सुमंगला सुमन की ग़ज़लें | Sumangla Suman Poetry
न कोई सफ़र, न किनारा मिला
न कोई सफ़र, न किनारा मिला
हमें डूबने का इशारा मिला
हवा साथ थी, फिर भी ठहरे रहे
मुहब्बत में ना कुछ सहारा मिला
कभी ख़्वाब लहरों पे लिखते रहे
लिखा जो नहीं था, दुबारा मिला
हमें ख़ार समझा था फूलों ने जब
फ़िज़ा से वही फिर इशारा मिला
भटकती रही कश्ती दरिया में यूँ
सुकूँ से मगर न किनारा मिला
‘सुमन’ तैरती रह गई गर्दिशों में
उसे बस खुदा का सहारा मिला
तख़्त वालों को न अब कोई शराफ़त चाहिये
तख़्त वालों को न अब कोई शराफ़त चाहिये
सिर्फ़ चेहरों पर सजी झूठी सियासत चाहिये
भीड़ सच बोले तो क़ातिल की तरह देखी गई
अब अदालत से नहीं उनकी इजाज़त चाहिये
खून बिकता है यहाँ नारे लगाकर हर गली
और सबको बस वफ़ा की इक सियासत चाहिये
आजकल हर शख़्स अपनी ही दौलत में मगन
रिश्तों में अब कोई आदत की हिफ़ाज़त चाहिये
अब कहाँ महफूज है कोई भी सच के दौर में
लफ़्ज़ की भी अब उसे पूरी हिफ़ाज़त चाहिये
बात सच्ची हो अगर, तो मार डाली जायेगी
इस जहां को बस दिखावे की इनायत चाहिये
गर किसी महफ़िल में बोलेगी ‘सुमन’ तो लोगों से
तालियों के साथ महफ़िल में मुहब्बत चाहिए
रात को चाँद भी फिर शरमाया
हुस्न जब तुमने मुझे दिखलाया
रात को चाँद भी फिर शरमाया
मुझको तो प्यार हुआ है तुमसे
जाने क्यों तुमसे नहीं बतलाया
कल जो तुम रो रही थी रातों में
सुबह ठण्डी हवा ने बतलाया
ज़िन्दगी में न था कोई तुझ बिन
प्रेम धोखा है ये भी झुठलाया
मन की हर बात कहूँ मैं तुझसे
तू हमेशा से मेरा हमसाया
हल्की बारिश में चलो भीगें हम
देखो रिमझिम का महीना आया
देखो तो प्यार सुमन ये तेरा
दूसरा जन्म जो लेकर आया
दिल में गुल खिल गए
प्यार उनसे किया दिल में गुल खिल गए
ख़ुशबुओं की तरह वो हमें मिल गए
जैसे भी हैं सनम वो बड़े अच्छे हैं
पर कहें कैसे मेरे तो लब सिल गए
छा गई बज़्म में ऐसे उनकी ग़ज़ल
सुनते ही उनके शब्दों को सब हिल गए
मुस्तक़िल थे भुलाने पे मुझको मगर
देखते ही मुझे फूल से खिल गए
आज अहदे वफा कर लो तुम मुझसे तो
समझूँगी पास आ मेरे साहिल गए
कस्म खा ईश की ए मेरे जानेजाँ
तेरी पीड़ा में हो हम भी शामिल गए
दूर जाते ही तुमसे ए जाने जिगर
हो सुमन सारे पल मेरे मुश्किल गए
ज़िन्दगी जिससे थी रोशन
ज़िन्दगी जिससे थी रोशन,वो शमा ही तो नहीं
जब जुनून-ए-होश आया, कुछ बचा ही तो नहीं
आँख उससे क्या मिली, साँसें बढ़ीं शामो-सहर,
बेख़ुदी में ढूंढ़ती नज़रें फिर मिला ही तो नहीं
आरज़ू के फूल महके, चाँदनी की गोद में,
पर हवाओं की सियाही, का सिला ही तो नहीं।
ज़ख़्म के गहरे समंदर में डुबो दीं आहटें,
सिलसिला बातों का उनसे फिर रुका ही तो नहीं
हसरतें थीं आईने में अक्स अपना देख लें,
पर मिलन के बाद उससे ये हुआ ही तो नहीं।
अब सदाएँ गूँजती हैं साथ मेरे दरमियाँ,
जिसको सुनना था मगर उसने सुना ही तो नहीं
छो़ड़ दी है दर्द की नग़री ‘सुमन’ ये सोचकर
के मुहब्बत में सनम अब कुछ बचा ही तो नहीं
बचपन की होली: वो रंग, वो उमंग
गली-गली में मस्ती का आलम,
होली के रंगों से महका हर मौसम।
खूब मलमल कर गुलाल लगाना,
रंग भरी बाल्टी किसी पे गिराना।
छत से छुपकर नीचे रंग उड़ाना,
और फिर भागकर खुद को बचाना।
पिचकारी की धार थी जैसे बाण,
जिस पर चले, बचने का न नाम।
मुँह लाल-नीला, कपड़े बदरंग,
पर दिल में उमंग का गूंजता संग।
गुझिया की खुशबू, ठंडाई का स्वाद,
होली में सब कुछ था खास और नवाज़।
मोहल्ले के शैतान थे तैयार,
जिसको पकड़ें, उसे रंग में डाल।
कोई छुपा छत पे, कोई गली के पार,
पर होली से बचना था बेकार।
बचने की कोशिश बेअसर रही,
क्योंकि टोली रंगों की बेशरम रही।
दादी की हिदायत थी सुबह से सख़्त,
“शाम से पहले आना घर वक्त!”
