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भगवानदास शर्मा ‘प्रशांत’ की कविताएं | Bhagwan Das Sharma Poetry

विषय सूची

मां भारती के सपूत

राष्ट्र सेवा में समर्पित,
दीप बनकर मैं जलूं।
तुम भी सेवा भाव रखो,
देश दीपक में बनूं।।

बनूं दीपक भारती के,
पुण्य वैभव गान का।
जन्म पावन इस धरा पे,
ईश्वरीय वरदान का।।

कामना पुनः जन्म लूं तो,
देश भारत में जनूं।
तुम भी सेवा भाव रखो,
देश दीपक मैं बनूं।।

सजग प्रहरी बन खड़े जो,
देश का अभिमान है।
हो गए कुर्बान ऐसे,
वीर धन्य महान है।।

नमन ऐसे देश भक्तों,
प्रणम्य उनकी धीरता,
राष्ट्र रक्षा में समर्पित,
अतुलनीय रही वीरता।।

राष्ट्र का स्वाभिमान बनकर,
राष्ट्र हित जीवन ज्यू,
तुम भी सेवा भाव रखो,
देश दीपक मै बनू।।

परमवीरों की परम,
ज्योति रहे जलती सदा।
देश हो खुशहाल और,
बढ़ती रहे धन संपदा।।

धर्म का हो आचरण,
मन में रहे नित शुद्धता।
भान हो सामर्थ्य का,
पुनः पा सके वो प्रबुद्धता।।

देशहित हो सभी के हिय,
हर कंठ से आह्वान हो।
देश मेरा फले फूले,
माँ भारती का गान हो।।

सजग समर्थ सपूत बनकर,
राष्ट्र की सेवा करूं।
तुम भी सेवा भाव रखो,
देश दीपक मैं बनूं।।

प्रेरणा गीत: विजय पथ

हार न मानो लड़ने वालों,
विजय एक दिन होनी है।
सारे वैभव सारी खुशियां,
सब कुछ तेरी होनी है।।

जीवन इक संघर्ष है
जिसमें,
कंटक पथ औ रण होंगे।
दृढ़ निश्चय कर बढ़ने वालों,
के नसीब में गढ़ होंगे।।

संघर्षों की लौ में जो भी,
तपता और सबरता है।
निश्चय ही वो स्वर्ण कांति सम,
अद्भुत और निखरता है।।

दुर्धर्ष लड़ाका ही लड़कर,
अपनी मंजिल को पाता है।
भावी पीढ़ी को उसका,
इतिहास पढ़ाया जाता है।।

जीवन में कठिन चुनौती को,
सहज भाव से लेता है।
मनोयोग युक्ति से सफलता,
में परिणित कर देता है।

कार्यशील रह कर्मक्षेत्र में,
आगे बढ़ते जाना है।
बाधाओं को तोड़-तोड़,
अपना पथ स्वयं बनाना है।।

मां भारती के सपूत

राष्ट्र सेवा में समर्पित,
दीप बनकर मैं जलूं।
तुम भी सेवा भाव रखो,
देश दीपक में बनूं।।

बनूं दीपक भारती के,
पुण्य वैभव गान का।
जन्म पावन इस धरा पे,
ईश्वरीय वरदान का।।

कामना पुनः जन्म लूं तो,
देश भारत में जनूं।
तुम भी सेवा भाव रखो,
देश दीपक मैं बनूं।।

परमवीरों की परम,
ज्योति रहे जलती सदा।
देश हो खुशहाल और,
बढ़ती रहे धन संपदा।।

धर्म का हो आचरण,
मन में रहे नित शुद्धता।
भान हो सामर्थ्य का,
पुनः पा सके वो प्रबुद्धता।।

देशहित हो सभी के हिय,
हर कंठ से आह्वान हो।
देश मेरा फले फूले,
माँ भारती का गान हो।।

सजग समर्थ सपूत बनकर,
राष्ट्र की सेवा करूं।
तुम भी सेवा भाव रखो,
देश दीपक मैं बनूं।।

युवा प्रेरक स्वामी विवेकानंद जी

पुण्य भूमि भारत में जन्मे,
एक अनोखे सन्यासी।
मानवता का पाठ पढ़ाया,
गर्व करें भारत वासी।।

रामकृष्ण को गुरु बनाकर,
परमब्रह्म का ज्ञान लिया।
पच्चीस वर्ष में योगी बन प्रण,
राष्ट्र चेतना ठान लिया।।

ब्रह्मचर्य,तप,त्याग,तपस्या,
युवा शक्ति आह्वान किया।
स्वर्ग समान भारतवर्ष को,
विश्व पटेल पर मान दिया।।

प्रेरित किया नवयुवकों को
नव जागरण संदेश दिया।
लक्ष्य साहस से बड़ा नहीं
‘उठो जागो’आह्वान किया।।

हर युवा राष्ट्र की आत्मा है,
भावी भारत के सबल बनो।
तुम वीर पुत्र भारत मां के,
करो शक्ति निहित, निर्बल न बनो।।

सब धर्म का मूल मानवता,
मानव धर्म यथार्थ किया।
अपने बुध्दिबल कर्मों से यह,
शिकागो में चरितार्थ किया।।

युवा देश की सच्ची निधि है,
इनको योग्य बना ले हम।
अच्छे सच्चे सपने देखे सब,
अंतर्मन शक्ति जगा ले हम।।

कहां विवेकानंद ने जैसा,
लक्ष्य महान बना ले हम।
सारे जग में सबसे अच्छा,
हिंदुस्तान बना ले हम।।

जय हिंद.. बंदे मातरम्

पितृ पक्ष: श्राद्ध की श्रद्धा

कैसी विडंबना है मालिक,
जिन्हें जीते जी मान नहीं।
पालन हार परिवार हो ही,
रहे खुद के लिए स्थान नहीं।।

जिन ने सारी उम्र खपा दी,
हम सबको सफल बनाने में।
उन्हें तन्हा छोड़ बुढ़ापे में,
हम खोए रहे जमाने में।।

संग थे जीवित पितु मातु जब,
तन मन से हम खुश कर न सके।
अब बुलाते स्वर्ग से उन्हें,
है केवल दिखावा करते दिखे।।

जीवित थे खाने को मांगे,
बस कड़वी बात सुनाते है।
श्राद्ध पक्ष में बने पुजारी,
कर तीरथ मौज मनाते हैं।।

जिनकी वजह हमें जन्म मिला,
मिले जग के सभी भोग यहां।
असहाय हुए तो अनाचार,
मां-बाप किए घर कैद जहां।।

रही नहि उनसे सहानुभूति,
अब करते सिर्फ दिखावा हैं।
कौवो कुत्तों से अब करुणा,
तो केवल एक छलावा हैं।।

कैसी है अद्भुत यह दुनिया,
चहुओर भ्रमित जन मान दिखे।
अंतर्मन सबके प्रभु बैठा है,
मृगतृष्णा सम इंसान देखें।।

मानवता होती तार तार,
इंसान अपनों से दूर भगे।
अपने मद में वह अंधा है,
नहि देखे गरीबों का मुंह फेर खड़े।।

दया धर्म और प्रेम नहीं है,
दिखावा कर उल्लू बना रहे।
घर में मां-बाप लाचार पड़े,
बस झूठा स्टेटस दिखा रहे।।

श्राद्ध में यदि सच्ची श्रद्धा है,
पितरों के मान में कुछ काम करे।
पितरों का पूजन करके हम,
वंचित भूखों को दान करे।।

बच्चों को दे हम सुसंस्कार,
किए सत्कर्मों का गान करें।
रखे कुल की मर्यादा सदा,
पितरों का ऊंचा नाम करो।।

मां-बाप ही जीवन में सब कुछ,
हैं जीते जी उनको खुश कर लो।।
और जो चले गए इस दुनिया से,
सम्मान सहित स्मरण कर लो।।

कर श्राद्ध कर्मकांड श्रद्धा से,
उनका पूजन स्मरण कर लें।
पितरों के नाम श्रद्धा रखे,
औ उनके नाम श्राद्ध कर लें।।

निर्गुण निराकार ईश्वर

जिसने यह सुंदर सृष्टि रची,
जो करता है हर जीव वास।
जिसके ही नेक इशारों पर,
फैला है चराचर में प्रकाश।।

