कृष्ण कुमार निर्माण की कविताएं | Krishan Kumar Nirman Poetry

बस,अब और नहीं

बस,अब और नहीं,,
तुम छिप जाओ,जाकर कहीं…
बादलों की ओट में,,,
क्योंकि….
मुझसे सहन नहीं होता
ये व्यवहार तुम्हारा
और तुम हो कि…
प्यार के नाम पर
मुखौटे पर मुखौटे लगाकर
प्रतिपल छल रहे हो मुझे
और…
साबित कर रहे हो
कि… तुम बेवफा हो
आखिर क्यों कर रहे हो तुम ऐसा…
जाओ,छिप जाओ
कहीं बादलों की ओट में…

उल्लू के पठ्ठे

जी हाँ,,
सबके पठ्ठे होते हैं
जैसे कि…
संतों के
महंतों के
नेताओं के
अभिनेताओं के
जिसके जितने पठ्ठे होंगे
उसको उतने ही सलाम होंगे
क्योंकि…
पठ्ठों के दम पर चल रहा है
सब कुछ
यहाँ तक कि उसकी व्यवस्था भी
पर….
बदनाम,,,केवल
उल्लू का पठ्ठा है

भेड़िए

जंगलों में मत ढूंढिए
बीहड़ो में मत जाइए
खोजने..भेड़ियों को ढूंढने
क्योंकि….
आजकल भेड़िए वहाँ नहीं रहते
जहाँ आप सोचते हैं
आजकल भेड़िए रहते हैं
गाँव और शहरों में
गली,नुक्कड़,चौराहों पर
इंसानी लिबास में

कृष्ण कुमार निर्माण
करनाल,हरियाणा

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