अनोखा सेलिब्रेशन
परीक्षा में उम्मीद के मुताबिक रिजल्ट ना आने के कारण… शहर में बढ़ते आत्महत्या के केसों को देखकर और अखबार में आए दिन किसी न किसी छात्र या छात्रा के सुसाइड करने की ख़बरों ने राजीव को सोचने पर मजबूर कर दिया।
उनके इकलौते बेटे मनोज ने हाल ही में 12वीं कक्षा की परीक्षा दी थी। उसका कल रिजल्ट आने वाला है। मनोज ने अपने पिता राजीव को बताया था कि उसका गणित का पेपर बिगड़ गया है। उसके गणित में पास होने के चांस न के बराबर हैं। वह फेल हो जाएगा। उसको खुद के पास होने की उम्मीद बहुत कम है।
पेपर खराब होने की बात सुनकर उन्होंने मनोज को कितनी डाँट लगाई थी, कितना उल्टा-सीधा बोला था। अब उनको डर सताने लगा था। अगर कहीं कल रिजल्ट ठीक नहीं आया? मनोज फेल हो गया तो..? उसने कुछ कर लिया तो…? उनके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा वही तो है।
हमारा सब कुछ उसी का तो हैं। अगर वही नही रहेगा तो हमारे जीवित रहने का और इस दौलत का कोई मतलब नहीं है। नहीं.. नहीं.. मैं अपने बच्चे को डिप्रेशन, तनाव, अवसाद में नहीं देख सकता। मुझे अपने बेटे के लिए कुछ करना होगा।
राजीव बिल्डिंग बनाने की ठेकेदारी का काम करते थे। उन्होंने अगले दिन अपने बेटे मनोज के साथ पूरे समय साथ रहना तय किया और एक पल के लिए भी उसको अपने आप से दूर नहीं किया।
ठीक दोपहर 12:00 बजे ऑनलाइन रिजल्ट घोषित हुआ। राजीव ने मनोज का रोल नंबर डालकर जब रिजल्ट देखा तो पाया कि मनोज सच में फेल हो गया था। मनोज सच कह रहा था। वह सच में गणित में फेल हो गया था, जबकि बाकी सभी विषयों में उसके नंबर बहुत अच्छे आए थे।
मनोज अपने पिता से नजर नहीं मिला पा रहा था। वह उदास था, गुमसुम था। राजीव के दिमाग में आत्महत्या वाली बातें घूमने लगी। उनको चिंता होने लगी कि मेरा बच्चा फेल हो गया है। अब उसके आसपास के बच्चे उसको चिढ़ायेंगे, उन बच्चों के पेरेंट्स भी उसको चिढ़ायेंगे। वह अपने दोस्तों से कैसे नज़रे मिलायेगा? उसकी सब जगह जगहँसाई होगी। वह उन सब का सामना कैसे करेगा? कर भी पाएगा या नहीं?
मेरे बच्चे पर ज्यादा दबाव न हो जाए, इसके लिए उन्होंने उसी दिन, शाम के समय एक बहुत बड़ी पार्टी घर पर रखी। उन्होंने कॉलोनी में रहने वाले सभी लोगों को, मनोज के दोस्तों को, मनोज के सभी अध्यापकों को पार्टी में बुलाया लेकिन किसी को यह नहीं बताया कि वह दावत क्यों दे रहे हैं?
जब सब लोग पार्टी में उपस्थित हो गए, तब उन सबके बीच उन्होंने अपने बेटे मनोज को बुलाया और सबके सामने कहा- “यह पार्टी इसलिए है कि मेरे बच्चे ने मेहनत की थी… मगर यह फेल हो गया। कोई बात नहीं। फेल होना गलत बात नहीं होती।
फेल होने का मतलब ये भी नहीं होता कि जिंदगी खत्म हो गई है। मैं मनोज के साथ कदम से कदम मिलाकर खड़ा हूँ। मुझे अपने बेटे पर गर्व है। मेरा यह बच्चा मोटिवेशन के साथ अगले साल आप सबको पास होकर दिखाएगा। डरने की बात नहीं है। मुझे यकीन है कि यहाँ मौजूद हर शख्स मनोज के साथ है।”
यह देखकर और राजीव की बातें सुनकर.. उस पार्टी में शामिल सभी लोग दंग रह गए। सब सोचने लगे कि कोई पिता इतना सकारात्मक कैसे हो सकता है? इतनी सुंदर बात कैसे सोच सकता है कि मेरा बच्चा फेल हो गया तो क्या हुआ? मैं तो उसको भी सेलिब्रेट करूंगा। मेरे बच्चे ने तो मेहनत की थी। रिजल्ट सकारात्मक आया ना आया तो क्या हुआ? मैं क्यों एक्स्ट्रा वजह बनूँ.. अपने बच्चे की डिप्रेशन, एंग्जायटी में जाने की?
