डॉ. चंद्रेश कुमार छ्तलानी की कविताएं | Dr. Chandresh Kumar Chhatlani Poetry
जेब में
रिश्तों को
वो सिक्कों-सा जेब में रखता था,
सोचता – यही सही जगह है,
ज़रूरत पड़ी तो निकाल लो, वरना पड़े रहें यहीं।
और आया एक वक़्त,
किस्मत ने जेब उधेड़ दी।
जो कुछ भी था,
सारा निकल कर गिर गया –
सड़क पर।
रुपए तो राहगीरों ने समेट लिए,
मगर रिश्ते…
दूसरों की ठोकरों के धूल-धक्कड़ में,
बिखरते रहे,
किसी ने न उठाए।
उसने तब जाना –
काश! ये रिश्ते
जेब में नहीं,
दिल में रखे होते।
अब जेब भी खाली है,
और दिल भी…
सन्नाटे का वज़न
सबसे भारी हो गया है।
भावशून्य
जब हृदय भेदते सर्जन को,
कोई सुंदर कहता है।
जब रोते का चित्र देख कर,
कोई दुःखी न होता है।
जब पीड़ा को शृंगार समझ,
सिर हिला के हँसते हैं।
जब क्रंदन की गाथा पे,
लोग प्रशंसा करते हैं।
आँसू भी रंगों में ढलकर,
हैं सौंदर्य कहे जाते।
और हृदयहीन दृष्टिवान,
वेदना में सुख हैं पाते।
तब सोचें, ऐसा मन लेकर,
कौन मनुष्य कहलाता है?
भावशून्य, नयन पत्थर से,
क्या मानव बन जाता है?
दिशाएं
भाषा बनी थी संवाद के लिए,
हमने विवादों को तरजीह दे दी।
समाज बना था, आज को सम बनाने के लिए,
हमने भेदभावों की विषमता को गले लगा लिया।
घर बने थे, परिवार बसाने को,
हमने दीवारों को खड़ी कर दिया।
विज्ञान था विकास के लिए हमारे,
हमने ही उसे विनाश की ओर मोड़ दिया।
धर्म थे आंतरिक शुद्धि के लिए,
हमने उनमें भी बुद्धि मिला दी।
जो एक थे इक पुल बनाने को,
इक दूजे को ही खाई में ढकेल दिया।
प्रेम बनाया था प्रकृति ने, मन के जीवन सा,
हमने शरीर के मिलन तक सीमित कर दिया।
हर डोर में इक गांठ लगी है।
जोड़े रखेगी हमें उस दिन तक,
जब तक गांठ है।
और, उसके बाद…
दिशाहीन रह गए हम,
इक नई दिशा में चले जाएंगे,
जो नियति ने नियत कर रखी है।
और,
जब हम ही नहीं होंगे,
तो गांठ कैसी?
किताब
कुछ पन्ने शिकायतों के
फट कर जाने कहां खो गए।
कुछ नखरों के अल्फाजों पर,
स्याही है बिखरी हुई।
नफरत के पन्नों में,
अक्षर मिल गए एक-दूसरे से,
अब पढ़ने में नहीं आते।
प्यार के पन्ने,
हमेशा से कोरे ही हैं।
दूसरों की बातों पर हामी भरते
पन्ने अब भी फड़फड़ा रहे हैं।
और शायद ऐसे ही,
फटी हुई जिल्द की ज़िंदगी की किताब,
यूं ही बंद हो जाती है।
रखी रह जाती है,
जहां न शेल्फ है, ना लाइब्रेरी।
भला फिर क्या होता होगा?
जो कहते हैं,
“मैं घर के काम क्यों करूं?
क्या मैं कोई नौकर हूँ?”
उन्हें क्या मालूम
घर की असली रचना ही पसीने से होती है।
मकान की बात और है।
जो समझते हैं,
“हम तो बस कमाने वाले हैं, दूसरों को दिलाने वाले हैं,
कहां खुद पर खर्च कर पाते हैं?”
