बिजलियां | Bijliyan

बिजलियां

( Bijliyan )

किस क़दर रक़्स़ां हैं हाय बहरो-बर में बिजलियां।
ख़ौफ़ बरपा कर रही हैं दिल-जिगर में बिजलियां।

जिनकी हैबत से लरज़ता है बदन कोहसार का।
बन्द हैं ऐसी तो मेरे ख़स के घर में बिजलियां।

या ख़ुदा मेह़फ़ूज़ रखना , आशियाने को मिरे।
वो गिराते फिर रहे हैं शहर भर में बिजलियां।

क्या डरेंगे हम तिरी बर्क़-ए-ख़िराम-ए-नाज़ से।
सैंकड़ों फिरती हैं ऐसी तो नगर में बिजलियां।

भूलकर भी मुफ़लिसों को मत सताया कीजिए।
खेलती रहती हैं इनकी चश्म-ए-तर में बिजलियां।

जो ठिठक जाते हैं जुगनू की चमक को देख कर।
उनको आती हैं नज़र हर रहगुज़र में बिजलियां।

इक नज़र ही देखना उसका क़यामत है फ़राज़।
मिलयनों हैं क़ैद उस की इक नज़र में बिजलियां।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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