हो रही है और चश्मे का दामन थामने की नौबत आन पड़ी है.. लगातार यमराज मुझे पत्र भेज रहे है और मै बेखबर न जाने किन मस्तियों में खोया हु।

बढ़ती उम्र का ख्याल तो मुझे तभी आ जाना चाहिए था जब मै लोगो के सम्बोधन में बेटा से भैय्या और भैय्या से अंकल बनने लगा था. बढ़ती उम्र मुझे सम्मान देती है और लोग बाग़ के नजरिये में तू से आप होने लगा हु. उस दिन जब राह चलती एक सुंदर बाला ने मुझ से पूछा ” अंकल कितना बजा है..? ”

तो मै जल भून कर राख हो गया.. वो स्पष्ट रूप से जता रही थी की मै प्रौढ़ अवस्था को प्राप्त कर रहा हु और मेरी तीस वर्षीय मानसिक उम्र इस बात को धता बता रही थी और चाह रही थी की मै चिर काल का युवा हु. मानव जीवन के ये कैसे अदभुत् रूप है.. जो है उसे स्वीकार नही करता.. जो नही है वही दिखाने की जद्दोज़हद करता है।

आधी रात जब घीर आयी तो मन फिर बेचेंन होने लगा.. न जाने किन गहराईयो में उतरने लगा.. लगा यमराज पास में खड़े है और मुस्कराते हुए बोल रहे है क्या सोच रहे हो वत्स.. तिन चिट्ठी तुम्हे भी भेज चूका हु।

मैने यम से निगाहे फिरा ली.. यम के पत्र मेरी बेचैनी को बढ़ा रहे है.. मै सोच में पड़ गया अब और कौन सी चिठ्ठी बाकि है यमराज की.. मैं फिर आईने के सामने खड़ा हो गया.. दाँत अभी सलामत है.. तो क्या दांत गिरेंगे.. मुह पोपला हो जायेंगा..? और क्या क्या होंगा मेरे साथ..?

जीवन के ये अनोखे रंग न जाने कितने सवाल खड़े करते है.. न जाने कितने सवालो के खुद ब खुद जवाब देते है.. इंसान के अपने बस में कुछ नही है.. न जन्म लेना और न ही मरना.. सब कुदरत के अधीन है.. और कुदरत निष्ठुर है.. वह अपने स्वरूप को प्रदर्शित कर के ही रहती है।

मुझे भी बुढा होना ही है.. और यमराज को भा गया तो समय से पहले यहाँ से बिदाई भी तय है.. समय से पहले महेंद्र भाई भी चले गए.. समय से पहले बड़े पापा श्री चम्पालाल जी भी चले गए.. उन्हें कोई पत्र नही मिला.. कोई संकेत नही दिए गए.. मगर मुझे पत्र मिल रहे है और मै वह पत्र पढ़ भी रहा हु।

इन पत्रो की भाषा नीरस है.. कठोर है.. निर्मम है.. मगर है सत्य.. पूर्ण सत्य.. अधूरे इंसान को पूरा करने वाले इन पत्रो को नजर अंदाज करना ठीक नही है.. जीवन को अर्ध सत्य मानने वाले लोग इन पत्रो की तह में जा कर तो जीवन का पूर्ण सत्य पा सकते है।

मै भी खुद को खंगाल रहा हु.. शायद कुछ निकल पड़े.. कुछ ऐसा जो की मैने संजो रखा हो.. कुछ ऐसा जो की अनपेक्षित हो.. कुछ बढ़िया बढ़िया सा.. कुछ सागर मन्थन में अमृत सा.. अनेक अनेक धन्यवाद.

रमेश तोरावत जैन
अकोला

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