उन्हें कौन समझाए
कि घरवालों पर खर्च करना,
घर को संवारने की तरह है।
मकान की बात और है।
वो रोटियाँ जो भूख लगने के वक्त सिकती हैं,
उनके खाने का स्वाद, घर के बाहर नहीं मिलता।
वे कपड़े जो धूप में महकते हैं,
उन्हें पहन कर घर का दिल भी खुश रहता है।
मकान की बात और है।
क्योंकि, ये काम नौकर भी करते है,
करते हैं कहीं घरवाले भी,
लेकिन, जिन्हें लगते ये भारी हैं,
उन्हें कहें कि यह,
ममता और जिम्मेदारी हैं।
इसी से घर बनता है।
मकान की बात और है।
और ऐसे मकान वाले,
बच्चों की मुस्कान में
साफ़ चादर की सुकून-भरी महक
महसूस नहीं कर सकते।
जो समझते हैं घर के काम नौकर की तरह,
वे दीवारें खड़ी कर देते हैं,
और उन घरों में सुकून नहीं बसता।
और, मकान की बात तो और है ही।
सच कहूँ,
घर की मिट्टी से जुड़ना है ज़रूरी,
उल्टी चप्पलें सीधी करने वाला,
बिना कहे कूड़ा डालने वाला,
वो ही जानता है कि
घर सिर्फ़ ईंटों से नहीं, अपनेपन से बनता है।
घर के कोने में, घर आत्मा बसती है।
जो उसे ना पहचाने,
उसके घर का फिर भला क्या होता होगा…?
“बस यूं ही “
बस यूं ही एक पिता
अपने बच्चों की तस्वीर ले के
बहल जाता है…
बस यूं ही एक पिता
उनकी गलती पे डांट के
खुद नहीं रोता…
बस यूं ही एक पिता
इंतजार नहीं करता
खुदके किसी दिवस का…
बस यूं ही एक पिता
अपनी मनपसन्द आइसक्रीम
कभी नहीं खाता…
बस यूं ही एक पिता
हँसता है शाम को बच्चों के साथ
दिन भर की दुर्दशा के बाद भी….
बस यूं ही एक पिता
शहर के बाहर जाकर भी
कहीं घूमता-फिरता नहीं अकेले….
बस यूं ही एक पिता
कमतर रहकर भी तुलना नहीं करता
पितृत्व की माँ की ममता के साथ…
बस यूं ही एक पिता
लड़ लेता है अकेले पूरी दुनिया से
कई बार हो जाता है अकेला घर पे भी…
बस यूं ही एक पिता
पी लेता है शराब की आधी बोतल
अपने अकेलेपन से बोर होकर
बस यूं ही एक पिता
कहता नहीं कभी अपने मन की बात
कमजोर साबित नहीं होना चाहता
बस यूं ही एक पिता
पिसता है बहुत सी चक्कियों के बीच
खुद को बेहतर बनाने के लिए
बस यूं ही एक पिता
पता नहीं क्या-क्या कर गुजरता है
यह कहते हुए “बस यूं ही…”
कैसे?
प्रेम हो जाता है मौन,
जब अपना हो जाता है कौन।
जहाँ पहले शब्द होते थे – रह जाती श्वास है – शव आस है।
त्रिभुज के ऊपरी कोण पर ऊंचा खड़ा स्नेह,
धीरे-धीरे फिसलता है
निचले कोण तक,
आधार ठंडा है,
पर अस्तित्व कुछ तो है – कुछ भी है।
वक़्त के साथ मन का तापमान
बदलता रहता है,
कभी धूप-सा गर्म,
तो कभी बर्फ सा चुप।
सच में,
प्रेम से खामोशी तक
और खामोशी से क्रोध तक –
एक लंबी यात्रा है –
अदृश्य, अस्फुट,
शायद हर रिश्ते में लिखी हुई।
और यह,
तब तक चलता है,
जब तक खुद अपनी राख में हम समाधि न पा ले।
क्योंकि,
शव – न प्रेम करता है, न क्रोध।
यह स्पंदन, यह टूटन,
मौन की चीख,
इस प्रश्नचिन्ह पर रुक जाती है,
कि देह के भीतर कैसे गूंजता रहता था,
वह अधूरापन?
“तब हम क्या करें?”
कोई कह दे कि वक्त तुम नहीं देते,
जबकि वक्त उसके साथ नहीं, उसके लिए ही खर्च किया हो,
फिर भी वो इल्ज़ाम दे कि दूरियां हमने रची हैं,
तब हम क्या करें?
कोई हमारे दर्द को “ड्रामा” कह दे,
जबकि घाव भरे हों असली खून से,
फिर भी वो कहे, “तुम दुख के एक्टर हो,”
तब हम क्या करें?
जब बार-बार कोई फोन काटते रहें,
तुम्हारी आवाज़ से भागे वो,
और तुम इक फोन ना उठाओ तो मुंह फुला दे,
जब इंतज़ार हमारी ज़िम्मेदारी हो,
और उनका इंतज़ार ना होना भी,
तब हम क्या करें?
तब हम क्या करें?
