अमरेश सिंह भदौरिया की कविताएं | Amresh Singh Bhadauriya Poetry

विषय सूची

अमलतास

चुपचाप झरता है अमलतास,
जैसे पीली चूड़ियाँ
गिर रही हों किसी दुल्हन की कलाई से।

गाँव की पगडंडी पर
जब धूप भी सो रही होती है,
तब वह
रंग भरता है उदासी में।

न फूलों का शोर,
न ख़ुशबू का घमंड—
बस पीली परतों में
एक ऋतु की मुस्कान ओढ़े
वह खड़ा रहता है।

लड़कियाँ उसके नीचे
खेल जाती हैं ब्याह-बनाव की कल्पनाएँ,
बुजुर्ग उसकी छाँव में
बीते दिनों की धूप सेंकते हैं।

अमलतास—
केवल फूल नहीं,
एक वक़्त का पुलिंदा है,
जिसमें यादें झरती हैं
धूप की तरह,
धीरे-धीरे,
मौसम के संग।

धतूरा

वह खिला
जैसे किसी तपस्वी की कामना
सिद्ध हो गई हो,
श्वेत पंखुरी में
सन्नाटा ओढ़े
सज गया विष।

धूप ने उसे पूजा,
छाँव ने छुआ तक नहीं।
कोई मधुमक्खी नहीं बैठी उस पर,
न ही किसी तितली ने
अपने पंख खोले।

धतूरा जानता है—
उसकी सुंदरता
किसी को आकर्षित नहीं करती,
बल्कि डराती है।

वह खिला
बिना माँगे प्रशंसा,
बिना खोजे प्रेम।
उसका होना ही
उसकी पहचान है।

कभी शिव की अर्चना में,
कभी किसी झोपड़ी के बाहर
उग आया वह
अभिशाप और वरदान
दोनों की सीमारेखा पर।

वह कहता नहीं,
पर सिखाता बहुत है—
हर सुंदर वस्तु
सुरक्षित नहीं होती,
और हर उपेक्षित फूल
निरर्थक नहीं होता।

चित्र बोलते हैं

दीवार पर टँगा
धूल से ढँका एक चित्र—
जैसे बीते समय ने
अपनी साँसें
काँच में बंद कर दी हों।

जहाँ कभी नन्हें पाँव
धूप में लहराते थे,
वहीं आज
एक सूनी ख़ामोशी
पुरानी लोरी की परछाईं बन गई है।

चित्र बोलते हैं—
जब शब्द चुप होते हैं,
तब वे तुम्हारे भीतर
भूली-बिसरी ऋतुएँ
धीरे-धीरे उगाने लगते हैं।

वह पहली बारिश
जिसमें कोई बचपन भीगा था,
या वो अंतिम विदाई
जिसमें आँसू और आशीर्वाद
एक साथ गिरा था।

चित्र थमे नहीं होते,
वे बहते हैं—
हर नज़र में
एक नई कहानी रचते हुए,
हर मौन में
एक बीता आलाप टांकते हुए।

कभी वे माँ की हँसी होते हैं,
कभी पिता की झुकी पलकें।
कभी कोई ताज़ा उल्लास,
तो कभी कोई
अधूरा स्वप्न।

चित्र बोलते हैं—
अगर तुम सुन सको,
तो हर फ्रेम
एक जीवित आत्मकथा है।

फागुन

फागुन आया नहीं,
पर हवा में रस घुलने लगा है—
सरसों पीली मुस्काई है,
और आम की मंजरियों में गंध बजने लगी है।

गाँव की गलियाँ अब
रंगों की चर्चा करती हैं—
कोई पिचकारी माँज रहा है,
कोई गुलाल सहेज रही है चुपचाप।

और वो—
जो खिड़की से देखती है पगडंडी,
उसका मन भी फागुन हो उठा है।
ना उसने रंग छुआ,
ना होली का हुड़दंग,
फिर भी भीतर कुछ
रंगने लगा है धीरे-धीरे।

फागुन
उसके आँचल में चुपके से घुस आया है—
रोटियों की भाप में,
आँगन की धूप में,
और मन की ओस में।

वो जानती है,
कि ये बसंत एक मौसम नहीं,
बल्कि स्मृति का रंग है—
जिसे कोई प्रेमी
बरसों पहले छोड़ गया था
गुलाल की तरह उसकी हँसी पर।

अब वो फागुन
हर साल लौटता है,
पर उसके साथ
वो नहीं आता…

फिर भी वह मुस्कुराती है,
मिट्टी में रंग घोलती है,
और कहती है—
“पगला फागुन, तू फिर आ गया?”

धूल, धुआँ और सपने

कोलाहल भरी सड़कों पर
अनवरत दौड़ती गाड़ियाँ,
धूल और धुएँ से बोझिल हवा,
हर चेहरे पर थकान की सिलवटें —
जैसे ज़िंदगी
किसी अनजाने मोड़ तक भागती जा रही हो।

सपनों का बोझिल थैला
कंधों पर लादे,
हर कोई अपनी-अपनी मंज़िल की
अनिश्चित तलाश में
निकल पड़ा है।

मशीनों का शोर
रिश्तों की खामोशी पर भारी है।
मोबाइल की नीली रोशनी में
डूबे चेहरे,
और आँखों में कैद
अकेलेपन की परछाइयाँ।

हर दिल में एक अधूरी जगह है,
जिसे कोई भरे,
ऐसी चाह लिए
भीड़ में कोई किसी को
ढूँढता फिरता है।

फिर भी कहीं —
किसी मोड़ पर
एक मुस्कान उगती है,
किसी अनजाने का हल्का सा सहारा,
एक टकराती नज़र
जो कह जाती है —
“मैं हूँ न।”

ये शहर
जो कभी सोता नहीं,
जहाँ सपने सड़कों पर पलते हैं,
जहाँ उम्मीदें भी
धूल और धुएँ से लिपटी
जिंदा हैं।

यहाँ हर कोई है अकेला,
और फिर भी
हर कोई है साथ।
एक साझा तन्हाई
जो सबकी है…
और फिर भी किसी की नहीं।

हरसिंगार

रात की चुप्पी में
चुपचाप झरता है
हरसिंगार।

कोई कोलाहल नहीं,
कोई प्रदर्शन नहीं,
बस मौन में
अपनी सुगंध बिखेरना
जानता है।

अंधकार में भी
जिनकी उपस्थिति
सुगंध से महसूस होती है,
वे हरसिंगार ही होते हैं।

वो संबंध,
वो प्रेम,
वो स्मृतियाँ,
जो जीवन में कभी
मुखर नहीं होते,
पर अपनी सच्चाई से
मौन ही
सब कुछ कह जाते हैं।

प्रेम भी कभी-कभी
हरसिंगार की तरह होता है —
साँझ ढले खिलता है,
रात्रि भर सुगंध देता है,
और प्रातः तक
मिट्टी में मिल जाता है।

ताकि अगले दिन
फिर कोई राहगीर
उन गिरे फूलों को देख
याद कर सके
कि मौन का भी
एक अलग सौंदर्य होता है।

हरसिंगार —
जो प्रेम की तरह
मौसम का मोहताज नहीं,
बस अंतर्मन की ऋतु चाहता है।

पुष्प वाटिका

हर मन के भीतर
एक पुष्प वाटिका होती है।

जहाँ खिले होते हैं
स्मृतियों के रंग-बिरंगे फूल,
कुछ कनेर जैसे कठोर,
कुछ कचनार-से कोमल,
कुछ मुरझाए हुए गुलाब
किसी अनकहे दर्द के साक्षी।

वहाँ बसती है
प्रीत की बेल,
विरह की लताओं में उलझी,
कभी चंपा-चमेली-सी महकती,
तो कभी आक के काँटों में उलझती।

कुछ भावनाएँ
सुगंधित रातरानी-सी
अंधेरे में भी महकती हैं,
और कुछ संबंध
शूलों की तरह उग आते हैं
हर नई कोपल के साथ।

इस वाटिका का माली
हर कोई स्वयं होता है,
कभी प्रेम से सींचता है,
कभी उपेक्षा से सुखाता है।

और उम्र के किसी मोड़ पर
जब कोई अपना
इस पुष्प वाटिका में
पग रखता है,
तो कुछ फूल
अनायास ही झर पड़ते हैं।

ये फूल, ये बेलें,
ये काँटे, ये सुवास —
यही तो है
मनुष्य का भीतर का संसार।

जहाँ जीवन
एक अंतहीन ऋतुचक्र है,
और हर ऋतु
एक नया फूल
गिराती भी है,
उगाती भी।

कचनार

बसंत की आहट से
जब डालियाँ
हल्के गुलाबी सपनों में
भीगने लगती हैं,
तब कहीं झाँकता है
कचनार।

ना वह गुलाब की तरह
चिल्लाता है,
ना पलाश की तरह
जंगल जला देता है।
वो तो चुपचाप
कोमल रंगों में
अपना प्रेम उकेरता है।

हर शाख पर
एक अलक्षित मुस्कान।
जैसे किसी गाँव की
अनजान लड़की
अपने आँगन में
पहली बार खिली हो।

कचनार —
शहर के धुएँ में भी
अपना रंग नहीं खोता।
वो जानता है
मौसम के बादल
हमेशा नहीं घिरे रहते।
एक दिन
हर तरफ़ फिर रंग होगा,
फिर सुरभि होगी।

कचनार का खिलना
सिर्फ़ ऋतु परिवर्तन नहीं,
एक आश्वस्ति है —
कि समय की रूखी डालियाँ भी
कभी-न-कभी
फिर मुस्कुराएँगी।

और जो
हर वक़्त बसंत खोजते हैं —
उन्हें कचनार सिखाता है
कि कभी-कभी
धूप और छाँव के बीच
खुद ही खिलना पड़ता है।

कचनार,
एक प्रेमगीत है
जो हवाओं में लिखा जाता है।
जो हर उस मन का फूल है
जो चीखना नहीं चाहता,
बस अपनी ख़ामोशी में
रंग भरना चाहता है।

सरस्वती वंदना

हे माँ,
कहीं कोई शब्द
मन के कोने में दबी हुई वीणा का स्वर ढूंढ रहा है।
कहीं कोई सपना
अधूरी किताब के पन्नों में स्याही तलाश रहा है।

तुम आओ —
बिखरी हुई चेतना को
अर्थ का वस्त्र पहना दो।
खामोश अक्षरों को
अपने नाम की पुकार दे दो।

माँ,
तुम्हारे बिना
शब्द बस शब्द रहते हैं,
भावों की नाव
मझधार में डगमगाती है।
तुम्हारी छाया
सोच को दिशा देती है,
तुम्हारी मुस्कान
हर प्रश्न का उत्तर बन जाती है।

आज फिर
मन के खाली आँगन में
तुम्हारा आशीष बरसे,
वीणा की तान में
बुद्धि का उजास भर दो।

काग़ज़ की ये कोरी दीवारें
तुम्हारे स्पर्श से बोल उठें।
हर अधूरी कविता
तुम्हारे नाम की वंदना बन जाए।

हे ज्ञानगंगा,
बस इतना कर दो —
कि जब भी कुछ लिखूँ, बोलूँ या सोचूँ,
उसमें सच्चाई की रोशनी हो।
ताकि हर स्वर, हर विचार
अंधेरे से टकराकर
ज्ञान के उजाले से अपने को आलोकित कर ले।

पहाड़ बुलाते हैं

पहाड़ बुलाते हैं—
क्योंकि जीवन की समतलता
एक भ्रम है,
और ऊँचाई तक पहुँचना
एक आंतरिक अन्वेषण।

वे पुकारते हैं…
जब आत्मा अपने ही बोझ से दबी
उत्तर की खोज में भटकती है।
जब प्रश्नों की भीड़ में
मन मौन चाहता है।

पहाड़ जानते हैं—
कि ऊँचाई सिर्फ़ चढ़ाई नहीं,
त्याग है…
हर उस बंधन का,
जो हमें ज़मीन से जोड़े रखता है।

हर शिखर पर खड़ा व्यक्ति
भीतर उतरता है—
क्योंकि सबसे ऊँचे बिंदु पर
मनुष्य अकेला नहीं,
सबसे अधिक अपने पास होता है।

पहाड़ सिखाते हैं—
कि स्थिरता भी एक यात्रा है,
और मौन वह संवाद,
जो शब्दों की पराजय के बाद शुरू होता है।

पहाड़ बुलाते हैं—
उनसे मिलने नहीं,
बल्कि
ख़ुद से मिलवाने के लिए।

जहाँ गूंजता है—
एक अदृश्य संवाद,
कि तुम वही हो
जिसे तुम खोजते रहे।

अखबार वाला

सर्दियों की सुबह,
घना कोहरा,
कपकपाती ठण्ड,
एक पुरानी साइकिल,
जिसमें टँगा है एक थैला,
उस थैले में है…

जिम्मेदारियों का बोझ,
परिस्थितियों की जकड़न,
जीने की उत्कट चाह,
कामनाओं की विवशता,
रिश्तों की मधुरता,
पापी पेट की आग,
मासूमों की ख्वाहिश,
नौनिहालों का उन्मुक्त बचपन,
पथराई आँखों के सपने,
दाम्पत्य के शुष्क अहसास,
सम्बन्धों की संजीवनी,
थोड़े-से अरमान,
पस्त हौसला,
अन्तहीन संघर्ष,
घर वापस जाने की विवशता,
और…

सुबह के बचे हुए अखबार,
जो बिकने से रह गए,
जिसमें छपी हैं
दुनिया भर की खबरें,
पर अफसोस,
पारदर्शी मीडिया की नजर में,
उसका अपना कहीं नाम नहीं है।

बुनियाद

इमारतें सिर उठाती हैं,
मीनारें आसमान से बातें करती हैं,
झरोखे गीत गुनगुनाते हैं,
और दीवारें किस्से कहती हैं।

पर…
इन सबके नीचे
कहीं गुमनाम
धड़कती रहती है —
एक बुनियाद।

जो दिखती नहीं,
पर होती है।
जो बोलती नहीं,
पर हर आंधी से
लड़ती है।

संबंधों की भी
कुछ बुनियादें होती हैं।
मौन में पिघलती,
समर्पण में जीती,
त्याग में सजीव होतीं।

हम अक्सर
दीवारों को रंगते हैं,
छतों को ऊँचा करते हैं,
साज-सज्जा में लगे रहते हैं,
पर भूल जाते हैं
उस अदृश्य बुनियाद को
जो सब कुछ थामे हुए है।

समय की आँधियाँ
जब रिश्तों की दीवारों को
डगमगाती हैं,
तब याद आती है
वही बुनियाद।

जीवन में
कभी-कभी लौटना चाहिए
उसी मिट्टी तक
जहाँ खड़े हुए थे हम।

क्योंकि —
बिना बुनियाद के
किसी भी इमारत का
कोई अर्थ नहीं होता।

जख्म जब राग बनते हैं

तुमने सुना है कभी
उस बाँसुरी का रुदन?
जो हर सुर में
अपना दुःख छुपाती है।

काट कर लाया गया था उसे,
अपने वंशजों की कतार से।
छीन लिए गए उसके पत्ते,
उसकी जड़ें, उसकी मिट्टी।
उसकी देह में छेद कर
बना दी गई वो
सुरों की दासी।

हर शाम
जब कोई उसके छेदों से
प्रेम गीत गाता है,
तब वो रोती है।
हर राग में,
हर तान में
अपना विलाप घोलती है।

लोग कहते हैं —
“क्या मधुर सुर है!”
पर कौन जानता है
कि वो मिठास भी
किसी टूटी आत्मा की आवाज़ होती है।

वो हर रात
अपनी कटाई को याद करती है,
अपनी शाखाओं की
पुरानी छाँव को।
और चाहती है
कि कभी तो
कोई उस पर हाथ न रखे।

बस खामोश पड़ी रहे
अपने जख्मों के साथ।

लेकिन नहीं,
हर बार कोई
उसे उठा लेता है,
और सुरों में
उसका दर्द बुन देता है।

तुम जब अगली बार
बाँसुरी सुनो,
तो ध्यान देना —
उस मीठे स्वर में
छुपा हुआ
वो अनकहा विलाप भी सुनाई देगा।

क्योंकि
संगीत में सबसे सुरीला
हमेशा वही होता है
जिसका दिल टूटा होता।

पर वो रोना संगीत बन गया।
तब जाना —
दर्द जब साँस में ढलता है
तो राग बनता है।

उपग्रह

वात्सल्य की तरलता,
जिम्मेदारियों का घर्षण,
दायित्वों का भार,
कर्तव्यों का नाभिकीय विखंडन।

अंतर्संबंधों का आवेग,
इच्छाओं की अंतहीन पिपासा,
भावनाओं की प्रबलता,
प्रणय का आवेश,
कामनाओं की निर्बाधता।

अनुबंध का गुरुत्वाकर्षण
जब टूटता है,
तो निजता का बोध
धुंधली पृथ्वी की ओर
एक उपग्रह-सा ताकता है।

कभी-कभी
सोचता हूँ—
कहीं मैं भी तो नहीं
अपनी कक्षा से भटका
कोई उपग्रह!

जो रिश्तों के गुरुत्व से छिटक कर
स्वत्व की तलाश में
शून्य अंतरिक्ष में भटकता
अनाम गति का यात्री।

जहाँ न कोई आकर्षण है,
न वर्जना।
बस—
स्मृतियों की परिक्रमा करता
एक अनदेखा चक्र।

धरती हर उपग्रह को
हमेशा नहीं लौटाती,
कुछ…
अज्ञात अंतरिक्ष में खो जाते हैं
और वहाँ भी
अपनी गुरुत्वहीन स्मृतियों के साथ
घूमते रहते हैं… अनंत काल तक।

और मैं,
इन्हीं उलझे, अकथ पथों पर
अक्सर टटोलता हूँ
अपनी पृथ्वी,
अपनी कक्षा,
अपना गुरुत्व।

कि कभी तो कोई सम्बंध
अपनी परिधि का विस्तार करेगा
और मुझे फिर से
अपने गुरुत्व में समेट लेगा।

पर फिलहाल…
मैं उपग्रह हूँ।

धुंधला दर्पण

मैंने देखा ख़ुद को
एक पुराने दर्पण में—
धुंधला, धूल सना,
टुकड़ों में बँटा हुआ।

चेहरा तो मेरा ही था,
पर आँखें अनजानी सी लगीं,
होंठ मुस्कुरा रहे थे,
पर भीतर कुछ रो रहा था।

ये दर्पण,
केवल काँच नहीं था—
ये मेरी यादों की परतें थीं,
अनकहे सवालों की सिलवटें,
और उन निर्णयों की दरारें
जिन्हें समय की हथौड़ी ने
बेआवाज़ तोड़ा।

मैं उसे पोंछना चाहता था,
साफ़ करना,
अपनी असल सूरत देखना चाहता था,
पर डरता था—
कहीं जो दिखे
वो मुझसे भी अधिक अपरिचित न हो!

कभी-कभी सोचता हूँ,
दर्पण ही धुंधला नहीं,
शायद दृष्टि ही धुंधलाई है,
या फिर
हम सब जीते हैं
आधे सच के साथ,
आधी छवि के साथ।

धुंधला दर्पण
मुझसे कहता है—
पहले अपने भीतर उतरो,
तब शायद मैं
तुम्हारा असली चेहरा दिखा सकूँ।

आज की यशोधरा

इस तरह,
निशीथ वेला में,
चुपचाप उठकर,
अँधेरे का फायदा उठाकर,
आँखें बंद किये हुए,
गहन निद्रा में सोयी,
परिणीता के दामन से चिपके हुए
दुधमुँहे बच्चे को अपने लक्ष्य की बाधा मानते हुए
छोड़कर…!

तुम निकल गए स्वत्व की खोज में,
और वापस लौटे तो इस संसार ने
तुम्हें दिया महात्मा का सम्बोधन!
यकीनन बहुत बड़ी उपलब्धि थी,
पर… समय सापेक्ष!
काश, आज आप ऐसा कर पाते?
मैं अकारण ही आपके बुद्धत्व पर
ये प्रश्न-चिन्ह नहीं लगा रहा!
इसके कुछ ठोस कारण हैं
आज की सदी के पास!
मैं देख रहा हूँ तीसरी आँख से,
दिन के उजाले में…!

आज की यशोधरा को,
जो अब अबला नहीं है!
उसने अपने हृदय में केवल,
दया, ममता, वात्सल्य,
करुणा, समर्पण और त्याग
ही नहीं प्रसूत किया है…!
उसने जन्म दिया है अपने हृदय में
मस्तिष्क वाले पुरुषत्व को!
जो चाह रखता है स्वामित्व की!
उसने सिर्फ त्याग की रामचरितमानस
और निष्काम कर्म की गीता ही नहीं पढ़ी!
उसने पढ़े हैं स्त्री विमर्श वाले त्रिपिटक!
उसने पढ़ा है संघर्ष का महाभारत!
उसने रटे हैं अपने अधिकार के पहाड़े!
आज, वो सोयी हुई नहीं है!
आज, वो सजग है!
आज, वो जाग्रत है!
आज, वो लैस है
अपने हक के अधिकार से!

आज अगर महात्मा बनकर
तुम लौटते भरे मधुमास में, तो
याचना करने से भी नहीं मिलता
तुम्हें तुम्हारे प्रेम का प्रतिदान!
इसके विपरीत, तुम्हें
देना पड़ता गुज़ारा भत्ता,
और…!
और…!
और…!
लौटाना पड़ता…!
वो…!
पहली छुवन का अहसास भी,
जो शायद ही तुम दे पाते…!!

नयी पीढ़ी

वो,
जो किताबों की धूल छोड़
स्क्रीन की चमक में
अपना भविष्य तलाश रही है।

जिसकी उंगलियों में
क़लम की स्याही नहीं,
टचस्क्रीन की स्मृति है।

जो इतिहास को
डेटा में देखती है,
और विरासत को
गूगल में खोजती है।

वो नयी पीढ़ी —
जिसके सपनों में
सिर्फ़ ऊँचाई नहीं,
रफ़्तार भी है।
जिसके पास सवाल ज़्यादा हैं,
पर सब्र कम।

जिसके लिए ‘घर’
चार दीवारें नहीं,
नेटवर्क की ताकत है।

वो पीढ़ी
जो परंपरा को
पोंछकर नई परिभाषाएँ गढ़ रही है,
जो रिश्तों के नाम बदल रही है,
और कह रही है —
“हम अपने समय के देवता हैं।”

लेकिन,
कभी-कभी मैं सोचता हूँ,
इनकी आँखों में
जो चमक है,
वो भीतर के अंधेरे को
कब तक छिपा पाएगी?

जब स्मृतियाँ
क्लाउड से मिट जाएँगी,
और पहचान
यूज़रनेम बन जाएगी,
तो क्या बचा रहेगा
इस नयी पीढ़ी के पास?

शायद…
कुछ अधूरी प्रेम कहानियाँ,
कुछ खोए हुए शब्द,
कुछ टूटे हुए सपने,
और बची रह जाएगी
वो तलाश —
जिसे कोई एप डाउनलोड नहीं कर सकता।

देहरी

यह देहरी,
सिर्फ़ घर की सीमा नहीं,
यह वो बिंदु है,
जहाँ से जीवन का हर पल,
हमारी आंतरिक यात्रा को आकार देता है।
हर कदम, हर श्वास,
यहीं से निकलता है।
यहीं से शुरू होती है वह यात्रा,
जो हमें अपने अस्तित्व की तलाश में ले जाती है।

नन्हें कदमों से जो कभी गूंजता था,
वह अब उस देहरी पर खड़ा,
सोचता है—
क्या मैंने सच में अपना रास्ता खोज लिया है?
क्या मैं उस सत्य तक पहुँच सका हूँ,
जो भीतर था, बाहर से छिपा हुआ?

यह देहरी कोई अंतर नहीं,
सिर्फ़ एक प्रतीक है—
हमारे भीतर की यात्रा का,
जहाँ हम खुद को तलाशते हैं,
और एक दिन,
उस ठंडी, शान्ति से भरी देहरी के पार,
सभी उत्तर मिल जाते हैं।

यह देहरी न केवल एक सीमा है,
यह एक समझ है—
समझ, जो हमें अपनी यात्रा से मिलती है।
जब दुनिया के शोर में
हम खड़े होते हैं इस देहरी पर,
तो हमें एहसास होता है कि
हर चीज़ को छोड़कर
सिर्फ़ एक ही चीज़ मायने रखती है—
आत्मा की शांति।

यह देहरी,
जिसे हम अक्सर पार करने का सोचते हैं,
असल में हमसे कहती है—
“रुको, भीतर की यात्रा को महसूस करो,
आत्मा की गहराई में उतरकर,
सत्य को पहचानो।”

हर देहरी,
हर संधि स्थल,
सिर्फ़ एक द्वार नहीं,
एक मार्ग है—
संसार और आत्मा का मिलन,
जो हमें हर बार
नई दृष्टि देता है,
नई समझ,
नई दिशा।

मैं हवा हूँ

मैं धीरे से,
चुपके से,
तुम्हारे पास आकर,
अपनी हल्की-सी छुवन से
तुम्हें आनंदित करती हूँ।
तुम्हें सहलाती हूँ,
तुम्हारे जिस्म की तपन को
अपने में समेट लेती हूँ।

बदले में,
मैं तुम्हें देती हूँ,
असीम आनंद,
असीम तृप्ति,
और तुमसे दूर चली जाती हूँ।
अचानक, तुम कुछ महसूस करते हो,
दौड़ते हो,
मुझे छूने के लिए।

पर तुम कुछ सोच कर रुक जाते हो,
शायद तुम जान गए हो,
कि मैं सिर्फ़ अहसास हूँ,
तुम्हारे आसपास हूँ।
तुम मुझे देख नहीं सकते,
तुम मुझे अपनी बाँहो में समेट नहीं सकते,
तुम मेरा जिस्म छू नहीं सकते,
क्योंकि मैं अनछुई हूँ।

बताओ, बताओ, बताओ,
मैं कौन हूँ?
शायद,
मैं ‘हवा’ हूँ।

तृप्ति अभी शेष है

पावस की रिमझिम फुहार,
दादुर की टर्राहट,
झींगुर का आलाप,
कोयल की कूक,
मयूर का नृत्य,
पपीहे की पीन पुकार,
परिंदों की उन्मुक्त उड़ान,

घटाओं से घिरा आसमान,
पवन का वेग,
बादलों की धक्कामुक्की,
धरती की बेचैनी,
पृथ्वी के वक्ष को चीर कर
निकला अंकुर,
कोमल हरित तृण,
धुले हुए पत्ते,
नवीन कोंपल,

कसमसाई नदी की देह,
लहरों की बेताबी,
किनारों को दरेरने की चाहत,
आकुल प्रेमीजन,
प्रतीक्षा का सावन,
नवयौवना का अँगड़ाई लेता भीगा हुआ तन,
अल्हड़ मस्ती, मादक अदा,
परदेसी-प्रियतम की राह देखती विरहिणी,
नायिका का इंतजार,
नवोढ़ा के नूपुर की झनकार,
चूड़ियों की खनक,
हथेलियों की हिना,

मिलन-यामिनी, प्रणय-प्रहर,
बिस्तर की सलवटें,
टूटता बदन,
अलसाई सुबह,
अधबुझी कामनाएँ,

सभी तो यही कह रहे हैं,
एक साथ, एक स्वर में,
कि…
तृप्ति अभी शेष है

सावन में सूनी साँझ

इस सावन,
न तो बादलों की गड़गड़ाहट में मधुरता है,
न बारिश की बूँदों में वह स्निग्धता —
हर बूँद
एक-एक कर गिरती है,
जैसे तुम्हारे लौटने की उम्मीदें…
धुलती हुई,
मिटती हुई।

चौखट पर बैठी हूँ —
पलकों की कोर पर तुम्हारी प्रतीक्षा टिकाए,
हर आहट पर मन काँप उठता है
और फिर…
सब कुछ शांत हो जाता है
जैसे भीतर कोई टूटकर बैठ गया हो।

काँच की चूड़ियाँ अब भी खनकती हैं,
पर वह सौंदर्य नहीं रहा
जो तुम्हारी मुस्कान से जग उठता था।
अब वो खनक
एक अकेली आवाज़ है —
जिसे कोई सुनने वाला नहीं।

सिंदूर की डिबिया
उसी स्थान पर रखी है —
पर अब वह
सुबह की किरण जैसा नहीं चमकता,
बस प्रतीक्षा की राख समेटे
चुपचाप पड़ा है।

आँगन की तुलसी
धीरे-धीरे मुरझाने लगी है —
शायद वह भी थक गई है
हर दिन तुम्हारे नाम की बाती जलाते हुए।
और मैं…
मैं अब नहीं रोती
शब्दों में,
न ही आँखों से —
मैं बस
साँसों के साथ तुम्हारी स्मृतियों को जीती हूँ।

सखियाँ कहती हैं —
“सावन तो प्रिय के लौटने का मौसम है!”
पर वे क्या जानें
कि हर ऋतु,
जब प्रिय दूर हो,
विरह का विस्तार भर होती है।

तुम्हारे बिना यह सावन
एक लंबी साँझ बन गया है —
न तो दीप जलते हैं,
न मन की देहरी पर उजास उतरता है।
बस धुँधलका है —
ठहरा हुआ,
नीरव,
जिसमें
दिशाएँ भी खो गई हैं,
और प्रतीक्षा भी
एक चुप विलाप बनकर रह गई है।

फुहार

नर्म घास पर नंगे पाँव चलते हुए
अचानक छू जाती है एक बूँद—
ना जाने किस दिशा से आई,
किसका भेजा हुआ संदेशा थी।

पेड़ों की पत्तियाँ
जैसे सहम कर मुस्कुराती हैं,
बिलकुल वैसे ही
मन की थकी हुई शाखों पर
छनकर गिरती है वह पहली फुहार।

धरती कुछ नहीं कहती,
पर उसकी चुप्पी में
एक पुलक होती है—
जैसे बरसों की प्रतीक्षा
अब शब्दों में नहीं,
माटी की गंध में बोल रही हो।

बच्चे दौड़ पड़ते हैं—
न माँ की पुकार सुनते हैं,
न छाता याद रखते हैं;
उनके लिए
हर फुहार एक उत्सव है,
हर भीगना एक स्वतंत्रता।

खिड़की से झाँकती वह स्त्री
धीरे से हँस देती है,
बचपन की कुछ पुरानी तस्वीरें
भीगने लगती हैं भीतर ही भीतर।
एक पुराना नाम—
धूल के नीचे दबा हुआ
फिर से उभर आता है
बूँदों की रेखाओं में।

कविता लिखने बैठा कवि
कागज़ बंद कर देता है,
वह जानता है—
कुछ अनुभूतियाँ
कविता नहीं बनतीं,
सिर्फ चुपचाप
भीगने के लिए होती हैं।

रहट

खेत के कोने में अब भी
जंग खाई एक रहट खड़ी है—
बिलकुल वैसे ही
जैसे दादी की कहानियाँ
जो अब कोई नहीं सुनता।

कभी
उसकी साँकलें गूंजती थीं
गायों के रंभाने और
कुएँ के जल की टप-टप संग—
कभी यह धुरी थी
गाँव की धड़कनों की।

वह बैल,
जिसकी आँखों पर पट्टी बंधी होती,
जानता था
घूमना ही उसकी नियति है—
फिर भी
हर चक्कर में
पानी उलीचता रहा
किसी और की प्यास बुझाने को।

रहट
सिर्फ एक यंत्र नहीं थी—
वह श्रम का संगीत थी,
वह विश्वास थी
कि हर मेहनत का फल
अंततः जीवन देता है।

अब वह चुप है—
उसके काँधे थक चुके हैं,
साँकलें चुपचाप जंग खा रही हैं,
और
बैल की जगह अब
मशीनें हैं
जिनमें संवेदनाएँ नहीं।

चूड़ियाँ

चूड़ियाँ—
केवल काँच की खनक नहीं,
एक गहना नहीं,
बल्कि एक जीवित धारा हैं,
जो हर हरकत में
महकती हैं, गूंजती हैं,
याद दिलाती हैं
उस प्रेम का,
जो कहीं भीतर
चुपके से बस गया है।

पहनने पर नहीं लगता
कि ये सिर्फ़ आभूषण हैं,
हर खनक में
एक कहानी छिपी होती है—
सपनों की, संघर्ष की,
संस्कारों की और इच्छाओं की।

चूड़ियाँ—
हर उँगली में बंधे अहसास की आवाज़,
हर खनक में गूंजती
चुप सी एक गाथा।
इन्हें पहने बिना
क्या कोई औरत
सचमुच पूरी हो सकती है?

रातों को जब चाँद
चुपके से छत से
दूर तक अपनी रौशनी फैला देता है,
तो ये चूड़ियाँ भी
संगीन ख़्वाबों की तरह
सपनों में रंग भर देती हैं।
सपने—
जिनमें दफ़न होती हैं
उम्मीदें, डर और इच्छाएँ।

कभी चूड़ी की आवाज़
गाँव की मिट्टी में मिलती है,
तो कभी शहर के गलियों में,
हर कदम, हर रास्ता
इनकी ध्वनियों से जुड़ा होता है,
सिर्फ़ एक चुप्पी के साथ
जो कभी किसी ने नहीं सुनी।

चूड़ियाँ—
हर टूटे हुए पल में
हमें याद दिलाती हैं
कि यह दुनिया केवल काँच से बनी नहीं,
बल्कि मन के उन हिस्सों से बनी है
जो टूटकर भी
सुर और समृद्धि का गूढ़ संदेश देते हैं।

चूड़ियाँ—
न सिर्फ़ ध्वनि हैं,
बल्कि वे हमारे अस्तित्व का
संकेत हैं,
एक बेतहाशा भागते हुए समाज में
वह राग, जो हमें
शांत और सजीव बनाये रखता है।

महावर

पाँवों की अँगुलियों के बीच
सजती है एक लाली—
महावर।
न लिपस्टिक, न सिंदूर,
फिर भी
शृंगार का सबसे मौन
और सबसे गूढ़ प्रतीक।

विवाह के पहले दिन
जब माँ ने
अपनी उंगलियों से
मेरे पाँवों पर उसे लगाया,
तो लगा—
प्रेम की पहली भाषा
शब्दों में नहीं,
रंगों में उतरती है।

महावर—
जो सिर्फ़ सजावट नहीं,
एक संकेत है
कि अब ये पाँव
किसी और की दहलीज़ के लिए
अर्पित हो गए हैं।

पर क्या सिर्फ दहलीज़ों तक सीमित है महावर?
या वह एक चलती स्त्री की थाती है—
जो हर पदचिन्ह में
अपना समर्पण छोड़ जाती है?

उसकी गंध में होती है
हल्दी, चंदन, आँच और अश्रु,
जिसे वह पहनती है
बिना शोर के—
हर मौसम में।

जब महावर फीकी पड़ने लगे,
तो समझ लेना—
स्त्री ने मुस्कानें ओढ़ रखी हैं
पर उसके भीतर
प्रेम की कोई रेखा
धीरे-धीरे मिट रही है।

महावर केवल रंग नहीं,
वह वो अस्फुट भाषा है
जिसमें स्त्री अपनी चुप्पियाँ
हर रोज़ कहती है—
पाँवों के नीचे,
लाल रेखाओं में।

“हिंदी – मन की भाषा”

हिंदी,
तुम सिर्फ़ एक भाषा नहीं,
एक लय हो
जो जन्म लेती है माँ की लोरी में,
और घुल जाती है
बचपन की पहली बुदबुदाहट में।

तुम वह आहट हो
जो खेतों में फसलों के साथ लहलहाती है,
जो लोकगीतों की तरह
हर मौसम को अर्थ देती है।

तुम पहाड़ की चट्टानों पर
बहती हुई नदी हो,
जो न रुकती है, न झुकती है,
बस चलती रहती है —
अपनी ही धारा में।

तुम्हें सीखना नहीं पड़ता,
तुम तो
सांसों के साथ भीतर उतरती हो,
और
आँखों के रास्ते भाव बनकर बह जाती हो।

आज जब दुनिया
तेजी से बदल रही है,
जब शब्द
अक्षरों से नहीं, संकेतो से बनते हैं,
तब भी
तुम अपने मौन में बोलती हो
और शोर में भी —
शब्दों की गरिमा बचा लेती हो।

हिंदी,
तुम भविष्य नहीं हो —
तुम वर्तमान हो,
इस मिट्टी की पहचान हो,
हमारी चेतना की आवाज़ हो,
हमारे होने की भाषा हो।

कमरबंद

मैं कमरबंद हूँ—
शृंगार नहीं,
एक अनकहा अनुबंध हूँ
देह और सामाजिक मर्यादा के बीच।

सोने-चाँदी से गढ़ा गया मेरा रूप,
किन्तु मेरा भार—
बस धातु का नहीं होता,
वह होता है
परंपराओं का,
जिन्होंने स्त्री की कमर पर
सदियों से अधिकार जमाया है।

कभी चुपचाप खनक उठती हूँ
उसके हर एक मोड़ पर,
उसकी चाल में—
शालीनता का संगीत बनकर,
तो कभी बंध जाती हूँ कसकर
उसकी स्वाभाविक उड़ानों को
संयम की जंजीर में।

मैंने देखा है
उसका बचपन—
जब पहली बार पहनाया गया मुझे
एक खेल की तरह,
और फिर
उसका यौवन—
जब खेल नहीं,
एक नियति बन गई मैं।

मैंने सुना है
उसका मौन—
जब वह
सजते हुए भी
भीतर से सिमटती थी,
मुझे ढोते हुए भी
अपनी पहचान तलाशती थी।

मैं हूँ—
जो उसके हर उत्सव में साथ रही,
पर हर विद्रोह में अकेली छूट गई।

अब समय है—
कि मुझे पहनते हुए
वह चुन सके अपनी मर्यादा स्वयं,
कि मैं गहना बनूं,
बंधन नहीं।

मनीप्लांट

वो नहीं छाता दीवारों पर,
न दिखता है आँगन के बीचों-बीच,
बस किसी कोने में
धीरे-धीरे चढ़ता रहता है—
जैसे कोई पुरुष,
जो रोज़ थकता है,
पर कहता कुछ नहीं।

मनीप्लांट की तरह
वो भी रोशनी नहीं माँगता,
सिर्फ़ थोड़ी-सी नमी चाहिए—
एक विश्वास,
कि जो कर रहा है,
उसकी कोई क़ीमत है।

काँच की बोतल में जड़ें जमाकर
वो सब थाम लेता है—
घर की दरकती दीवारें,
बिखरती प्राथमिकताएँ,
और बच्चों के बीच
अपना नाम तक खो बैठता है।

वो बेल की तरह
सजावटी नहीं होता,
पर जब वो न हो—
घर सूना लगता है।

वो न शिकायत करता है,
न श्रेय लेता है—
बस हर रोज़
अपना सिर झुकाकर
दीवार से सटा रहता है,
ताकि घर की खूबसूरती बनी रहे।

मनीप्लांट की सबसे बड़ी कला यही है—
वो साथ देता है,
सहारा देता है,
पर कभी आगे नहीं आता।

ऐसे ही होते हैं वो पुरुष,
जो घर की हर चीज़ को थामे रखते हैं,
बिना कभी खुद को दिखाए।

पहला सावन

पहला सावन था उसका…
और पहली बार
उसने बिन पूछे भीगने की हिम्मत नहीं की।

पीहर की छतों से जो बूँदें
हँसते हुए नीचे उतरती थीं,
यहाँ…
ससुराल के आँगन में
वे संकोच में ठिठकी हुई लगती थीं।

नीम के नीचे खड़ी वो,
भीतर से गीली
पर बाहर से सधी हुई—
जैसे कोई नई बेल,
जो दीवार पकड़कर चढ़ना सीख रही हो।

उसकी आँखों में
राखी का धागा लहराता रहा,
भाई की छत,
माँ की चाय,
और बप्पा की वो पुकार—
“बरखा आई बिटिया, भीग मत जाना…”

अब वो खुद कहती है—
“भीग नहीं सकती,
घूँघट भारी हो जाएगा।”

साड़ी का रंग तो हरा था,
पर मन में सावन नहीं था…
केवल परछाइयाँ थीं—
रिवाज़ों की, परंपराओं की,
और उन आँखों की
जो हर मुस्कान को तौलती हैं।

रसोई में खड़खड़ाते बर्तन
और बाहर बूँदों की ताल—
उसका पहला संगीत था विवाह के बाद का।

और फिर…
एक बूँद
उसके खुले पाँव पर गिरी,
जैसे माँ का हाथ
धीरे से सहला गया हो—

वो ठिठकी,
नज़र उठाई,
और एक पल को
सावन को अपने भीतर आने दिया।

पहला सावन
उसके लिए
एक मौन संस्कार था—
जहाँ हँसी दबा ली जाती है,
पर मिट्टी पर एक नई जड़ जमती है।

बरगद का पुरुषत्व

वो पीपल नहीं,
जो पूजा जाए,
ना नीम,
जिसकी कड़वाहट सब पहचानें—
वो बरगद है…
जिसकी जड़ें
धरती के भीतर भी फैली हैं,
और ऊपर भी
छाँव की एक मौन व्यवस्था बनाती हैं।

वो नमी नहीं माँगता,
ना तालियों की गूंज चाहता है—
बस खड़ा रहता है
हर मौसम, हर मिज़ाज में—
बिना हिले, बिना बोले।

बरगद—
हर गाँव का पुरखा,
हर आँगन की छाँव,
हर थके इंसान का टेक।

जैसे वो पुरुष,
जो कभी थकता नहीं,
कभी झुकता नहीं,
बस
कंधों पर छत,
और आँखों में
सबके लिए भरोसा रखता है।

उसे मालूम है,
हर शाख पर कोई ना कोई टिका है—
बेटा, पिता, भाई, या बूढ़ी माँ,
और उसकी छाया
कभी छुट्टी नहीं लेती।

वो चुप है,
पर मौन नहीं—
उसकी हर जड़
जैसे कहती है—
“अगर मैं हिला,
तो ये घर,
ये गाँव,
ये पूरा कुल-समाज
डगमगा जाएगा।”

बरगद कभी
“आई लव यू, डैड” नहीं सुनता,
ना उसे फूलों का दिन चाहिए—
पर फिर भी
हर बेटे की राह
उसी की छाँव में बनती है।

बरगद का पुरुषत्व
सिर्फ तन में नहीं,
धैर्य में है,
जो आँधी में भी
शांत खड़ा रहता है—
अपनों की ओर पीठ नहीं करता।

कनेर

वो गुलाब नहीं,
जो इत्र बन जाए,
ना कमल,
जो पूजा की थाली में सजे—
वो कनेर है…
धूप सहता, अकेला खिलता,
बिना माँग के रंग बिखेरता।

कोई नमी नहीं ज़मीन में,
ना पास कोई झरना,
पर फिर भी
हर गर्मी में
वो अपनी शाखों से
रंग निकाल ही लाता है।

जैसे कोई पुरुष,
जो हर संकट में
अपनी हँसी से घर को थाम लेता है।

उसके पत्ते
ना नर्म हैं,
ना चिकने—
वे तो जैसे
जिम्मेदारियों के मोटे पंजे हैं,
जो हर आँधी को झेलते हुए
जड़ों से कह देते हैं—
“मत हिलना।”

बच्चे उसे फूल नहीं मानते,
क्योंकि उसमें गंध नहीं,
पर उन्हें नहीं पता—
वो जो पिता दरवाज़े पर
धूप में खड़ा है,
वही घर की छाँव है।

कनेर कभी शिकायत नहीं करता,
क्योंकि उसने आदत डाल ली है—
दीवार से टिककर
भीतर खिले रहने की।

वो कभी दीवार की दरार में उग आता है,
तो कभी रेल की पटरी के पास—
जैसे वो पुरुष
जो ज़िंदगी के हर कठिन कोने में
अपनी जगह बना लेता है।

कभी-कभी
जब सब सो जाते हैं,
तो वो अपनी शाखें
थोड़ी सी हिला देता है—
जैसे कह रहा हो—
“मैं भी हूँ…
बिना माँगे खिला हुआ।”

वो कनेर है—
खुशबू नहीं,
पर सहारा है।

राम की आत्मग्लानि

राजसिंहासन पर बैठे थे राम,
पर भीतर एक शून्य पसरा था—
जिसमें हर दिन सीता की चुप्पी
गूँजती थी—
ठीक शंखनाद के बाद की निस्तब्धता जैसी।

उन्होंने धर्म निभाया था,
पर क्या इंसान भी रह पाए?

राजधर्म के नाम पर
उन्होंने छोड़ दिया था वह स्त्री,
जो जंगल से अग्नि तक
हर कसौटी पर खरी उतरी थी।

प्रजा की बातों से डर गया था राजा,
और पति…
वो तो उस दिन मर ही गया था
जब सीता को “शुद्धि” के लिए
अग्नि में खड़ा किया।

राम अकेले थे—
जनकपुत्री तो चली गई धरती में,
पर राम हर रात
अपने निर्णय के जलते अक्षरों को पढ़ते रहे।

मंदिरों में भगवान हैं वो,
पर मन के भीतर
कभी-कभी सिर्फ़ एक टूटा हुआ प्रेमी।

राम जानते थे—
उनका सबसे बड़ा युद्ध रावण से नहीं,
सीता से आँख मिलाने में था।

उनके हर यशगान के नीचे
एक चुप आर्त स्वर छिपा है—
“मैं राजा तो था,
पर शायद अच्छा प्रेमी नहीं बन पाया।”

राम की आत्मग्लानि
कभी अश्रु बनकर नहीं बही,
वो मर्यादा के भीतर दफ़न रही।

और यही वो चुप्पी है,
जिसमें हर युग की स्त्रियाँ
अपना जवाब ढूँढती हैं।

अग्निपरीक्षा

वो खड़ी थी,
हज़ारों आँखों के बीच
एक चुप्पी की चिता पर—
सिर ऊँचा, पाँव नंगे,
और रेखाएँ आग से लिपटी हुईं।

राम बोले थे—
“संदेह का कोई स्थान नहीं,
पर जनता का विश्वास ज़रूरी है।”

और सीता हँस दी थी—
वो हँसी नहीं थी,
वो एक चटकती हुई अस्मिता थी
जो अग्नि में क़दम रखने जा रही थी,
सिर्फ़ प्रेम नहीं— पृथ्वी की गवाही लेकर।

आग ने जलाया नहीं,
बस परखा—
और चुपचाप लौट आई
एक स्त्री की गरिमा में नहाई।

पर प्रश्न वही रहा—
सिद्ध क्यों करना पड़ा?
और किसके लिए?

युग बीत गए,
रामायणों के पन्ने पीले हो गए,
लेकिन सीता की अग्निपरीक्षा
आज भी जारी है—

जब कोई लड़की
रात को अकेली घर लौटती है,
या बिना सिंदूर के सिर ऊँचा करती है,
या मायके में मुस्कुरा देती है—

तब समाज पूछता है—
“क्यों? कैसे? किस अधिकार से?”

पर आज की सीता चुप नहीं रहती।
वो कहती है—

“मैं अब अग्नि में नहीं उतरूँगी—
अगर प्रेम पर संदेह है,
तो परीक्षा तुम्हारी होगी।”

अब अग्नि भी उसकी है,
ज्वाला भी, और उजास भी।

लक्ष्मण रेखा

वो खींच दी जाती है—
बिना पूछे, बिना कहे।
दरवाज़ों के चौखट पर नहीं,
बल्कि मन और सपनों के बीच।

कभी कहा जाता है—
“ये तेरी सुरक्षा है,”
कभी— “मर्यादा,”
पर असल में वो
डर और नियंत्रण का एक और नाम है।

राम जंगल जा सकते हैं,
लक्ष्मण साथ हो सकते हैं,
पर सीता के लिए रेखा है—
जिसे लांघना ‘पाप’ कहलाता है।

कोई नहीं पूछता,
कि अगर रावण रेखा के पार खड़ा है,
तो क्या चुपचाप खड़े रहना धर्म है?
या आवाज़ उठाना अधर्म?

आज भी खींची जाती हैं रेखाएँ—
दुपट्टे की लंबाई में,
ऑफिस की टेबल पर,
रात के समय और स्त्री की हँसी में।

पर अब सीता मौन नहीं है—
वो रेखा देखती है,
और सवाल करती है—

“जो मर्यादा मुझे बाँधती है,
क्या वही तुम्हारे लिए भी है?”

अब वो रेखा मिटाई जा रही है—
धीरे-धीरे, कदम दर कदम—
जहाँ स्त्री
सिर्फ़ भीतर की नहीं,
दुनिया की रानी बन रही है।

पांचाली

वो पांच पथों से आई थी
पांचाली बनकर,
पर हर राह ने
उसे कहीं न कहीं
चीर दिया था।

सभा में खड़ी थी वो—
आँखों में ज्वाला, पर हाथ खाली।
एक स्त्री अकेली,
और सत्ता पुरुषों के हाथ में
जिन्हें धर्म याद आया,
पर न्याय नहीं।

वो चुप रही,
क्योंकि उसे सिखाया गया था
कि “सीता की तरह सहना”
ही नारी का धर्म है।
पर भीतर—
एक अग्निकुंड लगातार धधकता रहा।

पांचाली अब राजमहल में नहीं,
वो बसों में, दफ़्तरों में, खेतों में,
स्कूलों और सोशल मीडिया में है।

जहाँ कोई उसकी हँसी छीनने आता है,
वो फिर खड़ी होती है—
ना रोती है,
ना गिड़गिड़ाती है।

वो अब खुद चीर बढ़ा सकती है,
या तान सकती है तलवार।
कृष्ण अब भीतर है—
उसकी आत्मा में
संकल्प बनकर।

पाजेब

जब वो चलती है
कच्ची पगडंडी पर,
तो मिट्टी की चूड़ी सी बज उठती है —
उसकी पाजेब।

न कोई बैंड, न बाजा,
पर जब खेतों के किनारे से
वो गुजरती है,
तो लगता है जैसे
सारी धरती उसकी ताल में थिरक रही हो।

पाजेब —
उसके बचपन की निशानी है,
जो माँ ने ब्याह के दिन पहनाई थी
कहते हुए:
“अब तेरे क़दमों की आवाज़
तेरे घर की पहचान होगी।”

वो जब थकी हुई चलती है,
तो पाजेब भी थक जाती है।
जब वो गुस्से में चलती है,
तो पाजेब झुंझलाती है।
और जब वो चुपचाप रोती है,
तो वही पाजेब
सबसे पहले उसकी बात समझती है।

पाजेब कोई गहना नहीं,
वो उसकी सखी है—
जो हर दुख-सुख में साथ चलती है।

जब प्रेमी उसे दूर से देखता है,
तो आँखों से पहले
उसके कान पहचानते हैं —
पाजेब की रुनझुन।

और जब वो एक दिन
नंगे पाँव चलती है—
तो घर, आँगन, गली
सब पूछते हैं:
“आज पाजेब क्यों नहीं बोली?”

क्योंकि पाजेब सिर्फ़ चलने की नहीं,
चुपचाप बोलने की चीज़ है।
और कभी-कभी
किसी स्त्री की सबसे गहरी आवाज़
उसके पाँवों से आती है।

महकती सुबह

सबसे पहले जागता है
मुर्गे की बांग में लिपटा समय,
फिर धीरे-धीरे
मिट्टी की खुशबू में खुलती हैं आँखें—
बिल्कुल वैसे
जैसे माँ की गोद से उठता है बच्चा।

गाय की रँभाहट,
दूध की बाल्टी में पड़ती धार की आवाज़,
और तुलसी पर पड़ती पहली धूप—
ये सब मिलकर
गाँव की सुबह को
महका देते हैं जैसे
किसी गीत का पहला स्वर।

ओस से भीगी पगडंडियाँ,
हल्की धूल में लिपटे पैर,
और खेतों की हरियाली में
छुपे अनगिनत सपने—
हर चीज़
बिना बोले कह देती है:
“नया दिन है, कुछ भी हो सकता है।”

दादी तुलसी को जल देती हैं,
माँ आँगन बुहारती है,
और पिता
हल को सीधा करते हुए
आकाश की ओर देख
कोई मौन प्रार्थना करते हैं।

और तभी

पूरब से आती है वो रोशनी—
जो सिर्फ़ उजाला नहीं लाती,
बल्कि जीवन को
फिर से सार्थक बना देती है।

महकती सुबह
सिर्फ़ एक समय नहीं होती,
वो एक संवेदना होती है,
जो कहती है—
“चलो फिर से जी लें,
जैसे आज पहली बार जिएँ।”

मनिहारिन

आती है हर तीसरे चौथे दिन,
टोकरी में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ लिए—
लाल, हरी, पीली, नीली…
जैसे मौसम की सारी भाषा
उसकी हथेली में सजी हो।

“चूड़ियाँ लो बहना…”
उसकी आवाज़ में कोई साधारण पुकार नहीं होती,
वो मानो हर स्त्री के मन की
कोई भूली हुई धुन छेड़ देती है।

वो जानती है
कौन-सी लड़की की सगाई तय हो चुकी है,
कौन विधवा है,
कौन रूठी हुई है,
और किसके हाथों में हरी चूड़ियाँ
अब शोभा नहीं देतीं।

वो चूड़ियाँ नहीं बेचती,
वो यादें पहनाती है।

उसके पास ना कोई मोबाइल है,
ना ही व्हाट्सएप,
पर गाँव की हर स्त्री की
खबर उसी के पास होती है।

वो हँसती है सबके साथ,
पर खुद की कहानी
कभी नहीं सुनाती।

शायद उसकी टोकरी में
उसके हिस्से की चूड़ियाँ
अब नहीं बचीं…

वो मनिहारिन

सिर्फ़ बाज़ार की महिला नहीं,
वो एक चलता-फिरता
स्त्री-संवेदना का संग्रहालय है।

आँगन

घर की छत से ज़्यादा
मुझे याद है वो आँगन,
जहाँ न दिन था, न रात,
बस जीवन था— खुला, बेलौस।

वहीं से शुरू होती थी
हर सुबह की पहली पुकार—
“जग जा बेटा, भोर हो गई!”
और वहीं बैठ कर
दादी सुनाती थीं
रूपकथाएँ और लोकगीत।

आँगन में तुलसी का चौरा था,
जो किसी मंदिर से कम नहीं।
और वो खटिया,
जिस पर बैठ
पिता रात के तारों से
सपनों की दिशा पूछते थे।

वहीं खेलते-झगड़ते
भाई-बहन बड़े हो गए,
और वहीँ
बरसों बाद
बिदाई में कोई आँचल भी भीग गया।

अब फ्लैट है,
बालकनी है,
पर आँगन नहीं है।

जहाँ मिट्टी थी,
वहाँ मार्बल है।
जहाँ रिश्ते थे,
अब बस नेटवर्क है।

आँगन वो जगह थी

जहाँ घर “घर” लगता था,
अब बस चारदीवारी है—
साफ़, सुंदर, लेकिन खाली।

आँगन मिट गया है,
पर मन अब भी
उसी कोने में बैठा है—
जहाँ कभी घर साँस लेता था।

नेपथ्य में

मंच पर जो बोलते हैं,
वो नहीं जानते—
कि शब्दों का वज़न
नेपथ्य में उठाया गया था।

जो मुस्कराहटें दी जाती हैं सबसे सामने,
वो किसी ने आँसू पीकर सँवारी थीं—
चुपचाप, बिना श्रेय के।

घर में जो सबसे ज़्यादा बोलते हैं,
वो नहीं सुनते
उनकी खामोशी,
जो रसोई से बैठक तक
हर कोना बुहारती है,
बिना मंच की तालियों के।

संयुक्त परिवार का वो सबसे बुज़ुर्ग,
जो अब कोने में रहता है,
कभी वही था
जिसकी छाँव में
पूरा आँगन फलता-फूलता था।

आज जब रिश्ते ‘स्क्रीनशॉट’ बनते हैं,

नेपथ्य में अब भी कोई
रोटियों की संख्या गिनता है,
ये देखे बिना कि
इंस्टाग्राम पर ‘डिनर’ कितना सुंदर दिखा।

नेपथ्य में हैं—
माँ की अधूरी नींद,
पिता की टूटी चप्पल,
भाई की छोड़ी हुई नौकरी,
बहन का त्यागा हुआ सपना।

परदे के आगे

जो दिखता है,
वो केवल एक दृश्य होता है,
ज़िंदगी नहीं।

और एक दिन
जब मंच ढह जाएगा—
नेपथ्य में खड़ा वही सच
सबसे ऊँचा दिखाई देगा।

परिधि और त्रिभुज

मैं अब एक परिधि बन गई हूँ,
जिसका केंद्र कहीं खो गया है।

तुम्हारे साथ जो जीवन था,
वो त्रिकोण जैसा था—
मैं, तुम और आसमान।

तुम चले गए,
तो एक कोण टूट गया।
अब जो भी जोड़ती हूँ,
वो त्रिभुज नहीं बनता,
बस टूटी हुई रेखाओं का
एक अधूरा चित्र बनता है।

गाँव की हर गली अब
मेरी परिधि के बाहर लगती है,
और लोग
मेरे भीतर झाँकते हुए
बस सवाल छोड़ जाते हैं।

खेतों के किनारे जो मेंड़ें थीं,
कभी हमारी योजनाओं की रेखाएँ,
अब वो भी
किसी गणित की तरह
असमाप्त प्रश्न बन गई हैं।

मैं अब रोटियाँ नहीं बेलती,
मैं वृत्त खींचती हूँ—
हर एक में तुमको खोजते हुए।

पिया,

तुम्हारे बिना
सारे आकार
बेमानी हो गए हैं।

अब बस
मन के काग़ज़ पर
एक त्रिभुज अधूरा पड़ा है,
और उसकी परिधि पर लिखा है —
‘तुम कब लौटोगे?’

चाँदनी रात

चाँद फिर निकला है,
ठीक वैसा ही —
जैसे तुम जाते वक़्त
मेरे माथे पर हाथ रख के बोले थे,
“जल्दी लौटूँगा।”

पर वक़्त बीत गया पिया,
और चाँद
अब मेरे आँचल पर
सिर्फ़ उजास नहीं,
विरह का सफ़ेद सन्नाटा बिछाता है।

आँगन की तुलसी सूखी नहीं है,
पर उसमें अब वो हरियाली नहीं,
जो तुम्हारे बोलों से आती थी।

चूल्हा जलता है रोज़,
पर रोटियाँ अब गोल नहीं बनतीं,
जैसे मेरे मन की परिधि
तुम्हारे बिना टूटी हुई हो।

गाय का बछड़ा
बार-बार दरवाज़े तक देखता है,
जैसे उसे भी यकीन हो
कि कोई आएगा—
लेकिन अब पगडंडी तक चुप है,
और चाँदनी भी।

ये रातें अब सौंदर्य नहीं लातीं,

ये पूछती हैं—
“जिसके लिए आँखें सजाई थीं,
वो कब लौटेगा?”

मैं चाँद से बात करती हूँ
पर वो जवाब नहीं देता,
बस हर रात
तुम्हारी याद की तरह
आकर बिखर जाता है छत पर।

पिया,

अब तुम ही बताओ—
इस चाँदनी को सुंदर कहूँ,
या अकेली?

ज्वालामुखी

मैं चुप हूँ,
जैसे कोई पर्वत—
स्थिर, अचल,
पर भीतर कहीं
लावा खदबदा रहा है।

हर दिन,
ज़िम्मेदारियों की राख
धीरे-धीरे जमती जाती है,
कभी प्रेम की अनकही बातें,
कभी टूटती आकांक्षाएँ—
सब कुछ भीतर ही भीतर
सुलगता रहता है।

चेहरे पर हँसी की परतें हैं,
पर मन की धरती फट चुकी है।
कर्म के खेत में
बीज बोता हूँ हर मौसम,
पर फल नहीं—
बस उम्मीदें उगती हैं।

समाज ने सिखाया—
“पुरुष रोते नहीं,
झुकते नहीं,
बस सहते हैं।”

तो मैं सहता हूँ—
एक वज्र-सी चुप्पी ओढ़े,
अपनों की ख्वाहिशों में
अपना वजूद जलाता हूँ।

कभी कोई पूछता नहीं—
“तुम कैसे हो?”
शायद पुरुषों के पास
भावनाओं की कोई
वैधता नहीं होती।

और फिर,
एक दिन अचानक
मेरे भीतर का ज्वालामुखी
फट पड़ता है—
शब्दों में नहीं,
संवेदना की चुप चीखों में।

बंजारा

मैं बंजारा हूँ—
ना मेरा कोई घर,
ना मेरा कोई नक्शा।

जिस रास्ते से चला,
वो मेरा हो गया।
जिस पेड़ के नीचे ठहरा,
वो मेरा आसमान बन गया।

मैंने रिश्ते भी
मौसमों की तरह जिए हैं—
कुछ ठंड से काँपे,
कुछ गर्म साँसों में पिघल गए।

लोग पूछते हैं—
“क्या तुम थकते नहीं?”
मैं मुस्कुरा देता हूँ—
क्योंकि ठहराव थकाता है,
रास्ता नहीं।

मेरे पास कुछ नहीं,
फिर भी बहुत कुछ है—
धूप का स्वाद,
मिट्टी की ख़ुशबू,
और अनजानों की मुस्कानें।

मैंने पाया है खुद को
हर खोने में,
मैंने सीखा है जीना
हर विदाई में।

क्योंकि बंजारा होना

मतलब रास्ते से रिश्ता रखना—
ना मंज़िल माँगना,
ना मुक़ाम जताना।

बस चलना…
जब तक साँस है,
जब तक सवाल हैं।

मन मरुस्थल

भीतर कहीं
एक मरुस्थल है—
जहाँ
ना कोई हरियाली उगती है,
ना बादल रुकते हैं
भावनाओं के आकाश में।

प्यास केवल जल की नहीं होती,
कभी-कभी
एक स्पर्श,
एक संवाद,
एक साँस की साझेदारी
भी जीवन दे सकती है।

पर यहाँ—
हर रिश्ते ने
रेत के कणों-सा
छल किया है,
हर स्मृति
रेत के तूफ़ान-सी
आँखें भर देती है।

मन खोजता है
कोई नख़लिस्तान—
जहाँ विश्राम हो,
जहाँ कोई
थोड़ा-सा समझ सके
इस सूखेपन को।

किंतु मरुस्थलों में
पाँव के निशान भी
जल्द मिट जाते हैं,
और मन—
फिर से अकेला
अपनी ही गूंज में
भटकता है।

भुइयाँ भवानी

न ऊँचा मंदिर, न सोने का मुकुट,
भुइयाँ भवानी तो वहीं रहती हैं
जहाँ हल की नोक मिट्टी चीरती है,
जहाँ बीजों में साँस भरती है उम्मीद।

वे धरती हैं—
झेलती हैं आकाश की क्रोधी बिजली,
सूखा, ओला, बेमौसम बरसात,
फिर भी हर बार
झोली फैलाकर कहती हैं—
“आओ बेटा, बो दो फिर से।”

जब किसान थक कर बैठता है
और घर की स्त्री चुपचाप
अधपका भात परोसती है—
वहीं बैठी होती हैं भुइयाँ भवानी,
बिना पूजा, बिना नाम-जप।

वे सिर्फ़ खेतों की देवी नहीं,
बल्कि स्त्री-सहिष्णुता की सजीव मूर्ति हैं।
जिनके आँचल में
हवा ठहरती है,
और जिनकी गोदी से
अन्न के साथ संस्कार भी जन्म लेते हैं।

जब कोई बच्चा मिट्टी में खेलता है,
या कोई बुज़ुर्ग उसकी माटी को माथे से लगाता है,
तब उस स्पर्श में
भुइयाँ भवानी की मुस्कान होती है।

वे न रूठती हैं, न माँगती हैं,

बस रहती हैं—
मौन, मिट्टी और माँ बनकर।

रातरानी

जब साँझ
बिन बोले उतरती है आँगन पर,
और तुलसी के चौरे पर
दीपक की लौ
पलकों की तरह काँपती है—
उसी वक़्त
कोई चुपचाप खिलने लगती है—
रातरानी।

न श्रृंगार, न काजल,
फिर भी उसकी गंध
मधुमास-सी
मन के भीतर उतर जाती है।
जैसे किसी नवोढ़ा के केशों से
भीनी-भीनी तेल की महक
अचानक
हवा में भर जाए।

वह खिड़की के पर्दों को सरकाकर
चाँद को एकटक देखती है,
और चाँद…
उसकी सांसों में
धूप की जगह चाँदनी रख जाता है।

रातरानी—
गाँव की वह स्त्री है
जो दिन भर मिट्टी में सने हाथों से
घर को साजती है,
पर रात होते ही
अपने बालों में कंघी फेर
गंध बनकर
साँसों की छाँव हो जाती है।

चारपाई के सिरहाने
किसी प्रिय का नाम
धीरे से पुकारती हुई—
वह संकोच में सिमटी
प्रेम की पहली कविता-सी लगती है।

उसकी चुप्पी
न केवल श्रृंगार है,
बल्कि प्रतीक्षा भी है—
कि कोई…
उसके भीतर खिलते फूल की महक को
सुन सके, समझ सके।

हल चलाता बुद्ध

वो बोलता नहीं,
बस सुबह सबसे पहले खेत की दिशा पकड़ता है।
ना बौद्ध ग्रंथ,
ना प्रवचन की आवश्यकता—
उसके पाँव की पगडंडी ही उसका धम्म है।

माथे पर पसीना,
हाथ में लकड़ी का पुराना हल,
और आँखों में
एक शांति जो किसी आश्रम से नहीं,
मिट्टी से आई है।

वो जब बीज बोता है,
तो उसके साथ
प्रार्थनाएँ भी ज़मीन में उतरती हैं।

वो नहीं डरता अकाल से,
क्योंकि उसने आशाओं की फसलें
कई बार सूखते देखी हैं,
और फिर भी
हर मौसम में श्रद्धा बोई है।

वो बुद्ध है—

जिसने सांसों के साथ खेत जोते हैं,
जिसने “इच्छा” को पसीने में गलाया है।
जिसका “निर्वाण”
शहरों के शोर से नहीं,
हल की खींच में आया है।

क्योंकि—

जब कोई
मौन रहकर
धरती को समझता है,
तो वो केवल किसान नहीं रहता—
वो ‘हल चलाता बुद्ध’ हो जाता है।

धुंधलका

धुंधलका
बस शाम के आसमान में नहीं होता,
कई बार
ये इंसान की आँखों में उतर आता है—
जब सच सामने खड़ा होता है,
पर उसे पहचानने की हिम्मत नहीं होती।

यह वो वक़्त है
जब उजाले और अंधेरे के बीच
कोई स्पष्ट रेखा नहीं होती,
जहाँ
अधूरे सच भी पूरे लगते हैं,
और झूठ—थोड़े सच से ढके होते हैं।

धुंधलका
वो समय है
जब लोग बोलते तो हैं,
पर सच नहीं कहते।
सुनते तो हैं,
पर समझना नहीं चाहते।

यह वो परछाई है
जहाँ इरादे भी धुँधले हो जाते हैं,
और नीयत—
धुँध में अपना चेहरा छुपा लेती है।

धुंधलके में
कोई रास्ता खोया नहीं होता,
पर तय भी नहीं होता।
यह
एक असमंजस की चुप्पी है—
जो समय को थाम लेती है,
लेकिन बदलाव से डरती है।

पर याद रखो—

धुंधलका चाहे जितना गहरा हो,
उजाला लौटता ही है।
शायद धीमे,
शायद थका हुआ,
पर लौटता ज़रूर है—
क्योंकि
धुँध सिर्फ़ रोक सकती है,
मिटा नहीं सकती।

नागफनी

धूप में उगी नागफनी
जैसे किसी औरत की चुप्पी
कम बोलती है,
पर हर काँटा
एक घाव की भाषा है।

ना गीत, ना गंध,
ना किसी ऋतु का आलिंगन
फिर भी खड़ी है
रेत में जड़ जमाए
अपने ही अस्तित्व की
गवाही देती।

आँगन की चौखट लांघे बिना
वो सबकुछ जानती है
किस किस ने क्या छीना,
कौन–कौन मुस्कराया
उसके आत्म-संयम पर।

उसके भीतर
फूलों की आकांक्षा मर चुकी है,
पर जीवन का ताप
अब भी बचा है
वो सिर्फ़ एक देह नहीं,
संघर्षों की पाठशाला है।

वो खेत नहीं
जिसे हल जोता जाए,
वो जंगल नहीं
जिसे काटा जाए,
वो नागफनी है
जिसे न रोपा गया,
न माँगा गया,
पर उग आई
अपने होने की जिद पर।

जिसे छूने से
लोग बचते हैं,
क्योंकि उसके पास
आराम नहीं
सिर्फ़ सवाल हैं।

पगडंडी पर कबीर

ना उसे चौपाल चाहिए,
ना कोई चोला।
वो चलता है अकेला
कभी गंगा किनारे,
कभी गाँव के बाहर की पगडंडी पर।

हाथ में न कोई ग्रंथ,
माथे पर न कोई तिलक,
बस जुबान में
ऐसे शब्द, जो सीधे आत्मा पर उतरते हैं।

वो कहता है
“माटी कहे कुम्हार से,
तू क्या रोंदे मोहि?”
और फिर खुद को
हल से जोतती ज़मीन की तरह पेश करता है।

वो कबीर है

जो मंदिर की घंटी से नहीं,
भीतर के मौन से संवाद करता है।
जिसके दोहे
खेतों के सूखे में भी भीगते हैं,
और मन की कड़वाहट में
शक्कर हो जाते हैं।

उसे ना शास्त्रों की सत्ता चाहिए,
ना भक्ति का तमाशा।
वो सच्चाई को
सूत में पिरोता है,
और पगडंडी पर बिखेरता जाता है।

क्योंकि

जब कोई
सीधे-सपाट रास्तों को छोड़कर
काँटों वाली पगडंडी चुनता है,
तो वो केवल एक पथिक नहीं रहता—
वो “पगडंडी पर कबीर” बन जाता है।

क्षरित होते जीवन मूल्य

कभी
जो मूल्य
पीढ़ियों के आँगन में
दीये की लौ की तरह
टिमटिमाते थे,

जो दादी की थपकी में,
पिता की डाँट में,
माँ के आँचल की गंध में
और मिट्टी सने पाँवों की
सदियों पुरानी लीक में
सहेजे जाते थे

वे आज
स्लोगन बनकर दीवारों पर
पोस्टरों में लटके हैं।

ईमानदारी अब
सीवी में लिखी जाती है,
सदाचार भाषणों में बचा है,
संयम उपदेशों में सिमट गया है,
और कर्तव्य —
बड़े-बड़े सेमिनारों की
फीकी चाय में घुलकर रह गया है।

जहाँ रिश्ते
मोबाइल नेटवर्क की तरह
व्यस्त या अस्थायी हो चले हैं,
जहाँ ‘सॉरी’ और ‘थैंक यू’
सिर्फ औपचारिकताएँ हैं,
वहाँ जीवन मूल्य
रेत की दीवार-से
ढहते जा रहे हैं।

जो पहले
संस्कार थे,
अब ‘स्किल सेट’ हो गए हैं,
और आदर्श —
अर्थशास्त्र की पंक्तियों में
मूल्यविहीन ‘वेरिएबल’ बन गए हैं।

काश…
कहीं फिर किसी आँगन में
एक नीम का पेड़ उग आये,
जिसकी छाँव तले
दादी की कोई पुरानी कथा
फिर से सुनाई जाये,
और कोई नन्हा बच्चा
कह सके —
“मुझे भी वैसा बनना है…”

पर इस भीड़ में
अब सिर्फ़ भीड़ है,
आदमी कम,
आदमी के भीतर
आदमी और भी कम।

जीवन मूल्य
आज भी चुपचाप
किसी उपेक्षित गली में
किसी जर्जर मंदिर के टूटे चौक पर
दिए की बुझती लौ-से
जल रहे हैं।

शीतली छाँव

पीपल की जड़ों में
बैठा है एक दिन—
थका हुआ, धूप से जर्जर,
पर साँसों में
अब भी उम्मीद लिए।

छाँव गिरती है धीरे-धीरे,
जैसे माँ की हथेली
बुखार से तपते माथे पर—
ना शोर, ना दावा—
बस शीतलता का संकल्प।

साथ की पगडंडी से
गुज़रते हैं चरवाहे,
सर पर घास का गठ्ठर लिए
स्त्रियाँ लौटती हैं खेतों से,
और छाँव सबको
बराबरी से पुकारती है।

यही तो जीवन है—
जहाँ थकावट के बीच
एक वृक्ष
अपनी मौन करुणा से
पूरी दुनिया को सहलाता है।

पुस्तकें

वे केवल काग़ज़ नहीं होतीं,
कुछ शब्दों की मढ़ाई नहीं,
बल्कि हर पन्ना —
एक मनुष्य की साँस,
एक युग की धड़कन,
एक गुमनाम दीया,
जो अँधेरे में टिमटिमाता है।

पुस्तकें —
स्मृतियों की पगडंडी होती हैं,
जहाँ बीते हुए बचपन की
धूल-धूसरित खुशबू
अभी तक साँस लेती है।

कभी वे युद्ध की रणभेरी हैं,
कभी प्रेम की गीली चिट्ठी,
कभी विरह में डूबी
कोई अधूरी पंक्ति,
तो कभी किसी बूढ़े दार्शनिक की
अंतिम गवाही।

पुस्तकें —
सिरहाने रखी जाती हैं,
कभी ओढ़नी के नीचे,
तो कभी किसी धूल जमी रैक में उपेक्षित,
फिर भी वे जीवित रहती हैं,
पढ़े जाने की प्रतीक्षा में।

और एक दिन —
जब कोई उन्हें स्नेहिल स्पर्श देता है,
तो वे खुल पड़ती हैं
सालों की मौन चुप्पी के बाद,
और सुना देती हैं
वो सब,
जो आज भी
अनकहा है।

भाग्य रेखा

हथेली पर खिंची वह सूक्ष्म रेखा
जिसे मनुष्य ने “भाग्य” कहा,
क्या वास्तव में वह नियति का प्रारूप है
या केवल अज्ञात का एक अनुमान?

रेखाएँ जन्म लेती हैं
एक ऐसे समय में
जब चेतना शून्य होती है,
और फिर,
वय का बढ़ना, अनुभवों का उतरना,
उन्हें अर्थ देने लगता है।

मनुष्य,
जिसे मिला है विवेक, विचार और विकल्प,
क्या उसे उचित है
इन मौन रेखाओं को अंतिम सत्य मान लेना?

भाग्य रेखा
कभी स्पष्ट दिखती है,
तो कभी धुँधली,
जैसे ईश्वर भी अनिर्णय में हो
कि इसे आशीर्वाद दूँ या परीक्षा।

पर वही मनुष्य,
जिसने इतिहास रचा, सभ्यताएँ गढ़ीं,
समुद्रों को चीर मार्ग बनाए,
क्या वह हथेली में बँधा रह सकता है?

जो चलता है
वह रेखाएँ नहीं देखता —
वह रचता है नई दिशा,
जहाँ निर्णय, कर्म और निष्ठा
रेखाओं से अधिक प्रबल होते हैं।

रेखाएँ स्थिर होती हैं,
कर्म गतिशील।
और गति ही है जो
किसी भी पूर्वनिर्धारित रूपरेखा को
पुनः आकार दे सकती है।

इसलिए,
जब भी हथेली देखो —
उसमें भविष्य नहीं,
स्वयं की क्षमता पहचानो।
क्योंकि भाग्य रेखा वही है
जिसे तुम अपनी दृष्टि से
नई आकृति देते हो।

कैक्टस

मैंने सोचा था
फूलों से भरी एक बग़िया उगाऊँगा,
जहाँ हर रंग की कोमल पंखुड़ियाँ होंगी,
महक होगी,
मगर उगा पाया…
सिर्फ़ कैक्टस।

क्योंकि
जिन ज़मीनों पर
धूप सख़्त हो जाती है,
जहाँ रिश्तों की बारिश
बरसना छोड़ देती है,
जहाँ संवाद
रेत-सा फिसल जाता है,
वहाँ फूल नहीं,
काँटे ही उगते हैं।

कैक्टस…
जो अकेले रहना सीख गया है,
जिसे न सावन की आस,
न भादो की बूंदों की उम्मीद।
जो अपने भीतर
पानी छुपाकर
धूप से जूझना जानता है।

कभी देखना,
उस काँटों की दीवार के पीछे
छुपा होता है
एक हरा,
कोमल,
सहमा हुआ दिल,
जो बस
एक भरोसे भरी छुअन चाहता है।

कैक्टस फूल भी देता है,
मगर कम,
क्योंकि उसने सीखा है
कि इस दुनिया में
फूलों से ज़्यादा
काँटों की ज़रूरत होती है।

आज मैं भी
अपने भीतर
एक कैक्टस उगा बैठा हूँ —
कम बोलता हूँ,
कम चाहता हूँ,
क्योंकि जानता हूँ
कि ज्यादा चाहतें
सबसे ज़्यादा ज़ख्म देती हैं।

दोमुंहे लोग

वे मिलते हैं मुस्कराहटों के मुखौटे पहन,
जैसे आत्मीय हों—
पर आत्मा से कोसों दूर।
एक चेहरा सुबह का—
दूसरा संध्या का—
और दोनों ही झूठ से सने!

इनकी बातों में शहद होता है,
पर मंशा में ज़हर टपकता है।
ये हाथ मिलाते हैं
पर नीयत जेब टटोलने की होती है।

जहाँ सिद्धांत की बात आती है—
वहाँ चुप्पी ओढ़ लेते हैं।
और जहाँ लाभ की गंध हो,
वहाँ सबसे पहले पहुँचते हैं।

ये रिश्तों को सौदों में बदलते हैं,
ईमान को ‘स्थितियों के अनुसार’ जीते हैं।
नक़ाब ओढ़े इस भीड़ में—
सच्चा चेहरा
कभी किसी की आँख नहीं देख पाती।

दोमुंहे लोग—
समाज के वो दीमक हैं
जो दीवारों पर नहीं,
जड़ों में लगते हैं।

दो जून की रोटी

( एक साहित्यिक व्यंग्य )

कहते हैं रोटी गोल होती है।
पर यह भूखे की थाली में अक्सर अदृश्य होती है –
कभी सरकार की फाइलों में फँसी होती है,
कभी जनप्रतिनिधियों के भाषणों में झूलती हुई
और कभी विकास के पोस्टरों में मुस्कराती हुई।

अब रोटी गेहूँ से नहीं,
सियासत के झूठे वादों से गूंथी जाती है,
विकास के गर्म तवे पर उलटी-पलटी जाती है,
और सरकारी रिपोर्टों की थाली में
नमकहराम आँकड़ों के साथ परोसी जाती है।

बाबू ने अपनी कुर्सी पर जम्हाई ली और कहा –
“भूख? कहाँ है? हमारे डाटा में तो सबको दो जून की रोटी मिल रही है।”
मैं सोचने लगा,
शायद भूख को भी अब बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन की ज़रूरत है।

वो रिक्शावाला, जो दिनभर सवारियाँ ढोता है,
रात को घर लौटकर बच्चों से कहता है –
“आज थक गया बेटा, पर देखो ये सपना –
कल घर में पराठे बनेंगे, आलू भी होगा, और मिठाई भी!”
बच्चा भूख से नहीं,
सपने टूटने के डर से सो जाता है।

रोटी की लड़ाई अब पेट की नहीं रही –
अब यह चेहरों की लड़ाई है।
जो चेहरा ज्यादा चमकदार, उसे रोटी भी ब्रांडेड मिलेगी।
और जो चेहरा झुलसा हुआ हो…
वो रोटी के बजाय पैम्फ़लेट खाएगा।

हमने रोटियों को भी वर्गों में बाँट दिया है –
कुछ रोटियाँ तिजोरियों में बंद हैं,
कुछ परोसी ही नहीं जातीं,
और कुछ सड़क पर पड़ी रहती हैं –
उस आदमी के बगल में जो भुखमरी से मरा है,
पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में “कुपोषण” लिखा गया है –
शब्दों की शालीनता, मौत की सच्चाई से बड़ी हो गई है।

रोटी की महिमा को अब पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाएगा।
UPSC की मुख्य परीक्षा में प्रश्न आएगा –
“रोटी और लोकतंत्र के मध्य अंतर्संबंध स्पष्ट कीजिए।”

कृपया ध्यान दें –
उत्तर ‘संविधान की प्रस्तावना’ से शुरू हो,
और ‘मिड-डे मील’ पर समाप्त हो।

रोटी अब रोटी नहीं रही,
यह अब प्रतिरोध है, प्रतिशोध है,
और कभी-कभी…
एक अदृश्य प्रश्नचिह्न बनकर टंगी रहती है भूखे के माथे पर –
“क्या मुझे जीने का अधिकार है?”

चौराहा

मैं खड़ा हूँ —
एक चौराहे पर,
जहाँ से मेरा जीवन
हर दिशा में बाँटना चाहता है मुझे।

बचपन की गली पीछे छूटी है —
मिट्टी से सने घुटने,
माँ की झिड़की में छुपा प्यार,
और टूटी साइकिल के पहिए
अब सिर्फ स्मृतियाँ हैं।

एक रास्ता पिता की उम्मीदों की ओर जाता है —
जहाँ डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर
बनने की कतार में
मेरे सपनों की लाशें दबी हैं।

दूसरा रास्ता दिल की ओर मुड़ता है —
जहाँ कविता, चित्र, संगीत और रंग
मुझे बुलाते हैं,
पर जेबें खाली हैं, और पेट भूखा है।

तीसरी राह बाजार से होकर जाती है —
जहाँ सफलता का मोल
चमचमाती घड़ियों और
मुस्कराते चेहरे की सेल्फियों में तौला जाता है।
पर वहाँ आत्मा अक्सर अकेली पाई जाती है।

और चौथा रास्ता—
वो भीतर उतरता है।
मन की गहराइयों में
एक बंसी बजती है,
जो पूछती है—
“क्या तू अपने लिए भी जिया?”

हर राह पर कोई खड़ा है—
माँ की चिंता,
पिता की खामोश निगाहें,
दोस्तों की हँसी,
समाज का व्यंग्य।
सब अपनी राह पकड़ने को कहते हैं।

मैं ठिठकता हूँ,
सोचता हूँ—
क्या कोई पाँचवाँ रास्ता भी है?
जहाँ मैं होऊँ… बस मैं।
ना आदर्शों से बँधा,
ना अपेक्षाओं से जकड़ा।

और फिर…
मैं अपनी छाया के साथ
एक राह बनाता हूँ—
जिस पर चलना लिखा तो नहीं था,
पर सही लगा।

अफ़वाह

वह आती नहीं—
घुस जाती है कानों में
जैसे साँप का फुँकारा
या
बीच बाज़ार में
गिरा कोई पत्थर
जिसकी गूँज से
भीड़ दौड़ पड़ती है
बिना देखे, बिना सोचे।

अफ़वाह—
किसी सच्चाई का छाया-पात्र,
अधकचरी बातों का बाज़ार,
जो सच से तेज़ दौड़ती है
और
झूठ को श्रृंगार देती है।

वह
कभी मंदिर की घंटियों से फूटती है,
तो कभी मस्जिद की दीवारों से टकराती है,
और लोग
अपने-अपने विश्वास की तलवारें निकाल
कटने लगते हैं
किसी और के इशारे पर।

अफ़वाह
कभी कोई नाम लेती है,
कभी कोई चेहरा बनाती है,
पर अंत में
छीन लेती है किसी की नींद,
किसी की ज़िंदगी,
या
किसी का वजूद।

सच के पाँव
धीरे चलते हैं,
पर जब चलते हैं—
अफ़वाह का चेहरा
आईने में बेनकाब हो जाता है।

तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम केवल एक अनुभव नहीं,
वह तो चेतना की किसी अतल गहराई में
जगा हुआ वह स्पंदन है
जो जीवन और मृत्यु के बीच
शाश्वत संवाद रचता है।

यह कोई संयोग नहीं,
जो संधियों और संकल्पों से बंधा हो,
यह तो वह अनाम अनुबंध है
जिसे आत्माएं बिना भाषा के
कर्म और स्मृति में निभाती हैं।

तुम्हारा प्रेम —
अदृश्य किन्तु सर्वत्र व्यापी,
जैसे वायु में घुला हुआ कोई ऋग्वैदिक मंत्र,
जो सुनाई तो नहीं देता,
पर आत्मा में हर पल गूंजता रहता है।

तुम्हारा प्रेम वह ध्वनि है
जो मौन से जन्म लेती है,
वह दीपशिखा है
जो अंधकार से प्रेम करती है।

तुम्हारा प्रेम…
कोई चरम नहीं, कोई प्रारंभ भी नहीं
यह कालजयी यात्रा है
जहाँ साथ होना नहीं,
सार्थक होना महत्त्वपूर्ण है।

पतंग

आसमान के खाली कैनवस पर
एक रंगीन सपना टाँकती है
पतंग।

धागों से नहीं,
उम्मीदों से बंधी होती है वह,
हर झटका,
हर चक्कर
किसी संघर्ष की तरह
उसे और ऊपर उठाता है।

नीचे से कोई बच्चा हँसता है,
ऊपर देखता है
जैसे कोई प्रश्न पूछ रहा हो
“क्या मैं भी उड़ सकता हूँ?”

हवा की चाल
कभी दोस्त होती है,
कभी द्रोही।
पर पतंग को उड़ना ही होता है
क्योंकि उसका धर्म है
आकाश से प्रेम।

कभी कोई माँ
छत पर खड़ी
हवा की दिशा देखकर
अपने बेटे की मुस्कान को मापती है,
तो कभी कोई बूढ़ा पिता
धागा थामे
बचपन की ऊँचाई में लौट जाना चाहता है।

पतंगें
केवल काग़ज़ नहीं होतीं
वे आसमान में लिखे गए
हज़ारों अधूरे पत्र होती हैं,
जो कहते हैं
“हम अब भी उड़ने में विश्वास रखते हैं।”

कटकर गिरना
उसकी हार नहीं,
बल्कि यह जानना होता है
कि गिरकर भी
उड़ने का सपना
किसी और हाथ में चला गया।

कशमकश

भीतर कुछ टूटा नहीं,
पर सब कुछ वैसा भी नहीं रहा
जैसे कोई धागा,
कसता चला गया वर्षों से
और अब उँगलियाँ सुन्न हो चली हैं।

चेहरे पर मुस्कान है,
पर आँखों में मौसम बदलते रहते हैं।
कोई समझ नहीं पाता
कि ये चुप्पी
कितनी ऊँची आवाज़ है।

हर सुबह
एक निर्णय मांगती है
चलना है या रुक जाना है,
बोलना है या बस सह लेना है।

कशमकश
कभी रिश्तों के बीच होती है,
कभी खुद से ही झगड़ना पड़ता है।
कभी जीतकर भी हार जैसा लगता है,
कभी हार में भी चैन मिल जाता है।

कोई राह नहीं दिखती
पर चलना जरूरी है,
क्योंकि ठहरना
और भी बड़ा बोझ बन जाता है।

कशमकश,
एक थके हुए मन का आईना है
जो मुस्कुराने की कोशिश में
अपनी ही आँखों से टकरा जाता है।

शांतिदूत

(दर्शन और पुरुषार्थ के धरातल पर दो युगों की संधि)

दृश्य-एक: श्रीकृष्ण – समय की देह में चैतन्य की आकृति

वे आये
न किसी घोष के साथ
न किसी जयघोष के,
सिर्फ मौन के उजाले में,
जहाँ न्याय की अग्नि धीरे-धीरे राख हो रही थी
और वाणी अपनी ही परछाईं से डरती थी।

सभा थी –
पर उसका केंद्र गायब था।
भीष्म के नेत्र बंद थे,
पर आँखों में असमंजस जल रहा था
जैसे वर्षों का अनुभव अपने ही विचार से पराजित हो गया हो।

द्रोण की मुद्रा एक प्रश्नवाचक चिन्ह थी –
‘क्या कर्तव्य सदा सत्ता की चौखट पर झुकता है?’
और विदुर की आत्मा,
सभा की दीवारों से सिर टकरा रही थी –
सत्ता के पक्ष में नहीं,
सत्य के पक्ष में कोई स्थान नहीं था वहाँ।

तभी वे आये –
केशव –
युग की प्रतिच्छाया में खड़े हुए,
काले नहीं – अंतर्यामी थे।

वे बोले नहीं पहले,
देखा —
जैसे समय की आँखों में झाँक रहे हों।

फिर बोले –
शब्द नहीं थे, दृष्टियाँ थीं –
हर वाक्य एक प्रश्न था,
हर प्रश्न एक विकल्प।

“क्या राज्य केवल भूमि है?”
“क्या रक्त बिना बहाए परिवर्तन नहीं होता?”
“क्या धर्म तभी जीवित रहता है, जब वह लड़ता है?”
“या फिर धर्म चुपचाप पराजय स्वीकार कर ले?”

कृष्ण किसी पक्ष के नहीं थे –
वे धुरी थे,
जहाँ से दोनों पक्षों की गति प्रारंभ होती है।

उन्होंने पाँच गाँव नहीं मांगे थे –
उन्होंने पाँच अवसर मांगे थे –
बचाने के, सुधारने के,
और भविष्य को पुनः मनुष्य बनाने के।

किन्तु दुर्योधन –
जो मनुष्य नहीं, संकल्प का विषैला रूप था,
वह अचल था –
क्योंकि उसका अहं स्वयं को ईश्वर समझ बैठा था।

कृष्ण उठे –
शांति का चक्र अब चुप नहीं था,
क्योंकि
जब मौन भी अन्याय बन जाए,
तो नीति भी युद्ध बन जाती है।

दृश्य-दो: अंगद – रजस्वला पृथ्वी पर धर्म का धैर्य

लंका –
जहाँ सोना दीवारों पर था
और अंधकार आत्मा में।
जहाँ सत्ता ने विचार को बंधक बना लिया था
और स्त्री, केवल विजय का बंधन बन चुकी थी।

वह आया –
अंगद –
एक बालक नहीं,
बल्कि मर्यादा की प्रतिमा
जो राम के अनुशासन से ढली थी,
पर सीता के अपमान से सुलगी थी।

उसने कुछ माँगा नहीं।
उसने कोई सौदे की भाषा नहीं बोली।
वह पाँव जमाकर खड़ा हो गया –
जैसे पृथ्वी ने अपनी थकान को भी संकल्प में बदल दिया हो।

रावण की सभा हँसी से गूंज रही थी –
एक हँसी जो अहंकार से पैदा होती है,
पर अज्ञान से मर जाती है।

अंगद चुप रहा,
क्योंकि कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं
जहाँ शब्द
रण की भूमिका बिगाड़ सकते हैं।

वह कोई संन्यासी नहीं था,
पर युद्ध भी उसका लक्ष्य नहीं था।
वह केवल यह सिद्ध करने आया था
कि सत्य के लिए खड़ा होना ही पर्याप्त है।
यदि तुम उसे हिला नहीं सकते,
तो तुम उसे जीत भी नहीं सकते।

अंगद का पाँव
वह प्रतिमा बन गया
जिसमें शक्ति, शांति और सत्य – तीनों मूर्त थे।

रावण, जो युद्ध में अमरता चाहता था,
उसके लिए वह पाँव मृत्यु का निमंत्रण बन गया।
क्योंकि
जो सत्य को हिला नहीं पाता,
वह स्वयं डगमगाने लगता है।

दो युगों में दो पुरुष –
एक नीति में, दूसरा संकल्प में।
एक ने शब्दों से चेताया,
दूसरे ने मौन से।

पर दोनों एक ही बात कहते हैं –
“शांति कोई आग्रह नहीं,
वह अंतिम चेतावनी है।
यदि सुन ली जाए,
तो युग बच जाते हैं।
नहीं सुनी जाए,
तो युग जल जाते हैं।”

कृष्ण और अंगद –
वह ‘शांतिदूत’ नहीं हैं,
बल्कि धर्म की सीमा रेखा हैं,
जहाँ से
नीति रण की ओर प्रवास करती है।

प्रतीक्षा का अम्लान दीप

धुँधली साँझ की बाँहों में लिपटी
गंगा, थकी हुई धाराओं सी,
किनारे किसी एकाकी दीपक की भाँति
मन की वीणा पर टिकी थी।

तट पर बैठा केवट
ना नाविक, ना साधक,
केवल एक निशब्द पुकार,
जो लहरों में स्पंदन खोजती थी।

वायु भी आलस भरी थी,
किन्तु उसके हृदय की धड़कनों में
किसी अनाम पदचाप की गूँज थी।
प्रतीक्षा, मानो
अदृश्य सन्ध्या का कोई आर्तनाद बन
उसके नेत्रों में दीपित थी।

गगन में चंद्र,
जल में काँपती उसकी छाया,
और केवट के प्राणों में
एक अस्फुट मंत्र : “राम…”

कौन था वो?
जो काल की सीमाओं को लाँघ
पाँव धरेगा इस धरा पर।
केवट जानता था,
उसके चरणों में
अनंत के गुप्त अर्थ बंधे होंगे।

फिर उतरते चरणों की आहट,
जल पर कंपित परछाइयाँ,
और उस शून्य गगन में
भक्ति का अम्लान दीप प्रज्वलित हुआ।

“पाँव पखारने दो,”
केवल एक वाक्य नहीं था,
वो शताब्दियों से झुलसती
प्रेमाकुल आत्मा का उद्घोष था।

उसने चरण-धूल को
जल में नहीं प्रवाहित किया।
उसे हृदय-कुंज की गोपनीय सीपी में रख,
स्मृतियों की रजत धाराओं से धोया।

और जब राम मुस्कुराए,
वो कोई तात्कालिक हास्य नहीं था।
वो सृष्टि की प्रथम रचना के समय से
लिखी प्रतीक्षा का उत्तर था।

आज भी गंगा की लहरें
उसी दीपक की लौ पर नृत्य करती हैं।
प्रेम की भाप में घुला
भक्ति का एक अदृश्य स्वर
“राम… राम…”
निरंतर उस जल में प्रवाहित है।

क्योंकि जब कोई मन
प्रेम और प्रतीक्षा के पारावार में डूबता है,
तब समय, संप्रदाय, शब्द — सब छूट जाते हैं।
और रह जाती है
केवल भक्ति,
जो स्वयं ईश्वर का ह्रदय है

सती अनसूया

वो कोई महल नहीं था
जहाँ त्रिदेव पहुँचे थे,
वो एक कुटिया थी,
जिसकी दीवारों पर
श्रद्धा की छायाएँ थीं
और देहरी पर
मौन की दीपशिखा जल रही थी।

अनसूया वहाँ केवल एक स्त्री नहीं थीं,
वो ऋचाओं की प्रतिमा थीं,
एक ऐसा श्लोक
जो किसी ग्रंथ में नहीं,
सिर्फ आचरण में लिखा जाता है।

जब त्रिदेव
कुशलता से प्रश्न लेकर आए,
तो उत्तर में कोई वाद-विवाद नहीं था
केवल ममत्व का पलना था,
जिसमें देवताओं ने
स्वयं को बालक होते देखा।

उनके झुलने की ध्वनि
घंटी की तरह न थी
वह तो अंतरात्मा के जल में उठती लहरें थीं,
जिन्होंने ब्रह्मा के सृजन को,
विष्णु के पालन को,
शिव के संहार को
एक मातृस्पर्श की परिभाषा में बदल दिया।

उन्होंने कुछ सिद्ध नहीं किया,
उन्होंने बस वह मौन जिया
जिसमें सत्य स्वयं को विस्मृत कर देता है।

वे कोई कविता नहीं थीं,
बल्कि उस अनुभूति की आहट,
जो अक्षर से पहले आती है,
जहाँ भाषा भी
नत-मस्तक हो जाती है।

बंजर ज़मीन

हृदय की ज़मीं पर,
अहसास की आद्रता से,
चाहत की उष्णता पाकर
कभी उगा था तुम्हारे
पवित्र प्रेम का अंकुर।

यक़ीनन… जीवन की सबसे बड़ी
ख़ुशी ने दिल की दहलीज़ पर
दस्तक दी थी।

यह अंकुरण अकेला नहीं आया,
साथ लाया
कल्पना की नई उड़ान,
अरमानों का नया क्षितिज,
उम्मीदों के नए-नवेले पंख,
और कुछ ख़ुशनुमा ख़्वाब।

मैं इस प्रेम की लतर को
प्रतिदिन स्नेहजल से सींचकर
बड़ा कर रहा था।

अचानक… एक दिन,
सच के समाघात ने
अरमानों का महल ढहा दिया।

जिसके मलबे में दबकर
मर गया प्रेम,
बिखर गईं स्वर्णिम कल्पनाएँ,
टूट गए भविष्य के
सभी सुनहरे स्वप्न।

तन्हाई, चिंता, घुटन,
बेबसी और मजबूरियाँ
बस यही शेष रह गईं।

और…
बची है सिर्फ चाहत,
जो अब सिसक रही है।

हृदय की ज़मीन को
खारे जल से सींचने के लिए
बरस रहे हैं नयन।

क्योंकि…
विज्ञान भी कहता है
बंजर ज़मीन पर
अंकुरण नहीं होता!

अंगद का पाँव

मैं अंगद का पाँव हूँ
न अडियल हूँ,
न अभिमानी।
बस सत्य की ज़मीन पर
संकल्प की कील हूँ।

लंका की राजसभा में
जब शब्दों की तलवारें चमकीं,
और अहंकार ने
धर्म को ठुकरा दिया,
तब मैंने नहीं हिलने की
जिद नहीं
आस्था की अचलता दिखाई।

मैं प्रतीक हूँ
उस प्रतिरोध का
जो युद्ध नहीं चाहता,
पर अन्याय के सम्मुख
झुकता भी नहीं।

हर युग में
जब-जब सत्ता मदांध हुई,
मैं वहीं गड़ा रहा
कभी किसी संत की वाणी में,
कभी किसी किसान की जमीं पर,
कभी किसी स्त्री के आत्म-सम्मान में।

मैं अंगद का पाँव हूँ
दृढ़ता का नाम,
जो कहता है
चलो संवाद करो,
पर अगर झूठ के चरण बढ़े,
तो मैं फिर वही बनूँगा
जो न हिला,
न डिगा
केवल धर्म की धरती पर
एक सत्य बिंब बन टिका।

शबरी की प्रतीक्षा

यह कोई साधारण प्रतीक्षा न थी
न क्षणों की गिनती,
न पथ की ओर आँख टिकाए कोई अधीरता।
यह प्रतीक्षा थी
जैसे कोई नदी
स्वयं समुद्र हो जाने की यात्रा में हो।

शबरी बैठी थी
एक निर्जन वन में नहीं,
बल्कि आत्मा के उस अंतर्यात्रिक वन में,
जहाँ हर पत्ता
एक श्लोक की भाँति गिरता था।

कंद चखना,
पेड़ों से संवाद करना,
मिट्टी की गंध में जीवन खोज लेना
ये सब क्रियाएँ नहीं थीं,
ये तो उसकी साधना के मंत्र थे।

राम उसका लक्ष्य नहीं थे,
वे तो उसके भीतर के
प्रेम, प्रतीक्षा और परिपक्वता का प्रतिबिंब मात्र थे।
वह जानती थी
सच्चा प्रेम आग्रह नहीं करता,
सिर्फ उपस्थित रहता है।

और उस उपस्थिति में
शबरी धीरे-धीरे
स्वयं को घिसती रही,
जैसे एक शिला जल में घुलती हो
अहं टूटता गया,
इच्छाएँ मुरझाती रहीं,
और बचा सिर्फ एक मौन…
जो राम से भी गहरा था।

जब राम आए
तो चमत्कार नहीं हुआ,
वह दृश्य केवल दृश्य नहीं था,
वह एक संपूर्ण जीवन की पुष्टि थी—
कि प्रतीक्षा, यदि निर्विचल हो,
तो वह स्वयं ईश्वर का रूप बन जाती है।

राम आए नहीं थे,
वे घटे थे
जैसे प्रार्थना की अंतिम चुप्पी में उतरता हो कोई उत्तर।
न चरणों की ध्वनि हुई,
न वनों में शंखनाद,
फिर भी हर वृक्ष, हर पत्ता,
उस एक क्षण में अरण्य नहीं,
आत्मा बन गया था।

वे किसी दिशा से नहीं आए,
वे तो उस प्रतीक्षा के भीतर से प्रकट हुए—
जहाँ प्रेम आग्रहहीन था,
समर्पण निर्वचन,
और मौन स्वयं एक संवाद।

शबरी ने राम को देखा नहीं,
उसने उन्हें पुकारा नहीं,
वह जानती थी
पहचानना, ईश्वर को सीमित कर देना है।

उसने उन्हें अनुभव किया
जैसे सूर्य को अनुभव करती है अंधकार की पीठ।

यह मिलन दृश्य नहीं था,
यह साक्षात्कार था
प्रश्नों से रहित,
आवश्यकताओं से परे,
पूर्णता की निर्विकार आभा में डूबा।

इसलिए,
जब राम मिले
वह मिलन नहीं था,
वह प्रतीक्षा का
स्वयं में लौट आना था।

सातवाँ वचन

सात फेरों में
जब तुमने थामा था मेरा हाथ,
हर वचन पर ठहरी थी
जीवन की नई परिभाषा।

पहला — साथ चलने का था,
दूसरा — विश्वास निभाने का,
तीसरा — सुख-दुख में साथ देने का,
चौथा — परिवार का आदर करने का,
पाँचवाँ — स्नेह और समर्पण का,
छठा — धर्म और कर्तव्य का,
पर…
सातवाँ वचन?
वो न तो पंडित ने बोला,
न किसी ग्रंथ में लिखा गया।

वो था
“मैं तुम्हारे खामोश आँसुओं को पढ़ सकूँ,
तुम मेरे अनकहे शब्दों को समझ सको।”

वो वचन
किसी अग्नि के साक्षी में नहीं दिया गया,
वो तो आँखों की भाषा में
मन के स्पर्श से बँधा था।

आज,
जब शब्द चुप हैं
और जीवन की चहल-पहल में
हम अक्सर खो जाते हैं
मुझे लगता है,
अगर हमने केवल
सातवाँ वचन ही निभाया होता,
तो बाकी सब
अपने आप निभ जाते।

अर्धांगिनी

अर्धांगिनी
केवल अर्ध नहीं,
वह पूर्णता की व्याख्या है,
सृजन का आदि स्रोत,
संपूर्ण अस्तित्व की आधारशिला है।

वह मात्र गृहिणी नहीं,
गृह की आत्मा है,
जिसके स्पर्श से
ईंट-पत्थर का ढाँचा
सजीव हो उठता है।

वह अन्न नहीं,
वह अन्नपूर्णा है,
जिसके श्रम से थाली भरती है,
और आत्मा तृप्त होती है।

वह मौन नहीं,
वह मधुर संवाद है,
जिसके शब्दों में
परिवार की धड़कनें बसी होती हैं।

वह परछाईं नहीं,
प्रकाश है
जो हर अंधकार को
अपनी आभा से हर लेती है।

अर्धांगिनी
सिर्फ़ संबोधन नहीं,
समानता का संकल्प है,
संवेदना की सहचरी,
संघर्ष की संबलिनी है।

वह हाथों की चूड़ियाँ नहीं,
हृदय की दृढ़ता है,
जो टूटकर भी
दूसरों को समेटने का साहस रखती है।

वह पीछे नहीं चलती,
साथ चलती है,
कभी मार्गदर्शक बन,
कभी मौन प्रेरणा बन।

और फिर भी,
उसे ‘अर्ध’ कह देना
उसके अस्तित्व के साथ
अन्याय है।

अर्धांगिनी
पूरे ब्रह्मांड की संगिनी है,
जिसे समझने के लिए
हृदय में श्रद्धा
और दृष्टि में समानता चाहिए।

नई सदी के अनुत्तरित सवाल

नवयुग की चौखट पर खड़े,
हमने रौशनी की लौ थामी,
पर अंधेरों की शक्लें बदलीं,
और सवाल वहीं रह गए –
अनुत्तरित।

प्रगति की पटरी पर दौड़ते
रोबोटिक मुस्कानों में
कहाँ छिप गई वह आत्मा
जो कभी संवेदना से चिपकी थी?

डिजिटल स्पर्श ने
क्या मिटा दी है उंगलियों की ऊष्मा?
या आत्मीयता अब
केवल इमोजी तक सिमट गई?

शब्द हैं—
पर संवाद गुम है,
मंच हैं—
पर मक़सद झूठा,
शिक्षा है—
पर विवेक कहाँ?

क्यों आज भी
कुपोषण के आँकड़े
चमचमाते मॉलों के साए में
सिसकते हैं?

क्यों विज्ञान के शिखर पर बैठा मन
अब भी
धर्म, जाति और लालच के
पिंजरे में कैद है?

नई सदी के ये सवाल
अब भी टकटकी लगाए
झाँक रहे हैं हमारी आँखों में—
उत्तर की प्रतीक्षा में,
जिसे हम भूलने का अभिनय कर रहे हैं।

अवसरवादी

वो
हर मौसम में रंग बदलता है—
जैसे ग्रीष्म में पेड़ की छाया,
जो धूप से नहीं,
धूप में खड़े से जुड़ी होती है।

उसकी अंतरात्मा नहीं होती,
केवल एक कैलेंडर होता है
जिसमें तारीखें नहीं,
अवसर दर्ज होते हैं।

वो
कभी मोम होता है,
कभी पत्थर
कभी हाथ जोड़ता है,
तो कभी पीठ में छुरा रखता है।

सिद्धांत उसके लिए
सिर्फ़ शब्दकोश का बोझ हैं,
उसके जीवन में
सिर्फ़ “फायदा” सही और “नुकसान” ग़लत है।

वो वहां नहीं होता
जहाँ संघर्ष होता है,
पर वहाँ ज़रूर दिखता है
जहाँ विजय-ध्वज लहराया जाता है।

उसकी मुस्कान में
चालाकी की दरारें हैं,
और उसकी चुप्पी
एक अगली योजना की भूमिका।

पर ध्यान रहे
वक़्त सबसे बड़ा दर्पण है,
जिसमें
हर अवसरवादी का चेहरा
कभी न कभी
बेपरदा हो ही जाता है।

धोबी घाट

भोर की उजास
जब तिरती है नदी पर,
धोबी घाट
करता है दिन का पहला वंदन।
कंधों पर कपड़ों की गठरी,
मन में बीते कल की थकन
फिर भी हर थपकी में
उम्मीद की गूँज होती है।

पत्थरों पर बजते कपड़े
जैसे बजती हो
किसी अदृश्य साज की तान,
जहाँ जीवन
कड़ी धूप में भी
अपना संगीत रचता है।

बहती नदी
केवल जल नहीं बहाती
वह धोती है
अंतर की चुप्पियाँ,
और हर छींटदार चादर में
जैसे कोई सपना
सूखता है धीरे-धीरे।

बच्चों की खिलखिलाहट,
नहाते लड़कों की हँसी,
और दूर से आती
घंटी की टुनकार
यह सब मिलकर
धोबी घाट को
एक जीवंत गीत बनाते हैं।

यह घाट
जहाँ कपड़े ही नहीं,
मन भी उजले होते हैं,
और पानी की धार में
एक पूरी सभ्यता
हर दिन फिर से
निखरती है।

देह का भूगोल

(स्त्री-सौंदर्य का सांस्कृतिक मानचित्र)

तुम्हारी काया
जैसे कोई संस्कृति से सजी हुई धरती,
जहाँ सौंदर्य की ऋतुएँ
मौन में भी संगीत रचती हैं,
और प्रत्येक अंग
किसी अर्थवान प्रतीक की तरह
अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

ललाट—
जैसे निःशब्द आकाश,
जहाँ मांग की सिन्दूरी रेखा
प्रभात की पहली लाली बनकर चमकती है।

केश—
कभी अंधकार में डूबा हुआ,
तो कभी चाँदनी से सराबोर—
कल्पना की सघन वनराशि।

दृष्टि—
निर्झरिणी सी बहती,
कभी मौन, कभी मुखर—
जैसे आत्मा को संबोधित करती कोई भाषा।

ओष्ठ—
कमल-दल पर पड़ी पहली बूँद की तरह कोमल,
जहाँ शब्द नहीं,
भाव जन्म लेते हैं।

कंठ-प्रदेश—
वाणी का उपवन,
जहाँ स्वर-पुष्प खिलते हैं
और मौन भी अपना अर्थ पाता है।

बाहुएँ—
स्नेह का विस्तार,
जिनके घेरे में
सम्पूर्ण सृष्टि विश्राम पा सकती है।

हृदय—
संवेदना का केन्द्र,
जहाँ भावनाएँ सहज लय में धड़कती हैं
जैसे कोई पुरातन वीणा।

ग्रीवा और कटि—
तरंगित सरिता की तरह लहराती रेखाएँ,
जिनमें सौंदर्य
नाद बनकर बहता है।

जंघाएँ और चरण—
धरा की शुद्धता से जुड़े,
संकल्प की दृढ़ता और सृजन की सहनशीलता लिए हुए।

संपूर्ण काया—
नारीत्व का एक अनकहा काव्य,
जहाँ नाद, रूप, रस और रीति—
सब एक साथ गूँजते हैं।

और इसलिए…

स्त्री की देह को केवल रूप से मत तौलो,
वह एक संवेदनशील सभ्यता की मूर्त रचना है,
जहाँ हर अंग
किसी आदिम गीत का स्वर है,
और हर रेखा
किसी प्राचीन मंत्र की ध्वनि।

योग्यता का वनवास

वो आता है वक्त पर,
काम समय से पहले पूरा करता है,
गलती नहीं करता,
पर तारीफ़ भी नहीं माँगता।

उसे आते हैं हल—
लेकिन वो “हल्ला” नहीं करता।
उसे आता है नेतृत्व—
पर वो “नेटवर्किंग” नहीं जानता।

और इसलिए—
जब लिस्ट बनती है पदोन्नति की,
तो उसका नाम
किसी “समीक्षा के अगले चरण” में डाल दिया जाता है।

कभी कहा जाता है—
“बहुत अच्छा काम करता है,
पर थोड़ा ‘लचीला’ नहीं है।”
कभी—
“टीम में घुलता नहीं,
इतना शांत क्यों रहता है?”
असल में—
वो “हाँ जी” नहीं करता।

जिसे आता है चमचागीरी,
वो ऊँची कुर्सी तक पहुँचता है,
और जो योग्यता से लबालब है—
वो टेबल के कोने पर बैठा रहता है,
फ़ाइलों के पीछे
अपना सम्मान ढूँढ़ता हुआ।

वो हर साल सुनता है—
“इस बार नहीं, अगली बार पक्का।”
पर वो जानता है—
ये कोई त्रेता नहीं,
जहाँ अगली बार अयोध्या मिलेगी।
यह कलियुग है—
यहाँ योग्यता को
बस वनवास ही मिलता है।

पर…

वनवास ही वो आग है
जिसमें तपकर राम बनते हैं।
और यहीं कहीं,
किसी अंधेरे कोने में
योग्यता भी अपना तेज सँजोती है।

फिर एक दिन,
वो लौटती है—
न नाराज़, न हताश,
बस सिद्ध और संकल्पित।

और तब उसका लौटना
सिर्फ़ वापसी नहीं होता,
बल्कि
एक पूरी व्यवस्था की पुनर्रचना होता है—
जहाँ काबिलियत को
फिर से उसका सिंहासन मिलता है।

हमारी सहयात्रा

(इक्कीस वर्षों की आत्मिक संगति पर एक आत्मकथ्य)

कभी-कभी जीवन कोई बड़ी घोषणा नहीं करता।
वह बस चलता है—मौन में, सहजता में, जैसे कोई पुराना राग धीरे-धीरे आत्मा में उतरता है।
आज, हमारे वैवाहिक जीवन के इक्कीस वर्ष पूर्ण हो रहे हैं।
इन वर्षों को देखते हुए यह कहना कठिन है कि हमने समय को जिया या समय ने हमें।
यह साथ केवल वर्षों की गिनती नहीं रहा—यह दो आत्माओं का एक सतत संवाद रहा है—
शब्दों से परे, पर अर्थों से परिपूर्ण।

जब हमने साथ चलना आरम्भ किया था,
मैं केवल एक स्वप्नद्रष्टा था—शब्दों में डूबा, भविष्य के रेशमी ख्वाब बुनता हुआ।
पर तुमने मुझे वर्तमान की ठोस ज़मीन दी—वह ज़मीन,
जहाँ प्रेम कोई प्रदर्शन नहीं,
बल्कि चुपचाप निभाए गए उत्तरदायित्वों की सघन कविता होता है।

तुमने मुझे सिखाया कि
जीवन कोई विराट महाकाव्य नहीं,
बल्कि रसोईघर की भाप,
बच्चों की कापियों के बीच भटके अक्षर,
बिजली के बिल, माँ की चिंता, और थकी शामों की गरम चाय में रचा गया एक धीमा, जीवंत गीत है।

तुमने यह भी सिखाया कि
प्रेम को चिल्लाने की ज़रूरत नहीं होती।
वह मौन में फूंकता है,
कभी आँखों की कोर से बहकर,
तो कभी चुपचाप रोटी पर घी बनकर उतरता है।
तुम्हारे मौन ने मेरे भीतर की सबसे सुंदर कविता को जन्म दिया—
जो किसी पन्ने पर नहीं,
बल्कि तुम्हारे स्पर्श में, तुम्हारे समर्पण में और तुम्हारी उपस्थिति में दर्ज होती रही।

दार्शनिक कहते हैं,
“प्रेम आत्मा का विस्तार है।”
और तुम्हारे साथ मैंने जाना—
कि आत्मा जब किसी और के लिए जगह बनाना सीख ले,
तो वही प्रेम, सहचरण और ईश्वर का पहला स्पर्श बन जाता है।

इन इक्कीस वर्षों में हमने बहुत कुछ पाया—
सुख, थकान, संघर्ष और आह्लाद।
कुछ खोया भी—समय, अवसर, शायद कुछ सपने।
पर जो नहीं टूटा, वह था विश्वास।

और विश्वास—वह मौन पुल है,
जो दो व्यक्तित्वों को बाँधता ही नहीं,
बल्कि उन्हें निरंतर एक-दूसरे के और निकट लाता है—
हर झगड़े के बाद, हर असहमति के पार।

तुमने मेरा जीवन केवल ‘पूर्ण’ नहीं,
‘संपूर्ण’ किया—
जहाँ प्रेम में भी एक गरिमा है,
और पीड़ा में भी एक सौंदर्य।

तुम्हारे बिना मैं शायद बस एक लेखक होता—
अर्थहीन शब्दों का व्यापारी।
पर तुम्हारे साथ मैं वह अर्थ बन सका,
जो केवल प्रेम में बार-बार एक-दूसरे को ‘पुनः चुनने’ से उपजता है।

आज—इस 21वीं वर्षगाँठ पर—
न कोई आभूषण है, न कोई वचन, न कोई चमत्कारी पंक्ति।
बस एक प्रार्थना है—

कि आने वाले वर्षों में भी मैं तुम्हें वैसे ही देख सकूँ—
जैसे कोई कवि अपनी पहली कविता को पढ़ता है—
काँपते हुए, विस्मित होकर, और हर बार कुछ नया पाकर।

तुम मेरी सबसे मौन, सबसे स्थायी कविता हो।
और मैं,
अब भी सिर्फ तुम्हारा पाठक।

संध्या सुंदरी

संध्या उतरती है
मेड़ों पर धीरे-धीरे—
जैसे कोई वधू
घूँघट सरकाती हो।

गायें लौटती हैं
धूल उड़ाते हुए,
घंटी की टनकार में
दिन भर का संगीत होता है।

कुएँ के पास
बहुएँ भर लाती हैं
घड़ों में जल नहीं—
चाँदनी की ठंडक होती है।

बच्चे,
मुट्ठियों में
धूल और हँसी समेटे
तुलसी चौरे के पास बैठते हैं।

अब नहीं धोते पाँव—
माँ समझ गई है
पवित्रता मन की होती है,
नहीं केवल स्थान की।

माँ दीपक सजाती है—
बाती सीधी कर
थकान को जला देती है
स्नेह की लौ में।

दादा चौपाल में
नीम की छाँह में
धीरे से कहते हैं—
“अब रात सिर पर है…”

पत्तों से उतरकर
चिड़ियाँ अपने नीड़ों में
दबे स्वर में गुनगुनाती हैं—
जैसे दिन को लोरी सुना रही हों।

संध्या,
गाँव के माथे पर
कुमकुम सी सजती है—
और हर आत्मा
थोड़ी देर को निर्विकार हो जाती है।

दहलीज़

दहलीज़—
न द्वार है, न दीवार,
बस एक रेखा है,
जो भीतर और बाहर के
हर अर्थ को बाँटती है।

यहाँ माँ की चुप्पी
थाली में परोसी जाती है,
और पिता की निगाहें
छत की कड़ी बन जाती हैं।

यहीं खड़ी होती है बहन,
अँचल में बचपन बाँधकर—
जब पायल के साथ
विदा का स्वर फूटता है।

यहीं से बेटा
पहली बार स्कूल जाता है,
और लौटता है
सपनों की गठरी लिए।

दहलीज़—
जहाँ हर ऋतु दस्तक देती है,
फागुन में रंग
और सावन में सौंधी हवा बनकर।

पर यह भी सच है—
कि दहलीज़ पर
कई बार कुछ सपने ठिठक जाते हैं,
और कुछ मन
अंदर ही भीतर कैद रह जाते हैं।

माँ

जिंदगी के अहसास में
वो हर वक़्त रहती
कभी सीख बनकर
कभी याद बनकर

दुनिया में नही
दूसरी कोई समता
सन्तान से पहले
जहाँ जन्म लेती ममता
औलाद में स्वयं
फौलाद भरती
टकराती तूफानों से
चट्टान बनकर
जिंदगी के अहसास में
वो हर वक़्त रहती
कभी सीख बनकर
कभी याद बनकर

पन्नाधाय बनी कभी
बनी जीजाबाई
अंग्रेजों से लड़कर
कहलायी लक्ष्मीबाई
सामने पड़ा है कभी
राष्ट्रहित जब
उदर अंश को रख
लिया है पीठ पर
जिंदगी के अहसास में
वो हर वक़्त रहती
कभी सीख बनकर
कभी याद बनकर

प्रगति को जहाँ
रुकना पड़ा है
देवत्त्व को स्वयं
झुकना पड़ा है
सतीत्व को कसौटी पर
सती ने रखा जब
त्रिलोकी झूले हैं
पालने में पड़कर
जिंदगी के अहसास में
वो हर वक़्त रहती
कभी सीख बनकर
कभी याद बनकर

कुरुक्षेत्र

हर युग में जन्म लेता है एक कुरुक्षेत्र,
जहाँ युद्ध तलवारों से नहीं,
संघर्ष होता है—
मौन बनाम मुखरता,
सिद्धांत बनाम सुविधा का।

जहाँ अर्जुन खड़ा होता है,
नहीं पहचान पाता—
शत्रु और स्नेही के बीच का अंतर,
क्योंकि सामने खड़े होते हैं—
अपने: गुरु, बंधु, कुल-धर्म।

धर्म साफ़ होता है,
पर उसे निभाना कठिन,
क्योंकि अधर्म अब
कौरवों के कवच में नहीं,
संस्थागत कुर्सियों के भीतर छुपा होता है।

कृष्ण अब रथ नहीं चलाते,
वो अंतरात्मा की आवाज़ बनकर
धीरे से कहते हैं—
“उठो, और लड़ो।
मौन भी कभी-कभी
पाप का सहभागी बन जाता है।”

कुरुक्षेत्र अब केवल एक स्थान नहीं,
ये हर वो पल है—
जब तुम्हें
सुविधा चुननी होती है या सत्य।
हर बार जब तुम सोचते हो—
“चुप रह लें… क्या फ़र्क पड़ता है…”
वहीं से युद्ध आरंभ होता है।

क्योंकि—

धर्म की रक्षा
ध्वनि नहीं, साहस माँगती है।
और जो अर्जुन
अपने ही प्रश्नों से हार जाए—
उसका गांडीव
शस्त्र नहीं, शंका बन जाता है।

आरक्षण की बैसाखी

चल पड़ा था जीवन की दौड़ में
अपनी हड्डियों के दम पर।
न जाति की बैसाखी थी,
न सत्ता का तिलक।
बस माँ की रोटियाँ थीं,
और पिता की आँखों की उम्मीद।

पर भैया,
जब मेरिट से पहुँचा द्वार तक,
तो कह दिया गया—
“पंक्ति में खड़े रहने का
अधिकार तुम्हें नहीं,
क्योंकि तुम्हारा नाम
इतिहास के घावों में दर्ज नहीं।”

मैं चुप रहा।
कहीं कोई ‘संविधान’ मेरी बात नहीं कहता,
कहीं कोई ‘बाबा’ मेरे लिए संघर्ष नहीं करता।
मेरे हिस्से का सूरज
हर बार कोटे के बादल छीन ले जाते हैं।

हास्यास्पद है यह —
कि मुझसे कहा जाता है —
“तू अभिजात्य है, तुझे क्या कष्ट!”
जबकि मेरी जेब में तो
कभी पूरी किताब खरीदने के पैसे भी नहीं होते।

पर जिनके पास
दादी के खेत,
पिता की कुर्सी,
और माँ का शहर भर का नेटवर्क है,
वे ‘पिछड़े’ कहलाते हैं —
और मैं — ‘सुविधा संपन्न भोगी’।

कभी-कभी लगता है,
कि मैं योग्यता का अपराधी हूँ।
मेरी प्रतिभा पर
आरक्षण का कोड़ा पड़ता है,
और मैं हर बार
‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर
पीछे ढकेल दिया जाता हूँ।

कितना अजीब है,
एक देश में —
जहाँ भीख मांगना अपराध है,
वहाँ कोटा मांगना अधिकार है।

शबरी की प्रतीक्षा

यह कोई साधारण प्रतीक्षा न थी—
न क्षणों की गिनती,
न पथ की ओर आँख टिकाए कोई अधीरता।
यह प्रतीक्षा थी
जैसे कोई नदी
स्वयं समुद्र हो जाने की यात्रा में हो।

शबरी बैठी थी—
एक निर्जन वन में नहीं,
बल्कि आत्मा के उस अंतर्यात्रिक वन में,
जहाँ हर पत्ता
एक श्लोक की भाँति गिरता था।

कंद चखना,
पेड़ों से संवाद करना,
मिट्टी की गंध में जीवन खोज लेना—
ये सब क्रियाएँ नहीं थीं,
ये तो उसकी साधना के मंत्र थे।

राम उसका लक्ष्य नहीं थे,
वे तो उसके भीतर के
प्रेम, प्रतीक्षा और परिपक्वता का प्रतिबिंब मात्र थे।
वह जानती थी—
सच्चा प्रेम आग्रह नहीं करता,
सिर्फ उपस्थित रहता है।

और उस उपस्थिति में
शबरी धीरे-धीरे
स्वयं को घिसती रही,
जैसे एक शिला जल में घुलती हो—
अहं टूटता गया,
इच्छाएँ मुरझाती रहीं,
और बचा सिर्फ एक मौन…
जो राम से भी गहरा था।

जब राम आए—
तो चमत्कार नहीं हुआ,
वह दृश्य केवल दृश्य नहीं था,
वह एक संपूर्ण जीवन की पुष्टि थी—
कि प्रतीक्षा, यदि निर्विचल हो,
तो वह स्वयं ईश्वर का रूप बन जाती है।

राम आए नहीं थे,
वे घटे थे—
जैसे प्रार्थना की अंतिम चुप्पी में उतरता हो कोई उत्तर।
न चरणों की ध्वनि हुई,
न वनों में शंखनाद,
फिर भी हर वृक्ष, हर पत्ता,
उस एक क्षण में अरण्य नहीं,
आत्मा बन गया था।

वे किसी दिशा से नहीं आए,
वे तो उस प्रतीक्षा के भीतर से प्रकट हुए—
जहाँ प्रेम आग्रहहीन था,
समर्पण निर्वचन,
और मौन स्वयं एक संवाद।

शबरी ने राम को देखा नहीं,
उसने उन्हें पुकारा नहीं,
वह जानती थी—
पहचानना, ईश्वर को सीमित कर देना है।

उसने उन्हें अनुभव किया—
जैसे सूर्य को अनुभव करती है अंधकार की पीठ।

यह मिलन दृश्य नहीं था,
यह साक्षात्कार था—
प्रश्नों से रहित,
आवश्यकताओं से परे,
पूर्णता की निर्विकार आभा में डूबा।

इसलिए,
जब राम मिले—
वह मिलन नहीं था,
वह प्रतीक्षा का
स्वयं में लौट आना था।

ऑपरेशन सिंदूर

सुन पाक —
अब तेरा वक़्त आ गया है।
जो ज़हर उगला था तूने,
वो ज़हर अब तेरे गले उतरेगा।

सवा एक बजे रात,
तेरे अंधेरों में तांडव हुआ।
हिंदुस्तान के बेटों ने
तेरी छाती पर पैर रखा।

नौ ठिकाने —
तेरे हर नापाक अड्डे को
धुएँ में उड़ा दिया।
तेरे हर सपने को
बारूद में नहला दिया।

हम वो हैं,
जो ऐलान करके नहीं आते,
सिर्फ़ तेरा नक़्शा बदलकर लौटते हैं।
तेरी औक़ात तेरे घर में बता आते हैं।

तेरे गली-कूचों में अब मातम बजेगा,
तेरे वजूद पर कालिख सजेगी।
जो आँख उठी हिंदुस्तान की ओर,
उस आँख को ताबूत में रख देंगे।

ये हिंदुस्तान है —
शब्द नहीं, वार करता है।
और जब वार करता है,
तो दुश्मन की सात पुश्तें
ताबीज़ बाँधने लगती हैं।

सुन ले —
तेरा हर मंसूबा अब तेरी लाश के नीचे दबेगा।
अब तुझे तेरी ज़ुबान में जवाब मिलेगा।
तेरे हौंसले अब राख होंगे,
तेरे सपने सिर्फ़ कब्रिस्तान में जिएँगे।

जय हिंद — हर बार, हर वार।

अहिल्या का प्रतिवाद

जब धर्म की कसौटी पर न्याय मौन रहा—
मैं वहीं से बोलती हूँ।

मैं
न तो शिला हूँ,
न अग्नि की ज्वालाओं में शुद्धि खोजती कोई सत्ता।
मैं वह मौन हूँ
जो युगों से भाषा बनने की प्रतीक्षा में है।

अहिल्या —
नाम भर नहीं,
एक प्रतीक हूँ उस निर्णयहीन नारी का
जिसे पुरुष-नीति ने
अधिकारहीन बना
धर्म की चौखट पर रख दिया।

क्या मेरा अपराध
केवल इतना था
कि मैंने छल को पहचान न सकी?
या फिर यह कि
मैं स्त्री थी —
मौन और सहनशील होने के लिए रची गई?

गौतम की क्रोधाग्नि
और राम के चरण-स्पर्श के बीच
जो युग बीते,
मैं हर युग में उस स्त्री की छाया बनी,
जिसे पुरुषों ने पूजने से पहले तोड़ा,
और मोक्ष कह कर मौन सौंप दिया।

मैं पूछती हूँ —
क्या सतीत्व वह है
जो युग-युगांतर से
स्त्री को सिद्ध करना पड़ता है
पुरुष के संदेह की अग्नि में?

नहीं।
अब मैं वह स्त्री हूँ
जो अपने अंतर में अग्नि भी है
और शांति भी।
मैं स्वंय प्रश्न हूँ,
स्वंय उत्तर भी।

मेरा सतीत्व
अब किसी ऋषि की स्वीकृति का मोह नहीं रखता,
न किसी अवतार की कृपा का आकांक्षी है।
यह मेरी जाग्रत चेतना है,
जो मिथकों के भीतर से
अपने लिए एक नवशास्त्र रच रही है।

अहिल्या अब पत्थर नहीं—
वह चेतना है,
जो प्रतीक नहीं बनती,
प्रश्न बनती है।
वह वह मौन है,
जिसमें शब्द जन्म लेते हैं—
और वह प्रतिरोध,
जो करुणा से नहीं,
विवेक से उपजता है।
जो सत्य के लिए
अब किसी अवतार की प्रतीक्षा नहीं करती—
बल्कि स्वंय इतिहास को रचती है।

खलिहान

धूप में भीगता
पसीने से चमकता
वह सूना नहीं होता—
खलिहान बोलता है
हर रोटी की कहानी।

धान की गंध में
बसी होती हैं
माँ की हथेलियाँ,
और भूसे के ढेरों में
छिपा होता है
बचपन का एक छुपन-छुपाई खेल।

कंधे पर गट्ठर ढोती
वह स्त्री
केवल अन्न नहीं
पूरे वर्ष की आशा
बाँध लाती है झोले में।

बैल की घंटियाँ
आकाश की चुप्पी तोड़ती हैं
और नंगे पाँव
खलिहान को नापते बच्चे
धूल में नहीं—
भविष्य में खेलते हैं।

तह की गई चादर की तरह
दिन ढलता है—
फिर भी कोई थकान
शिकायत नहीं बनती,
क्योंकि
मिट्टी की पूजा
शब्दों से नहीं,
श्रम से होती है।

भावनाओं का बंजरपन

मन
अब बीज नहीं बोता
सिर्फ़ दीवारों पर
पत्थर उगाता है
और कैलेंडर टाँग देता है।

संवेदनाएँ
सूखते तालाब-सी
हर मौसम
और सिकुड़ती जाती हैं।

किसी की पीड़ा
अब आँकड़ों में दर्ज होती है,
किसी की वेदना
विचार-विमर्श का
एक विषय बनकर रह जाती है।

चेहरों की मुस्कानें
अब मुखौटे लगती हैं,
और आँखों में
नींद की जगह
थकी हुई प्रतीक्षा पलती है।

हमने
प्रेम को पोस्ट,
दुख को स्टेटस,
रिश्तों को नेटवर्क
और जीवन को
नोटिफिकेशन बना दिया है।

अब कोई नहीं
जोतता मन की ज़मीन,
न ही शब्दों की वर्षा करता है
बस उगते हैं
तर्कों के काँटे,
और काटते हैं
मौन की झाड़ियाँ।

यह समय
सूचनाओं से सींचा गया,
पर भावनाओं से
सूखा हुआ है।

धरती की पीठ पर

मैंने देखा है
धरती की पीठ पर
एक किसान उगाता है
सिर्फ अनाज ही नहीं,
बल्कि अपनी उम्मीदें भी।

उसकी हथेली की दरारों में
बरसों की धूप छुपी है,
और आँखों में
अब भी आसमान तक पहुँचने का सपना।

जब बारिश धो देती है मिट्टी की प्यास,
तो उसके चेहरे की झुर्रियाँ
मुस्कुराहट बन जाती हैं।

उसी खेत की मेड़ पर
एक औरत सिर पर घड़ा रखे
अपने हिस्से की नदी खोजती है,
और चिड़ियाँ
दिनभर उसकी साँसों में
उड़ने का हौसला भरती हैं।

गाँव के मंदिर की घंटी
अब भी पुराने सुर में बजती है,
और पीपल की छाँव
हर दुखिया का आसरा है।

मैंने सीखा है,
कि जहाँ शहरों की भीड़ में
इंसान खो जाते हैं,
वहीं गाँव की पगडंडियाँ
हर पाँव की पहचान रखती हैं।

धरती की पीठ पर
जब भी एक बीज गिरता है,
तो केवल पौधा ही नहीं,
एक युग उगता है।

इक्कीसवीं सदी

यह
इक्कीसवीं सदी है—
जहाँ स्पर्श मोबाइल में है
और संवेदना नेटवर्क में फँसी हुई।

यहाँ रिश्ते
कमेंट बॉक्स में पलते हैं
और मन
इनबॉक्स में सूखता जाता है।

यहाँ बच्चे
गूगल से सवाल पूछते हैं,
और माँ-बाप
वॉट्सऐप से संस्कार बाँटते हैं।

ज्ञान
अब अनुभव से नहीं,
रील और शॉर्ट्स से मापा जाता है,
जहाँ ‘देखा है’ का अर्थ
‘समझा है’ नहीं होता।

यहाँ
मंदिर, मस्जिद और संसद
सभी में शोर है,
पर आत्मा के भीतर
एक भयावह चुप्पी पसरी है।

सदी की शुरुआत
उम्मीदों से हुई थी,
पर अब
आशंका की आँधियों में
सपनों के वृक्ष झुकने लगे हैं।

हमने
चाँद पर झंडा गाड़ दिया,
लेकिन ज़मीन पर
इंसानियत का चेहरा धुंधला हो गया।

भगीरथ संकल्प

सूख चुकी थी पृथ्वी की देह,
नदियाँ बस नाम रह गई थीं,
बादल
जैसे किसी निर्वासित गाथा के भटके हुए अक्षर।

धरती की छाती पर
दरारें थीं,
भूख के नक्शे थे,
प्यास की चीखें थीं।

तब…
एक अकेला उठा
नंगे पाँव, धूप से झुलसा,
अग्निपथ रचता हुआ!

उसने समय के देवताओं को नहीं मनाया,
न द्रवित किया किसी युग के भाग्य को,
बस अपने कंधों पर उठा लिया
एक पूरे ब्रह्मांड का बोझ।

छेनी-हथौड़ी से नहीं,
अपने हठ से, अपने अश्रु से,
पर्वत की छाती को चीर डाला,
और धरती को दिया
जल, जीवन, गति।

भगीरथ था वह
न किसी मंदिर में पूजित,
न किसी कथा में अलंकृत,
बस मिट्टी से उठकर
मिट्टी के लिए जिया।

आज भी जब धरती रोती है,
आकाश थमता है,
तो एक भगीरथ
चुपचाप जन्म लेता है
अपने भीतर
संपूर्ण सृष्टि को संचालित कर देने के संकल्प के साथ।

मुखौटे

हर दिन
हम पहनते हैं एक नया चेहरा
कभी मुस्कुराहट का,
कभी सहमति का,
कभी उस मौन का
जो भीतर से चीख रहा होता है।

हम सीख चुके हैं
कि कैसे दुख को छुपाना है
एक मीठे शब्द में,
कैसे असहमति को
मौन की चादर में ढाँप देना है।

अब रिश्ते
भाव से नहीं,
प्रभाव से चलते हैं।
सच्चाई
तमीज़ से हार जाती है,
और मुखौटा
‘व्यक्तित्व’ कहाने लगता है।

कोई पूछता भी नहीं—
“तुम सच में ठीक हो?”
क्योंकि जवाब में
सच सुनने का साहस
अब किसी के पास नहीं।

हर शाम
हम थके होते हैं—
काम से नहीं,
मुखौटे सँभालते सँभालते।

कभी-कभी लगता है,
चेहरा खो गया है,
सिर्फ़ मुखौटा रह गया है।

उतरन

वह लड़की
आज फिर पहनती है
एक पुरानी सलवार—
जिसकी सिलवटों में
किसी और की युवावस्था
अब भी सांस लेती है।

रंग हलका पड़ गया है,
किनारे जरा उधड़ गए हैं,
पर धागों में
अब भी किसी और की
शादी की शाम टंकी हुई है।

चप्पल उसकी पांवों से बड़ी है—
चलते-चलते
हर मोड़ पर चटकती है
जैसे कहती हो—
“तू इस घर की नहीं है पूरी तरह।”

स्कूल बैग के भीतर
किसी अर्जुन का नाम
जबरन काटकर
उसने अपना लिखा है—
पर हर परीक्षा में
लगता है जैसे
पहले की स्याही अभी भी जीतती है।

उतरन
सिर्फ वस्त्र नहीं होती—
वह एक स्मृति होती है
किसी और की जीत की,
किसी की उदारता की छाया में
किसी और की हार भी।

वह बुज़ुर्ग माँ
जो अपने गहनों में से
छोटा-सा पायल
बहू को सौंपती है—
उसे ‘उतरन’ नहीं कहती,
उसे ‘आशीर्वाद’ कहती है।

लेकिन झुग्गी की वह स्त्री—
जो समाज की छाँव में
हर त्यौहार पर
किसी और की पुरानी साड़ी पहनती है,
वह अपने बच्चों को
अब भी नया सपना पहनाना चाहती है।

उतरन,
कभी करुणा है
तो कभी कटाक्ष,
कभी प्रेम
तो कभी पहना गया भेदभाव।

कब मिलेगा वह दिन
जब हर देह को
अपने लिए सिला गया वस्त्र मिलेगा,
हर नाम को
अपनी किताब में
पहली बार लिखा जाएगा,
और उतरन
सिर्फ बीते समय की
एक लोक-कथा बनकर रह जाएगी।

दायित्व-बोध

मैं केवल पाठ नहीं पढ़ाता,
शब्दों में संस्कार गढ़ता हूँ—
दीवारों के भीतर उगते स्वप्न
मेरे ही अंश हैं,
जिन्हें मैं हर दिन
संवेदनाओं से सींचता हूँ।

चॉक की धूल
मेरे वस्त्रों पर नहीं,
विचारों की रेखाओं में सजी होती है—
हर रेखा,
किसी संभावित भविष्य का मानचित्र बन जाती है।

घंटी की हर टंकार
मेरे दायित्व का उद्घोष है—
हर कालांश,
केवल पठन नहीं,
चरित्र निर्माण की एक प्रक्रिया है।

जब मैं डाँटता हूँ,
तो वह क्रोध नहीं,
एक दृष्टा की पीड़ा होती है
जो चाहता है कि
उसका शिष्य अंधकार से बचे।

और मेरी मुस्कान—
कोमल नहीं,
एक आश्वासन है
कि संसार में अभी भी
प्रेरणा जीवित है।

मैं जानता हूँ—
मेरे श्रम से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं
वे आँखें,
जो मेरी ओर टिकी होती हैं
किसी विश्वास की तरह।

शिक्षक होना
न केवल एक उत्तरदायित्व है,
बल्कि वह साधना है
जो स्वयं को तिल-तिल तपाकर
दूसरों में उजास भरती है।

धर्म तुला

धर्म तुला पर खड़े हुए
अब न्याय नहीं तौलते—
पलड़े सत्ता के भार से
एकतरफ़ा झुकते हैं,
और न्याय—
बस बहसों के ब्योरे में
तारीख़ों की तरह दर्ज़ रह जाता है।

कभी जहाँ सत्य की जय होती थी,
अब वहाँ मौन की चतुराई है।
शब्दों की मर्यादा
सभाओं के मध्य टूटती है
और न्याय,
राजसी चुप्पी की ओट में
लज्जा का वस्त्र ओढ़े
विलीन होता जाता है।

द्रौपदी का चीर
आज भी खींचा जा रहा है,
मंच भले बदल गए हों—
दर्शक वही हैं
जो आज भी करुणा की चीखों में
मनोरंजन ढूँढ़ते हैं।

धर्मराज
हर घर में बैठा है,
सत्य जानकर भी
शांति के नाम पर
अधर्म का मूल्य चुका रहा है।

दुर्योधन की न्याय-याचना
न्याय नहीं,
अहंकार का आवरण थी।
वह पाँच गाँव नहीं चाहता था—
उसे पूर्ण अधिपत्य चाहिए था,
उसका न्याय
अपमान की चादर ओढ़े
सत्ता के पलड़े में झूलता रहा।

कृष्ण का चक्र
युगों से घूम रहा है—
कभी शब्दों में,
कभी युद्धों में,
तो कभी
अंदर ही अंदर
एक सजग अंतरात्मा में।

अब कृष्ण की बाँसुरी चुप है,
पर सुदर्शन
हर युग की हथेली पर
घूम रहा है
क्योंकि धर्म,
शब्दों से नहीं—
कर्मों से तौला जाता है।

यह युग पुकारता है
कि धर्म केवल
शास्त्रों में नहीं—
संवेदना में है।
जब तक न्याय
निर्बलों की पीड़ा में
गूँजता नहीं—
वह अधूरा है।

अब
हर अपमान पर
भीतर का कोई कृष्ण
उठे—
न केवल चक्र लेकर,
बल्कि संकल्प लेकर
कि अन्याय अब मौन से नहीं—
प्रतिरोध से मिटेगा।
तभी धर्म की तुला
फिर से संतुलन पाएगी।

लेबर चौराहा

वो नहीं करता भाषण,
न सोशल मीडिया पर डालता अपनी मेहनत की तस्वीरें।
उसकी ज़िंदगी
जैसे भोर का सूरज
सिर पर ईंटों की तरह चढ़ता है हर दिन।

लेबर चौराहा
उसका ऑफिस नहीं,
वो चबूतरा है जहाँ
सपने खड़े होते हैं
सस्ती मजदूरी की उम्मीद में।

वो प्रेम नहीं करता शायरी में,
करता है
बच्चे की टूटी चप्पल सिलवाने में,
बिटिया के लिए मेले से चूड़ी लाने में।
उसका प्यार
रोटी के चार टुकड़ों में बंटा होता है
पर सबसे बड़ा हिस्सा घर भेज देता है।

वो आदमी
कभी मंदिर की सीढ़ियों पर सुस्ताता है,
कभी नाली के किनारे बैठकर
बीड़ी सुलगाता है
उसकी थकान
कोई नहीं देखता।

उसकी बीवी गाँव में
हर शाम सूरज ढलने तक
आसमान को निहारती है
क्या आज काम मिला होगा?

लेबर चौराहा
कोई चौराहा नहीं,
ये एक कविता है
जो हर रोज़ चुपचाप लिखी जाती है
मिट्टी, पसीने और इंतज़ार से।

आस्तीन के साँप

(दफ़्तर की साज़िश)

दफ़्तर में साँप
कुर्सियों पर नहीं
कंधों पर रेंगते हैं,
फाइलों की फड़फड़ाहट में
फुफकारते हैं।

वे मुस्कराते हैं,
“सर, आप ही तो हमारे आदर्श हैं!”
कहकर
आपकी रिपोर्ट दबा आते हैं
किसी और की फाइल के नीचे।

वे चाय मँगवाते हैं
आपके लिए,
पर घोलते हैं
अपने मतलब का शक्कर
और परोसते हैं
मीठी मार!

वे बैठते हैं पास,
जैसे वर्षों के साथी हों
और अगली बैठक में
आपका नाम काटने का
प्रस्ताव पढ़ते हैं।

उनकी मेल में हँसी होती है,
कार्बन कॉपी में षड्यंत्र,
और ‘फॉरवर्ड’ में
आपकी मेहनत का
धुँआधार विसर्जन।

वे गलियों में नहीं,
गले में बसते हैं
जैसे शुभकामना के बहाने
गूँजते विषपान।

वे सलाह नहीं देते,
संकेत करते हैं
जिससे आपकी प्रगति
धीरे-धीरे
आपके ही पैरों में बाँध दी जाए।

हर तारीफ के नीचे
एक खुरचती हुई बात छिपी होती है,
हर मुस्कान के पीछे
एक नोटिंग
“कमी है नेतृत्व क्षमता में।”

प्रभाती

पूरब की लाली
धीरे-धीरे खेतों पर उतरती है,
ओस की बूँदें
धरती की पलकों पर
जगमगाने लगती हैं।

कुएँ की चरखी
पहली बार घूमती है,
और माँ
बाल्टी में भर लाती है
सुबह की शांति।

पीपल पर बैठी चिड़ियाँ
गाँव को जगाती हैं,
जबकि दादा
अंगोछा सँभालते हुए
दिन का हिसाब सोचने लगते हैं।

भोर की हवा
गाय की साँसों से होकर
खलिहान तक जाती है—
जैसे प्रभाती
गाँव की रगों में
फिर से जीवन का राग भर रही हो।

अधनंगे चरवाहे

प्रातःकाल की प्रथम किरण के साथ
वे जाग उठते हैं—
कंधे पर बाँस की लाठी,
सिर पर अंगोछा बाँधे,
नंगे पाँव धरती की नब्ज़ टटोलते
चरागाह की ओर बढ़ चलते हैं।

चिथड़े वस्त्रों में भी
उनकी दृष्टि में होती है
स्वप्नों की उजास—
हरियाली की तलाश
उन्हें सुदूर खेतों तक ले जाती है।

उनकी थैली में होती है
माँ के हाथों की रोटियाँ,
थोड़ा नमक, एक प्याज,
और मन में संतोष का भाव—
जैसे न्यूनता में भी
समग्र जीवन समाहित हो।

वृक्षों की छाया में
कभी बाँसुरी की धुन छेड़ते,
कभी पशुओं से संवाद करते
वे समय की गति को
अपनी लय में बाँध लेते हैं।

गर्मियों की तीव्र लू हो,
या वर्षा की मूसलधार,
या शीत का काँपता दिन—
चरवाहे कभी थकते नहीं,
क्योंकि उनका जीवन
प्रकृति से अनुबंधित होता है।

पगडंडियाँ उनकी कथा कहती हैं,
धूल उन्हें पहचानती है,
और साँझ की गोधूलि
उनके चरणों को
धूप से लौटती छायाओं की तरह चूमती है।

चैत दुपहरी

चैत की दुपहरी है
गाँव की देह पर
धूप नहीं,
भूख उतरती है।

धूल से अँटी
पगडंडी के छोर पर
एक स्त्री झुकी है
सिर पर लकड़ियों का गठ्ठर,
पीठ पर बच्चा,
और आँखों में
दिन का अधूरा सपना।

उसके घाघरे में हवा नहीं,
बस थकान है।
हँसी, अब भी गूँथी है ओठों पर,
पर उसमें रोटी की
गंध नहीं,
संघर्ष का स्वाद है।

खेत की मेड़ पर
एक कृषक,
नरवा के गड्ढे से पानी खींच रहा है
छाले पड़े हैं हथेलियों में,
पर उसकी निगाह में
अब भी
अन्न के अंकुर फूटते हैं।

धूप उस पर हँसती है,
पर वह चुपचाप
धरती की गोद को सहलाता है
जैसे वह
माँ नहीं,
सहधर्मिणी हो।

गाँव की गली में
बच्चे नंगे पाँव
कंचे खेलते हैं,
और बरगद तले बैठी
बुज़ुर्ग अम्मा
पास से गुजरती नव-ब्याहताओं को
हल्के स्वर में
कभी हँसी में डाँटती,
कभी कामचोरी पर टोकती,
तो कभी
अपना बीता जीवन सुना देती है।

उनके शब्दों में
कभी कटाक्ष होता है,
तो कभी माँ जैसी छाया
जैसे अनुभव
नई पीढ़ी से
धीरे-धीरे
संवाद कर रहा हो।

चौराहे पर रखे मटकों में,
भरकर मीठा कुएँ का पानी,
कुछ किशोर, हर भोर उठकर
छाँव बाँटने निकल पड़ते हैं।

बाँस की छायाओं तले,
वे रख आते हैं
माटी के घड़े,
जिनमें धड़कती है गाँव की करुणा।

जब धूप देह को छीलती है,
और होंठों पर प्यास बिखरती है,
तब वही प्याऊ
घूँट-घूँट
जैसे जीवन का गीत गाते हैं।

उन मटकों में
सिर्फ पानी नहीं होता
माँ की ममता,
धरती की ठंडक,
और
संवेदनशील मन का अनकहा श्रम
उतरता है हर घूँट में।

आसमान तपता है,
पर उन मटकों में
अब भी ठंडक बची रहती है
जैसे गाँव,
हर बार चैत से लड़कर
फिर मुस्कुराना सीख जाता हो।

अमरेश सिंह भदौरिया
प्रवक्ता हिंदी
त्रिवेणी काशी इ० कॉ० बिहार, उन्नाव

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *