Kavita Prem Palega Jab Antas mein

प्रेम पलेगा जब अंतस में | Kavita Prem Palega Jab Antas mein

प्रेम पलेगा जब अंतस में

( Prem palega jab antas mein )

 

प्रेम पलेगा जब अंतस में,पीड़ा बारंबार मिलेगी

निज स्वार्थ अस्ताचल बिंदु,
समता भाव सरित प्रवाह ।
त्याग समर्पण उरस्थ प्रभा,
स्पृहा मिलन दर्शन अथाह ।
पग पग कंटक शूल चुभन,
पर मुखमंडल मुस्कान खिलेगी ।
प्रेम पलेगा जब अंतस में, पीड़ा बारंबार मिलेगी ।।

उच्च निम्न विभेद विलोपन,
दृष्टि आरेखित प्रियेशी छवि ।
विरोध कटाक्ष अपमान सर्वत्र,
सहन अनुपमा सदृश रवि ।
वृहत्त रूप जनमानस प्रश्न,
पर उत्तर बन नीरव चलेगी ।
प्रेम पलेगा जब अंतस में,पीड़ा बारंबार मिलेगी ।।

विष अंतर सुधा स्पंदन,
लोक हित अग्नि परीक्षा ।
नेह अमिय धार अनंत,
प्रियल चाह नैतिक अभिरक्षा ।
आलोकित कर पर जीवन,
बाती बन दिन रात जलेगी ।
प्रेम पलेगा जब अंतस में ,पीड़ा बारंबार मिलेगी ।।

संघर्ष बाधा पथ पर्याय,
संदेह चरित्र हाव भाव।
परंपरा मर्यादा प्रतिकूल बिंब,
परिवार समाज व्यंग्य घाव ।
शब्द स्वर द्विअर्थ अभिव्यंजना ,
कायिक दमन वासनाएं मचलेगी ।
प्रेम पलेगा जब अंतस में,पीड़ा बारंबार मिलेगी ।।

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

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