पर दोस्तों की टोली ने ली थी कसम,
आज रंगेंगे सबको, चाहे कुछ भी हो सनम।
रंगों में भीगा वो प्यारा दिन,
बचपन की होली, वही साजन-बिन।
अब न वैसा हुड़दंग, न वो शोर,
बचपन की होली थी सबसे जोर।
रंग आज भी हैं, मिठास भी वही,
पर वो नटखट सी मुस्कान नहीं।
काश वो दिन फिर लौट के आए,
बचपन की होली फिर रंग जमाए!
होली: रंगों का अलौकिक उत्सव
फागुन की बाँहों में मदमस्त बयार,
धरा ने सँवारी सतरंगी साज।
गगन झूमता है, धरा गा रही,
बसंती हवाएँ गुलाल उड़ा रही।
टेसू के फूलों ने केसर बिखेरा,
हर देहरी पर रंगों का सवेरा।
गुलालों की खुशबू, अबीरों की धार,
भीगती साँझ, महकता भोर का प्यार।
बांसुरी की तानों में घुली राधा राग,
होली में छलके प्रेम का अनुराग।
चंग की थापों पे थिरके गगन,
धरती भी झूमे, नाचे हर आंगन।
मिटे द्वेष-कलुष, पावन हो मन,
होली का संदेश – प्रेम का संग।
गुंजार करे मन, पवन भी सुहानी,
रंगों में घुली हर शब्दों की बानी।
गुझिया की मिठास, ठंडाई का स्वाद,
मधुर हो सुर, हर गीत में नाद।
न कोई पराया, न ऊँच, न नीच,
होली सिखाए, प्रेम हो सबसे प्राचीन।
भीगे तरुवर, भीगे गलियारे,
रंगीन हो जाएं मन के द्वारे।
कान्हा की मुरली, ग्वालों की टोली,
बरसे निखर कर प्रेम की होली।
प्रकृति ने पहनी चूनर सुहानी,
बिखरी हवाओं में स्नेह की रवानी।
रंगों में डूबी ये सारी कायनात,
सजग हो दिल, पुलकित हर बात।
होली का अर्थ यही कहता,
रंग प्रेम का सृष्टि में बहता।
मेरी दुनियां ग़म में डुबाई गई है
मेरी दुनियां ग़म में डुबाई गई है
गमों की दवा बस पिलाई गई है
थी उल्फ़त ही उल्फ़त मेरी ओर से पर
उधर सिर्फ नफ़रत निभाई गई है
ज़माने में उसको जी क्यों ढूंढ़ते हो
तेरी रूह में वो जो पाई गई है
रुलाते हो मुझको बहुत बेरुखी ये
मुहब्बत में क्यूँ कर मिलाई गई है
न जलती न बुझती हूँ उनकी तरफ़ से
अगन कैसी हय ये लगाई गई है
बताओ मुझे प्यार में किसलिए ये
सज़ा-ए-जुदाई सुनाई गई है
सुमी देख ले ये वही ताज है जी
जहाँ क़ब्र तेरी बनाई गई है
न कोई सफ़र, न किनारा मिला
न कोई सफ़र, न किनारा मिला
हमें डूबने का इशारा मिला
हवा संग थी, फिर भी ठहरे रहे
मुहब्बत में ना कुछ सहारा मिला
कभी ख़्वाब लहरों पे लिखते रहे
लिखा जो नहीं वो दुबारा मिला
हमें ख़ार समझा था फूलों ने तो
फ़िज़ा से हमें ये इशारा मिला
भटकती रही कश्ती दरिया में यूँ
सुकूँ से मगर न किनारा मिला
फ़क़त खत ही सही
तू न आया तो, फ़क़त खत ही सही
सिर्फ़ इतनी सी मुहब्बत ही सही
याद करते हो सदा मुझको सनम
आरज़ू में ये इबादत ही सही
मान ली हर वक्त तेरा साथ पर
कर नज़र इक तो इनायत ही सही
ख़्वाब में आते रहो गे तो मुझे
वस्ल हसरत में बगावत ही सही
उम्र भर तक तो सहे दौरे भरम
अब सुमन लगती हिकारत ही सही
बसंत पंचमी
सूरज ने खोली निज आँखें
और प्रकृति ने ली अंगड़ाई।
अनुभूति हुई कुछ ऐसे,
जैसे नई नवेली दुल्हन आई।।
हो गई प्रफुल्लित धरा आज,
है सभी स्तबक खिले खिले ।
मानव भी है स्नेहसिक्त,
मुस्कुरा रहे सब गले मिले।।
फाग माह की आभा न्यारी,
शोभा भी है कान्तिमयी ।
दृष्टि नहीं हट पाती किंचित,
देख धरा को शांतिमयी।।
नवपल्लव नव कोपल फूटीं,
खिल गई वृक्ष की हर डाली।
उड़ती पतंग सी नव मंडलों में,
आई ऋतु रानी मतवाली।।
धारण कर पीली साड़ी,
खेतों में सरसों इतराई।
श्रृंगार पूर्ण धरती माता भी,
मन ही मन कितनी हर्षाई।।
सोलह श्रृंगार से सजी क्यारियाँ,
भौरें मतवाले होकर रस पीते।
डाल डाल पर चहके चिड़ियाँ,
वन उपवन आनंद जीते।।
मादक सुगंध ले पवन बह रहा,
कोकिला छोड़ती मधुर तान।
अंतहीन सुख सदा रहे यह,
प्रेम पूर्ण सबका सम्मान ।।

सुमंगला सुमन
मुम्बई
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