जिसने रचना की जीवन की,
डाला अपना सबमें है कान्त।
वह छोटा है परमाणु से भी,
पर विस्तृत है ब्रह्मांड अंत।।

जिसने है बनाए सूर्य चंद्र,
जिससे प्रकाशित सब सितार।
जो रमा हुआ है कण-कण में,
हमें शक्ति दे रहा अति अपार।।

जो विद्यमान हर जीव में है,
जिसकी फैली यह माया है।
अखिल ब्रह्मांड का नायक वो,
हर जीव जगत में समाया है।।

सृष्टि संचालित करता जो,
अकल्पनीय है विधि विधान।
जस मां बच्चे का ख्याल रखें,
हम सबका है वही कृपा निधान।।

वो कई रूपों में है विद्यमान
समझ से परे, न कोई निशान।
वह ज्योति पुंज ईश्वर ही है,
अदृश्य, अटल ज्यों बुद्धि ज्ञान।।

गुरु की महिमा

शिक्षक विकास सीढ़ी जैसे,
ज्ञान सृजनता करते हैं।
सब विषयों का ज्ञान कराकर,
ज्ञान की लौ जलाते है।।

सत्य न्याय के पथ पर चलना,
शिक्षक हमें बताते हैं।
जीवन संघर्षों से लड़ना,
शिक्षक हमें सिखाते हैं।।

खेल खेल में हमे सिखाकर,
मन आलोकित करते हैं।
विद्या का धन देखकर शिक्षक,
जीवन सुखमय करते है।

शिक्षक ईश्वर से बढ़कर है,
यह कबीर बतलाते हैं।
क्योंकि शिक्षक ही शिष्यों को,
ईश्वर तक पहुंचाते है।।

जीवन में कुछ करना है तो,
संकल्पित आचरण रखो।
शीश झुकाकर श्रद्धा से तुम,
गुरुओं का अनुसरण करो।।

गुरु की महिमा

( 1 )

जीवन पथ का मार्ग दिखाकर,
ज्ञान की लौ जलाते हैं।
सत असत्य का भेद करा कर,
सही राह दिखलाते हैं।।

ज्ञान बिना जीवन दुर्गम है,
जीवन सुगम बनाते हैं।
नैया की पतवार सदृश वह,
सागर पार कराते हैं।।

शिल्पी समान वो गढ़ गढ़ के,
शक्ल रूप में लाते हैं।
गुरु की महिमा होती अनंत,
भगवन भेंट कराते हैं।।

मातु-पिता दें जीवन हमको,
गुरुवर ज्ञान सिखाते हैं।
हमें अवगुणों से दूर करें,
नित् जीना सिखलाते हैं।।

गुरु की महिमा होती अनुपम,
यह कबीर बतलाते हैं।
यदि गुरु गोविंद दोऊ खड़े,
गुरु पहले पूजे जाते हैं।।

त्रिदेव हैं गुरु में समाहित,
परम ब्रह्म कहलाते हैं।
यदि विधि सृष्टि सृजन करते,
गुरु ज्ञान बोध कराते हैं।।

( 2 )

गुरु गुणों की खान है,
दें शिष्यों को ज्ञान।
शिल्पकार सम गढ़ उन्हें,
डाले उनमें जान।।

शिक्षक दया निधान है,
बच्चों से करते नेह।
शिक्षक ईश समान है,
सदा आशीष देह।।

गुरु वंदना से शुरू हो,
शिक्षा की शुरुआत।
गुरु कृपा बरसे सदा,
मिट जाए अभिघात।।

गुण अनंत है गुरु में,
न करि सके बखान।
मीठी औषधि की तरह,
दुर्लभ मिले सुजान।।

गुरु ऊर्जा की स्रोत है,
हरे जग अंधकार।
कृपा गुरु की होत ही,
जीवन हो उजियार।।

गुरु की महिमा

गुरुवर धरती पर विरंच सम,
ज्ञान सृजनता करते हैं।
ज्ञानदीप की ज्योति जलाकर,
गुण जीवन में भरते हैं।

सत्य न्याय के पथ पर चलना,
शिक्षक हमें बताते हैं।
जीवन संघर्षों से लड़ना,
शिक्षक हमें सिखाते हैं।।

खेल खेल में हमे सिखाकर,
मन आलोकित करते हैं।
विद्या का धन देखकर शिक्षक,
जीवन सुखमय करता है।

शिक्षक ईश्वर से बढ़कर है,
यह कबीर बतलाते हैं।
क्योंकि शिक्षक ही शिष्यों को,
ईश्वर तक पहुंचाते है।।

जीवन में कुछ करना है तो,
संकल्पित आचरण रखो।
शीश झुका का श्रद्धा से तुम,
गुरुओं का अनुसरण करो।।

स्वतंत्रता दिवस विशेष

सत सनातन संस्कृति मेरी,
मानव को चलना सिखलाया।
पुण्य भूमि भारत ने सबको,
मिलजुल कर रहना बतलाया।।

सभ्यता यहीं पर जन्मी थी,
भाषा का प्रादुर्भाव हुआ।
ऋषियों ने वेद पुराण रचे,
भगवत गीता उदभाव हुआ।।

अध्यात्म योग का पोषक बन,
नक्षत्र गणित को समझाया।
हर एक क्षेत्र था महारथी,
विज्ञान रहस्य को सुलझाया।।

था विश्व गुरू अपना भारत,
दुनियां में इसका डंका था।
संस्कृति मूल्यों में आगे,
इसमें न किसी को शंका था।।

फिर समय चक्र ऐसा बदला,
दुनियाँ भर से मलेक्ष् आए।
लूटा संस्कृति को किया नष्ट,
बर्बर हिंसक आतंक ढाए।।

आहत की सोने की चिड़िया,
मुगलों ने भी डेरा डारा।
क्रूर मलेक्षों ने भारत को,
फिर जीभर के घेरा मारा।।

उपनिवेश वाद दौर चल फिर,
व्यापार हेतु जग यहां धाया।
देश के सब संसाधनों को,
ईस्ट इंडिया ने कब्जाया।।

भरकस भारत धन लूट हुई,
नैरोजी ने सब बतलाया।
वीरों के अथक प्रयासों से,
फिर देश आजाद हो पाया।।

पंद्रह अगस्त सन सैंतालिस,
की भोर नया दिनकर निकला।
अस्त व्यस्त अपना भारत फिर,
उठ खड़ा हुआ फिर से संभला।।

संकल्प किया फिर भारत ने,
खोये गौरव को पाने को।
उठ खड़ा हुआ रण योद्धा सा,
फिर से कौशल दिखलाने को।।

नेतृत्व मिला भारत को फिर,
इतिहास अनोखे रच डालें।
हर क्षेत्र सामरिक शक्ति बढ़ी,
कीर्तिमान कइ फिर रच डाले।।

हम पुण्य धरा पर गर्व करें,
जिस मातृभूमि पर जन्म लिया।
हे बंदनीय भारत माता!
भरपूर नेह आजन्म दिया।।

प्यासा कौवा

( बाल कविता )

एक कौवे को लगी प्यास,
उड़ कर गया घड़े के पास।
पानी कम घड़े में पाया,
कौवे ने दिमाग लगाया।।

वहीं बिखरे कंकड़ पाया,
वह चौच से कंकड़ लाया।
ज्यों ज्यों कंकड़ पड़ता गया,
त्यों त्यों पानी चढ़ता गया।।

पहुंच तक पानी चढ़ आया,
वह मेहनत का फल पाया।।
कौवे ने तब पिया पानी,
ज्ञान देती हमें कहानी।।

मुश्किल समय युक्ति लगाता,
निश्चय मेहनत से हल पाता।
कठिन वक्त में धैर्य न खोओ,
श्रम करने से तुम न रोओ।।

स्वतंत्रता दिवस विशेष

सत सनातन संस्कृति जिसकी,
मानव को चलना सिखलाया।
पुण्य भूमि भारत ने सबको,
मिलजुल कर रहना बतलाया।।

सभ्यता यहीं पर जन्मी थी,
भाषा का प्रादुर्भाव हुआ।
ऋषि मुनियों ने सब शास्त्र रचे,
भगवत गीता सम भाव हुआ।।

अध्यात्म योग का पोषक बन,
नक्षत्र गणित को समझाया।
हर एक क्षेत्र था महारथी,
विज्ञान रहस्य को सुलझाया।।