(उक्त कहानी सच्ची घटना से प्रेरित है।)
परिवार के सदस्यों को आत्महत्या से बचने/बचाने के लिए विचारणीय बिंदु:-
अगर हमारे मन में आत्महत्या को लेकर विचार पनपते रहते हैं तो… आत्महत्या के विचारों से बचने के लिए शारीरिक, मानसिक स्तर पर कुछ सुझावों पर अमल करने की जरूरत है। शारीरिक स्तर पर समय पर सोना और एक निश्चित समय पर उठना जरूरी है। नियमित रूप से व्यायाम करें और संतुलित पौष्टिक आहार ग्रहण करें। शराब और धूमपान से बचें।
मानसिक स्तर पर अपने विचारों को लिखें, जिसे मनोचिकित्सकीय भाषा में स्ट्रेस डायरी कहते हैं। स्ट्रेस डायरी से हमारे विचारों में जो खामियां हैं, उनका पता चलता है। जैसे अनेक बार हम छोटी सी समस्या को तिल का ताड़ बना देते हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी एग्जाम में एक बार फेल हो गया तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह हर एग्जाम में फेल ही होता रहेगा।
लोग अपनी गलती को माफ नहीं करते, जिसे ब्लैक एंड व्हाइट थिंकिंग कहते हैं। ऐसी सोच से बचना है। समस्या के बारे में ज्यादा विचार न कर उसके समाधान के बारे में सोचना है। ऐसी सोच से आप समस्या को सकारात्मक तरीके से देखकर उसका समाधान कर सकते हैं। परिजनों के साथ वक्त बिताएं।
उनके साथ अपनी बातों को साझा करें। उनकी कोई समस्या हो तो उसे सुलझाने में उनकी मदद करें। इसी तरह अपने प्रियजनों और दोस्तों के लिए भी वक्त निकालें। इससे जहां आप एक-दूसरे की समस्या को समझ सकेंगे, वहींआपसी प्रेम भी बढ़ेगा। इसके अलावा मेडिटेशन और योग को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करें। कोई हॉबी विकसित करें। संगीत सुनें या फिर खेलकूद से संबंधित गतिविधियों में भाग लें।
यह सही है कि आत्महत्या या इसका प्रयास करने वाला शख्स किसी को बताकर आत्महत्या या इसका प्रयास नहीं करता, लेकिन आत्महत्या की बात सोचने वाले व्यक्ति की मनोदशा असामान्य हो जाती है।
वह डिप्रेशन में जा सकता है। परिजनों और लोगों से कटा-कटा महसूस करता है, हताश महसूस करता है और उसके दिमाग में नकारात्मक विचार मंडराते रहते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के परिजनों को सजग हो जाना चाहिए। उन्हें रोगी के साथ हमदर्दी रखनी चाहिए।
आत्महत्या का विचार मन में लाने वाले व्यक्ति की मनोदशा जीवन और मृत्यु की दुविधा में झूलती रहती है। वह दिल से तो जीना चाहता है, लेकिन उसे अपनी तकलीफों का अंत आत्महत्या में ही दिखता है। इस कारण वह गलत निर्णय ले बैठता है।
ऐसे में परिजन यदि उसकी तकलीफों को पहले से ही समझ लें और उसकी सहायता करें तो रोगी सहज रूप से जीवन जीना स्वीकार कर लेता है। जब व्यक्ति असामान्य व हताश महसूस करे तो उसे तब तक अकेला न छोड़ें, जब तक मनोचिकित्सक की सुविधा उपलब्ध न हो जाए। आपका यह छोटा सहयोग एक जीवन को बचा सकता है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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