भयमुक्त समाज बने

आज पूरा समाज डरा हुआ है। पहले रास्ते चलते यदि कोई साथी मिल जाता था तो सोचते थे कि कोई साथी मिल गया है परन्तु आज उल्टा हो गया है। अब लोग जानवरों से अधिक मनुष्य से डरने लगा है।

मनुष्य को हर समय यह भय सताता रहा है कि अकेला पड़ने पर कही कोई हमसे छीना झपटी ना कर ले। आखिर इतनी भयावह स्थिति समाज में कैसे बनी इसका जवाब किसी के पास नहीं है । यह भय तो एक दिन में तो बढ़ नहीं गया इसके लिए लंबा समय लगा होगा।

आवश्यकता है एक ऐसे समान के निर्माण की जहां लोग भय युक्त जीवन जी सके। लोग अपने अधिकारों के लिए धरने प्रदर्शन तो करते है परन्तु निर्भय समाज के निर्माण के लिए कोई प्रदर्शन नहीं करता।

हमें लोगों के विश्वास को जीतना होगा। यह बिना त्याग के नहीं हो सकता। मनुष्य- मनुष्य के बीच बढ़ती दूरियां को कम करने के लिए अभियान चलाने होंगे । हमें स्वयं अपना आदर्श प्रदर्शित करना होगा। क्योंकि अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।

आज समाज में इसीलिए इतना बिगाड़ आ रहा है कि जो लोग सुधार की बात करते हैं, उनका खुद का जीवन ही बहुत, खराब होता है। खुद चरितहीन होते हुए चरित्रवान बनने की सीख कैसे दे सकता है।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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