था विश्व गुरू अपना भारत,
दुनियां में इसका डंका था।
संस्कृत संस्कृति में भी आगे,
इसमें न किसी को शंका था।।

फिर समय चक्र ऐसा बदला,
दुनियाँ भर से मलेक्ष् आए।
लूटा संस्कृति को किया नष्ट,
बर्बर हिंसक आतंक ढाए।।

आहत की सोने की चिड़िया,
मुगलों ने भी डेरा डारा।
क्रूर मलेक्षों ने जनता को,
फिर जीभर के घेरा मारा।।

उपनिवेश वाद दौर चल फिर,
व्यापार हेतु जग यहां धाया।
देश के सब संसाधनों को,
ईस्ट इंडिया ने कब्जाया।।

भरकस भारत धन लूट हुई,
नैरोजी ने सब बतलाया।
वीरों के अथक प्रयासों से,
देश आजाद फिर
हो पाया।।

पंद्रह अगस्त सन सैंतालिस,
की भोर नया दिनकर निकला।
अस्त व्यस्त अपना भारत फिर,
उठ खड़ा हुआ फिर से संभला।।

संकल्प किया फिर भारत ने,
खोये गौरव को पाने को।
उठ खड़ा हुआ रण योद्धा सा,
फिर से कौशल दिखलाने को।।

“राखी का त्यौहार”

भ्रात बहन का रिश्ता न्यारा,
भाई बहन प्यारा बंधन।
होता पावन, लगता न्यारा,
पर्व अनोखा रक्षा बंधन।।

प्यार भरा बंधन दोनों का,
एक दूजे के हम दर्द बने।
जिंदगी भर साथ निभाने,
बहन रक्षा का वचन चुने।।

कभी प्रेम तो कभी तकरार,
घर रौनक दोनों से बने।
लेकिन जब भी आए मुसीबत,
एक दूजे की ढाल बने।।

दोनों का है प्यार अनोखा,
एक दूजे बिन रह न सके।
मातु-पिता की डांट डपट पर,
इक दूजे की गलती ढकें।।

रक्षाबंधन पर सब बहने,
वीर के लिए प्रार्थना करें।
पूजा की थाल सजा कर,
मस्तक अक्षत से तिलक करें।।

कच्चे धागे में बंद जाय,
कर्तव्यों की डोर अटूट।
माता पिता भी खुशी होते,
दोनों का देख नेह अटूट।।

यह त्योहार प्रेम का द्योतक,
शगुन में भाई से मांगे।
भाई मेरे ध्यान तुम रखना,
रक्षा को तुम आना आगे।।

चला चल भोले की दर पर

चला चल भोले की दर पर,
तेरा कल्याण हो जाए।
मिटे सब बाधा जीवन की,
राहें आसान हो जाए।।

चला चल भोले की दर पर…

बड़े ही भोले हैं भगवन, कोई नहीं दूसरा दानी। सभी को मनका फल देते,
न दूजा आप सा सानी। शरण में आ भी जा,पूरे तेरी अरमान हो जाएं।।

चला चल भोले के दर पर…

भले अर्पण को कुछ ना हो,
चढ़ा ले गंगा जल मन से।
भले पूजा की थाली नहीं,
खुश होय श्रद्धा सुमन से।
तेरी श्रद्धा और भक्ति से, भोले मेहरबान हो जाएं।।

चला चल भोले की दर पर…

भोले श्रद्धा के भूखे हैं,
सुमिरै जो निश्चल होकर मन।
कृपा करते हैं भक्तों पर, सदा रहते जो शिव की शरण।।
अरे प्राणी! कृपा पाकर, सुखी दिनमान हो जाए।

चला चल भोले के दर पर,
तेरा कल्याण हो जाए।
हरे सब बाधा जीवन की, राहें आसान हो जाए।।

चला चल भोले की दर पर…

सावन

आयो है मनभावन सावन,
अब पड़ने लगी फुहार है।
रोम रोम हो रहा प्रफुल्लित,
झूले पड़ अमुआ डारि है।।

बादल! इक संदेशो मेरो,
तुम बाबा को जाकर दीजो।
सावन रुत आई मतवाली,
पीहर मुझको बुला लीजो।।

अम्मा तुम भेजो भैया को,
पीहर मुझको लिवा जावे।
सावन में मिले सखी सारी,
सभी मिल मोद मना पावे।।

सहेली संग दिलको खोलू,
झूलू संग, अमुआ डारी।
बार-बार मन उठे हिलोरे,
चाहत यही मन में भारी।।

याद बहुत आती है बाबा,
आप सभी औ अंगना की।
खेल मै खेली सखियों संग,
है याद सताए बहना की।।

सावन की झड़ी

अंबर से झरती बूंदें लगे,
पग में नूपुर सी बजती।
घन छाए घनश्याम लगे यो,
खुले केश युवती सजती।।

वृक्षों पर पड़ती बूंदें जैसे,
अलग राग ही छेड़ रही,
हरियाली की ओढ़े चुनरिया,
प्रगति मोद में झूम रही।।

सर सर सिहरे शीत समीरा,
सब जीव जंतु है नाच रहे।
सावन अनुपम छटा बिखेरे,
बिरहन मिलन को तरस रही।।

मन वीणा झंकृत हो उठता,
मन में सिहरन सी बसती।
सावन ऋतु आ गई मतवाली,
सृजन मोद संग भू हंसती।।

बचपन

यादें बचपन की आते ही,
मन स्मृतियां तैरने लगती।
मित्रों के संग खेलकूद सब,
कल की सी हि बातें लगती।

कैसे भूला जा सकता है,
बचपन के वो कारनामे,
घर में तनिक ठहरते थे नहि,
निकल जाते, धूम मचाने।।

छोटी मोटी शरारतों से,
दिनभर बदमाशिया करते।
खेलकूद संध्या घर लौटे,
पापा की डांट से डरते।।

पापा सदा ही समझाते,
तुम उज्ज्वल भविष्य बनाओ,
अनमोल है मेरे लाल तुम,
अब मत समय गंवाओ।।

सदैव ही बचपन से मां ने,
मुझ पे अपना स्नेह लुटाया।
दादा दादी ने भी मुझको,
सुना किस्से खूब लुभाया।।

कौन भुला सकता है देखो,
बचपन की मधुरिम यादें।
काल चक्र का घूमे पहिया,
विस्मृत सी रह गई बाते।।

सावन में बिटिया की पुकार

आयो है मनभावन सावन,
अब पड़ने लगी फुहार है।
रोम रोम हो रहा प्रफुल्लित,
झूले पड़ अमुआ डारि है।।

बादल ! एक संदेश मेरो,
बाबूजी को जाकर दीजो।
सावन रुत आई मतवाली,
पीहर मुझको बुला लीजो।।

अम्मा तुम भेजो भैया को,
पीहर मुझको लिवा जावे।
सावन में मिले सखी सारी,
सभी मिल मोद मना पावे।।

सखी संग मै दिल को खोलू,
झूलू संग अमुआ डाली।
बार-बार मन उठे हिलोरे,
चाहत यही मन में भारी।।

याद बहुत आती है बाबा,
आप सभी औ अंगना की।
खेली मै खेल सखियों संग,
बड़ी याद आए बहना की।।

बारिश में मस्ती

नभ के विस्तृत प्रांगण में,
काले बादल घिर आते हैं।
तरह तरह के भेष धरे हुए,
बच्चों को बहुत लुभाते हैं।

धीरे रिम-झिम पड़ती बूंदें,
बच्चों के मन को हर्षाते हैं।
दादुर, मोर, पपीहा, झींगुर,
सब अपने स्वर में गाते हैं।।

तवा सी तपती धरती की,
बारिश ही प्यास बुझाती है।
झर झर झर झर पड़ती बूंदें,
बच्चों को बहुत लुभाती है।।

सब ताल तलैया भर जाते,
बच्चों में मस्ती जगाते है।
बच्चे अपने झुण्डों के संग,
बारिश का लुफ्त उठाते हैं।।

चलती ठंडी-ठंडी पुरवाई,
बारिश में बच्चे नहाते हैं।
राजू राधा दोनों मिलकर,
बारिश में नाव चलाते हैं।।

गुरु की महिमा: गुरु पूर्णिमा विशेष

(कुंडलियाँ छंद)

गुरुजन करते है सदा,
जीवन मार्ग प्रशस्त।
अमिट ज्ञान का फल मिले,
रहते जो अभ्यस्त।।
रहते जो अभ्यस्त,
मानते जो गुरु कहते।
मिल जाए उन्हें ज्ञान,
न कष्ट जीवन में सहते।।
कहि प्रशांत समझाए,
गुरु उपकारी सतजन।
बनता जीवन सफल,
कृपा करें जापे गुरुजन।।

पाते हैं निज छात्र जो,
गुरुजन से सद्ज्ञान।
उनके मार्ग प्रशस्त हो,
सर्व भांति कल्याण।।
सर्व भांति कल्याण,
रतन सा शिल्प सजाते।
बनकर श्रेष्ठ वरेण्य,
जगत में नाम कमाते।।
कहि प्रशांत बतलाएं,
वही जन पूजे जाते,
कृपा पात्र बन ज्ञान,
गुरु से जो जन पाते।।

गुरु की महिमा

जीवन पथ का मार्ग दिखाकर,
ज्ञान की लौ जलाते हैं।
सत असत्य का भेद करा कर,
सही राह दिखलाते हैं।।

ज्ञान बिना जीवन दुर्गम है,
जीवन सुगम बनाते हैं।
नैया की पतवार सदृश वह,
सागर पार कराते हैं।।

शिल्पी के सम वह गढ़ गढ़ के,
शक्ल रूप में लाते हैं।
गुरु की महिमा है अति अनंत,
ईश्वर- भेंट कराते हैं।।

मातु-पिता दें जीवन हमको,
पर गुरु-गुर सिखाते हैं।
हमें अवगुणों से दूर करें,
नित्य जीना सिखाते हैं।।

गुरु की महिमा है अति अनुपम,
यह कबीर बतलाते हैं।
यदि गुरु गोविंद दोऊ खड़े,
गुरु पहले पूजे जाते हैं।।

त्रिदेव हैं गुरु में समाहित,
परम ब्रह्म कहलाते हैं।
यदि विधि सृष्टि सृजन करते,
गुरु ज्ञान बोध कराते हैं।।

जीवन में पिता

पिता ईश्वर सम है जग में,
हरदम हम यह ध्यान रखें।
जिसने हमको पाला पोसा,
हम भी उनका मान रखें।।

जिनने अपनी उम्र सौंप दी,
बच्चों को सफल बनाने में।
अब तन्हा उनको छोड़ें कैसे,
जो सुख न मिला जमाने में।।

पिता से बढ़कर जग में कोई,
नहि मिलता हमे हमदर्द यहां।
पिता की परवरिश के चलते,
बने सक्षम करने सत्कर्म जहां।।

है स्वार्थ के सब रिश्तेये नाते,
सिर्फ मातु-पिता ही है अपने।
डाल वो बन जाते जीवन की,
ताकि कभी टूट न पाए सपने।।

पिता खग की भांति जीवन में,
बच्चों के लिए ताना-बाना बुनते।
कभी बच्चों को कोई कष्ट न हो,
उनकी खातिर सब कुछ करते।।

हर खुशियों की पूर्ति पिता है,
वे सारी इच्छाएं पूरी करते है।
पिता के होने से ही बचपन है,
सब खुशियां झोली में भरते है।।

हो माता का श्रृंगार पिता से,
वही घर-बगिया के माली है।
बच्चों का भी सौभाग्य जुड़ा,
पिता है तो भरपेट थाली है।।

परिवार रूपी बगिया का वो,
सदा ध्यान रखें संचित करते।
बागवा बन सदा घर आंगन,
महकाएं और रक्षित करते।।

पिताही है प्रतिमूर्ति ईश्वर का,
उनके चरणों में सारे धाम है।
कभी दुख ना दे इन ईश्वर को,
मिली काया,यश औ नाम है।।

जिंदगी का सफर

जिंदगी यदि खेल है,
तो खेलना ही चाहिए।
सुख की चाहत सब रखें,
दुख भी होना चाहिए।।

फूल भी हो, शूल भी,
हो जिंदगी के बाग में।
हम उन्हीं के मध्य जीते,
हैं भरे अनुराग में।।

फूल का है काम अपना,
शूल का भी काम है।
हर परिस्थिति को सहन,
करने से मिले मुकाम है।।

गर तुम्हें मंजिल है पानी,
तो कष्ट सहना चाहिए।
दुख से है सुख की प्राप्ति,
यह समझना चाहिए।।

सुख अगर हो साथ में,
तो लोग कम होते कहां?
औ जब दुख का समय हो,
तब स्वार्थी टिकते कहां?

दुख में ही पहचान होती,
धीरज धर्म और मित्र की।
दुख में ही हम जान पाते,
सच में हकीकत चरित्र की।।

दीर्घ लगती दुख की आयु,
इस जूझते संसार में।
बीत जाता समय पल में,
जब खुशियां हो परिवार में।।

है एक सिक्के के पहलू ,
ये ज्ञान होना चाहिए।
सुख व दुख मन की दशाएं,
ये भान होना चाहिए।।

बाल कविता : बिल्ली की हज यात्रा

एक रोज बिल्ली मौसी को,
मिला नहीं कुछ खाने को।
फिर उसने एक युक्ति लगाई,
कहा चली मै हज जाने को।।

बिल्ली मौसी की सुनके बात,
सभी चूहों में खुशियां दौड़ी।
निकले मनाने चूहे जश्न सभी,
फिर बिल से कर छाती चौड़ी।।

एक समझ दार वृद्ध बूढ़े चूहे,
ने फिर सबको फटकार लगाई।
सब करो जश्न अभी बंद तुम्हें,
इतनी सी बात समझ ना आई।।

है डोंगी ओ धोखेबाज बिल्ली,
उसकी बातों में तुम मत आना।
खबरदार तुम सभी लोग सुनो,
कतई बिल से बाहर मत जाना।।

राजनीति का पाठ पढ़ लिया है,
झूठ फरेब सीखी,बैठे दिल्ली में।
त्यों सौ सौ चूहे खाकर जो कहा,
हज करने जाती झूठी बिल्ली ने।।

विरह वियोगिनी

रूप वती अद्वितीय अनुपम,
आंखों में लिए छवि हमदम।
सरल सलोनी सहज हो तुम,
नैनो में आस लिए प्रियतम।।

हिय में छुपाए हो प्रेम अगन,
वजह न शेष होने की मगन।
प्रीत मिलन की आस लिए,
अंदर- अंदर व्यथित है मन।।

सता रही है अब प्रिय बिछुड़न,
सूना घर आंगन, रहे उलझन।
अब क्या बतलाए हाले सनम,
विरह वियोगिनी बड़े धड़कन।।

सब श्रृंगार अधूरे प्रिय तुम बिन,
अब बाट देखती दिन गिनगिन।
बोझिल सा लगने लगता जीवन
वापस आओ प्रिय कटे न दिन।।

जल जीवन आधार

( कुंडलियां छंद )

पानी का संचय करें,
बूंद बूंद अनमोल।
बिन पानी सब सुन है,
समझे इसका मोल।।
समझे इसका मोल,
बड़ी मुश्किल से मिलता।
जल जीवन का मूल,
इसी से जीवन खिलता।।
कहि प्रशांत समझाएं,
चेत जा अब भी प्राणी,
जल जीवन आधार,
व्यर्थ मत फेंको पानी।।

आबादी बढ़ती रही,
हुई संकुचित सोच।
संसाधन दोहन बड़ा,
खत्म हो रहे स्रोत।।
खत्म हो रहे स्रोत,
नीर का संकट भारी,
जीवन दुष्कर हुआ,
हुए सब जीव दुखारी।।
कहि प्रशांत समझाएं,
रोकिए यह बर्बादी।
हुआ भूमि जल खत्म,
बेचेगी नहि आबादी।।

पाकिस्तान को नसीहत

हुआ आतंकी हमला पुनः,
हुई सेना गतिविधि तेज।
बड़ी सीमा पर टेंशन बहुत
सेनायें सीमा दी गई भेज।।

दंश विभाजन मुल्क का,
अब भी भुगते दोनों देश।
ज्यों भाई- भाई से लड़ते,
स्थिति है टकराव बिशेष।।

हालत पतली हुई पाक की,
कुछ दिनों राशन बचा शेष।
शासन भ्रष्टाचार की भेंट है,
हाहाकार मचा है पूरे देश।।

नासूर बन चुका भारत का,
निर्मम हत्या कर जख्म देत।
कई बार मुँह की खा चुका,
फिर भी कछु सीख न लेत।।

रक्त- रंजित पुनः घाटी हुईं,
बेशर्म हो के जिम्मेदारी लेत।
भारत अब माकूल जबाब दे,
जब तक न जाये वह चेत।।

श्रमिक ( कुण्डलियां छंद )

श्रमिक देश की रीढ़ है,
श्रम बिनु कछु न होय।
दुनियाँ में बदलाव सब,
केवल श्रम से होय।।

केवल श्रम से होय,
श्रमिक की लगन न्यारी,
सड़क सेतु और बाँध,
रचे नित रचना सारी।।

समझें एकईं बात,
औ ध्यान दे सभी धनिक।
उनका भी है मान,
प्रताड़ित न हो श्रमिक।।

श्रमिक दिवस हो सार्थक,
कुछ बातें ले जान।
श्रमिक हमारे बंधु हैं,
दें उनको सम्मान।।

दें उनको सम्मान,
काम ले उनसे सादर।
मानवता रख भाव,
करें नहि कभी अनादर।।

होते विकास धुरी,
नहि विचलित होते तनिक।
खून पसीना बहा,
करम रत रहते श्रमिक।।

पहलगाम की आतंकी घटना

पहलगाम की विभीषिका है,
रही अब चीखती पुकारती।
निर्दोषों को क्यों मार डाला,
बहुत आहत हुई मां भारती।।

आतंकवाद को जो पोषकर,
है लाशों पर रोटियाँ सकते।
इंसानियत को भी मार कर,
वे मजहब की बातें फेंकते।।

आक्रोश छाया सारे देश में,
औ बुझने न दो घर के दिए।
आतंकियों की कमर तोड़ो,
जख्म जिसने देश को दिए।।

रखता पाक है नापाक मंसूबे,
बजूद मिट्टी में मिल जाएगा।
होंगे असफल बुरे इरादे सभी,
बिल्कुल वरबाद हो जाएगा।।

बदहाल पाकिस्तान तू सुनले,
हर करनी की सजा तू पाएगा।
अभी सिंधु जल किया बंद है,
आगे और भी मुंह की खाएगा।।

बहशी पूछ मजहब मार डाले,
मेरे कई निर्दोष निहत्ते भारती।
अब इस्लाम पर्याय बन चुका,
सारे विश्व,आतंक का सारथी।।

अब कुचलना ही विकल्प है,
आतंक रूपी पोषित सर्प को।
सम्पूर्ण जगत भी ध्यान देले,
कोई प्रोत्साहन न दे दर्प को।।

दुश्मन को मुंह तोड़ जवाब दें,
सक्षम है नेतृत्व, सैन्य शक्तियाँ।
आफत की घड़ी में एकजुट हो,
सब साथ राजनीतिक शक्तियां।।

मुर्शिदाबाद की घटना

मुर्शिदाबाद विभीषिका,
रही चीखकर पुकारती।
निर्दोष जन क्यों मर रहे,
आहट है माता भारती।।

नरसंहार को जो हवा दें,
है लाशों पे रोटी सेकतें।
इंसानियत को ही मारते,
औ कौमी बघारें फेकते।।

नृशंस अनर्थ छाये नहीं,
बुझ न पाए घर के दिये।
सरकार भी बस मौन है,
लगे होंठ जैसे हो सिये।।

हिन्दू मरे या हो मुसलमाँ,
मरता तो माँ का लाल है।
कुछ धूर्त नेताओं की बस,
रहे स्वार्थी चुनावी चाल है।।

समाज सुधारक: डॉ. बी. आर. रामजी आम्बेडकर

हे महा पुरुष, हे युग नायक!
हो तुम संविधान के निर्माता।
शोषित पिछड़ों के उद्धारक,
थे बहुजन के भाग्य विधाता।।

ऊंच नींच औ जात-पात जैसे,
आडंबरों पर घोर प्रहार किया।
शांति दूत बनकर मानवता के,
सबे जीने का अधिकार दिया।।

शिक्षा को समर्थ शस्त्र बनाकर,
मानव हित में सदा कार्य किया।
रहो संगठित और शिक्षित बनो,
ये पिछड़ों को अद्भुत मंत्र दिया।।

पीड़ित वंचित के रक्षक बनकर,
अत्याचारों औ हक़ के लिए लड़े,
शिक्षा समता को ध्येय बनाकर,
आडंबर कुरीतियों से रहे अड़े।।

हे बाबा! हम सब ऋणी तुम्हारे,
सही राह दिखा उपकार किया।
शत-शत बार नमन करते तुम्हें,
नई सोच के संग सतमार्ग दिया।।

हनुमत गुणगान

हे! मारुति नंदन, कपि नायक,
तेरी भक्ति है बड़ी सुखदायक..

तुम अष्ट सिद्धि के दाता हो,
औ भक्तों के भाग्य विधाता।
हे! पंच मुखी, बजरंग बली,
तुम नौ निधियां के दाता हो।।

हे! मारुति नंदन, कपि नायक…

नहि है रामभक्त तुम्हरे जैसा,
सिया- राम हृदय में साजे हैं।
प्रभु रामकथा जहाँ भी होती,
हनुमत तो वहां पे बिराजे हैं।।

हे! मारुति नंदन, कपि नायक….

तुम शंकर सुभन,केसरी नंदन,
श्रीराम काज हेतु अभिनन्दन।
संतन हित पालक हे!भगवन्ता,
दुष्टों का दमन करें हनुमान्ता।।

हे! मारुति नंदन, कपि नायक…

महावीर की लीला अति न्यारी,
रोद्र रूप में ही आये शिवधारी।
राम सुग्रीव मिलाप कराये तुम,
सिय खोजन चली सेना सारी।।

हे! मारुति नंदन, कपि नायक…

आदेश मिला प्रभु राम का तो,
सीता की खोज में निकल पड़े।
अपने बल- बुद्धि ज्ञान- बल से,
अवरोध सभी हल किये जो पड़े।।

हे! मारुति नंदन, कपि नायक…..
तेरी लीला अनुपम सुख दायक…

पर्यावरण सुरक्षित तो हम सुरक्षित

हैदराबाद की घटना को सुन,
मेरा अत्यधिक द्रवित है मन।
पर्यावरण को आहत करे जो,
वो विकास नहीं,है पागलपन।।

आशंकित होंगे सब जीव जंतु,
मानव!क्यों मेरे घर उजाड़ दिए।
कहते होंगे,मुझे भी जीने दो क्यों,
मेरे आशियाने सब तबाह किये।।

इंसान लालच की है भेंट चढ़ा,
लालच किस हद तक बढ़ा लिया।
पेड़ काट,अब छाया को तरसते,
कंक्रीट का जंगल खडा किया।।

यह कहते होगे सब पखेरू भी,
कच्चे मका औ छप्पर मेंट दिए।
हरे पेड़ों को भी काट-काट कर,
अपने निज स्वारथ भेंट किए।।

अब मोबाइल टावर खड़े किए।
प्रदूषण से दम पहले से घुट रहा,
प्रजनन को जगह न बची कोई,
और आग आसमान उगल रहा।।

कहते, धरती के तुम श्रेष्ठ पुरुष,
पर स्वारथ में इतने क्यों अंधे हो,
हथियारों, विनाश की होड़ लगी,
किस विकास की होड़ में बंधे हो।।

भारतवंशी सुनीता विलियम्स

नारी शक्ति को किया है चरितार्थ,
भारतवंशी होने का मान मिला।
कल्पना के बाद,भारत की बेटी,
को नासा में बड़ा सम्मान मिला।।

यह साबित कर दिया सुनीता ने,
पूरा किया मन में जो ठान लिया।
तनिक नहीं कभी विचलित हुई,
है पोस्टपोन मिशन, जान लिया।।

सारे भारत की दुआएं साथ रही,
नासा का भी सदा ही साथ मिला।
सबसे अधिक व्योम में रहने का,
सौभाग्य से ही सिर माथ मिला।।

करनेको पूरी कल्पना की कल्पना,
तुम्हें ईश से अजेय वरदान मिला।
नौ माह ज्यों गगन गर्भ में रहकर,
फिर ईश्वर से जीवन दान मिला।।

गर्वित है देश सुनीता पर जिसने,
‘वसुधैव कुटुंब’ का मंत्र सजाया।
किसी एक देश की नहीं हो तुम,
‘ब्रह्मांड की बेटी’का तगमा पाया।।

गौरैया की मनोदशा

बोलती ये होगी चिड़ियाँ प्यारी,
लालच को इतना बढ़ा लिया।
पेड़ काट डाले दुनिया भर से,
कंक्रीट का जंगल खडा किया।।

कहती होगी, शायद हे ! मानव,
कच्चे मकां औ छप्पर मैंट दिए।
हरे पेड़ों को भी काट-काट कर,
अपने निज स्वारथ में भेंट किए।।

प्रदूषण से पहले थी मैं परेशान,
अब मोबाइल टावर खड़े किए।
प्रजनन को जगह बची न कोई,
चहुओर अट्टालिकाएं खड़े किए।।

लालच स्वार्थ आलस्य त्यागो,
जीव जंतु से तुम प्रेम कर लो।
आफत की विनाश घड़ी में मेरी,
रक्षा और मुझसे प्रेम कर लो।।

सतरंगी होली

नीला, पीला, हरा, गुलाबी,
है सत रंगी अंबर होली का।
आओ मिलक़े खुशियां बांटे,
मोल न लगे मृदुबोली का।।

रंगों का है यह पर्व अनोखा,
मिटा दूरियां सब रंग लगाए।
रिश्तो की मर्यादा समझे हम,
मान बड़ों का भूल न जाए।।

मन से सारे कलषु मिटाकर,
चलो श्याम रंग में रंग जाए।
भेदभाव का अंतर पाट कर,
संग प्रकृति आनंद मनाए।।

मृदुवाणी औ आनंद प्रेम से,
आओ सबको गले लगाए।
शांति औ सद्भाव से मिलकर
लोकगीत और फाग सुनाये।।

प्रेम भाव से हिल मिलकर,
हरेक चेहरे पर रंगत लायें।
प्रेम रंग में सबको रंग डाले,
अंतर मन सबके रंग जाए।

गुजिया साके और मिठाई,
बड़े प्रेम से मिलजुल खाएं।
इस पावन पुनीत होली पर,
नहीं नशे को हाथ लगाएं।।

अलौकिक प्रेम

राधे- कृष्ण की जोड़ी अलौकिक,
सारे जग में प्रेम का पर्याय बनो है।
राधा ने प्रीति जो मोहन से जोड़ी,
कृष्ण से पहले राधा नाम सुनो है।।

बरसाने की वृषभान दुलारी ने तो,
कृष्ण को ही अपनो मान लियो है।
प्रेम के रंग में ऐसी भीगी किशोरी,
दूजो न कोनऊ रंग आन दियो है।।

शक्ति स्वरूपा राधारानी के संग में,
ब्रज धाम में मोहन खेलत है होली।
महायोगी को महारास देख हर्षाते,
औ पुष्प वर्षा करें देवों की टोली।।

राधा रानी का अनन्य प्रेम

कृष्ण गए ब्रज धाम छोड़ के,
सखियन संग राधा अकुलाएं।
कृष्ण प्रेम में राधा है व्याकुल,
बिन कान्हा नहि कछू सुहाय।।

बिरह श्याम व्याकुल भई राधा,
अन्य सखीं भी रही अकुलाय।
राधा ने तब प्रभु सुमिरन कीन्हो,
मन में कोंधों फिर एक उपाय।।

सखिन रूप धरयो कान्हा को,
सब दूर व्यथा भई मन हर्षाये।
ज्यों सच्चे मन सुमिरन कीन्हा,
सब सखि रूप कान्हा दर्शाये।।

कृष्ण की लीला बड़ी अनोखी,
सभी देव ब्रज धाम को आये।
महामाया ने फिर माया बिखेरी,
हर गोपी संग श्याम दिखाएं।।

राधा में कृष्ण, कृष्ण में राधा,
लोगन को अब रहे दिखाएं।
महा रास महा योगी रचावत,
सभी देव पुष्प बर्षा कराये।।

नीलवर्ण,भाल पंख बिराजे,
घन लटाए घनश्याम पे भाये।
अधरन पर मुस्कान मनोहर,
आँखे संमोहित सी कर जाये।।

रूप अलौकिक दिव्य देखकर,
कोटि काम रति भी रहे शर्माए।
प्रभु ने कृपा करी श्री राधा पर,
तब माधव छोड़ द्वारका आए।।

गूढ़ मर्म तो केवल राधा समझी,
श्रीकृष्णा साक्षात बरसाने आए।
सुखद प्रेम की अनुभूति पाय के,
प्रभु गोपिन संग महारास रचाये।।

नारी सबला है, अबला कैसे मान लिया..

नारी को नर प्रधान समाज ने तो,
कमसिन कलियों का नाम दिया।
नारी तो है नाजुक और पराधीन,
दुनिया ने तो यही सम्मान दिया।।

क्या शक्ति भूल गए नारी की तुम,
सबला,सब कुछ कर सकती है?
अपनी जिद पे यदि अड़ जाए,
माँ जगदम्बा भी बन सकती है।।

जब-जब भी नारी पर जुल्म हुए,
जुल्म-पापों की घटा घहराई है।।
तब तब त्रिशूल लेकर महाकाली,
औ अम्बिका स्वरूप में आई है।।

प्रेम-सहिष्णु प्रतिमूर्ति है नारी,
सबला है,अबला कैसे मान लिया?
परिवार खातिर हर कुर्बानी देती,
अपनी इच्छा पे नहि ध्यान दिया।।

पुरुषों से अधिक सहनशक्ति देकर,
नारी को सृष्टि ने सृजन हेतु भेजा है।
कमतर,कमजोर न आंकना तुम,
नारी ने धरा पे सहज रूप सहेजा है।।

नारी तेरे अनेक रूप

नारी तुम हो शक्ति स्वरुपा,
सकल सृजन साकार तुम।
गृह-शोभा भी तुमसे ही है,
नेह वात्सल्य का सार तुम।।

प्रति मूर्ति हो सहनशील की,
सब तकलीफे सह लेती हो।
परिवार की खुशियाँ खातिर,
सब चुपके से सह लेती हो।।

तुम समान दूजा नहीं कोई,
त्यागी, इस नश्वर संसार मे।
ईश्वर ने दी है तुन्हे शक्तियाँ,
पूर्ण सृष्टि सृजन के सार मे।।

माह – ए – रमज़ान

मुबारक हो सबको रमज़ान,
यह पाक महीना आया है।
मिटाने सबके दिल से नफरते,
साथ रहमते दुआ लाया है।।

नेक दिल इबादत करने को,
अमन का पैगाम लाया है।
मुल्क में हो अमन औ शांति,
इल्म सबके दिल छाया है।।

मिले सब से गले हंस करके,
नेक काम से ही हमसाया है।
ज़कात करना खूब गरीबों में,
यही खुदा ने भी समझाया है।।

दिल में सब के रहम औ नेकी,
रख तभी रोज़ा मयस्सर होगा।
हक़ीक़त में दिल पाक साफ है,
तभी खुदा दिल के करीब होगा।।

जब अजान में सलामती और,
हर किसी के लिए दुआ होंगी।
मन से मगरिब की अज़ान कर,
तो ये रमज़ान कुछ खास होंगी ।।

विजय पथ

चाहे सिरपे गमों की धूप हो या,
बहुत खुशियों की बरसात हो।
यूं बढ़ ही चले मंजिल को राही,
अब दिन हो या काली रात हो।।

माना टेड़ा कठिन है रास्ता औ,
बिघ्न, कठिनाइयों से है भरा।
मशाल उम्मीदों की जला कर,
देख और आगे बढ़ तो, जरा।।

वरण करता है विजय को जो,
कभी भी हार स्वीकारता नहीं।
सफलता भी चूमती चरण को,
जो रुकना कभी जानता नहीं।।

इतिहास इबादत गड़ गया जो,
बढ़ता रहा लक्ष्य पर बिन रुके।
आदर्श बन जाता दूजो के लिए,
जो संघर्ष में कभी भी न झुके।।

जले बुरे विचार इस होली में

मिट जाये कुत्सित सब विचार,
मिले गले आपस हमजोली में।
यही विनती करते हम ईश्वर से,
पल बीते संग हंसी ठिठोली में।।

मिटे सभी गिले शिकवे दिल से,
बनाये नव उत्सर्ग इस होली में।
जिंदगी का नहि ठोर -ठिकाना,
जी भर जीले अबकी होली में।।

सब के मन खुशियां भरें रघुवर,
करूणा निधि तुम्हारी झोली में।
आहत मन हो न पाए कभी भी,
जले अधम विचार सब होली में।।

वक्त बड़ा बलवान

वक्त बड़ा बलवान इस जग में,
वही जीवन सफल कर पाता है।
वक्त की चाल समझ लेता जो,
औ संग वक्त के चलते जाता है।।

जीवन को खुद आकार जो देता,
वो भविष्य सुरक्षित कर लेता है।
वक्त के महिता यदि जान जाए,
हर मुकाम हासिल कर लेता है।।

वक्त बड़ा अनमोल इस जग में,
कीमत इसकी जो जान जाता।
वक्त को यदि बरवाद किया तो,
सब बर्बाद वक्त है कर जाता।।

बालू की रेत समान यह मुट्ठी से,
प्रति क्षण ये निकलता जाता है।
वक्त का पहिया जो थाम लिया,
जीवन में सफलता पा जाता है।।

वक्त से बड़ा न शिक्षक है जग में,
यह खट्टे मीठे अनुभव दे जाता है।
यदि बोये पेड़ बबूल के है तो फिर,
मीठे आम कहां वह खा पाता है।।

जीवन भर बुरे कर्मों में लिप्त रहा ,
मद- काम में सदा अनुरक्त रहा।
चाहे, अब सब जग तुम्हे मान करें ,
होगा ऐसा,ये झूठ किसने कहा?

वक्त की इज्जत करो इस जग में,
सब बक्त के साथ है बदल जाता।
बीता वक्त, हाथ होय जब खाली,
दूजों पे मिथ्या दोष लगा पाता।।

बचपन मौज,जवानी आलस्य में,
यदि उपयोगी जीवन न बन पाया।
बीता वक्त गुजरता,नदी धारा सम,
कभी लौट के वापस न आ पाया।।

दिव्य प्रयागराज की महिमा

सब तीर्थ में है तीर्थ अनोखा,
दिब्य प्रयागराज की शान है।
त्रिवेणी संगम पर अवस्थित,
भव्यता औ दिव्यता महान है।।

बलयाकार घाट होते सुशोभित,
खूबसूरती मन को हर लेती है।
दिव्य संध्या आरती माँ गंगा की,
सबके मन पावन कर देती है।।

शिव की नगरी वैभव अनुपम,
यहाँ मंदिरों की शोभा न्यारी है।
संस्कृति,शिक्षा का है केंद्र बिंदु,
साधकों को नगरी यें प्यारी है।।

करने स्व पितरों का पिंड दान,
सकल विश्व से श्रद्धालु आते है।
मिटै मन कलषु,करें यहाँ दान,
जीवन पूर्ण आनंदमय बनाते है।।

महाकुंभ का प्रचलन है सनातन।
आया महा योग बारह वर्षों बाद,
दिव् महिमा इसकी चिर पुरातन।।
पापनाशिनी सबका हरे उन्माद।।

संक्रांति, मौनी, वसंतोत्सव और,
महाशिवरात्रि पे करें शाही स्नान।
करके तामसिक प्रवृत्ति विसर्जन,
बने सात्विक,हो जीवन कल्याण।।

जग संत महंत श्रद्धालु देवगण,
पधारे प्रयाग समागम है महान।
सत् सनातनी धर्म संगम स्थलीं,
है अद्भुत दिव्य अध्यात्म संधान।।

शान-ए- हिंद: सरजा शिवाजी महाराज

Chhatrapati Shivaji Maharaj

शिवनेर दुर्ग में जन्म लिया,
जीजा ने जिसको जाया था।
अन्याय मिटाने मुगलों का,
प्रत्यक्ष शिवा जस आया था।।

क्रूर अत्याचारी मुगलों के वो,
सदा पंख कतरने वाला था।
हिंदू स्वराज्य का संस्थापक,
और मान बचाने वाला था।।

औरंगजेब ने अफजल भेज,
जब पीठ छुरा चलवाया था।
पेट फाड़ कर अफजल का,
शिवा नरसिंह रूप धराया था।।

सरजा शिवाजी ने रखी थी,
लाज हमारे स्वाभिमान की,
बार -बार वंदन, गाथा गाये,
शिवाजी शौर्य बलिदान की।।

सीधी बात

ढूंढ रहे दूजे में कमियाँ,
खुद अपने मन ताके कौन?
झांक रहे इधर-उधर सब,
स्वयं के अंदर झांके कौन?

कस्तूरी कुंडल मृग बसती,
ढूंढत वन फिरे,बुझाये कौन?
दुनियाँ सुधारे सब चिल्लाते,
खुद को आज सुझाये कौन?

पर उपदेश कुशल बहु तेरे,
खुद पर आज विचारे कौन?
हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा,
ये सीधी बात स्वीकारे कौन ?

प्रेम दीवानगी

जब से मिला हूं तुमसे,
बहका सा जा रहा हूं।
सोचू, न तुमको सोचूं,
तुम्हें सोचे जा रहा हूं।।

तेरा देख कर मुस्कुराना,
वो पल याद कर रहा हूँ।
है तुझको भी प्रेम मुझसे,
ये अनुमान लगा रहा हूं।।

ख्वाबों में मैं तुझको देखूं,
दीवाना हुआ जा रहा हूं।
कब होगी रूबरू फिरसे,
ये ख्वाहिश सजा रहा हूँ।।

मकसद तेरा प्यार पाना,
मन आशा जगा रहा हूं।
सब कुछ छोड़कर अब,
तेरे सजदे में आ रहा हूं।।

आंखों में बसा तेरा चेहरा,
प्रेम – रंगों से बना रहा हूँ।
फूलों,तितली से बातें कर,
तेरी तस्वीर बना रहा हूं।।

मनहरण कवित्त छंद:
मनहरण छंद को घनाक्षरी या कवित्त भी कहते हैं। यह एक वर्णिक छंद है। इसमें मात्राओं की गणना नहीं की जाती,बल्कि वर्णों यानी अक्षरों की गणना की जाती है। मनहरण छंद का इस्तेमाल सबसे पहले भक्ति काल में हुआ था। मनहरण छंद में 8-8-8-7 वर्णों पर यति होती है।

इस छंद में चरण (पंक्ति) के अंत में लघु-गुरु होना ज़रूरी है। इस छंद में भाषा के प्रवाह और गति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। गेयता इसका गुण है। इस छंद में ध्रुपद राग में गाया जा सकता है। प्रत्येक चरण में 16-15 की युति पर कुल 31 वर्ण होते हैं।

1- प्रेम की पराकाष्ठा

कृष्ण की दीवानी मीरा,
भक्ति भाव सरावोर।
कृष्ण को ही अपना,
सर्वस्व मान लेती है।।

कृष्ण भक्ति लीन होके,
सब राज सुख छोड़।
कृष्ण की शरण में,
प्रवास कर लेती हैं।।

प्रेम मांगता है जब,
त्याग तब मीराबाई।
सारी जिंदगानी,
बलिदान कर देती है।।

प्रेम-भक्ति,आस्था की,
सकल मूर्ति मीराबाई।
कृष्ण के भरोसे,
विषपान कर लेती हैं।।

2-जुनून

मातृशक्ति शौर्य का,
मैं कहां लौ बखान करूं।
नारियों में त्याग,
बलिदान यही पाओगे।।

आन,मान,शान हेतु,
प्राण निज होम दिए।
ऐसी वीर नारियों की,
गाथा यही पाओगे।।

लक्ष्मी बाई मरदानी,
रानी हाड़ी बलिदानी।
पन्नाधाय जैसा त्याग,
अन्यत्र नहीं पाओगे।।

मान को बचाने हेतु,
जौहर का व्रत किया।
पद्मिनी सी स्वाभिमानी,
दूजी नहीं पाओगे।।

मस्त फाल्गुन मास

ऋतु फाल्गुन मास के आने पर ,
चहुओर बसंती सी छा जाती है।
यौवन स्वरूप देख ऋतुराज का,
सकल प्रकृति सहज हर्षाती है।।

आनंदित होकर गाता जब बसंत,
तो पुष्प कली- कली मुस्काती है।
साखों पर चटकीली नव- कोंपलें,
सौम्य,बहुरंगी मनको लुभाती है।।

साखों पर लंबी हरित लतिकायें ,
पवन झोके, झलुआ झुलाती हैं।
सुत अनंग-बसंत के मोद मगन में,
प्रकृति हर्षित,उल्लास मनाती है।।

मंद मलय मरू महकाये मनको,
केक कोकिलें मधुगीत सुनाती है।
पुष्पों से लदी, लिपटी लतिकाये,
प्रेम आलिंगन से भाव जगाती है।।

मन की पुलकन, आनंदित कर,
प्रिय मिलन की चाह जागती है।
मोद मना सकल सृष्टि सृजन के,
नव अंकुर धरणी विकसाती है।।

पुष्प मधुप मधु मकरंद लेन को,
नीरज रज लेने, भ्रमर धावते है।
आम्र बौर महक, महुआ मधुपा,
कोयलें अति मीठे गीत गावते है।।

फाल्गुन मास की, होली का रंग,
एक अजब सी मस्ती भरता है।
प्रेम अनुराग रंग, रंग जाते सभी,
उत्साह, उमंग, जोश भरता है।।

फाल्गुन मास नवजीवन सृष्टि ,
नवसृजन,ऊर्जा का द्योतक है।
धार्मिक अनुष्ठान, नव कार्य हेतु,
शिव-शक्ति मिलन उद्योतक है।।

कह मुकरी छंद

“कहमुकरी” जैसा कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है,’कहना और मुकर जाना’।यह एक लोक छंद है। ‘अमीर खुसरो’ ने हिंदी भाषा में ‘कह मुकरी छंद’ में कई सर्वश्रेष्ठ रचनायें रची।

उनके बाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और अन्य कवियों ने भी इस विधा को आगे बढ़ाया। यह सोलह मात्राओं का छंद विधान है।इसकी संरचना चौपाई छंद के समान ही होती है। लयात्मकता, गेयता और पहेली की आभा इस छंद के सौंदर्य को बढ़ाती है।बिम्बात्मकता से इस छंद में चार चाँद लग जाते हैं।

यह छंद दो सखियों के वार्तालाप का जीवंत दृश्य उपस्थित करता है। प्रथम दो पंक्तियों में ऐसा बिंब बनता है कि दूसरी को लगता है कि वह साजन के बारे में बता रही है, लेकिन जब वह पूछती है तो वह मुकर जाती है। इस प्रकार यह छंद रोचक रचना विधान के साथ पाठक के मन की जिज्ञासा को बढ़ाता है।

मनमोहक उसकी है काया,
अंग -अंग में प्रेम समाया।
मंत्र मुग्ध करता है रंग,
क्या सखि साजन? ना सखी सारंग।। (मोर )

बहुत जरूरी होती भाई,
इसे मिलती है प्रभुताई।
इसके बिना न कुछ भी अच्छा,
क्या सखी पैसा? ना सखी शिक्षा।।

जब देखूं मन अति हर्षाये,
मेरे उर ठंडक पहुंचायें।
देख के उसको खिल जाता मन,
क्या सखि साजन? ना सखी उपवन।।

देखो आया बसंत

ज्यों माघ -मास के आते ही,
ऋतु बासंती सी छा जाती है।
स्वागत करने ऋतुराजा का,
सारी प्रकृति सहज हर्षती है।।

मदआक्रांत आ गया बसंत,
हर पुष्प कली मुस्काती है।
साखों पे चटके नव कोंपल,
हर एक मन को लुभाती है।।

साखों पर लंबी हरित बेलें,
हवा झोके, झूले झूलती हैं।
सुत अनंग बसंत गोद लिए,
प्रकृति पालना झुलाती है।।

मंदमलय मारू महकाये मन,
कोकिलें मधु गीत सुनाती है।
पुष्प लतायें लिपटें तरुओं से,
आलिंगन सा भाव जगाती है।।

मन की पुलकन आनंदित कर,
प्रिय -मिलन के राग जागती है।
मोद मना सकल सृष्टि सृजन के,
नव अंकुर धरणी विकसाती है।।

महाकुंभ की महिमा

छोड़ राशि धनु,मकर में आते,
बदलते है गति सूर्य भगवान।
प्रवेश करें सूर्य उत्तरायण में,
आयें संक्रांति हरने अवसान।।

अद्भुत योग है सन पचीस का,
पवित्र संक्रांति फलदाई महान।
जीवन आशामय आनंदित बनें,
मिटे मन कळशु करने से दान।।

महाकुंभ का प्रचलन है सनातन।
आया महा योग १४४ वर्षों बाद ,
दिव् महिमा इसकी चिर पुरातन।।
पापनाशिनी सबका हरे उन्माद।।

संक्रांति,मौनी,वसंतोत्सव और,
महाशिवरात्रि पे करें शाही स्नान।
करके तामसिक प्रवृत्ति विसर्जन,
बने सात्विक,हो जीवन कल्याण।।

जग संत महंत श्रद्धालु देवगण,
पधारे प्रयाग समागम है महान।
सत् सनातनी धर्म संगम स्थलीं,
है अद्भुत दिव्य अध्यात्म संधान।।

आ जाओ ऋतुराज बसंत

जब आएगा ऋतुराज झूम,
धरा का तृण तृण हर्षायेगा।
हरी-भरी धरती पर फिर से,
सब प्रकतिमयी हो जायेगा।।

सब बाग बगीचे महकेंगे औ,
तरुओं पर कॉपले आएंगी।
मकरंद बौर फिर आमों पर,
चहुँ ओर सुगंध फैलाएगी।।

होगा सर्दी- गर्मी का मिलन,
मौसम में नयी तरंग होगी।
महक उठेगे सभी गांव शहर,
हरेक हृदय नई उमंग होगी।।

हर्षित जीव जंतु, पेड़ों पे भी,
मयूर, कीर, कोयले गाएंगी।
खेतों में खिली पीली सरसों,
मखमली सी छटा फैलाएगी।।

नभ से सूरज फिर धीरे-धीरे,
वसुधा पर लालिमा बिखेरेंगे।
मलयगिरि सुगंधित सुगंध से,
वायुदेव फिर प्रेम राग उकरेंगे।।

ऐसे सुख का कभी अंत न हो,
प्रभु निर्मल प्रेम सिखा जाओ ।
नव श्रंगार धरणि का करने को,
हे ऋतुराज! बसंत आ जाओ।।

नाम की महिमा

प्रभु श्रीराम के नाम से सब,
बिगड़ी बाते बन जाती है।
राम नाम भव सागर नौका,
प्रभु चरणों तक ले जाती है।।

राम रमें है हर रोम -रोम में,
श्री राम ही जग की आशा है।
राम नाम सर्वभौम है जग में,
राम ही तो प्रेम की भाषा है।।

मेरे राम तो है करुणा सागर,
सभी कर्मों की वह गागर है।
जीवन नैया के है खिवैया औ ,
शक्ति भक्ति के महासागर है।।

नाम का अमृत-पान करें जो,
रहे शरणागत आठो याम है।
प्रभु राम की कृपा सदा रहती,
औ अंत में मिले मोक्ष धाम है।।

राष्ट्र क्या है?

राष्ट्र ना धरती का टुकड़ा,
इसमें समाहित सभी जन।
राष्ट्र बनता सम भावना से,
प्रेम मिलन, मनोहर मन।।

राष्ट्र की शोभा न केवल,
संसाधनों औ भूगोल से।
न हिमशिखर,न मरुधरा,
न सरल जीवन मूल से।।

राष्ट्र स्वयं में संचित समेटे,
पूर्व ज्ञान औ इतिहास को।
चिर पुरातन रीति रीवाजों,
और लोक के विश्वास को।।

होता राष्ट्र हित सबसे बड़ा,
इससे न बढकर और कुछ।
देश सेवा से बड़ा होता नहीं,
जीवन में करम र्और कुछ।।

व्यक्ति की पहचान, इज्जत,
जुड़ जाती उसी के राष्ट्र से।
सार गर्वित मृत्यु भी होती है,
देशहित बलिदानी राष्ट्र से।।

राष्ट्र में हम सभी समाहित,
राष्ट्र सबके लिए सर्वस्व है।
शूरवीरों की कौशल क्षमता,
से ही दुनिया में वर्चस्व है।।

भगवान दास शर्मा ‘प्रशांत’
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उ.प्र.

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