नारी की वेदनाएं
भारत को पुरुष प्रधान देश माना जाता है। प्राचीन काल से ही भारत में महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता रहा है। उनके साथ हमेशा भेदभाव किया जाता है. महिलाओं के साथ हमेशा दुर्व्यवहार किया जाता है। यह पुरुष प्रधान संस्कृति के कारण हुआ है।
इसके साथ ही, पारंपरिक पुरुष-प्रधान संस्कृति के प्रभाव में आने के कारण, महिलाएँ भी उसमें शामिल हो गई हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य कि महिलाएं भी अपनी बेटियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करती हैं। हमारे समाज में इस बात को दृढ़ता से महसूस किया जाता है।
आजकल महिलाएं भी लड़की को जन्म देने के लिए तैयार नहीं होती हैं क्योंकि उन्हें अपने परिवार वालों से नफरत का सामना करना पड़ता है। इसलिए महिलाएं पुरुषों की सोच का शिकार हो जाती हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज की शिक्षित महिलाएं भी अज्ञानी विचारों से भरी हुई हैं।
कभी-कभी आश्चर्य होता है कि महिलाओं के प्रति इतनी नफरत क्यों है? महिलाओं से नफरत उसके जन्म से ही शुरू हो जाती है और उसकी मृत्यु तक खत्म नहीं होती। जन्म से मृत्यु तक के सफर में एक महिला को कई अत्याचारों का सामना करना पड़ता है। उन्हें विभिन्न समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है।
जिनमें मुख्य रूप से कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, अपहरण, बाल श्रम, यौन शोषण, घरेलू हिंसा, दहेज, शिक्षा से वंचित होना शामिल है। महिलाएं हमेशा से ही अत्याचार का शिकार बनती आयी हैं।
नारी प्रकृति की निर्माता है लेकिन हमें लगता है कि पितृसत्तात्मक संस्कृति पारंपरिक रूप से उसे नष्ट करने का साहस करने में सफल होती है। मंदिर तक ही सीमित महिलाओं को देवी के सम्मान माना जाता है। वस्तुतः सभी देवियाँ नारी में ही अवतरित होती हैं। नारी में इतनी शक्ति, सामर्थ्य और साहस है कि वह किसी भी युद्ध में हार नहीं सकती।
लेकिन पुरुषसत्तात्मक संस्कृति ने शाश्वत सत्ता को विकृत करने का काम किया है। आज भले ही महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कई कानून पारित किए गए, लेकिन मामूली बदलावों को छोड़कर वे कानून कागजों पर ही रह गए।
कन्या भ्रूण हत्या रोकथाम अधिनियम के कार्यान्वयन के बावजूद, भारत की वर्तमान व्यवस्था में स्त्री भ्रूण हत्या बड़े पैमाने पर हो रही है। जिससे जन्म दर में लिंग अंतर बढ़ रहा है। आज, लड़कियों की औसत जन्म दर प्रति 1000 लड़कों पर 934 है। इनमें सबसे कम दर राजस्थान राज्य में है।
वहां लड़कों की तुलना में लड़कियों की जन्म दर 832 है। इसलिए आज हमारे देश में बहुत से बच्चे शादी से वंचित रह जाते हैं। लड़कों की शादी के लिए लड़कियों की कमी हो गई है। राजस्थान के कई लोग कर्नाटक राज्य से लड़कियों को सीधे खरीदकर यानी उनके माता-पिता को पैसे देकर ला रहे हैं और उनसे शादी कर रहे हैं। समस्या भले ही बढ़ती रहे, लेकिन हकीकत तो यह है कि संतान पैदा करने वाली महिला इस दुनिया में अकेली महिला नहीं होगी।
यौन उत्पीड़न आज सबसे बड़ी समस्या बन गई है, हमारे देश में प्रतिदिन औसतन 85-86 बलात्कार के मामले सामने आते हैं। इनमें स्कूली लड़कियों से लेकर कामकाजी महिलाएं, माताएं और घर की महिलाएं तक शामिल हैं। वे सभी सदा पीड़ित बने जा रहे हैं। कोई भी महिला अकेले में कहीं भी आजादी से नहीं घूम सकती।
आज अगर एक महिला रातसमय के समय में अकेली चले तो वह कई शोषीतों का शिकार बन सकती है। हरेक पुरुष कई गिद्धों की तरह मांस के टुकड़े-टुकड़े तोड़ने को आतुर है। कई लड़कियां दिनदहाड़े निर्भया हत्याकांड के जैसे शिकार हो रही हैं।
कोई स्कूल बस में लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है तो कोई रिक्शा से घर पहुंचाने के बहाने लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार और बलात्कार कर रहा है और उन्हें मारकर उनके टुकड़े कर रहा है। उस महिला ने क्या गलत किया है? क्या वह आपकी वासनाओं को पूरी करने के लिए पैदा हुई है?
महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और दुर्व्यवहार को रोकने के लिए, भारतीय संविधान में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार निवारण अधिनियम, पोक्सो एक्ट, यानी यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 बनाया।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए ऐसे कई कानून बनाए गए लेकिन रेप की घटनाएं कम होती नजर नहीं आ रही हैं। वहीं दूसरी ओर लगातार दिन-ब-दिन रेप की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके कई कारण हैं, लेकिन ऐसा करना कितना उचित नहीं। ये सवाल समाज के लगातार समाज के सामने खड़ा हुआ है।
बाल विवाह समाज के लिए एक अभिशाप हुआ करता था। लेकिन अब इसकी औसत थोड़ी कम हो गई है। लेकिन आज भी बाल विवाह हो रहे हैं। लड़कियों की शादी उनके वयस्क होने से पहले ही कर दी जाती है जिससे उनके जीवन और प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है।
बचपन में ही उसकी भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है। जब उसकी खेलने की उम्र में होती है, तभी उसे संसार के रथ से जोड़ दिया जाता है और उसके सिर पर बोझ लाद दिया जाता है। इसलिए वह शारीरिक और मानसिक रूप से विकसित नहीं हो पाती।
बाल विवाह रोकथाम कानून लागू होने के बावजूद आज भी देश में बाल विवाह होते रहते हैं। यह समस्या विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है। हालाँकि लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा जैसी कई योजनाएँ हैं, लेकिन परंपरा से आए विकृत विचारों के कारण अभी भी समाज में कोई बदलाव नहीं आया है।
यह इस देश की त्रासदी है कि आज भी कई माता-पिता बुद्धिमान होते हुए भी अपने कन्या को शिक्षित करने का साहस नहीं दिखाते। इसके विपरीत अपने बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। दुख की बात है कि इस तरह मानवता की हत्या की जा रही है।’
दहेज निवारण अधिनियम 1961 से लागू किया गया। इस अधिनियम में कई बार संशोधन किया गया। आज भी दूल्हे का परिवार लगातार दहेज की मांग कर रहा है. कौन पैसा मांग रहा है, कौन सोना मांग रहा है, कौन बंगला गाड़ी मांग रहा है, आज इस आधुनिक समाज में न जाने क्या-क्या तरीके चल रहे हैं। दहेज के लिए अक्सर दुल्हनों को प्रताड़ित किया जाता है। इसमें कई दुल्हनें मारी जाती हैं। इसी क्रोध में उनकी हत्या भी की जाती है।
दहेज की समस्या
दहेज प्रथा बेटी को आत्मनिर्भर बनाने,
पिता की मदद आर्थिक सक्षमता दिलाने;
दहेज ने जन्म दिया कन्या भ्रूण हत्यारों को,
लड़की के परिवार में वित्तीय समस्याओं को |
दहेज की परिभाषा संपत्ति या वस्तु मूल्यवान,
लेनदेन को प्रतिबंध विवाह में चीज मूल्यवान;
बेटीयों के पिता को दहेज नित बनता गया शाप,
जमाई खरीदने के लिए दहेज बन गया एक माप |
दहेज कानून बनाया अच्छे संबंध के लिए,
दहेज अधिनियम लगाया प्रतिबंध के लिए;
पाॅंच साल की सजा का प्रावधान गुनाह के लिए,
धसे नहीं आज भी लोग दहेज़ लेनेदेन के लिए |
कानून के बावजूद भी दहेज लिया जाता है,
आज भी खुली बाजार में दूल्हा बिक जाता है;
किसी को कीमती कार बंगला नजर आता है,
दूल्हे तरफ से ससुराल कंगाल किया जाता है |
पढ़ा कर भी लड़कियों को दहेज देनी पड़ी,
लड़की के पिता कहाँ से लायेंगे बंगला गाड़ी;
दूल्हे को ससुराल की न ही कोई कुछ पड़ीं,
कौन किसको समझाएँ दहेज की कहानी बड़ी |
उपरोक्त सभी उदाहरणों से हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि कानून के बावजूद अत्याचार रुक नहीं रहे हैं। महिला हिंसा के मामले में कोई नियंत्रण नहीं है। इसके विपरीत हम इसे दिन-ब-दिन बढ़ता हुआ देख रहे हैं।
इसके लिए संवैधानिक नीति में बदलाव करना होगा। लेकिन इसके साथ-साथ समाज को जगाना भी जरूरी है और समाज को जगाना ही होगा। समाज को सामाजिक प्रबोधन की अत्यंत आवश्यकता है, विशेषकर आज के माता-पिता को लड़कियों का महत्व समझाना अत्यंत आवश्यक हो गया है अन्यथा इस संसार का भविष्य अंधकार में हो जाएगा।
इसी प्रकार यदि नारी जाति नष्ट हो जाये तो इस संसार में नारी ही नहीं रहेगी। यह समझना बहुत जरूरी है कि अगर महिलाओं का अस्तित्व नहीं है तो इंसान का भी अस्तित्व नहीं है। क्योंकि स्त्री ही सृष्टि की रचयिता है और यदि वह नहीं होगी तो इस सृष्टि में मनुष्य कैसे होंगे?
इंसानों का उदाहरण इतिहास में डायनासोर की तरह दर्ज किया जाएगा। इंसान डायनासोर की तरह हो जायेंगे। डायनासोर भी कभी अस्तित्व में थे। आज दुनिया में कहीं भी डायनासोर की कोई प्रजाति जीवित नहीं पाई जाती। साक्ष्य में इसके अवशेष ही मिलते हैं।
हालाँकि, सृष्टि की रचयिता को समझना हर किसी के लिए बहुत ज़रूरी है, उनकी वजह से ही घर में खुशियाँ फैलती हैं, उनकी वजह से घर में खुशबू आती है। इसलिए सभी को नारी का सम्मान करना चाहिए। मैं सभी से अनुरोध करता हूं कि यह याद रखें कि उनका कभी अपमान नहीं होना चाहिए।’

आनंदा आसवले, मुंबई
पत्ता: साईभक्ती चाल, रूम नं. 1, आनंद नगर, अप्पा पाड़ा,
कुरार विलेज, मालाड (पूर्व) मुंबई-400097
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