अविश्वासी

अविश्वासी

राजू बहुत कंजूस और लालची प्रवृत्ति का व्यक्ति था। वह किसी पर आसानी से विश्वास नहीं करता था। एक दिन बाइक से घर जाते समय उसका एक्सीडेंट हो गया। उसके सीधे पैर में फ्रैक्चर हो गया। डॉक्टर ने उसकी हड्डी जोड़कर, प्लास्टर करके आराम करने की सलाह दी। दो दिन अस्पताल में रहने के बाद जब वह घर आया तो उसके एकलौते बेटे रजनीश ने पिता से कहा-

“पापा जी, मेरी कॉलेज की फीस जानी है। मुझे दस हजार रूपयों की जरूरत है। आप मुझे बता दीजिए कि रुपये कहाँ रखे हैं। मैं पर्स ले आऊंगा।”

पहले तो राजू ने रुपये देने में आनाकानी की, लेकिन बार बार रजनीश के अनुनय-विनय करने पर वह कुछ नरम हुआ। वह एक मोटी लकड़ी की मदद से… व एक पैर का सहारा लेकर उठने की कोशिश करने लगा। रजनीश ने अपने पिता को इस तरह उठने को मना किया। लेकिन राजू न माना। रूपयों के मामले में राजू को अपनी पत्नी मोनिका और रजनीश तक पर विश्वास नहीं था।

लकड़ी की सहायता से वह स्वयं उठा और एक पैर पर कूदते कूदते वह शेल्फ तक पहुँच गया। अब राजू, रजनीश को देने के लिए, शेल्फ के लॉकर में रखे रुपए निकालकर गिनने लगा। अचानक एक 500 का नोट उसके हाथ से गिर पड़ा। उस नोट को पकड़ने के चक्कर में राजू यह भी भूल गया कि उसके पैर में फ्रैक्चर है। राजू का बैलेंस बिगड़ गया और वह नीचे धड़ाम से गिर पड़ा। लकड़ी भी उसकी कोई मदद न कर सकी।

एक फ्रेक्चर तो उसकी टांग में पहले से ही था। लेकिन अब गिरने के कारण उसके उल्टे हाथ में भी फ्रैक्चर हो गया। कहाँ वह अपनी एक टांग के टूटने से परेशान था, अब बायां हाथ भी किसी काम का न रहा।

अपनी लालची और अविश्वासी प्रवृत्ति के कारण अब वह बाएं हाथ में भी फैक्चर करवा बैठा। आनन फानन में उसका ऑपरेशन कराया गया। एक पैर की तरह अब उसके एक हाथ में भी प्लास्टर था।

अस्पताल के बिस्तर पर पड़े पड़े राजू सोच रहा था कि काश… वह बेटे रजनीश की बात मान लेता और उसको बता देता कि रुपए कहाँ रखे हैं तो यह सब न होता।

आखिर मेरा सब कुछ रजनीश का ही तो है.. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। जहाँ वह अगले दो महीने में चलने लायक हो जाता, वहीं अब हाथ में फ्रेक्चर के कारण उसके ठीक होने की समय सीमा बढ़ गई थी, खर्चा हुआ सो अलग।

काश वह अपनी लालची और अविश्वासी प्रवृत्ति को नियंत्रित कर पाता। अपने परिवार के सदस्यों पर विश्वास कर पाता, उनकी बात मान पाता। अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखकर, अपने शरीर की सीमाओं को समझ सकता।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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