बस इतना करें
चुपचाप अपनी घड़ी देखो,
और बिना शोर किए उस वक्त को अपने हाथों में ले लो,
जो अभी भी तुम्हारा है।
अपने दर्द को एक कविता बना लो,
जिसे सिर्फ वही समझेगा जिसने कभी दर्द देखा हो।
अपने फोन को एक आईने की तरह कर लो,
और उसमें देखकर पूछो – “क्या मैं भी किसी का वक्त, किसी की बात,
इसी तरह काटता हूँ?”
शायद…
खुद से मिलने निकल पड़ें एक दो कदम,
उन रास्तों पर जो अब तक सिर्फ दूसरों के लिए चले।
शायद…
जो बचे हैं दिल के कोने,
वहां खुद के लिए एक दीपक तो जले।
क्योंकि यह सच है,
कुछ लोग रहेंगे तुम्हारे अंधेरे की तरह,
जिनके लिए तुमने उजाला चुना है।
लेकिन फिर भी तुम,
उजाला देते रहो,
देने से यह उजाला नहीं घटेगा।
और तुम्हें भी इक दिन मिलेगा –
यही उजाला,
सब्र रखो।
स्वयम हूँ स्वयम से दूर
मैं अपूर्ण हूँ,
फिर भी मैं केवल मैं ही हूँ।
स्वयम की स्वीकृति की साथ हूँ,
लेकिन अपर्याप्त हूँ।
मैं जानता हूँ कि वो निर्विकार मुझमे समाहित है,
लेकिन मैं भावबद्ध हूँ।
सृष्टि के सृजन की शक्ति के साथ,
मैं अलौकिक का स्वामी हूँ।
फिर भी रक्त का हर कण,
मुझे शुद्ध करना होता है।
मुझे काटना दिव्यता के लिए असंभव है,
किसी और आवश्यकता नहीं है।
संचय की प्रवृत्ति के साथ,
मैं प्रचुर कैसे हूँ, विचार निःशब्द हैं।
मैं सभी आनंद का स्त्रोत हूँ,
हर विकार से हर क्षण परे हूँ।
लेकिन ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को
सुख दुःख में परिवर्तित कर देता हूँ।
मैं कभी भी दर्पण में अपने आप को नहीं देख पाता हूँ,
स्वयम को पाना ही मोक्ष है,
स्वयम से क्यों दूर चला जाता हूँ?
नफरत
दीवारें नफरत के घरोंदों की
अक्सर बनी होती हैं
उन शब्दों की ईंटों से
जो पकने से पहले ही गिर जाती हैं
किसी की उम्मीदों के बहते पानी में।
उछलती हुई बूँदें जब बिखर जाती हैं
नाकामयाबी की सड़क पे
और मिल के मिट्टी से तब्दील हो जाती हैं कीचड़ में।
विक्षिप्त दिमाग सी कीचड़ मिलकर अधपकी ईंट से
बना देती है नफरत के पक्के घर।
सुनो, तुम जब भी जाओ वहां साथ ले जाना
बर्फ सा ठंडा दिमाग,
क्योंकि वो ईंटें आज भी गर्म हैं।
और ले जाना एक साफ़ आईना,
ताकि तुम्हें याद रहे तुम्हारा अपना अक्स।
हाँ! मत भूलना अपने गुलाब से दिल को,
वहां की बू तुम सह नहीं पाओगे।
और क्या याद दिलाऊं?
कि छोड़ देना यहीं पे दीवारों को तोड़ने का सामान,
टूटकर पक जाती हैं ये कच्ची दीवारें।
बस! तुम चले जाना…
खड़े हो जाना… उन्हें देखना…
और पुकारना उम्मीद के पानी को…
देखना! ढह जायेगा नफरत का पूरा घर,
बह जायेगा उसी पानी में।
तुम देखना… देखोगे ना!
कुछ तो
मील का पत्थर चाहे ना बन पाएं,
रास्ते में इक निशाँ तो अपना भी हो।
पूरा कर पाएं, ना कर पाएं,
हो छोटा सा, पर इक सपना भी हो।
मंज़िलों पे नाम खुदा किसी और का सही,
सफ़र में साथ औ’ हाथ अपना भी हो कहीं।
कदमों के बढ़ने पे तालियाँ ना बजें,
खामोशी है अपनी हौसलों संग बही।
कोई सड़क हमारे नाम पे ना हो चाहे,
हम वहां चलें जहां डर से थे लोग ठिठके।
ये वक्त भले ही किसी और का कहलाए,
हम चट्टानों से लड़ें, मुट्ठियां ना झिझके।
न हो सूरज हमारे हाथ में,
दिया जलाने को एक बाती हमारी हो।
सीधे सफर में जीवन ना कटे चाहे,
किसी मोड़ पे हमारा मन ना भारी हो।
जो बन ना सके कहानी किसी किताब की,
लेकिन इक वाक्य तो अपना छोड़ कर जाएं।
दुनिया डरती है जिस मौत से,
देख के उसको हम ज़रा सा मुस्कुराएं।
डैड तुम कितने अजीब हो!
जाग कर अल-सुबह जाने क्या-क्या सुनते रहते हो?
कहते हो मिलेगी संगीत से एनर्जी पॉज़िटिव!
लेकिन खुद की बुढ़ाती शक्ल भी आईने में क्या ढंग से देख पाते हो?
डैड तुम कितने अजीब हो!
काम पे जाते वक्त,
कभी वॉलेट तो कभी घड़ी भूल जाते हो!
लेकिन जाने कैसे वक्त पर हर सामान ले आते हो?
डैड तुम कितने अजीब हो!
साथ तुम्हारे बहसों के बाद
माँ और मैं आँसू बहा लेते हैं।
तुम तुम्हारे आँसू पता नहीं कहाँ रख आते हो?
डैड तुम कितने अजीब हो!
माँ तो ईश्वर है मैं जानूं,
तुम्हें छाया देता इक बरगद सा ही मानूं।
लेकिन तुम अपनी जड़ें कहाँ छिपा जाते हो?
डैड तुम कितने अजीब हो!
कभी शाम को – कभी रात को आते हो,
देर करने पे हमारी चिंतित डांट भी खाते हो।
तब थकान छिपाने वाला सांता का चेहरा कहाँ से लाते हो?
डैड तुम कितने अजीब हो!
तू मृत्यु!
विज्ञान कहता है,
तू श्वास का थमना है,
हृदय का अंतिम स्पंदन है,
न्यूरॉन्स के तार का टूट जाना है तू।
कहलाती है पहले तो क्लीनिकल मृत्यु, फिर जैविक विघटन,
जैसे परखनली में बुझता कोई प्रयोग हो।
उधर दर्शन फुसफुसाता है,
तू तो जीवन के पार का पुल है,
कहीं मोक्ष है, कहीं पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक का द्वार भी…
शरीर की चेतना, आत्मा का चोले से बाहर आना है मृत्यु।
कुछ इस तरह जैसे नदी समुद्र में खो जाए,
पानी में पानी मिला, पानी मिटा-पानी रहा!
लेकिन, मन की गुफाओं में तो,
तू भय बनकर घूमती है,
“थैनेटोफोबिया” का छद्म नाम,
जो सभ्यताओं में स्थापित करता है,
समाधि, कब्रें, प्रेम का इतिहास, नफरत का भी…
कुल मिलाकर तू ही तो जीवन को गहराई देती है।
और कहीं पन्नों में फड़फड़ाती, कविता कहती है,
तू रात का अंतिम पंख है,
जो सूरज को जन्म देता है।
तू वो नींद है, जिसमें सपने नहीं होते।
अनंत को गिनते हुए, तू वह आईना है,
जिसमें जीवन अपना अर्थ ढूँढता है, अर्थ खोते हुए।
अरे! लेकिन, इन सबसे दूर, तू चुपचाप क्यों खड़ी है,
न तो शत्रु तेरा, न कोई मित्र,
तू इतना बड़ा सच है, जो अटल है, है अपरिहार्य।
हर सेकंड कितनी ही जानें ले लेती है तू।
मेरे अंदर भी कितनी कोशिकाएं, कितने जीवाणु, तुझसे मिलते रहते हैं।
और, सच बता,
कहीं तू ब्रह्मांड का वह गीत तो नहीं,
जिसके बोल अभी अधूरे जाने हैं…
या शायद समझा गया है, केवल एक ही शब्द तेरा।
सिन्दूर शक्ति
किसने कहा कि चूड़ी-बिंदी, सिन्दूर बिछिया भार है,
यह तो नारी की मर्यादा, उसकी शक्ति का श्रृंगार है।
काली जब रणचंडी बनकर करती रुधिर स्नान है,
सिंदूर सजा माथे पर तब भी, डरता सारा संसार है।
जिसे तुम कहते बोझ, वही उसका स्वाभिमान है,
हर श्रृंगार में छिपा हुआ उसका गौरव मान है।
दुर्गा जब अट्टहास करे, करती महिषासुर संहार,
तब भी सजी है मांग उसकी, वही है उसका श्रृंगार।
सिन्दूर उसका बंधन नहीं, ये उसकी पहचान है,
जब मिटे वही सिन्दूर, हृदय की चीख पुकार है।
‘ऑपरेशन सिन्दूर’ का नाम यूँ ही तो रखा नहीं गया,
इसमें हर नारी के आँसू, तड़प की सदा भरी है क्या!
ये सम्मान है हर उस बेटी का, जो सीमा पर बलिदान करे,
जो मांग सजाकर शत्रु से, अपने राष्ट्र का मान धरे।
सुन लो ये श्रृंगार सहित, है शपथ यह शक्ति की,
नारी जब शस्त्र उठा ले, है प्रतीक देशभक्ति की।
रणभेरी की पुकार
परीक्षा की घड़ी निकट है, संयम को अपनाइए,
मन में धीरज, वाणी में बल, ना कर्तव्य से डिग जाइए।
पहलगाम की पीड़ा गहरी, अब धधक रहा है क्षोभ,
शांत नहीं, अब उत्तर देना, सहन नहीं होता अब क्रोध।
सीमा पर संकल्प जगा है, रणचंडी मुस्काए,
भारत माँ के वीर सपूत अब पीछे ना हट पाए।
राजनीति के भवनों में अब रणयोजना है बनती,
शत्रु की हर चाल-कपट पर, दृष्टि हमारी है रहती।
प्रधानमंत्री की वाणी में है अब ज्वाला गूँज रही,
रक्षा मंत्री के तेवर से पाक की सेना धूज रही।
शब्द नहीं ये अब सन्निपात है, रण का है आमंत्रण,
होश संग अब जोश जरूरी, यही राष्ट्र का है चिंतन।
युद्ध स्वयं में अंत है, पर कई बार हो जाता है यह धर्म,
भूमि, भाषा, संस्कृति की रक्षा हेतु करे शस्त्र का कर्म।
सोच समझ के चलता भारत, हर मोर्चे पर जागरूक,
न भूले चुपचाप नहीं है, सिंह को लग रही अब भूख।
दुश्मन को कमजोर समझना मूढ़ों की है पहचान,
रण के पहले कर लें ज़रा दुश्मन शक्ति का अनुमान।
यूक्रेन की पीड़ा देखो, कितनी लंबी है रात,
पश्चिम ने दी साँस उसे, बढ़ती जा रही थी बात।
भारत अब उस सूत्र को भी काटने को चला है चाल,
रणनीति की हर चाल में देश अपना लाता भूचाल।
भीतर का जो विष फैला है, उसको भी तो देखें,
सांप्रदायिक ताप न बढ़े, इस दिशा में दृष्टि फैंके।
विपक्ष खड़ा संग साथ में, है यह बड़ा संकेत,
सत्ता से भी ऊपर होता राष्ट्रप्रेम का संवेद।
रण में जाए वीर जब, हो पीछे बल की चिंघाड़,
जनगण से लेकर संसद तक हो मातृभूमि का सिंगार।
महँगाई हो, संकट हो, कुछ किल्लत भी आए,
पर संयम, श्रद्धा और संकल्प हमें हैं सिखलाए।
कारगिल की राख कहे, रण में क्या मूल्य चुकाया,
अब समय है, उस राख से ही फिर भारत ने है दम दिखाया।
इच्छामृत्यु: मुक्ति का अधिकार
पीड़ा के दरवाज़े पर जीवन मिला है,
साँसें नहीं, यह ज़ख्मों का सिलसिला है।
हर धड़कन गिड़गिड़ाती है,
“अब बस… मृत्यु से ही ज़िंदगी इलाज़ पाती है।”
कभी किसी की माँ की आँखों में डूब जाता है यह सवाल:
“ज़हर दो, ना दो दया… मौत से बदतर है जीवन का हाल।”
उसके आँसू बोलते थे वही सच,
जो कानूनों ने किया सुनने से इनकार।
कोई पिता भी हाथ पकड़ते हैं मौत का,
जब जिस्म में ज़िन्दगी सिर्फ़ ज़ंग बन गई।
उनकी चुप्पी भी चीख कर कहती थी,
“मौत से डरता नहीं, ज़िन्दा-लाश बनने से डरता हूँ।”
हर बार मृत्यु डरावनी होती नहीं,
है कभी यह माँ की गोद सी भी।
जो कलेजे से लगाकर कहती है-
“अब सो जा… यह दर्द तेरा नहीं, मेरा है।”
यूथेनेशिया-एक शब्द नहीं,
दया की आख़िरी गुहार है,
जो कहती है: “मेरे जलते हुए आकाश को
अब बारिश नहीं, बस एक चिंगारी चाहिए।”
हमने नैतिकता के पत्थर बाँध दिए
उन्हें, जो डूबते हुए भी तैरना चाहते थे।
क्या इंसानियत है यह,
ज़िन्दगी को ज़ख्म और मौत को गुनाह बनाना?
नीदरलैंड्स में मौत गीत गाती है,
स्विट्ज़रलैंड में चुपके से आती है रात की तरह-शांत।
कभी अंत है एक चिकित्सा ही,
दर्द से मुक्ति पाप नहीं, प्रार्थना है कहलाती।
जीना भी कभी विरुद्ध प्रकृति के बेहतर तो कभी मरना भी,
उस आग में कूदने के है समान,
जो आग बर्फ़ से ठंडी, अंधेरे से उजली है।
जब साँसों का बोझ पसलियों को चुभने लगे,
तो मुक्ति का हक़ क्यों न हो मनुष्य की मुट्ठी में?
होता है कभी प्यार मुट्ठी खोलने का नाम भी।
कभी चिता जलाना भी मौत को हराना होता है।
अब उतारो नैतिकता की यह काली ज़ंजीर,
देखो उस आँख से जो दर्द को पहचानती है।
इच्छामृत्यु देना पाप नहीं,
प्रेम की अनंतता का साक्षी है।
अमरता का भी…
विनय पथ
कारवाँ में दौड़ कर आगे चलने वालों,
कारवां तुमने संभाल रखा,
क्या इस भाव ने जकड़ा है?
देखो, हर पग पर ज्योति जगी किसी और की,
लिखा नाम मील के पत्थर पर नहीं तुम्हारा और,
हर मोड़ किसी और ने हाथ पकड़ा है।
अपनी ही पदचाप पर गर्वित होने वाले ज़रा देखो,
कितनी ही पदछापों को वक्त ने वक्त से निकाल रखा है।
जो कल थे शिखर पे, आज धूल भी बाकी नहीं।
कौनसा है ऐसा गुब्बारा जो फूला हवा से और,
हवा ने सम्भाल रखा है।
जो ऊँचे होकर नीचे ना देखें, वे भूल गए जड़ें भूमि से हैं।
काल चक्र न देखे ताज कभी, सब झुकते अपनी कमी से हैं।
जो जीवन नाव का स्वामी खुद को मानें,
लहरों की ताकत से अनजान हैं।
देखो ज़ोर-ज़ोर से हँसते चेहरे के पीछे,
कितनी चीखों के श्मशान हैं।
चलना है तो, चलो साथ, गर्व तज कर बहें,
इतिहास भी देखो सत्य बस यही कहे,
जो झुके, समय भी साथ उनके रहे।
पहलगाम की पीड़ा
वो घाटी जहाँ लिद्दर का जल, संगीत सरीखा बहता था,
कौन जाने उसकी लहरों में, बहुत बारूद रखा रहता था।
बेताब वैली मौन खड़ी, आँसू में भीग गई चुपचाप,
जहाँ हँसी थी पर्यटकों की, वहाँ लगे हैं बंदूक-चाप।
शालीमार के वृक्षों पर हैं, गोलों के गहरे घाव,
पीर-पंजाल की वादियाँ में जीवन लगा है दांव।
अमरनाथ के पावन पथ पर, खंजर की परछाई है,
भक्ति के पथ पर अब लगता, मौतों की गिनती आई है।
पहलगाम जहाँ गूँजती थी, बाँसुरियों की मधुर तान,
अब वहाँ बस सन्नाटा है, टूटा हर सुर का सम्मान।
शांति के नाम लिखे, घरों में दीवारें रोती हैं,
मातम के पोस्टर चिपके हैं, बंदूकें पहरे देती हैं।
गुलमर्ग की बर्फ पहले, मुस्कानों की भाषा थी,
अब वही बहती बूँद-बूँद आंखों में निराशा थी।
हे कश्मीर! तेरे सपनों को, किसने ऐसे रौंद दिया?
तेरे गुलशन को ज़हर दे, किसने कब्र को खोद दिया?
मैं नहीं जानता
मैं नहीं जानता कि क्या सामान ज़रूरी है,
चेहरा ज़रूरी है कि मुस्कान ज़रूरी है।
वो कहता है कि पैदा करना एहसान नहीं है,
तू कहता रह, बस इतना सा एहसान ज़रूरी है।
घर बना था मगर रौशनी गुम थी कहीं,
खिड़कियाँ हैं पर इक निगहबान ज़रूरी है।
छोड़ के जाना मुश्किलों में कुछ नया तो नहीं,
रिश्तों में पर इक नया इमान ज़रूरी है।
शिकवे हैं बहुत से मगर ए दोस्त सुन ले,
मुझको शिकवे नहीं इनसान ज़रूरी है।
एक कोशिकीय दंगा
किसी एक कोशिकीय जीव की तरह दंगा,
दंगों का माता और पिता दोनों है।
यह खुद को जन्म देता है,
अपने ही ज़हर में पनपता है,
और फैलता है ऐसे,
जैसे हवा में उड़ता कोई अदृश्य वायरस।
लोग समझते नहीं हैं-
यह कोई अचानक फूट पड़ने वाली चीज़ नहीं,
यह तैयार किया जाता है,
धीरे-धीरे, नफरत की प्रयोगशालाओं में,
अफ़वाहों के टेस्टट्यूब के साथ।
कोई अस्थमा का पंप, प्रेम की उखड़ती सांस को संभाल नहीं पाता।
और इंसान—
सहसा बदल जाता है जंगली जानवर में।
जानवरों की भीड़ उतार फेंकती है मस्तिष्क को,
वह कहां पहचानेगी आग और राख,
और उस अधजली सभ्यता की
दिमागहीन बूँद खुद को विभाजित करती है,
कर अंतर्जनन
वह दंगा बार-बार लौटता है,
अपने आप को दोहराते हुए।
काश लोग समझ पाते,
कि दंगा मारने से पहले
डीएनए में छिपे प्रेम को मारता है,
कुचल देता है संवेदना की नस को,
और ब्रह्मांड के गणितीय सूत्र में,
हम ‘मानव माइनस मानवता’ हो जाते हैं।
नहीं होती
टूटे रिश्तों की जिन्हें परवाह नहीं होती,
ख़ुद से ऊँची उनकी परवाज़ नहीं होती।
करते हैं नफरत जो रिश्तों से अपने,
ख़ुदाई से उनकी मुलाक़ात नहीं होती।
मोहब्बत और अमन है, नाम मज़हब का,
जो ना माने ये, उससे इबादत नहीं होती।
हर सच की इक आवाज़ हुआ करती है,
जो चुप हो गए तुम, ये कोई बात नहीं होती।
अच्छे आदमी
अच्छे आदमी करते हैं अच्छाई,
अपनों से पहले दूसरों की परवाह करते हैं।
यही उनकी बनती है पहचान,
जो उन्हें “अच्छा आदमी” बनाती है।
जब लोग जान जाते हैं कि कोई सचमुच अच्छा है,
तो वे उससे अपनी अच्छाई भी करवाने लगते हैं।
अच्छे आदमी चुपचाप करते रहते हैं अच्छाई,
शिकायत, हिसाब को रख कर परे।
धीरे-धीरे लोग उनकी अच्छाई को अधिकार समझ लेते हैं,
और अपनी अच्छाई करवाना उनकी आदत बन जाती है—
और यह आदत एक दिन, शोषण में बदल जाती है।
अच्छे आदमी समझते हुए भी नहीं रुकते,
अपने सुख-दुख, समय आदि की परवाह किए बिना,
हो के परेशान भी,
करते रहते हैं अच्छाई।
और यही अच्छाई, धीरे-धीरे थका देती है उन्हें।
शरीर जवाब दे देता है।
मन फिर भी ऊर्जावान रहता है,
वही ऊर्जा उनसे अच्छाई करवाती रहती है।
और, अच्छाई करने से मन में ऊर्जा बढ़ती भी जाती है।
वो बात कुछ और नहीं,
कि शरीर एक दिन निरंतर काम करने से खत्म हो जाता है।
और तब, जब वे नहीं रहते,
वही लोग, जो करते थे शोषण,
उनकी आँखें मुंदी देख, आँख मूंदकर कहते हैं—
“भगवान को भी अच्छे आदमी पसंद होते हैं, इसलिए उन्होंने जल्दी बुला लिया।”
श्री राम वन्दना
राम-राम में रम ले बन्दे, रम ले राम नाम में।
यही नाम तो आयेगा बन्दे, आखिर तेरे काम में।
जय राम – श्री राम – श्री राम जय-जय राम।
रोग-शोक ना क्रोध रहेगा
मन में विषाद ना आक्रान्त है।
राम नाम को जपने वाला
आनन्दित और शान्त है।
आओ उठकर सब पुकारें, आ राम आराम में।
जय राम – श्री राम – श्री राम जय-जय राम।
बजरंग जिसका ध्यान लगाऐं
नारद जिसकी कथा सुनाऐं।
ब्रह्ममुख से आई जो वाणी
राम नाम ही हम सब गाऐं।
राम नाम के जप से फैले, शान्ति चारों धाम में।
जय राम – श्री राम – श्री राम जय-जय राम।
पता नहीं क्या फायदा?
लड़ना है तो घर पे आई मुश्किलों से लड़ो,
अपनों से बैर बढ़ाने से क्या फायदा!
अपनों की आँखों में आंसू हों तो,
गैरों संग मुस्कुराने से क्या फायदा!
हाथ थाम कर गुदगुदा दो ज़िंदगी को,
मौत का ख़ौफ दिखाने से क्या फायदा!
रिश्तों को निभाने का हौसला रखो,
दुश्मनी को निभाने से क्या फायदा!
मोहब्बत की लौ से चिराग रोशन कर के देखो तो,
नफ़रत की आग जलाने से क्या फायदा!
और… हाँ दोस्त!
अगर दम हो तो दिल की वसुधा पर प्यार के बीज बोकर एक हो जाओ,
सोचो, दीवारों की फ़सलें उगाने से क्या फ़ायदा!
नव संवत्सर
यह नव संवत्सर, यह पल नहीं पराया,
प्रकृति की है यह मंगलकारी छाया।
धरती माँ के आँचल में है सबको समाना,
विश्वबंधुत्व का है सनातन आशियाना।
नव उषा की अरुणिमा लेकर आया है यह दिन,
जीवन पथ पर खिले आशा-कुसुम पल-छिन।
संकट के सागर की लहरें लौट जाएँ,
सुख की सरिता सबके द्वार ठहर जाए।
“सर्वे दुर्गाणि” का मंत्र गूँजे हर घर में,
हर मन दीपक बने, निराशा के अम्बर में।
भद्र दृष्टि से देखें यह विराट चित्रपट,
प्रेम का वृक्ष पलता रहे भारत के घट-घट।
कल्याण का दीप अनादि, अनंत जलता रहे,
मंगलगीत यह धरती का अनवरत गूँजता रहे।
प्रेम
प्रेम वही जो प्रेमी को राह सही दिखलाए,
प्रेम नहीं जो प्रेमी को राह से भटकाए।
प्रेम कहां जो प्रेमी पे, हक केवल जतलाए,
प्रेम साथ में अपने तो, ज़िम्मेदारी लाए।
प्रेम वही जो गहन अंधेरे, को रोशन कर जाए,
सड़कों पे भटकते को, मंज़िल की राह बताए।
प्रेम नहीं है भ्रम के पहाड़ों की चढ़ाई,
प्रेम के हर अक्षर में, छिपी है सच्चाई।
प्रेम नहीं है झील सा, सीमाओं पे ठहरा,
बनता सागर, ना पाएं लहरों पे हम पहरा।
प्रेम कभी हमें बनाए ना दावेदार,
साथ चलना है चाहे, राह हो कांटेदार।
प्रेम नहीं जो महलों के, सपने है दिखलाए,
देख दरार वह तो घर की, छत है बन जाए।
प्रेम नहीं जो प्रेमी से बातों को छिपाए,
प्रेम है वो, जो सच्चाई का आईना बन जाए।
प्रेम कहां पर केवल प्रेम गीत को गाता है,
सुख दुःख में ये खुद, गीत इक बन जाता है।
प्रेम वही जो अटूट रहे, हर स्थिति में निभ जाए,
हृदय में जो बसा रहे, वही सच्चा प्रेम कहलाए।
रिश्ते
कुछ रिश्ते प्रेम की अलौकिक छाया में हैं निभते,
कुछ काल के भँवर में बहकर विस्मृत हो हैं जाते।
कुछ नाते, डूबते सूरज की लौ सी हैं मिट जाते,
कुछ अँधेरे में चाँदनी बन कर याद हैं आते।
कुछ मृगतृष्णा बन झूठे सुख का स्वप्न दिखलाएँ,
कुछ सच्चे साथी धूप में छाँव बनकर आएँ।
कोई बंधन सहज साँस सा मन को है छू जाए,
कोई मर्म में गड़े काँटा सा दर्द बड़ा बन जाए।
कोई जीवन का सुर बन संगीत में घुल जाए,
कोई विषाद का गीत बन हृदय से धुल जाए।
कुछ रिश्ते बरसात की बूँद से सहारा बन कर आएं,
कुछ बिन बुलाए मेहमान से आकर, द्वार पर मुस्काएं।
कुछ राहों में बिखरे कांटों से बन जाएं,
कुछ अपनेपन के फूल चुपके से महकाएं।
रिश्तों का यह संसार भावों का महाकाव्य हो,
जहाँ प्रेम ही सच हो, बाकी माया का अध्याय हो।
न टूटे वही डोर, जो दिल की बातें समझे,
आत्मा को छुए जो, ही कहलाएं रिश्ते।
सच्चा रिश्ता है वही, समय की छाँव हो, धूप हो,
प्रेम के पत्ते न मुरझाए, ऐसा ही स्वरूप हो।

चंद्रेश कुमार छ्तलानी
उदयपुर (राजस्थान)
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