उनके होंठों पे थी हंसी कल शब

उनके होंठों पे थी हंसी कल शब

उनके होंठों पे थी हंसी कल शब

उनके होंठों पे थी हंसी कल शब।
रोशनी सी थी तीरगी कल शब।

चांद उतरा था अपने आंगन में।
हम पे बरसी थी चांदनी कल शब।

कुछ क़दम भी हमारे बहके थे।
कुछ हवा भी थी मधभरी कल शब।

जो भी कहना था कह दिया उनसे।
आ गई काम मयकशी कल शब।

मेरे सिरहाने कोई बैठा था।
दूर थी दिल से बेकली कल शब।

दाद देते न लोग थकते थे।
हमने की ऐसी शायरी कल शब।

हाय कैसे फ़राज़ बतलाएं।
हम पे तारी थी जो ग़शी कल शब।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • चलन में है अब | Chalan mein

    चलन में है अब ( Chalan mein hain ab )   सीने को खोलने का फैशन चलन में है अब और गाली बोलने का फैशन चलन में है अब देखो ज़रा संभल के तुम बात कोई बोलो कम करके तोलने का फैशन चलन में है अब ये दूध जैसी रंगत आई नहीं है यूं ही…

  • अब हम | Ghazal Ab Hum

    अब हम ( Ab Hum ) पहले अपनी इ़नान देखेंगे। फिर जहाँ का गुमान देखेंगे। सीख लें ढंग जंग के फिर हम। सबके तीर-ओ-कमान देखेंगे। पर हमारे तराशने वालो। हम तुम्हारी उड़ान देखेंगे। यह करिशमा दिखाएंगे अब हम। सर झुका कर जहान देखेंगे। हम तो कुछ कर नहीं सके लेकिन। अब तुम्हारा ज़मान देखेंगे। रंग…

  • वो नहीं | Ghazal Wo Nahi

    वो नहीं ( Wo Nahi ) ये असल है वो नहीं ये नकल है वो नहीं घास वो गेहूं है ये ये फ़सल है वो नहीं आदमी दोनों हैं पर ये सरल है वो नहीं फर्क दोनों में है क्या ये तरल है वो नहीं फूल हैं दोनों “कुमार” ये कमल है वो नहीं कुमार…

  • तेरे बग़ैर | Tere Bagair

    तेरे बग़ैर ( Tere Bagair ) वीरां यह गुलज़ार है तेरे बग़ैरकरना यह स्वीकार है तेरे बग़ैर हर नफ़स यह कह रही है चीख करज़िन्दगी बेकार है तेरे बग़ैर तेरी यह जागीर लावारिस पड़ीकौन अब मुख़्तार है तेरे बग़ैर मैं मदद को हाथ फैलाऊं कहाँसबके लब इनकार है तेरे बग़ैर क्या सजाऊं जाम पैमाने बताकिसको…

  • कोई शिकवा शिकायत ही नहीं | Shikwa Shikayat

    कोई शिकवा शिकायत ही नहीं ( Koi shikwa shikayat hi nahi )   کوئی شکوہ شکایت ہی نہیں ہے مجھے تم سے عداوت ہی نہیں ہے कोई शिक्वा शिकायत ही नहीं है मुझे तुम से अदावत ही नहीं है تمہارے بعد میں اۓ جان جاناں کسی سے اب محبت ہی نہیں ہے तुम्हारे बाद में…

  • गमज़दा दिल | Ghamzada Shayari

    गमज़दा दिल ( Ghamzada dil )    फूल शबनम छोड़ कर कुछ और ही मौज़ू रहे अब सुखन में भी ज़रा मिट्टी की कुछ खुशबू रहे। हो चुकी बातें बहुत महबूब की बाबत यहां ज़िक़्र उनका भी करें जो मुल्क़ का बाज़ू रहे। गमज़दा दिल कर सकूं आज़ाद ग़म की क़ैद से काश मेरे पास…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *