शादी का चौथा फेरा

शादी का चौथा फेरा

सुहागरात की अगली सुबह प्रातः 6:00 बजे जैसे ही नई नवेली दुल्हन शीतल की आंख खुली, तो उसने अपने पति वीर सिंह को अपने करीब ना पाया। कुछ देर तक वह अपने पति का इंतजार करती रही। उसे लगा कि शायद मेरे पति दैनिक क्रियाकलापों से निवृत होकर बाहर घूमने गए हैं, कुछ देर में वापिस आ जाएंगे। जब इंतजार करते-करते 8:00 बज गए, तो शीतल ने अपनी सासू मां गायत्री से पूछा-

“मम्मी जी, वे कहाँ गए हैं? उनका कुछ पता है?”

“वे कौन? वीर सिंह?” गायत्री बोली।

“हाँ मम्मी जी, मैं उन्हीं के बारे में आपसे पूछ रही हूँ।”

“क्या हुआ? तुमसे बताकर नहीं गया?” गायत्री ने सवाल किया।

“नहीं मम्मी जी, मैं तो सो रही थी। मेरी आंख सुबह 6:00 बजे खुली तो देखा वे कमरे में नहीं थे। तब से इंतजार करते-करते 2 घंटे से ज्यादा का समय हो गया, इसलिए आपसे पूछा। शायद आपको उनकी जानकारी हो।” शीतल बोली।

“सुबह 5:00 बजे देखा था उसे। शादी की थकान की वजह से हम सब लोग गहरी नींद में थे। जब वह कमरे में आया था तो उसने लाइट ऑन की थी। तभी नींद में ही मेरी आंख खुल गई थी। मैं भी नींद के आगोश में थी। वह शायद कुछ ढूंढ रहा था फिर लाइट ऑफ करके चला गया। न तो उसने कुछ बताया और न ही मैंने उससे कुछ पूछा। इसके बाद मैं भी सो गई। बेटा, परेशान ना हो। मैं अभी कॉल करके पूछती हूँ उससे।” गायत्री ने शीतल से कहा।

“मम्मी जी, कॉल करने का कोई फायदा नहीं है। मोबाइल तो कमरे में ही रखा हुआ है। मैंनें जब उन्हें कॉल की तो मेरे करीब में ही फोन की रिंग बजी। तब पता चला कि मोबाइल तो वे घर पर ही भूल गए हैं।” शीतल बोली।

“ऐसे कैसे हो सकता है? फोन तो वह हमेशा अपने साथ लेकर ही जाता है। वह घर पर मोबाइल कैसे भूल सकता है? बेटा, सच-सच बताना। रात तुम दोनों के बीच कोई बात तो नहीं हुई जिससे वह नाराज होकर कहीं चला गया हो? तुम दोनों के बीच सब कुछ ठीक तो है?” शीतल को शकभरी निगाहों से देखते हुए गायत्री ने सवाल किए।

“मम्मी जी, कैसी बातें कर रही हो? हम दोनों के बीच सब कुछ ठीक है। हमारे बीच कोई मनमुटाव, झगड़ा, नाराजगी जैसी कोई बात नहीं हुई। आपकी बातों से मुझे घबराहट हो रही है। कृपया आप उनका पता लगाने की कोशिश करो।” यह कहते हुए शीतल की आंखें नम हो गई।

“बेटा शीतल, तू परेशान ना हो। मैं अभी वीर सिंह के दोस्तों से उसके बारे में पता करती हूँ। हो ना हो.. वह अपने दोस्तों के साथ कहीं बैठा हुआ गप मार रहा होगा।” गायत्री ने शीतल को तसल्ली देते हुए कहा।

एक-एक करके गायत्री ने वीर सिंह के सभी दोस्तों को कॉल लगाई, लेकिन हर जगह से एक ही जवाब मिला- “वीर सिंह तो यहां नहीं आया। हमें वीर सिंह के बारे में कोई जानकारी नहीं है।”

वीर सिंह को लेकर सब लोग परेशान हो गए। धीरे-धीरे परिवार के सभी लोगों, रिश्तेदारों में खबर फैल गई कि वीर सिंह सुबह-सुबह उठकर, तैयार होकर, मोबाइल घर पर छोड़कर कहीं चला गया है। सबके मन में एक ही सवाल चल रहा था कि आखिर वीर सिंह गया कहाँ? सबकी निगाहें शीतल पर थी। वीर सिंह के इस तरह सुबह-सुबह जाने को सब शीतल से जोड़कर देख रहे हैं। सबको यही लग रहा था कि शीतल कुछ छुपा रही है। हो ना हो, शीतल व वीर सिंह के बीच रात में जरूर कुछ खटपट हुई है। जिस वजह से वीर सिंह मोबाइल घर पर छोड़कर, अंधेरे अंधेरे में तड़के 5:00 बजे कहीं चला गया।

वीर सिंह को ढूंढते-ढूंढते दोपहर के 12:00 बज गए लेकिन वीर सिंह नहीं मिला। 12:30 बजे के लगभग गायत्री के पास वीर सिंह के एक दोस्त राघव की कॉल आई। उसने कहा- “आंटी जी, वीर सिंह अपने जनरल स्टोर पर बैठा हुआ है। आज सुबह 6:00 बजे ही उसने दुकान खोल ली थी, तब से वह यहीँ दुकान पर है।”

“हे भगवान! यह कैसा लड़का है? शादी से अगले दिन भला कौन दुकान खोलता है? आराम करने की बजाय दुकान खोल कर बैठ गया? सबको इस कमबख्त ने परेशान करके रख दिया। सुबह मुझे बात कर भी तो जा सकता था कि दुकान जा रहा है। अब समझ आया कि वह मेरे कमरे में सुबह-सुबह लाइट जलाकर दुकान की चाबी ही ढूंढ रहा था।” वीर सिंह पर गुस्सा करते हुए गायत्री बोली।

मम्मी जी से वीर सिंह के दुकान पर होने की बात सुनकर शीतल की जान में जान आई। वीर सिंह का एक जनरल स्टोर था जो घर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर था। वीर सिंह के पिताजी रणजीत सिंह जनरल स्टोर चलाते थे। लेकिन उनकी मौत के बाद वीर सिंह ही इस जनरल स्टोर को चलाता था। किसी का भी ध्यान जनरल स्टोर की ओर नहीं गया था।

शाम में जब वीर सिंह घर आया तो उसने देखा कि शीतल उससे नाराज है। वह बात तो सबसे कर रही है लेकिन उससे बात करने से बच रही है। वीर सिंह ने सबकी नजरों से बचाकर शीतल को अपनी तरफ खींचा और अपने कमरे में हाथ पकड़कर ले जाने लगा। शीतल ने उससे हाथ छुड़ाने की कोशिश की लेकिन वीर सिंह ने उसका हाथ नहीं छोड़ा। वीर सिंह बोला-

“तुम कैसे मुझसे नाराज हो? परिवार के सभी लोगों, दोस्तों, रिश्तेदारों की नाराजगी तो मैं सह सकता हूँ और सुबह से उनका गुस्सा, नाराजगी सह भी रहा हूँ लेकिन मैं तुम्हारी नाराजगी सह न पाऊंगा। मैं तुम्हें इस तरह नाराज नहीं देख सकता। हाँ, मुझसे गलती हुई है कि मैंने दुकान पर जाने को लेकर किसी से चर्चा नहीं की और बिन बताए दुकान चला गया। तुम भी सो रही थी।

तुम्हें मैंने उठाना ठीक नहीं समझा और गलती से मेरा मोबाइल भी घर पर रह गया। इसलिए अपने बारे में बता नहीं पाया। मुझे माफ कर दो मेरी शीतल। आगे से कभी गलती नहीं होगी। भविष्य में मैं कभी शिकायत का मौका नहीं दूंगा। तुम्हारा कहना मानूँगा।” वीर सिंह द्वारा अपनी गलती मानने की बात सुनकर भी शीतल चुप रही। उसने कुछ कहना सही नहीं समझा।

“मुझे अपनी शीतल को मनाने के लिए क्या करना होगा? अब रोमांटिक अंदाज में कहते हुए वीर सिंह शीतल को अपनी बाहों में भरने की कोशिश की।

“कुछ तो शर्म करो। यह तो देखो, यहाँ परिवार के सब लोग इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। तुम्हारी ऐसी हरकतें देखेंगे तो क्या कहेंगे?” खुद को अलग करते हुए शीतल बोली।

“लोगों की बड़ी फिक्र है? मेरी कोई फिक्र नहीं है। आखिर हम दोनों पति-पत्नी हैं। इसमें डरने वाली क्या बात है?”

“पति-पत्नी हैं तो क्या? खुले में करोगे सब कुछ?”

“मैं तो अकेले में तुम्हें प्यार करना चाहता हूँ। अपने कान पड़कर अपनी गलती मानना चाहता हूँ। लेकिन तुम मान ही नहीं रही। मुझसे नाराज होकर बैठी हो। मुझसे बात नहीं कर रही हो। तुम्हें मनाने के लिए ही तो मुझे बेशर्म बनना पड़ रहा है। मैं भी कहाँ सबके सामने बेशर्मी दिखाना चाहता हूँ।”

“अच्छा ऐसी बात है। तो ठीक है, मैं मान गई। मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ लेकिन आपको मुझसे एक वायदा करना पड़ेगा कि आप मुझे कभी अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाओगे। जहाँ भी जाओगे, बताकर जाओगे। आपको नहीं पता। आज सब लोग मुझे शक भरी निगाहों से देख रहे थे। सबको यही लग रहा था कि मुझसे नाराज होकर आप कहीं चले गए हो। वैसे मैं जान सकती हूँ कि आपको आज इतनी सुबह दुकान पर जाने की क्या जरूरत थी, जबकि बाकी दिनों में सामान्यत 10:00 बजे से पहले दुकान नहीं खुलती। आज आप आराम भी तो कर सकते थे।”

“तुमसे शादी होने के बाद मेरी जिम्मेदारी तुमको लेकर, परिवार को लेकर बहुत बढ़ गई है। पहले मैं अकेला था। अब हम एक से दो हो गए हैं, कल को दो से चार भी होंगे। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा जीवन देने और घर चलाने के लिए रुपयों की जरूरत होती है।

इसी दुकान से ही तो हमने सब कुछ पाया है। हमारी काफी फेमस दुकान थी। पिताजी की मृत्यु के बाद मैं अपनी दुकान खोलने को लेकर काफी लापरवाही करता था। इससे दुकानदारी कम हो गई। ग्राहक कट गए। पुनः दुकान को स्थापित करने में समय लगेगा। ऐसे में, दुकान के प्रति मेरा गंभीर होना बेहद जरूरी था।

इसी दुकान से मैं अपने, तुम्हारे और अपने होने वाले बच्चों के सारे सपने पूरा करना चाहता हूँ। इसके लिए मुझे ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ेगी और ज्यादा से ज्यादा दुकान पर बैठना पड़ेगा। इसलिए मैं आज समय से पहले ही 6:00 बजे दुकान खोल कर बैठ गया।” वीर सिंह ने अपनी बात रखकर शीतल को समझाने की कोशिश की।

“मुझे यकीन नहीं हो रहा जो व्यक्ति लापरवाही में मोबाइल घर छोड़ कर जा सकता है, वह इतनी समझदारी भरी बातें कैसे कर सकता है?” इतराते हुए शीतल बोली।

“तुम्हें याद है शीतल? जब हमारे फेरे हो रहे थे तब पंडित जी ने चौथे फेरे के समय चौथे वचन का एक श्लोक पढ़ा था, जो मैंने बाद में गूगल से सर्च करके, स्क्रीनशॉट लेकर रख लिया है। मोबाइल से पढ़कर वीर सिंह, शीतल को बताने लगा। श्लोक कुछ इस तरह है:-

सात फेरों का चौथा वचन:-

कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ:।।

इसका अर्थ है कि कन्या चौथा वचन में पति से यह मांगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिंता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जबकि आप विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दा‍यित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग अर्थात पति के बाएं हिस्से में अर्धांगिनी बनकर आ सकती हूँ।

इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उत्तरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृष्ट करती है। इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए, जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो, पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे।

फेरों के समय ही ‘सात फेरों के सातों वचनों’ को मैंने गांठ बांध लिया था। इसी को ध्यान में रखकर मैं सुबह जल्दी ही दुकान चला गया था। अब से मैं हर रोज सुबह 6 बजे दुकान खोल लिया करूँगा। तुम्हें इससे कोई दिक्कत तो नहीं होगी?”

“बिल्कुल नहीं, मैं खुश किस्मत हूँ कि मुझे आपके जैसा समझदार, जिम्मेदार, प्यार करने वाला, ध्यान रखने वाला जीवनसाथी मिला। बहुत कम ऐसे लोग होते हैं जो यहाँ तक का सोच पाते हैं। मुझे आप पर और आपकी सोच पर नाज है।” यह कहकर शीतल ने वीर सिंह को अपनी बाहों में कसकर भर लिया।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • पुजारी | Pujari Laghu Katha

    जमना बाजार में खड़ी एक दुकान पर खड़ी कुछ खरीद रही थी कि एक ट्रेक्टर ट्राली में एक सांड के शव को सफेद कपड़े के ऊपर रंग बिरंगे फूलों सें सजा जिसके आगे दो बैंड फ़िल्मी शोक धुन बजाते चल रहे थे, देखा। जैसे ही उसने अपनी गर्दन उसके जलूस को देखने के लिए घुमाई…

  • अरे पीयूष पहचाना मुझे | Pehchana Mujhe

    बात बहुत पुरानी हैं, मैं वृंदावन में बाँके बिहारी के दर्शन करने के लिये अकेला ही जा रहा था,सामने से आ रही एक बहुत सुंदर सी गाड़ी जिसको एक महिला चला रही थी, अचानक मेरे पास आ कर रुकी, शीशा नीचे करके बोली आप पीयूष हैं ना, मैं बोला, हाँ मैं पीयूष हूँ । उसने…

  • अति

    6 माह पुरानी बात है। रोज की तरह जैसे ही मैं स्कूल पहुँचा तो मुझे पता चला कि आज राजू के दोनों बच्चे स्कूल नहीं आये हैं। कारण पूछने पर पता चला कि बच्चों के पिता राजू ने पंखे पर फांसी का फंदा लगाकर जान देने की कोशिश की है। उक्त घटना को सुनकर मुझे…

  • अंतिम चांस | Antim Chance

    वैसे उन्हें गुरु जी कहते थे। कहें भी क्यों नहीं जो उन्ही के ही मार्गदर्शन में तो कई उच्च अधिकारी बन गए थे । परंतु भाग्य की विडंबना कहे या कर्मों का फल जो कुछ भी कह लें कई बार तो एक नंबरों से ऐसे लुढ़क पड़ते थे जैसे कोई पहाड़ी से फिसल गया हो।…

  • कलयुग के राम | Kalyug ke Ram

    सभी उन्हें कलयुग के राम कहते हैं। वैसे उनका नाम उनके माता-पिता ने रामचंद्र रखा भी था। भगवान राम जैसे उनका स्वभाव भी है । भाइयों को एक सूत्र में बांधने की कला उन्होंने आजीवन की है। वैसे उनकी शादी हो चुकी थी कि पिता का साया सिर से उठ गया। परिवार की सारी जिम्मेदारी…

  • समझौता : लघुकथा

    शकुन आज बड़े वर्षों में बाद दोस्तों से मिल रही थी। दोस्तों की बहुत ज़िद करने पर ही घर से निकली थी। बच्चों ने भी जबरदस्ती दोस्तों से मिलने भेजा था। आज वर्षों बाद मुस्कुरा रही थी, गुनगुना रही थी, खुश होकर तस्वीरें खिंचवा रही थी। दिन भर मस्ती में गुज़र गया। शकुन ने तो…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *