मर्यादा पुरुषोत्तम: कथा से कर्म तक

(राम नवमी पर एक साहित्यिक आलेख)

साहित्य, धर्म और संस्कृति जब एकत्र होकर किसी एक स्वरूप को आकार देते हैं, तो वह स्वरूप केवल वंदनीय नहीं, जीवंत होता है—वह प्रेरक होता है, वह पथप्रदर्शक होता है। श्रीराम ऐसा ही एक स्वरूप हैं—जो केवल देवता नहीं, एक जीवन-दर्शन हैं, एक मानवता का आदर्श हैं, और भारतीय साहित्य की सनातन धुरी।

राम नवमी का पर्व हमें हर वर्ष स्मरण कराता है कि एक युग में धर्म की परिभाषा किसी सिंहासन से नहीं, वन की मिट्टी से गढ़ी गई थी; और उस परिभाषा का नाम था—राम।
वे राम, जिनका जन्म भले ही राजमहलों में हुआ, पर चरित्र का निर्माण वनों में तपते समय हुआ। वे राम, जिन्होंने युद्ध में रावण को हराया, पर जीवन में अपने भीतर के लोभ, मोह और मोहभंग को भी जीत लिया।

रामायण एक ग्रंथ नहीं, एक संकेत-शास्त्र है—जो हमें बताता है कि आदर्श क्या होता है और आदर्श तक पहुँचना किस श्रम और त्याग की माँग करता है। राम वन जाते हैं, सीता का त्याग करते हैं, और अंततः मर्यादा की जटाओं में स्वयं को बाँध देते हैं—क्योंकि वे जानते हैं कि राजा वही नहीं जो शासन करे, राजा वह है जो अपने भीतर राज्य कर सके।

“धर्मो रक्षति रक्षितः”—यह श्लोक केवल शास्त्रों में नहीं, राम के आचरण में जीवित है।

यदि भारतीय साहित्य एक शरीर है, तो रामकथा उसकी आत्मा है। वाल्मीकि की ऋचाओं में, तुलसीदास की चौपाइयों में, कबीर की बोलियों में, कंबन की तमिल पंक्तियों में, राम हर युग में, हर भाषा में, हर शैली में नये-नये अर्थों के साथ अवतरित होते रहे हैं।

तुलसीदास कहते हैं— “रामहि केवल प्रेम पियारा, जान लेहु जो जाननिहारा।”
– यहाँ राम केवल एक पात्र नहीं, प्रेम का प्रतीक हैं। और वह प्रेम केवल व्यक्ति का नहीं, समाज, संस्कृति, और आत्मा का प्रेम है।

आधुनिक समय में जब आदर्शों का मोल घटने लगा है, जब सुविधा और सिद्धांत में संघर्ष गहराता जा रहा है, तब राम नवमी केवल एक उत्सव नहीं, एक चुनौती है।
चुनौती यह कि—
क्या हम अपने भीतर उस मर्यादा को जीवित रख पा रहे हैं, जो राम की आत्मा है?
क्या हम अपने कर्मों में वह नैतिक साहस रख पा रहे हैं, जो राम के वनगमन में दिखता है?

राम ने सत्ता का त्याग किया, आज हम सत्ता के लिए सारा सत्य त्याग देते हैं।
राम ने न्याय के लिए हृदय को कठोर किया, हम आज हृदय की कठोरता को ही न्याय मान बैठते हैं।

राम का जन्म हर वर्ष होता है—नवमी को, चैत्र शुक्ल पक्ष में;
परंतु रामत्व का जन्म तभी होता है, जब हम अपने भीतर की अशांति में धैर्य का दीपक जलाते हैं, जब हम संबंधों के द्वंद्व में कर्तव्य की बाँसुरी सुनते हैं, और जब हम सत्य के लिए स्वयं को परिस्थितियों के विरुद्ध खड़ा करते हैं।

राम नवमी का यह पावन अवसर हमसे यही अपेक्षा करता है—
कि राम को केवल मंदिरों में न पूजें,
उन्हें अपने मन, अपने विचार और अपने कर्म में प्रतिष्ठित करें।

क्योंकि राम वही हैं, जो कथा से निकलकर कर्म तक पहुँचें।
और वही सच्चे अर्थों में—मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।

अमरेश सिंह भदौरिया
प्रवक्ता हिंदी
त्रिवेणी काशी इ० कॉ० बिहार, उन्नाव

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