मीना भट्ट सिद्धार्थ की ग़ज़लें | Meena Bhatt Siddharth Poetry
मुझको यारब न लाल-ओ- गुहर दीजिए
मुझको यारब न लाल-ओ- गुहर दीजिए
जो वतन पे हो कुर्बां वो सर दीजिए
नफ़रतों का जहाँ पर बसेरा न हो
इक मुहब्बत का ऐसा नगर दीजिए
जो गुज़रती हो दर से तुम्हारे सनम
उस डगर का पता कुछ ख़बर दीजिए
घर में वालिद से ही रौशनी है सदा
उनकी छाया हमें उम्र भर दीजिए
चीख़ता हो नगर ख़ौफ़ में हो गली
ऐसी यारब न दुख की सहर दीजिए
मंज़िलें ख़ुद ही आकर क़दम चूम लें
हमको ऐसा ही दस्त-ए-हुनर दीजिए
उँगली उठती न हो जिसके ईमान पर
ऐसा ख़ुद्दार मालिक बशर दीजिए
वो कहाँ जा छिपा है कि मिलता नहीं
खोज कर मेरा लख़्ते -ए-जिगर दीजिए।
कम की ख़्वाहिश है ज़ियादा नहीं माँगा करते
कम की ख़्वाहिश है ज़ियादा नहीं माँगा करते
प्यास लगती है तो दरिया नहीं माँगा करते
हम कभी ऐसा कभी वैसा नहीं माँगा करते
चाहते अच्छा ही घटिया नहीं माँगा करते
लेते हैं एहसां नहीं हम तो किसी का भी कभी
कोई सर रखने को शाना नहीं माँगा करते
अपनी मेहनत से कमा हम तो गुज़ारा है करें
हाथ फैलाके निवाला नहीं माँगा करते
चाहें आगोश में हम आसमां ये सारा ही
हम कभी अब्र का टुकड़ा नहीं माँगा करते
भरना हम चाहें उड़ानें भी परिंदों सी सदा
और ख़्वाबों में भी पहरा नहीं माँगा करते
धूप चुभती रहे हमको नहीं है ग़म इसका
हम तो ज़ुल्फों का भी साया नहीं माँगा करते
हमको आता है हुनर यार ग़ज़ल कहने का
हम किसी से कभी मिसरा नहीं माँगा करते
हमको तो ये चाक गरेबां न दिखाएँ मीना
ज़ख़्म सिलने को भी धागा नहीं माँगा करते
आ गयी उन पे कमसिनी फिर से
आ गयी उन पे कमसिनी फिर से
अब क़यामत है लाज़िमी फिर से
धूल चेहरे पे है जमी फिर से
बढ़ गई दिल की बेकली फिर से
यूँ तो दरिया के तट पे बैठे हैं
है मगर लब पे तश्नगी फिर से
खुशनुमा लग रहा जहां सारा
सुब्ह आई है शबनमी फिर से
अब न आते वो ख़यालों में
हो गए हम,वो अजनबी फिर से
ख़्वाब होगें सभी मुकम्मल अब
आई दिल सू नवा-गरी फिर से
बाद मुद्दत के वो मिले मीना
गोया सब कुछ हुआ सही फिर से
इस मुहब्बत ने तो हम पर ये इनायत की है
इस मुहब्बत ने तो हम पर ये इनायत की है
जो ये बंजर थी ज़मीं उसको भी जन्नत की है
मैंने उल्फ़त की हमेशा ही इबादत की है
तेरी दुनिया की हर इक शय से मुहब्बत की है
अपने सीने में बसा ली है तुम्हारी सूरत
और ख़ुद से भी अधिक उसकी हिफ़ाज़त की है
हम न सद्दाम किसी मुल्क रियासत के हुए
हमने लोगों के दिलों पे ही हुकूमत की है
जो हक़ीक़त के तरफ़दार हैं सच ही लिखते
ऐसे अख़बारों की हमने सदा इज़्ज़त की है
इसके तेवर है जुदा ख़ौफ़ नहीं ये खाए
इस मुहब्बत ने तो शाहों से बग़ावत की है
ज़िंदगी जिसने गुज़ारी यहाँ गैरों के लिए
ऐसे हर शख़्स की मीना ने भी इज़्ज़त की है
किसी भी बात के बिन आज मुस्काने से क्या होगा
किसी भी बात के बिन आज मुस्काने से क्या होगा
तमाशा होगा महफ़िल में भला जाने से क्या होगा
लगे ये घर भी वीराना तुम्हारी याद में हमदम
मगर माज़ी की यूँ फिलहाल याद आने से क्या होगा
अगर इंसानियत होगी नहीं दिल में बशर फिर तो
तेरे मंदिर या मस्ज़िद में चले जाने से क्या होगा
सभी मसरूफ़ रहते हैं यहां अपने ही कामों में
बढ़ा के दोस्ती ग़म अपना बतलाने से क्या होगा
लगी पाबंदियां मिलने मिलाने पे ज़माने की
बता ऐ शम्अ की अब तेरे परवाने से क्या होगा
फ़क़त दौलत की शुहरत की यहाँ चाहत है लोगों को
फिर उनपे प्यार बेमतलब ही बरसाने से क्या होगा
जवानी चार दिन की भागती है जान ले हमदम
कि अपने हुस्न पर तेरे यूँ इतराने से क्या होगा
नशा दिलबर की बातों का हमें बहका रहा मीना
लगी है आग दिल में यार पैमाने से क्या होगा
तरीक़ा प्यार का उसको बता दिया हमने
तरीक़ा प्यार का उसको बता दिया हमने
अमीरे-शह्र को झुकना सिखा दिया हमने
गुनाहों की करें हर रोज़ पैरवी जो भी
उन्हें भी सच का पुजारी बना दिया हमने
सफ़ीना सौंप दिया अपना नाख़ुदा को और
ज़ुबाँ पे अपनी भी ताला लगा दिया हमने
जो बेचते थे बदन यार चंद सिक्कों में
शिकम की भूख को उनकी मिटा दिया हमने
ज़मीं का एक भी टुकड़ा जिन्हें नसीब न था
कि दिल से उनको ही राजा बना दिया हमने
शरीके-जुर्म थे गद्दार थे वतन के भी
उन्हें नज़र से तो अपनी गिरा दिया हमने
पशेमाँ हो न कभी ज़िंदगी में ऐ मीना
कि हाले-दिल तुझे अपना सुना दिया हमने।।
एहले दुनिया में जो ये इज़्ज़ते फ़नकार गिरी
एहले दुनिया में जो ये इज़्ज़ते फ़नकार गिरी
ख़ून रोया है क़लम दिल की भी सरकार गिरी
रोई जी भर के ज़मीं सर पे जो तलवार गिरी
आज अंबर से भी अश्कों की ही बौछार गिरी
जीत लिक्खी न थी क़िस्मत में मेरी करती क्या
कोशिशें लाख कीं आंचल में मगर हार गिरी
पार कैसे हो मुहब्बत की भला ये कश्ती
दूर साहिल है सनम और ये पतवार गिरी
हो बुलंदी पे भला कैसे सितारा मेरा
मेरी उम्मीदों पे बिजली तो कई बार गिरी
इस सियासत की हरिक चाल है शतरंजी क्यों
बातों बातों में यहाँ देखिए सरकार गिरी
कोई देता न तवज्जो कहाँ अब मीना को
इन बुज़ुर्गों के भी सिर से यहाँ दस्तार गिरी
सबसे कहें मेरे अधर ईद मुबारक
सबसे कहें मेरे अधर ईद मुबारक
मिलते गले मिलती है नज़र ईद मुबारक
जाते हैं मुहब्बत की डगर ईद मुबारक
तू ही मेरा दिल और जिगर ईद मुबारक
चेहरे पे है रौनक़ सभी के आज यहाँ पर
ख़ुश होता है उल्फ़त का नगर ईद मुबारक
हों पूरी मुरादें तेरी हर ख़्वाब मुकम्मल
कर सजदा ख़ुदा का तू सँवर ईद मुबारक
वारे तो हुनर के सभी ये लालो -गुहर हैं
तुम ही मेरे हो शम्सो-क़मर ईद मुबारक
एहसां न कभी भूलें रखें याद सनम को
जब उसने कहा जाने-जिगर ईद मुबारक
रमज़ान ने बख़्शी हैं हमें ईद की ख़ुशियाँ
आबाद रहो रश्के-क़मर ईद मुबारक
पैग़ाम मुहब्बत के मिले और वफ़ा के
तुहफ़े मिले सबको ही जी भर ईद मुबारक
लाना नहीं था उसको मगर ले के आ गया
लाना नहीं था उसको मगर ले के आ गया
मेरे लिए वो लाल-ओ-गुहर ले के आ गया
मेरे लिए ख़ुशी की ख़बर ले के आ गया
उल्फ़त की इक नई सी नज़र ले के आ गया
होशो-हवास में थे मगर चुप थी ये ज़ुबाँ
गुल की जगह वो सुर्ख़ हजर ले के आ गया
दम घुट रहा था तीरगी से दिल भी था उदास
मेरे लिए वो नूरे-सहर ले के आ गया
आज़ाद हसरतों से न हो पाए तब तलक
यकलख़्त मौत की वो ख़बर ले के आ गया
तारों से मांग भरने की ख़्वाहिश थी वो मगर
मेरे लिए तो शम्सो-क़मर ले के आ गया
मुद्दत से मुंतज़िर था जो “मीना” तेरे लिए
वो अपनी ज़िंदगी मेरे घर ले के आ गया
हमेशा चूमें मिट्टी को वतन की आन रखते हैं
हमेशा चूमें मिट्टी को वतन की आन रखते हैं
छिपाकर हम दिलों में अपना हिंदुस्तान रखते हैं
वही गंगो-जमुन तहज़ीब धरती पाक़ है इसकी
पुजारी अम्न के हम हैं यही पहचान रखते हैं
गुज़ारिश है यही रब से कि दम निकले यहीं अपना
क़फ़न ओढ़ें तिरंगे का यही अरमान रखते हैं
चुका सकते नहीं है इस ज़मीं का क़र्ज़ हम यारो
लबों पर हम हमेशा इसका ही जयगान रखते हैं
वतन आज़ाद है आबाद भी जनता यहाँ की भी
कि हम वासी यहाँ के हैं सदा अभिमान रखते हैं
न कोई तोड़ सकता है हमारी देख ताकत को
हिफ़ाज़त करते हम इसकी जिगर चट्टान रखते हैं
बचाते हैं बुरी नज़रों से इसको रोज़ ही मीना
करेंगे नाम भी ऊँचा कि उसकी शान रखते हैं
नहीं चाँदी में रहती है न वो सोने में रहती है
नहीं चाँदी में रहती है न वो सोने में रहती है
वो दिलकश चाँदनी इस क़ल्ब के टुकड़े में रहती है
ये दौलत क्यों सदा ज़रदार के हिस्से में रहती है
ग़रीबी क्यों भला हम जैसों के खाते में रहती है
शराफ़त नाम की भी आजकल ढूँढे नहीं मिलती
यहां तहज़ीब सारी ही फ़क़त शजरे में रहती है
अज़ल से प्यार का दुश्मन रहा है ये ज़माना क्यों
मोहब्बत भी हमेशा इसलिए चर्चे में रहती है
कभी घबरा न तू नाकामियों से ज़ीस्त की अपनी
छुपी ये क़ामयाबी तो इसी मलबे में रहती है
बहकती ये जवानी मुफ़्त में देती है जाँ अपनी
ख़राबी बस यही तो इश्क़ के नश्शे में रहती है
यहाँ दहशत है नफ़रत भी नहीं महफ़ूज़ है मीना
हमारी ज़ीस्त हर पल क्यों यहाँ ख़तरे में रहती है
दिल ये दीवाना नहीं हमको मगर लगता है
दिल ये दीवाना नहीं हमको मगर लगता है
तेरी चाहत में ही गुम शाम-ओ-सहर लगता है
तेरे बिन आज अधूरा ये सफ़र लगता है
भटके फिरते हैं बड़ी दूर ये घर लगता है
ज़ीस्त में जिसने कभी देखी न हो गहराई
उसको दरिया में उतरने से भी डर लगता है
जिनकी चाँदी की हैं दीवारें महल सोने के
हर बुराई में छुपा उनके हुनर लगता है
जिस बुलंदी पे मैं पहुँचा हूँ मेरे मालिक अब
ये तो सब सच की कमाई का असर लगता है
खोया रहता हूँ मैं तेरे ही ख़यालों में सनम
तू मेरी बात से लेकिन बे-ख़बर लगता है
हौसले पस्त बहारों के ख़िज़ांओं में यूँ
शह्र में अब कहाँ कोई भी शजर लगता है
मौत आजाए न पैग़ाम के पहले पहले
मौत आजाए न पैग़ाम के पहले पहले
थाम लो हाथ मेरा शाम के पहले पहले
ज़ुल्म बढ़ता जा रहा है यहाँ मुख़्तारों का
दम निकल जाए न इल्ज़ाम के पहले पहले
धर्म और सत्य की करने को हिफ़ाज़त यारो
राम आए थे मेरे श्याम के पहले पहले
मेरी फ़ितरत में है साक़ी तेरा ये मयखाना
मैं बहक जाता हूँ क्यों जाम के पहले पहले
ये मुहब्बत कहाँ डरती है हुकूमत से कभी
सर क़लम हो भले अंजाम के पहले पहले
उल्फ़तें बन रहीं बाज़ार की ज़ीनत तो फिर
तुम ख़रीदो मुझे नीलाम के पहले पहले
टूट जाऊँ न कहीं सुब्ह के होते होते
लो सँभालो मुझे तुम शाम के पहले-पहले
उसका हक़ सबसे ज़ियादा है तो मीना सुन लो
माँ के सजदे में जा हुक्काम के पहले पहले
वही है रोग वही तो तबीब रहते हैं
वही है रोग वही तो तबीब रहते हैं
हमेशा से ही वो दिल के क़रीब रहते हैं
है ज़लज़ला ही जहाँ तक निगाह है जाती
घरों में भी यहाँ लटके सलीब रहते हैं
नहीं बदलते किसी हाल चाहे सूरत में
हमेशा बिगड़े ही क्यों अपने नसीब रहते हैं
लगाते तुहमतें और तंज़ ही वो बस करते
कि लोग भी यहां कितने अजीब रहते हैं
जिन्हें न ज़र न तो इज़्ज़त न शोहरतें हासिल
जहाँ में ऐसे भी कुछ बदनसीब रहते हैं
उजड़ गई है ये बस्ती हमारी गाँवों की
सुना है शहर में सारे हबीब रहते हैं
सुकूँ कहां है भला अब नसीब में लिक्खा
महल में लोग दिलों से ग़रीब रहते हैं
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
तुम मुझको वफाओं की सज़ा क्यों नहीं देते
नफ़रत की कहानी को मिटा क्यों नहीं देते
अब अम्न की गंगा भी बहा क्यों नहीं देते
मंज़ूर तुम्हें इश्क़ हमारा नहीं है तो
फिर ज़ह्र हमें आप पिला क्यों नहीं देते
ये चाँद न छिप जाए कहीं शर्म से जानम
तुम रुख़ पे ये चिलमन भी गिरा क्यों नहीं देते
शैतान बना इंसा करे ज़ुल्म-ओ -सितम रोज़
इक दीप मुहब्बत का जला क्यूँ नहीं देते
राहत भी मिले तुमको भी कुछ अपने ग़मों से
महफ़िल में ग़ज़ल एक सुना क्यों नहीं देते
इस इश्क़ ने रुसवा किया गर तुमको भी मीना
तस्वीर मेरी दिल से हटा क्यों नहीं देते
दोस्तो मैं एक दिन रंगे वफ़ा हो जाऊँगी
दोस्तो मैं एक दिन रंगे वफ़ा हो जाऊँगी
ख़ुद ब ख़ुद सिमटूंगी अपना दायरा हो जाऊँगी
क़ैद से दुनिया की मैं अब तो रिहा हो जाऊँगी
मौत सिरहाने खड़ी तुमसे ज़ुदा हो जाऊँगी
मुझको तो ख़ुद ही नहीं मालूम अपना रास्ता
कैसे औरों के लिए फिर रहनुमा हो जाऊँगी
ज़ख़्म भी लगने लगे है आजकल मुझको हसीं
देखना हर दर्द की मैं ख़ुद दवा हो जाऊँगी
अब चमक तो आपके चेहरे पे भी आ ही गई।।
देख लेना अब मैँ कोई आईना हो जाऊँगी
हौसले को तोड़ सकता है कहाँ कोई मेरे
एक दिन मैं जगमगाता फ़लसफ़ा हो जाऊँगी
वो अगर चाहें ग़ज़ल कहना तो कह लें शौक़ से
उस ग़ज़ल का ख़ूबसूरत क़फ़िया हो जाऊँगी
हाथ होता है मेरे जब भी सनम का पहलू
हाथ होता है मेरे जब भी सनम का पहलू
फिर तो रहता ही नहीं साथ है ग़म का पहलू
ज़ख़्म सारे हैं मेरे रंज-ओ-अलम का पहलू
अब तो ज़ाहिर है सभी पर ही सितम का पहलू
शोख़ियाँ उनकी उड़ाती हैं हमारी नींदे
चैन लेने न दे ज़ुल्फ़ों के भी ख़म का पहलू
बनके शमशीर कभी तख़्त पलट देती ये
आज़माना न इसे ये है क़लम का पहलू
दे ग़रीबों को निवाले भी कभी हाथों में
मेरे मौला तू कभी देख शिकम का पहलू
फिर तो जीना ही था दुश्वार हमारा हरदम
जो न मिलता ये मुझे रब के करम का पहलू
प्यार शिद्दत से तुम्हें इतना किया है मीना
मेरी आंँखों में नहीं कोई भरम का पहलू
ज़रूरत नींव की होती है दर से, बाम से पहले
ज़रूरत नींव की होती है दर से, बाम से पहले
मुहब्बत रूह करती है सदा, अज्साम से पहले
मुकम्मल हो ये चाहत भी न हो कुहराम भी कोई
ख़ुदा हमको मिले मंज़िल यहाँ अय्याम से पहले
दयारे ग़ैर में हमको सताती याद माज़ी की
तड़पता दिल मेरा कुंज-ए-क़फ़स में शाम से पहले
न काँटो की हुकूमत हो न हो ख़ंजर किसी के हाथ
तमन्ना है नज़ारा हो यही अंजाम से.पहले
तराशा था रुबाई को बहुत लोगों ने पहले भी
न थी उसमें कभी ज़ीनत मगर ख़य्याम से पहले
निकल कर जब चली वह तो उसे माँ ने हिदायत दी
कि वापस लौटना बेटी तू घर पर शाम से पहले
हूँ नस्ले-मीर मैं मुझको सुख़न के हैं अदब मालूम
सदा लूँ नाम ग़ालिब का किसी भी नाम से पहले
धड़कता दिल हमारा है न क़ासिद अब तलक आया
मुहब्बत मिट न जाए ये तेरे पैग़ाम से पहले
मुझे दुश्मन न समझो तुम मैं सच्चा दोस्त हूँ मीना
ज़रा कुछ पूछ तो लेते ख़याले-ख़ाम से पहले
बन तथागत वो रहे खोए चमत्कारों में
बन तथागत वो रहे खोए चमत्कारों में
गिनती करवाने लगे अपनी भी अवतारों में
अब हक़ीक़त से यहाँ दूर हैं ख़बरें होतीं
झूठ ही झूठ भरा रहता है अख़बारों में
हाँ में हाँ बस ये मिलाने के लिए होते हैं
चापलूसी है फ़क़त आज तो दरबारों में
बदला है दौर भी बदला ये ज़माना सारा
अब न कोई भी चुना जाएगा दीवारों में
अब भी कुछ करने का जज़्बा रहे दिल में इनके
बाक़ी सच्चाई है अब सिर्फ़ क़लमकारों में
झूठे इल्ज़ाम लगाकर यूँ हज़ारों हम पे
हमको शामिल किया जाता है गुनहगारों में
मुझको इस इश्क़ ने छोड़ा न कहीं का मीना
नाम मेरा भी है शामिल यहाँ बीमारों में
इश्क़ में जब से वो कबीर हुए
इश्क़ में जब से वो कबीर हुए
उनकी चाहत में हम सग़ीर हुए
कोई तुम सा नहीं है जाने जाँ
इश्क़ में तुम तो यूँ नज़ीर हुए
उठ के ताज़ीम अब वो करते हैं
जिनकी नज़रों में हम हक़ीर हुए
तिश्नगी मेरी बुझ न पाई कभी
चाहे कितने ही आब गीर हुए
आज से दिल तुम्हे ये सौंप दिया
इस रियासत के तुम वज़ीर हुए
बनके राँझा फ़िदा थे वो हम पर
और हम भी उन्हीं की हीर हुए
तय किया इश्क़ का सफ़र मीना
तब कहीं जा के हम मुशीर हुए
हर इक मक़ाम ज़िंदगी का ग़मज़दा मिला
हर इक मक़ाम ज़िंदगी का ग़मज़दा मिला
हमको हर एक मोड़ पे इक मसअला मिला
नालायकों को जब किया बे-दख़्ल घर से तो
अपना ही ख़ून ख़ब्त में फिर चीख़ता मिला
बूढ़े शजर को छोड़ के सब लोग चल दिए
उसको वफ़ा का अपनी ये कैसा सिला मिला
नूरे-सहर कभी न ही शामे अवध मिली
जब जागे नींद से हमें सब कुछ लुटा मिला
बस दिल जला के मेरा तो महबूब चल दिए
मेरी हथेलियों को न रंग -ए-हिना मिला
ख़्वाहिश बहुत थी एक ग़ज़ल कहते अब यहाँ
लेकिन हमें न उम्दा कोई क़ाफ़िया मिला
ग़ुरबत में कोई आके कहाँ पूछता है अब
जलता दिया वफ़ा का भी हमको बुझा मिला
मुश्किल है मुस्तफ़ा मिले मीना को अब यहाँ
खोजा तमाम पर न कोई नक़्श -ए-पा मिला
दिल के कारण यार फिसल जाती हूँ मैं
दिल के कारण यार फिसल जाती हूँ मैं
जब भी देखूँ चाँद मचल जाती हूँ मैं
माँ का है आशीष सँभल जाती हूँ मैं
हर मुश्किल से साफ निकल जाती हूँ मैं
देख बग़ावत अकसर शौहर बच्चों की
घर से बाहर रोज़ निकल जाती हूँ मैं
ढ़ाई आख़र प्रेम पढ़ा बस जीवन में
आग दिलों में देख सँभल जाती हूँ मैं
सूखे दरिया सा है ये जीवन मेरा
तेरी ख़ातिर रोज़ पिघल जाती हूँ मैं
आज किसी की मौत हुई कोरोना से
सुन के ऐसी बात दहल जाती हूँ मैं
साथ हमेशा देती सबका मैं यारो
और मुसीबत में न बदल जाती हूँ मैं
राहत मिलती गा के ग़ज़लों को मीना
अपनी ग़ज़लों में बस ढ़ल जाती हूँ मैं
हमको तमाम जाविये से आज़मा चुके
हमको तमाम जाविये से आज़मा चुके
हासिल हुआ न कुछ वो सितम करके जा चुके
पत्थर का दिल था उनका पसीजा नहीं कभी
रस्मे-वफ़ा तो बारहा हम हैं निभा चुके
तेग़े-जफ़ा चलाया था दिलबर ने मेरे जब
राहे वफ़ा में हँस के ये सिर भी कटा चुके
मुश्किल थी राह साथ कोई क़ाफ़िला न था
तन्हा सफ़र में दूर तलक हम हैं आ चुके
टूटा जो दिल हमारा हुए अश्क बार हम
करते भी क्या गिरफ़्ते-वफ़ा में थे आ चुके
हर वक़्त इश्क़ में चली है हुस्न की यहां
दिल चीज़ क्या है जान भी आशिक़ लुटा चुके
हरकत से बाज आया न मीना कभी अदू
उसको तो बारहा गले से हम लगा चुके
उजाला तुमसे था वो रौशनी तुम्हारी थी
उजाला तुमसे था वो रौशनी तुम्हारी थी
वो चांद तुम थे हसीं चांदनी तुम्हारी थी
हर एक शय थी मयस्सर हमें ज़माने की
जहां में सब था मगर इक कमी तुम्हारी थी
हज़ारों ग़म दिए हैं तोहफ़े में हमें तुमने
हमारी हर ख़ुशी फिर भी रही तुम्हारी थी
नसीब से ही मिले दह्र में किसी को कुछ
है नाज़ मुझसे हुई दोस्ती तुम्हारी थी
अभी भी जज़्बा मुहब्बत का दिल में बाकी है
हुनर जो मुझ में है जादूगरी तुम्हारी थी
बुझा सका न ये दरिया भी प्यास को मेरी
लबों पे मेरे फ़क़त तश्नगी तुम्हारी थी
ख़रीदने में लगी थी ग़मों को क्यों मीना
ख़ुशी से क्या पता क्यों ठन गयी तुम्हारी थी
हुस्न के रुख़ से फ़क़त पर्दा हटाने भर से
हुस्न के रुख़ से फ़क़त पर्दा हटाने भर से
जी उठे फिर से तेरी दीद को पाने भर से
मंज़िलें तुमको मिलेगी न बताने भर से
ख़्वाब होंगे न मुकम्मल ये सजाने भर से
हाथ भी आगे किया साथ चले भी लेकिन
क्या मिला ऐसा हमें प्यार जताने भर से
प्यार से हँस के मिलो कुछ तो ग़रीबों से ज़रा
कुछ नहीं होता ख़ज़ाने यूँ लुटाने भर से
लोग चूमेंगे क़दम, दिल में बसा भी लेंगे
जो अलग कुछ भी करे कोई ज़माने भर से
अब तो पूछेंगे सवाल उनसे हज़ारों सब ही
वो परेशां हैं मेरे बज़्म में आने भर से
इश्क़ करते हैं फ़क़त आप से मीना हम तो
पूछ ले चाहे कोई जा के ज़माने भर से
सबको उसने यहाँ औक़ात बता दी मेरी
सबको उसने यहाँ औक़ात बता दी मेरी
क्या है औक़ात हरिक बात बता दी मेरी
जो मिली मैंने वो सौग़ात बता दी मेरी
इश्क़ की तुमसे शुरूआत बता दी मेरी
रंग देखें हैं बहुत हमने तो इस दुनिया के
सबने आँखों की ये बरसात बता दी मेरी
इस मुहब्बत का बना आज फ़साना फिर से
दिलरुबा तूने मुलाकात बता दी मेरी
सारी इज़्ज़त को किया ख़ाक है पल में उसने
सबको ही सच्ची अलामात बता दी मेरी
प्यार में तेरे हुआ यार न हासिल कुछ भी
और ज़माने ने हुई मात बता दी मेरी
हर बशर पल में हुआ मेरा दीवाना मीना
मेरी ग़ज़लों ने करामात बता दी मेरी
मयख़ारों के दिल उनके हवाले न रहेंगे
मयख़ारों के दिल उनके हवाले न रहेंगे
मयख़ाने में गर मय के पियाले न रहेंगे
बेचेंगे हुनर अपना वो,मजबूर से होकर
जब खाने को घर में ही निवाले न रहेंगे
ज़ंजीर ग़ुलामी की ये टूटेगी किसी दिन
होठों पे रियाया के यूं ताले न रहेंगे
ढल जाएगी जब मस्त जवानी तेरी नादां
तब देखना ये चाहने वाले न रहेंगे
जब होगी ज़मीं अम्न की ख़ुशबू से मुअत्तर
आहें न रहेंगी कहीं नाले न रहेंगे
जन्नत सा नज़र आएगा दुनिया का नज़ारा
लोगों के कहीं क़ल्ब जो काले न रहेंगे
महफ़िल से ही मुंँह मोड़ चले जाएंगे सब लोग
मीना जो सुख़नवर ही निराले न रहेंगे
रोशनी दिल जलाती रही रात भर
रोशनी दिल जलाती रही रात भर
याद उनकी जगाती रही रात भर
हुस्न की हर अदा ने तो ढाये सितम
दिल्लगी भी रुलाती रही रात भर
ज़िं दगी को हमेशा मिली ठोकरें
फिर भी वो मुस्कराती रही रात भर
इस क़फ़स में भला चैन मिलता कहाँ
पंछी सी फड़फड़ाती रही रात भर
रोग ऐसा लगा दिल तडपता रहा
बेकली ही सताती रही रात भर
रूह बेचैन थी इक झलक के लिये
मौत हमको बुलाती रही रात भर
रू-ब-रू आज मीना हुई शायरी
आँख उससे लड़ाती रही रात भर
कैसा था लाजवाब सा चेहरा
कैसा था लाजवाब सा चेहरा
पढ़ लो तुम बस किताब सा चेहरा
देख लाखों हुए थे घायल भी
उनका वो आफ़ताब सा चेहरा
धरती पर चाँद जैसे उतरा हो
ऐसा था माहताब सा चेहरा
मयकशी का सा था नशा उसमें
सर चढ़ा था शराब सा चेहरा
एक ख़ुशबू फ़िज़ा में थी फैली
यार गुल था गुलाब सा चेहरा
मिलता था हर सवाल का उत्तर
ऐसा था वो जवाब सा चेहरा
क्या था उसमें कमाल था मीना
ख़ूबसूरत ख़िताब सा चेहरा
कहाँ ये वक़्त हम पे मेहरबाँ था
कहाँ ये वक़्त हम पे मेहरबाँ था
ग़मों का हर तरफ फैला धुआँ था
हमेशा इश्क़ में तो इम्तिहाँ था
सितम लाखों सहे पर बेज़ुबाँ था
पड़े थे इश्क़ में हम भी किसी के
कभी सीने में दिल अपने जवाँ था
सुकूँ था और ख़ुशियाँ भी थी दिल में
कभी जब गाँव में मेरा मकाँ था
लुटाता जान था मैं तो तुम्हीं पर
यकीं लेकिन सनम तुझको कहाँ था
सर -ए -बाज़ार ही रुसवा करे वो
हमें जिस लाल पे अपने गुमाँ था
मुक़म्मल था इरादों का जहाँ वो
किसी के दिल में अपना आशियाँ था
मुहब्बत दिलों में बसाए हुए हैं
मुहब्बत दिलों में बसाए हुए हैं
ग़मों को वो अपने छिपाए हुए हैं
चलाते छुरी पीठ पर जो सदा ही
उन्हीं से तो यारी निभाए हुए हैं
बिना बात ही जो बनाते फ़साना
उन्हीं पर तो हम दिल लुटाए हुए हैं
जिन्होंने न समझा हमारी वफ़ा को
उन्हीं से तो आँखें मिलाए हुए हैं
बुझायेगी क्या आँधियाँ अब इसे तो
दिया आस का हम जलाए हुए हैं
हँसी है लवों पर जिगर में हैं आहें
कि काँटों मे हम गुल खिलाए हुए हैं
जिन्हे आस्तीनों में पाला था मीना
वही साँप फ़न को उठाए हुए हैं
बात दिल की नहीं कहे मुझसे
बात दिल की नहीं कहे मुझसे
राज़ कितने छिपा रखे मुझसे
देख कर क्यों नज़र झुके तेरी
मत छिपा सच तू आइने मुझसे
करता परवाह मैं नहीं अब तो
कोई कितना भी अब लड़े मुझसे
हर समय चाहता खुशी तेरी
दिल ये तेरा नहीं दुखे मुझसे
अपनी मेहनत से है कमाया सब
फिर बता क्यों ये जग जले मुझसे
थामा शर्मोहया का है दामन
देखा जब तब वो छिप गये मुझसे
टूट कर प्यार मैं तो करता हूँ
हुस्न जब भी कहीं मिले मुझसे
देख गिर्दाव में फँसे मीना
अब सफीना न ये बचे मुझसे
महफ़िलों में रोज़ जाना चाहिए
महफ़िलों में रोज़ जाना चाहिए
अब ग़ज़ल सुनना सुनाना चाहिए
बेटियों को और पढ़ाना चाहिए
हौसले उनके बढ़ाना चाहिए
उनको अब जलवा दिखाना चाहिए
रुख से ये पर्दा हटाना चाहिए
चाँद को घर पर बुलाना चाहिए
प्यार का मंज़र बनाना चाहिए
ज़िंदगी को घर बदलना है नया
मौत आने का बहाना चाहिए
नाम जिसमें हो मिलावट का नहीं
वो पुराना ही ज़माना चाहिए
मुद्दतों से दर -बदर है दिल मेरा
अब तेरे दिल में ठिकाना चाहिए
उम्र कोई हो तकाजा है यही
दिल मुहब्बत में लगाना चाहिए
हमको ये लालो गुहर कुछ भी नहीं
प्यार का ही बस ख़ज़ाना चाहिए
अम्न के गुल रोज़ बगिया में खिला
ये ज़मीं जन्नत बनाना चाहिए
कोई पोछेंगा नहीं आकर कभी
अश्कों को मीना छिपाना चाहिए
आरज़ जुस्तजू बंदगी ले गया
आरज़ जुस्तजू बंदगी ले गया
मेरी सारी वो दरियादिली ले गया
जो कही भी न थी अनकही ले गया
वो रवानी ग़ज़ल की सभी ले गया
उम्र भर की मुझे तीरगी बख़्श कर ।
मेरी आंखों की वो रोशनी ले गया
ले गया आशिकों की गली वह मुझे
वो ग़लत ले गया या सही ले गया
मुझसे करके दग़ा और कपट देख लो
वो बुढ़ापे की मेरी छड़ी ले गया
मुझको किस्से कहानी सुना प्यार की
मेरी नेकी बदी जो भी थी ले गया
लूटता ही रहा दोस्त बनकर मुझे
दौलतें ग़म की देकर ख़ुशी ले गया
बज़्म की जान थी जो मेरी शायरी
छीन कर वो ग़ज़ल भी मेरी ले गया
बेसबब सर झुकाना नही है
बेसबब सर झुकाना नही है
नाज़ तेरे उठाना नहीं है
इश्क़ दिल में मेरे आपका बस
और कोई खज़ाना नहीं है
क्या गया क्या मिला ज़िंदगी में
जोड़ना और घटाना नहीं है
मिन्नतें कर ले तू लाख लेकिन
लौट के उसको आना नहीं है
बात कल पे न टालो कोई भी
कल का कोई ठिकाना नहीं है
संग दिल से हमें इश्क़ करके
दिल को अपने जलाना नहीं है
लफ़्जों में दर्द कैसे बयाँ हो
अपना दिल शायराना नहीं है
पत्थरों के नगर में हमें दिल
शीशे का आज़माना नहीं है
ज़ख़्म मीना मिले हैं हज़ारों
पर ग़ज़ल में जताना नहीं है
तुम कभी यार न उल्फ़त में अदावत करना
तुम कभी यार न उल्फ़त में अदावत करना
जितना मुमकिन हो ज़माने में मुहब्बत करना
वक़्त कैसा भी हो बच्चों की हिफ़ाज़त करना
झाँकना दिल में सदा आप अयादत करना
लाख शिकवे हों भले दिल में किसी के लेकिन
फिर भी मुश्किल है बहुत अपनों से नफ़रत करना
भटके दर-दर हुए मोहताज़ निवालों को वो
मँहगा उनको पड़ा मालिक से बग़ावत करना
वो फ़रिश्ते हैं ज़मी पर करो इज़्ज़त उनकी
अपने वालिद से कभी तुम न बग़ावत करना
बंदगी ख़्वाब दिखाती है मुझे जन्नत के
रंग लाया है ख़ुदा की ये इबादत करना
पाक रखना ये मुहब्बत यूं सदा तुम मीना
जीना इज़्ज़त से यहां और रफ़ाक़त करना
मिली जब से मुहब्बत हम सफ़र की बात करते हैं
मिली जब से मुहब्बत हम सफ़र की बात करते हैं
हुईं पूरी मुरादें , रहगुजर की बात करते हैं
बड़े नादान है अब पूछते दिल में हमारे क्या
ये दिल हम हार बैठे अब जिगर की बात करते हैं
सफीना आज मेरा जब फँसा है इस भँवर में तो
करें हम याद रब को और लहर की बात करते हैं
अकेला छोड के मुझको चला फिर कारवाँ ये तो
सितारे हैं खफ़ा यारा सहर की बात करते हैं
जलायी है बहुत ही मोमबत्ती याद में हम तो
जलाने को घिनौने अब बशर की बात करते हैं
लगी कैसी हवा इस गाँव को तो आज देखो तुम
बडे बूढे भी सुन अब तो नगर की बात करते हैं
कफ़स में काट डाला था जिन्हे सैय्याद ज़ालिम ने
नये जो आ गये पंछी के पर की बात करते हैं
मिला है मुद्दतों के बाद देखो वक्त ये मीना
चलो सब कुछ भुलाके आज घर की बात करते हैं
एक दिन मुझसे मिली जब ज़िन्दगी कहने लगी
एक दिन मुझसे मिली जब ज़िन्दगी कहने लगी
हो गए क्यों आप मुझसे अजनबी कहने लगी
दौरे हाज़िर में कोई घर से निकलता ही नहीं
अब गुज़र कैसे करें ये रहबरी कहने लगी
अब पराया हो चुका देखो तो ये साया मेरा
पर सलामत तुम रहो ये बेख़ुदी कहने लगी
दोस्तों के रूप में दुश्मन हज़ारों हैं खडे़
अब करें किस पर भरोसा सादगी कहने लगी
ख़ूब की हमने इबादत और गए दैर -ओ -हरम
पर ख़ुदा मिलता नहीं ये बंदगी कहने लगी
जुल्फ़ उनकी है घटा और लब भी पैमाने बने
मत फ़िदा रुख़सार पे हो मयकशी कहने लगी
छोड़िए आवारगी अब अपने घर की सोचिए
हो गयी बेटी सयानी मुफ़लिसी कहने लगी
नेकियाँ मिलती नहीं है और बदी बढ़ती बहुत
शर्म आँखों में नहीं ये बेरुख़ी कहने लगी
वक़्ते – रुख़सत जो नमी देखी है तेरी आँखों में
रूह भी तड़पी बहुत और ज़ीस्त भी कहने लगी
पाँव में ज़ंजीर ख़ुद नारी ने पहनी प्रेम की
त्याग को पर उसके दुनिया बुज़दिली कहने लगी
जब रदीफ़ो -काफ़िया भी ख़ूबसूरत है मिला
अब ग़ज़ल मीना कहेगी शाइरी कहने लगी
ज़ीस्त में हासिल नहीं है यूं तो आसानी मुझे
ज़ीस्त में हासिल नहीं है यूं तो आसानी मुझे
पर झुका सकते नहीं तख़्ते सुलेमानी मुझे
वो रहें ख़ामोश तो होती परेशानी मुझे
छोटे बच्चों की बहुत भाती है शैतानी मुझे
लुत्फ़ लेती हूँ फ़क़ीरी का नहीं शिकवा कोई
अच्छी लगती देश की मिट्टी ये मुल्तानी मुझे
कह रहा सागर बड़ा मायूस होकर के सुनो
नित डुबाकर रेत का घर है पशेमानी मुझे
रौशनी, ख़ुशबू न मुझमें कोई ऐसी बात है।
लोग नाहक कह रहे हैं रात की रानी मुझे।
मय-कशी का शौक़ ले आया मुझे देखो कहाँ
ले के जाएगी कहां अब मेरी नादानी मुझे
बाद मुद्दत के ग़ज़ल मीना ने कह डाली मगर
अपनी लगती ही नहीं लगती है बेगानी मुझे
दिलबर न यूँ शरमाइए अब देर न कीजे
दिलबर न यूँ शरमाइए अब देर न कीजे
बाहों में चले आइए अब देर न कीजे
मुफ़लिस पे तरस खाइए अब देर न कीजे
कुछ प्यार भी जतलाइए अब देर न कीजे
सरकार अदावत भुला के हमसे पुरानी
सब मसअले सुलझाइए अब देर न कीजे
महफ़िल में तेरी शायरी से रौनक़ें हैं बस
दिल ग़ज़लों से बहलाइए अब देर न कीजे
बेताब हवाएं भी तेरी रह में खड़ी हैं
दामन को तो लहराइए अब देर न कीजे
मिल जाए ज़रा चैन मेरे क़ल्ब जिगर को
आँखों से पिला जाइए अब देर न कीजे
होते हैं परेशान सताने से भला क्यों
थोड़ा सा तो मुस्काइए अब देर न कीजे
है चूर जवानी नशे में आज जो मीना
कुछ इसको भी समझाइए अब देर न कीजे
चोट जो दिल पे है
तुम न इसको भी कोई नक़्श-ए- मुहब्बत समझो
चोट जो दिल पे है वो रंगे-कुदूरत समझो
मेरे अशआर बयाँ करते हक़ीक़त समझो
जो कहा उसको नहीं कोई शिकायत समझो
वो हमें राह दिखाते हैं हरिक मुश्किल में
सर पे साया हो बुज़ुर्गों का तो क़िस्मत समझो
अब रखो सोच के ही कूचा-ए-क़ातिल में क़दम
चलती है चाल अजब रंग-ए-सियासत समझो
सबकी तक़दीर का सबको ही मिलेगा लेकिन
जो ख़ुदा से मिले तुम उसको इनायत समझो
हर क़दम राह-ए-मुहब्बत में हवस मिलती है
मशविरा है के इशारों को न उल्फ़त समझो
वो ख़फ़ा होगा अगर नूर की किल्लत होगी
चाँद की रौशनी को उसकी इनायत समझो
वो है मंदिर वही मस्ज़िद वही गिरिजा घर भी
माँ के क़दमों मे ही होती है ये जन्नत समझो
जाने मीना है ये आग़ाज़ भी अंजाम यही
है मुहब्बत ही ख़ुदा इसकी भी क़ीमत समझो
कितना मुश्किल है
कितना मुश्किल है कभी ग़म का फ़साना कहना
अश्क बहते हों मगर उनको भी झूठा कहना
याद आता है मुझे अब भी वो गुज़रा बचपन
मीठे लफ़्ज़ों से मुझे माँ का वो लाला कहना
मार डालेगी ये तारीफ़ें भी झूठी उनकी
घर की रौनक़ तो कभी चाँद सितारा कहना
ख़ूब वाक़िफ़ हूँ मैं भी प्यार मुहब्बत से अब
इतनी मिलती है जफ़ाएँ न कि अपना कहना
इस तरफ़ हम थे उधर था ये ज़माना ज़ालिम
भूलना मत कभी यह प्यार क़ा क़िस्सा कहना
बोझ रिश्तों का लिए सर पे फिरा करते हैं
मर चुके हम हैं कभी के नहीं ज़िंदा कहना
लिक्खे मीना ने भी अश्कों से तुम्हारी ख़ातिर
इसके हर शेर को अब ज़ीस्त का हिस्सा कहना
कोई गदर के बाद
यहाँ बचा ही नहीं जब कोई गदर के बाद
मिलेगी कैसे ख़ुशी फिर हमें सहर के बाद
न मिल सका कहीं साहिल हमें भँवर के बाद
ख़ुशी मिली ही नहीं तेरे इस नगर के बाद
ख़बर मिली जो सरे बज़्म तेरे आने की
ग़ज़ल ही भूल गए हम तो इस ख़बर के बाद
जहाँ उरूज है यारो वहाँ ज़वाल भी है
कहाँ रुकेगें भला आप इस शिखर के बाद
जो निकले मेरा जनाज़ा तो ग़म नहीं करना
मिलेगी अच्छी ख़बर तुमको इस ख़बर के बाद
न ऐसे काटिए घर के शजर को ऐ लोगो
मिलेगी छाँव कहाँ तुमको इस शजर के बाद
न ऐसे अश्क बहा मीना उनकी फुर्क़त में
वो मर न जाएँ कहीं तेरी चश्मे तर के बाद
जब गया ज़ालिम तो अपनी हर निशानी ले गया
जब गया ज़ालिम तो अपनी हर निशानी ले गया
थम गई ये ज़िन्दगी सारी रवानी ले गया
रुख़सती की इस घड़ी में हूँ अकेला मैं यहाँ
पाक रिश्तों की मगर सारी कहानी ले गया
इख़्तिलाफ़ी का सबक़ देखो मिला कैसा हमें
कुछ लिखे ख़त साथ में वादे ज़ुबानी ले गया
चोट पर एक चोट हमको रोज़ ही मिलती रही
ज़ख़्म देके उम्र भर की शादमानी ले गया
सिरफिरा था वो बड़ा फ़नकार शब्दों का बहुत
गीत ग़ज़लों को सुना शामें सुहानी ले गया
थी क़सम खायी रुलाने की हमें उस शख़्स ने
दाग़ दामन में लगा उल्फ़त पुरानी ले गया
एक पल में आज सहरा हो गया दिल का चमन
मेरे होठों की हँसी आँखों का पानी ले गया
शान शौक़त ये हमारी सब उसी के दम पे थी
हौसलों के साथ रूह-ए- ज़िंदगानी ले गया
कौन जानेगा मुझे अब शायरों की भीड़ में
देके ख़ामोशी मेरी वो तर्ज़-ए-बयानी ले गया
शब-ए-फिराक़ भी देखो सहर में रहती है
शब-ए-फिराक़ भी देखो सहर में रहती है
तजल्ली-ए-रुख़े-जानाँ क़मर में रहती है
बहार आए तो वह रहगुज़र में रहती है
तमाम शाख़ पे हर इक शजर में रहती है
मआनी हमसे न पूछे कोई मुहब्बत के
ये आग वो है जो इस दिल जिगर में रहती है
कहाँ दीवाना हुआ है जहां ये बेमतलब
ज़रूर बात कोई हर हुनर में रहती है
बहुत हैं शिकवे गिले और उदास बैठे हम
चराग़े दिल भी बुझे ज़ीस्त डर में रहती है
हमें थी जुस्तजू जिसकी वो एक मुद्दत से
ख़बर मिली की हमारी नज़र में रहती है
हमारे दरमियाँ है वो नहीं मगर मीना
हमारी हर खुशी उसके असर में रहती है
निकला ज़नाज़ा सजके जो यूँ तेरी लाश का
निकला ज़नाज़ा सजके जो यूँ तेरी लाश का
बिखरा ये दिल भी ऐसे मकाँ जैसे ताश का
जज़्बात क़त्ल हो गए अरमाँ बिखर गए
अब सिलसिला कोई नहीं यादों के पाश का
कर दे कोई कमाल तू आ कर ख़ुदा मेरे
होता नहीं है ख़त्म ये रस्ता तलाश का
हर सिम्त रौनकें हैं फ़ज़ाएँ भी ख़ुशगवार
जब से खिला है फूल ये दिल में पलाश का
मक़बूल हो गया तेरी मूरत तराश कर
पूरा हुआ ये ख़्वाब भी मुझ बुत तराश का
साँसे रुकी हैं प्यार के दो बोल सुन सकें
मुद्दत से इंतज़ार है उस लफ़्ज़े काश का
मीना बढ़े हैं पाप ज़मीं पर कुछ इस क़दर
अब आ गया हो जैसे के मौसम विनाश का
बड़ा दिलकश मैं मंजर देखती हूँ
बड़ा दिलकश मैं मंजर देखती हूँ
तेरी आँखों में सागर देखती हूँ
हुई मा’दूम है इंसानियत अब
हर इक इंसान पत्थर देखती हूँ
पता वुसअत न गहराई है जिसकी
वो सहरा दिल के अंदर देखती हूँ
हुनर ज़िंदा रहेगा है ये तस्कीं
मैं हर बच्चे में आज़र देखती हूँ
न ग़ालिब और कोई मीर जैसा
यहाँ जब-जब सुख़नवर देखती हूँ
तेरी तस्कीन की ख़ातिर मैं हमदम
तेरे शे’रों में ढलकर देखती हूँ
मिली रहमत ख़ुदा की है बना वो
मुकद्दर का सिकंदर देखती हूँ
नहीं चाहूँ मैं हीरे और जवाहर
हसीं बस तुमसा दिलबर देखती हूँ
झुका दे तू फ़लक को भी ज़मी पर
मैं तुझ में इक मुज़फ़्फ़र देखती हूँ
हर इक पत्थर को मीना सर झुकाऊं
मैं हर पत्थर में शंकर देखती हूं
हुआ इश्क़ में हूँ गिरफ़्तार,पढ़ना
हुआ इश्क़ में हूँ गिरफ़्तार,पढ़ना
उठाकर सवेरे का अख़बार पढ़ना
क़लमकार पढ़ना न फ़नकार पढ़ना
अगर नाम आए तो ख़ुद्दार पढ़ना
भले ही किताबें न पढ़ना, सनम तुम
मगर आके तुम हाल-ए-बीमार पढ़ना।
वो इक़रार करतीं सदा इश्क़ का ही
कभी मेरी आँखों को सरकार पढ़ना
दुआएँ हमेशा हमें उनसे मिलतीं
बड़ों की सज़ा में भी तुम प्यार पढ़ना
वफ़ा से नहीं वास्ता जब ये रखती
तो फिर क्या मोहब्बत का मेयार पढ़ना
मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत मिलेगी
कभी ख़ूबसूरत ये रुख़सार पढ़ना
ख़ुदा ही मेरा सच इबादत उसी की
नहीं और का मैं तरफ़दार पढ़ना
हमने अब स़ख़्त जान कर ली है
हमने अब स़ख़्त जान कर ली है
दूरी अब दरमियान कर ली है
मिट गयी आन बान है सारी
खतरे में और जान कर ली है
करने दीदार हमने हूरों का
आस्माँ पे दुकान कर ली है
इस परिंदे ने माँ से मिलने को
आज लंबी उड़ान कर ली है
रोज़ कह -कह के यूँ ग़ज़ल ऐसे
कैसी हमदम थकान कर ली है
उम्र सोलह को पार करके अब
ज़िंदगी ये जवान कर ली है
उम्र जब से ढ़लान पर आयी
बंद अपपनी ज़ुबान कर ली है
काफ़िया थे ग़ज़ल के कम लेकिन
कहने में खींचतान कर ली है
पढते गीता कुरान हम मीना
याद सारी अज़ान कर ली है
जंग तो रोज़ देख जारी है
जंग तो रोज़ देख जारी है
ज़िन्दगी मौत से ये हारी है
मुझको डर है नहीं किसी का अब
माँ ने मेरी नज़र उतारी है
द्रोपदी दाँव पर लगी फिर से
खेलते खेल फिर जुआरी है
और कैसे उधार दूँ तुमको
पहले की बाकी तो उधारी है
चाहे राजा हो या धनी कोई
सामने रब के वो भिखारी है
तिरछी नज़रों से जब निहारें वो
चलती तब यार दिल पे आरी है
उम्दा है काफ़िया सुनो मीना
जां से हमको ग़ज़ल ये प्यारी है
तुम्हारी हर अदा ने मार डाला।
तुम्हारी हर अदा ने मार डाला।
सितम है, दिलरुबा ने मार डाला
हमें चाहत थी,जीने की अगरचे
मगर ज़ालिम क़ज़ा ने मार डाला
निभायी है वफ़ा शिद्दत से हमने
मगर हमको दग़ा ने मार डाला
मयस्सर कैसे हों हमको उजाले
अँधेरो की सदा ने मार डाला
नवाज़ा था मुहब्बत से ख़ुदा ने
मगर तेरी जफ़ा ने मार डाला
हमारी मौत पर रोते हैं वो ही
हमें जिनकी दुआ ने मार डाला
उठाया रुख़ से जो पर्दा तो मीना
हमें उनकी हया ने मार डाला
बातों बातों में मुझको छलता है
बातों बातों में मुझको छलता है
साँप सा जह्र वो उगलता है
फ़ैसलें पल में हैं पलट जाते
जब भी सिक्का कोई उछलता है
मैं अकेली कहीं न रह जाऊँ
साथ मेरे वो रोज़ चलता है
रोज़ ठगता है चाँद ये मुझको
रात ढलती है तब ये ढलता है
जब भी जलता है रात में दीपक
ख़्वाब आँखों में इसकी पलता है
जब भी देखूँ कहीं हसीं चेहरा
हाथ से दिल मेरा फिसलता है
कोशिशें की तमाम, पर मीना
दिल हमारा कहाँ बहलता है
बातों बातों में मुझको छलता है
बातों बातों में मुझको छलता है
साँप सा जह्र वो उगलता है
फ़ैसलें पल में हैं पलट जाते
जब भी सिक्का कोई उछलता है
मैं अकेली कहीं न रह जाऊँ
साथ मेरे वो रोज़ चलता है
रोज़ ठगता है चाँद ये मुझको
रात ढलती है तब ये ढलता है
जब भी जलता है रात में दीपक
ख़्वाब आँखों में इसकी पलता है
जब भी देखूँ कहीं हसीं चेहरा
हाथ से दिल मेरा फिसलता है
कोशिशें की तमाम, पर मीना
दिल हमारा कहाँ बहलता है
आपका इंतज़ार कौन करे
आपका इंतज़ार कौन करे
आशिक़ों में शुमार कौन करे
क़र्ज़ पहले का तो दिया ही नहीं
बारहा फिर उधार कौन करे
नाव तूफाँ में ख़ुद ले जाते हैं
अब उन्हें होशियार कौन करे
देता है बार -बार ये धोखा
दिल पे अब एतिबार कौन करे
रूठ जाते हैं बातों बातों में
आप पर जाँ निसार कौन करे
धोखा देते हैं रोज़ अपने जो
ऐसे अपनों से प्यार कौन करे
बेवफ़ा का ख़िताब देके उन्हें
प्यार को दाग़दार कौन करे
गहरी आँखों में तेरी डूबा हूँ
तैर कर इनको पार कौन करे
हिज्र की रात है परेशाँ हूँ
चाँद से आँखें चार कौन करे
रोज़ कहकर ग़ज़ल नयी मीना
नैनों को अश्क बार कौन करे
ज़माने की तू बदगुमानी बदल दे
ज़माने की तू बदगुमानी बदल दे
है इन्साँ तो ग़म की निशानी बदल दे
फ़ना जो करें कोख़ में बेटियों को
बुरी सोच इनकी पुरानी बदल दे
छुपानी पड़े जो ज़माने से हमको
वफ़ा की सभी वो निशानी बदल दे
जुदाई मुहब्बत का अंजाम है गर
तो रब मेरे ऐसी कहानी बदल दे
लिखी है ग़रीबी मुक़द्दर में ग़र तो
पसीना बहा सब मआनी बदल दे
बदलता रहा है सदा वक़्त का रुख़
बुरे वक़्त की रुत सुहानी बदल दे
ग़रीबों पे ढाती सदा ज़ुल्म देखो
कि सरकार तू ये सयानी बदल दे
हुये ज़ुल्म लाखों थीं चुपचाप फिर भी
गुलामी की नारी कहानी बदल दे
कभी अश्क देता कभी मुस्कराहट
यूँ मीना की रब शादमानी बदल दे
दर पे तेरे सर झुकाना चाहता हूँ
दर पे तेरे सर झुकाना चाहता हूँ
मैं ख़ुुदा तुझको बनाना चाहता हूँ
दाग़ दामन के मिटाना चाहता हूँ
मैं ख़ता अपनी छिपाना चाहता हूँ
रस्मे उल्फ़त भी निभानी है मुझे अब
दिल से तेरे दिल मिलाना चाहता हूँ
ज़िंदगी तूने हमेशा ही रुलाया
अब मगर हँसना-हँसाना चाहता हूँ
तोड़ कर दीवारें सारी अब क़फ़स की
पंख अपने फड़फड़ाना चाहता हूँ
ख़ुल्क़-आमेज़ी रहे ता-उम्र ऐसा
इक ख़ुशी का घर बसाना चाहता हूँ
अब तलक सूखे पड़े जो डायरी में
उन गुलों को फिर खिलाना चाहता हूँ
मसअले सब प्यार से सुलझा के मीना
दिल से नफ़रत को मिटाना चाहता हूँ
दिल मे जब से तेरा बसर देखा
दिल मे जब से तेरा बसर देखा
पीछे मुड के न इक नज़र देखा
लाख इंसा निगाह से गुज़रे
हमने तुझसा कहाँ बशर देखा
रोशनी से भरी मेरी दुनिया
कोई तुम सा नहीं क़मर देखा
प्यार कर ढूढ़ता फिरे ख़ुद को
आदमी यूँ न बेख़बर देखा
रब का कोई पता नहीं मिलता
हमने उसको किधर किधर देखा
छोड दी दौलतें ज़माने की
आपने जब से इक नज़र देखा
नफ़रतों के जहां मे इंसा को
ख़ून से हमने तरबतर देखा
ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही मीना
इश्क़ मे कैसा ये हुनर देखा
दिल-जिगर प्यार में खो गए।
दिल-जिगर प्यार में खो गए।
हम सनम आपके हो गए।
काम पूरे सभी हो गए
छू के माँ के चरण जो गए
क्या मिले चार पैसे उन्हें,
वो तो जैसे ख़ुदा हो गए
ज़िंदगी बोझ लगने लगी,
जबसे दिल तोडक़र वो गए
पहले ढाये सितम उम्रभर,
क़ब्र पर आके फिर रो गए।
जिनको था मालो-ज़र का ग़ुरूर
खाली हाथों ही यारो गए
डुबकी गंगा में वो तो लगा
पाप मीना सभी धो गए
किसे मालूम अंदर की कहानी
किसे मालूम अंदर की कहानी
कहेगी आँख मंजर की कहानी
ये जर्जर तन कहेगा अब सदा ही
ग़रीबों के मुकद्दर की कहानी
बुझा सकता नहीं था प्यास अपनी
यही है देखो सागर की कहानी
बनेगा ख़ाक इक दिन जिस्म ये तो
यही है हर सिकंदर की कहानी
लगा है ख़ून इंसानों का इसमें
सदी कहती है खंजर की कहानी
वहाँ जाएँगे, पैदल, हाथ ख़ाली,
सुनी है आज कौसर की कहानी
कभी थी रौनकें सजती थी महफिल
बताते सब ये खंडहर की कहानी
बचाने अस्मतें दी जान अपनी
कहेगें लोग जौहर की कहानी
रहे हैं दफ़्न लाखों राज इसमें
न ज़ाहिर हो मेरे घर की कहानी
सुनो तुम ग़ौर से मीना ग़ज़ल ये
कहेगी एक शायर की कहानी
कोई मज़ाक नहीं
किसी को दोस्त बनाना कोई मज़ाक नहीं
दिलों से बैर भगाना कोई मज़ाक नहीं
अजीब शख़्स है सबको पता है उससे तो
तआल्लुक़ात बनाना कोई मज़ाक नहीं
न आज़मा कभी क़ुदरत को तू भी ऐ गुलशन
ख़िज़ाँ में फूल खिलाना कोई मज़ाक नहीं
तुम्हारे नाम पे लिखने को लिख दिया लेकिन
तुम्हें वो शेर सुनाना कोई मज़ाक नहीं
दिल-ओ-दिमाग पे ले कर नशा मुहब्बत का
ये उम्र अपनी बिताना कोई मज़ाक नहीं
तमाम तंज़ को सुनना भी मुस्कुराना भी
ये अश्क अपने छिपाना कोई मज़ाक नहीं
किसी की क़ब्र सजा दे कोई भले लेकिन
किसी की ज़ीस्त सजाना कोई मज़ाक नहीं
सितम सहे हैं हज़ारों ही जग में मीना
किसी पे दिल का भी आना कोई मज़ाक नहीं
जाना ज़रूरी हो गया है
कहा उसने जिधर, जाना ज़रूरी हो गया है
कहा उसने जो कर जाना ज़रूरी हो गया है
हमें हद से गुज़र जाना ज़रूरी हो गया है
मुहब्बत में बिखर जाना ज़रूरी हो गया है
बची अब है कहाँ इंसानियत लोगों के दिल में
परेशाँ हो के मर जाना ज़रूरी हो गया है
मेरा दिल कब तलक रोता रहेगा अब मुझे तो
मुहब्बत के नगर जाना ज़रूरी हो गया है
रखेगा याद तुझको फिर ज़माना भी ये सारा
कुछ अच्छे काम कर जाना ज़रूरी हो गया है
हज़ारों लोग रस्ता देखते हैं जिस गली में
वहाँ शामो-सहर जाना ज़रुरी हो गया है
अज़ल से इश्क़ में रुसवाइयां मिलती हैं मीना
तो फिर क्यूँ उनसे डर जाना ज़रूरी हो गया है
कारों के मालिक हो गए
ज़र, ज़मीं, बंँगलों के और कारों के मालिक हो गए
अब सियासत-दान दरबारों के मालिक हो गए
जो सर-ए-बाज़ार लोगों की उछालें आबरू
आजकल वो लोग दस्तारों के मालिक हो गए
पाँव उनके इस ज़मीं पर अब कहाँ पड़ते हैं दोस्त
क़द हुआ ऊँचा बहुत तारों के मालिक हो गए
एक ख़ंजर थामने में भी लरज़ते थे जो हाथ
वक़्त बदला वो ही तलवारों के मालिक हो गए
खोटे सिक्के थे जो चल पाए नहीं बाज़ार में
चालबाज़ी कर वो बाज़ारों के मालिक हो गए
कल तलक जो ख़ुद ही थे ताज़ा ख़बर इस शह्र की
चमकी है तक़दीर अख़बारों के मालिक हो गए
अब सँभल के पाँव रखना नफ़रतों के शह्र में
इस जगह के लोग अंगारों के मालिक हो गए
तेरी कश्ती की ज़रूरत अब नहीं मल्लाह को
नाख़ुदा मीना सभी धारों के मालिक हो गए
याद मुझको कुछ नहीं रहता
याद मुझको कुछ नहीं रहता तेरे आने के बाद
वक़्त ही गुज़रे नहीं मेरा तेरे जाने के बाद
कौन पढ़ता है कसीदे आप की तारीफ़ के
सब बुराई करते हैं बस बज़्म से जाने के बाद
हो गया दीदार तेरे हुस्न का जब से मुझे
आरज़ू अब क्या हो मेरी ऐसे नज़राने के बाद
अब अदावत और नफ़रत का यहाँ क्या काम है
बस मुहब्बत ही मुहब्बत है तेरे आने के बाद
इन ग़रीबों को यहाँ मिलता कहाँ इंसाफ़ है
उनपे हंँसती भी अमीरी है सितम ढाने के बाद
डोर कच्ची तो नहीं थी मेरे उल्फ़त की सनम
तोड़ कर क्यों चल दिए तुम मुझको उलझाने के बाद
जब क़दम तेरे पड़े उजड़े हुए गुलशन में तो
दिल हुआ गुलज़ार मीना फिर से वीराने के बाद
ग़ैरों को अपना बनाते हैं तेरे शह्र के लोग
ग़ैरों को अपना बनाते हैं तेरे शह्र के लोग
हाथ दुश्मन से मिलाते हैं तेरे शह्र के लोग
ख़ूब चलती है ज़ुबां इनकी भी ख़ंजर जैसी
खून आंखों से रुलाते हैं तेरे शहर के लोग
मुझ पे इल्ज़ाम लगाते हैं ये दुनिया भर के
हमको बेवज़्ह सताते हैं तेरे शह्र के लोग
ख़ौफ़ इनको नहीं कोई भी ख़ुदा का देखो
ख़ून इंसा का बहाते हैं तेरे शह्र के लोग
हैं वो बेज़ार अज़ल से ही मेरी सूरत से
ख़ार राहों में बिछाते हैं तेरे शह्र के लोग
बात बेकार की करते हैं गुमाँ है इनको
अपना मे’आर गिराते हैं तेरे शह्र के लोग
चैन से रहने नहीं देते हैं मीना मुझको
शम्अ सा मुझको जलाते हैं तेरे शह्र के लोग
मुल्क की अपने सियासत मसख़रों की ज़द में है
मुल्क की अपने सियासत मसख़रों की ज़द में है
और ये जनता हमारी मुश्किलों की ज़द में है
रोज़ है दंगा यहाँ और मज़हबों के भी फ़साद
ज़िंदगी हर एक की ही गोलियों की ज़द में है
तोड़ते मासूम दिल के हैं यहाँ जज़्बात भी
सख़्त पत्थर भी यहाँ अब शिल्पियों की ज़द में है
अक़्ल-मंदी की कोई क़ीमत नहीं है आजकल
अब बसीरत तो यहाँ पर ज़ाहिलों की ज़द में है
खो गया आहो-फ़ुगाँ का भी असर अब देखिए
ख़ाक का आग़ोश है और ग़मज़दों की ज़द में है
है तबाही का ही मंज़र देख लो अब हर तरफ़
रस्म-ए-उल्फ़त भी यहाँ बर्बादियों की ज़द में है
क़ायदे बदले हैं तब से रोशनी के देखिए
आसमां का चाँद जबसे जुगनुओं की ज़द में है
छूट दोषी जा रहे निर्दोष को मिलती सज़ा
आज ये कानून भी तो साक्षियों की ज़द में है
हादसे ही हादसे हैं ज़िंदगी में आजकल
मुस्कराहट भी यहाँ पर हाशियों की ज़द में है
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी के राज़ मीना खुल गये
दोस्त भी कुछ अब हमारे दुश्मनों की ज़द में है
अपने दामन को बचा के रखो मक्कारी से
अपने दामन को बचा के रखो मक्कारी से
ज़ीस्त को जीते रहो सादगी ख़ुद्दारी से
ये ज़रूरी तो नहीं ख़्वाब मुकम्मल हों सभी
मंज़िलें मिलतीं हैं इंसान को दुश्वारी से
आस्तीनों के जो हैं सांप नज़र में रखिए
डस न जाएं ये कहीं मुल्क को ग़द्दारी से
परचम-ए-इल्म-ए-अदब ऊंचा हमेशा रखना
जीत लो बज़्म का दिल अपनी क़लमकारी से
मौत को याद रखो आएगी बर-हक़ इक दिन
ज़िन्दगी आप जियो मौत की तैयारी से
आशियां तुम जो ग़रीबों के जलाओगे अगर
घर तुम्हारा भी तो जल जाएगा चिंगारी से
आम चर्चा ये सर-ए-बज़्म सुनी है मीना
लूट ली तुमने तो महफ़िल ही ये फ़नकारी से
ये क्या हुआ है दोस्तो, ख़बर न अबकी बार है,
ये क्या हुआ है दोस्तो, ख़बर न अबकी बार है,
कि मिल रहे हैं ग़म ही ग़म, ख़लिश भी बेशुमार है
मिटा दो आज दूरियाँ कि मौसमें बहार है
हया को मौत आ गयी नज़र भी बेक़रार है
नसीहतें हमें मिली न खेल समझो प्यार को
हज़ार तुहमतें लगीं न दिल पे ऐतबार है
क़फ़स में है ये ज़िंदगी अजीब दिल का हाल भी
ग़मों का दौर देखिए कि मौत बार -बार है
पढ़ो तो मेरी शायरी मिलेंगी तुम को राहतें
मरीज़े इश्क़ हो गए कि तेरा इंतज़ार है
थे काग़ज़ी सभी गुलाब उनमें रंगो बू न थी
गुज़र गए हैं लम्हे पर हैं शोख़ियाँ भी प्यार है
अभी भी आस क़ल्ब की है आप से लगी हुई
है साँस आख़िरी मगर अभी भी इंतज़ार है
न फ़िक्र अपने आप की न होश है न चैन भी
हक़ीक़तों से दूर है अजीब इंतिशार है
यही ज़मीं यही वतन यही मेरा मुकाम भी
हैं मिट्टी रोज़ चूमते नमन हज़ार बार है
जलाके ख़ाक कर गए हुज़ूर हर उमीद को
हैं साज़िशें ये वक़्त की ये दिल मगर निसार है
कहने अपनी बात को अब हर सुख़न आज़ाद है
कहने अपनी बात को अब हर सुख़न आज़ाद है
बंदिशें कोई नहीं अब हर कहन आज़ाद है
हर गली हर शह्र और आज़ाद है ये हर पहर
साँस लेते चैन से हम ये पवन आज़ाद है
नफ़रतों के दायरों को तोड़ डालो मिल के सब
इल्तिजा बस अम्न की है, अब वतन आज़ाद है
टूटी ज़ंजीरें सभी अब तो सवेरा है नया
बहती कलकल है नदी और बाँकपन आज़ाद है
मौत आकर ले गयी तब चैन आया रूह को
ओढ़कर दो गज कफ़न मेरा बदन आज़ाद है
बेड़ियों में जकड़ी थी नारी हज़ारों साल से
हर सुमन अब तोड़ ज़ंजीर -ओ-रसन आज़ाद है
ये ज़मीं है मीर ग़ालिब और है रसखान की
आज तुलसी सूर का भी हर सपन आज़ाद है
बढ़ाएँ हम वतन का मान ये अरमान है यारो
बढ़ाएँ हम वतन का मान ये अरमान है यारो
ज़मीं जननी हमारी है बडा़ एहसान है यारो
लिखो तुम फिर नया इतिहास अपने देश भारत का
वतन खुशहाल हो इसमें ही अपनी शान है यारो
हमेशा वीरों की गाथा सुनाती आई है धरती
हमारा दिल जिगर इस पर रहा क़ुर्बान है यारो
शराफ़त के लिबासों में यहाँ ग़द्दार भी हैं कुछ
सबक उनको सिखाओ जो कोई शैतान है यारो
यही लक्ष्मी यही दुर्गा यही नारी भवानी है
करे संहार दुश्मन का बचाती आन है यारो
कभी देखा था सपना मुल्क के आज़ाद होने का
मिली मुश्किल से आज़ादी, हमारी जान है यारो
ग़ज़ल यह अब शहीदों को ही करती नज़्र है मीना
उन्हीं से दर हक़ीक़त देश की पहचान है यारो
घर की तो आबरू ही नवेली में क़ैद है
घर की तो आबरू ही नवेली में क़ैद है
जैसे चमन की ख़ुशबू चमेली में क़ैद है
उस पर है बद नज़र कभी से इस ज़माने की
रानी जो मेरे दिल की हवेली में क़ैद है
इस मतलबी जहां में किसे नेक मैं कहूँ
ईमां का धन इस एक अकेली में क़ैद है
मुमताज़ कह रहे हैं उसे लोग हैं फ़िदा
सारे जहाँ का नूर सहेली में क़ैद है
दीवाना खाक छाने है दिल्ली में जा ब जा
लेकिन मेरा वो झुमका बरेली में क़ैद है
ज़ीनत थी गुलसितां की जो फूलों की जान थी
तितली वो कुछ दिनों से हथेली में क़ैद है
दुनिया के हर सवाल का मीना है इक जवाब
पढ़ लो जवाब तुम भी पहेली में क़ैद है
हो न जाए कहीं रुसवाई छुपा कर रक्खें
हो न जाए कहीं रुसवाई छुपा कर रक्खें
इन अमीरों से शनासाई छुपा कर रक्खें
फ़ायदा कुछ नहीं चतुराई छुपा कर रक्खें
मूर्ख के सामने दानाई छुपा कर रक्खें
कौन करता है यक़ीं आपकी इन बातों पर
इसलिए अपनी ये सच्चाई छुपा कर रक्खें
लालची कोई भ्रमर इसको चुरा ले न कहीं
फूल कलियाँ सभी अँगड़ाई छुपा कर रक्खें
सब उड़ाएँगें हँसीं साथ न देगा कोई
दर्द की कुछ नहीं सुनवाई छुपा कर रक्खें
आ न जाना कभी तुम साहिलों के झाँसे में
ये समंदर सदा गहराई छुपा कर रक्खें
ज़ख़्म ही देंगे सभी क्या दवा देंगे मीना
राज़दारों से भी परछाई छुपा कर रक्खें
ग़म मुहब्बत में मिले और बे-ख़ुदी महँगी पड़ी
ग़म मुहब्बत में मिले और बे-ख़ुदी महँगी पड़ी
क़ैस लैला सी हमें दीवानगी महँगी पड़ी
हमको तो ऐ वक़्त तेरी बेरुख़ी महँगी पड़ी
बेबसी हर-सू दिखी यूँ तीरगी महँगी पड़ी
बे अदब इस दौर में ये ज़ीस्त भी आसां न थी
दाँव कुछ आते नहीं थे सादगी महँगी पड़ी
इम्तिहाँ हम रोज़ देते थे मुहब्बत में मगर
लोगों ने जब तोड़ा दिल को आशिक़ी महँगी पड़ी
रोज़ ही इंसानियत का क़त्ल होता है यहाँ
ऐ अमीरे-शह्र तेरी दोस्ती महँगी पड़ी
कुछ नहीं हासिल हुआ रूठा ज़माना है अलग
झूठ की हमको यहाँ पर पैरवी महँगी पड़ी
कर न पायी ये कभी आबाद तो क़ल्बो -जिगर
हमको मीना रोज़ की ये शायरी महँगी पड़ी
आख़िर सिखाता कौन था
प्यार का मुझको सबक आख़िर सिखाता कौन था
शम्अ उल्फ़त की मेरे दिल में जलाता कौन था
अपने सीने से हमें हँस कर लगाता कौन था
और सिवा माँ के मुहब्बत से बुलाता कौन था
भूल बैठा है तू शायद ऐ बता हमदम मेरे
याद में तेरी यहाँ आँसू बहाता कौन था
जिसके शेरों में तुम्हारा रंग दिखता था मुझे
उस ग़ज़ल को बारहा यूँ गुनगुनाता कौन था
शोला बारी आँखों में थी और बहके थे क़दम
शोख़ दिलकश सी निगाहों से पिलाता कौन था
छोड़ कर जो चल दिया उससे तो पूछे कोई
उसके दिल में मा- सिवा मेरे समाता कौन था
मीरो-ग़ालिब जैसा कोई भी नहीं शायर हुआ
सामने उनके सुख़न में ठहर पाता कौन था
अगर इजाज़त हो
ज़माने को मैं जला लूँ अगर इजाज़त हो
नसीब तुमको बना लूँ अगर इजाज़त है
है वो दरिंदगी डरते हैं गुल भी भौरों से
जहां से तुमको छिपा लूँ अगर इजाज़त हो
इलाज मिलता नहीं ज़ख़्म है बड़ा ग़हरा
कहो तो दिल में सजा लूँ अगर इजाज़त हो
नज़र नज़र से मिले और मिले ये दिल दिल से
नक़ाब रुख़ से हटा लूँ अगर इजाज़त हो
नवाज़िशें हैं बढ़ी जब से दिल मचलता है
मैं अपने दिल को मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं ख़ुद को क़ैस बना लूँ बने तू जो लैला
कि नाम कुछ तो कमा लूँ अगर इजाज़त हो
कहीं चुभें न तेरे गुलबदन को ये मीना
मैं रह से ख़ार उठा लूँ अगर इजाज़त हो
किधर जाता है
राह-ए-उल्फ़त से परेशान, किधर जाता है
अपनी मंज़िल से भी अनजान किधर जाता है
झूठ से हार के नादान किधर जाता है
मार के अपना तू ईमान किधर जाता है
बिक रहा हूँ सरे बाज़ार तेरी शर्तो पर
दे के मुझको तू ये नुक़सान किधर जाता है
तेरी यादों का उठा था जो मेरे सीने से
देखना है कि वो तूफ़ान किधर जाता है।।
मैं इसी सोच में उलझी हूँ बड़ी मुद्दत से
बाद मरने के ये इंसान किधर जाता है।
क़त्ल करती हूँ हर इक लम्हा तेरी यादों का
तू बना के मुझे श्मशान किधर जाता है
मयकदा भी है, तेरा घर भी, सनम-ख़ाना भी
आज़माना है कि अब ध्यान किधर जाता है।।
नेकियाँ छोड़ के जिसने जो कमाया मीना
देखिए ले के वो सामान किधर जाता है।।
ज़माने वालों को अब इसपे एतबार नहीं
ज़माने वालों को अब इसपे एतबार नहीं
कभी किया बड़ों को हमने शर्मसार नहीं
हमें न आरज़ू है पारसा कहे कोई
हुए किसी की मुहब्बत में दाग़दार नहीं
वो मो’जिज़ा ही कहाँ लूट ले जो महफ़िल को
क़लम में उनके भी अब पहले- सी है धार नहीं
मिलेगी सख़्त सज़ा तुमको भी गुनाहों की
कि सच की होगी अदालत में अब की हार नहीं
मिज़ाज गर्म ही रहता हमेशा से उनका
अदब लिहाज़ पे उनको है इख़्तियार नहीं
लबों पे नाम लिए तेरा ही हुए रुख़सत
चढ़ा दो फूल भी ये ग़ैर की मज़ार नहीं
पता जो होता मिलेगा सभी से धोका हमें
बनाते हम किसी को अपना राज़दार नहीं
क़द को ऊँचा रखो मत घटाया करो
क़द को ऊँचा रखो मत घटाया करो
घर जो उजड़े उन्हें फिर बसाया करो
बज़्म में हौसला तुम बढ़ाया करो
आके चेहरा भी अपना दिखाया करो
दर्दे-दिल की उन्हें भी दवा दो ज़रा
मुफ़िलसों को नहीं तुम सताया करो
बात औरों की भी मानिए कुछ तो अब
अपनी हरदम ही मत तुम चलाया करो
आप निकलो कभी ख़ौफ़ की हद से तो
बे धड़क मुझसे तुम मिलने आया करो
ख़ौफ़ खाओ ख़ुदा का भी थोड़ा सा तुम
झूठे इल्ज़ाम भी मत लगाया करो
बख़्शी नेमत ख़ुदा ने ये मीना हमें
अपनी जाँ इश्क़ में मत लुटाया करो
इश्क़ जाता है वहीं हुस्न जिधर जाता है
इश्क़ जाता है वहीं हुस्न जिधर जाता है
हो अगर सच्ची मुहब्बत तो सँवर जाता है
ज़ीस्त में आज हैं खुशियां तो हैं कल मातम भी
दिल से इनका नहीं जल्दी ही असर जाता है
इश्क़ की राह पे चलना है बहुत मुश्किल सा
बात जब उनकी हो दिल और जिगर जाता है
जो तपन से किसी इंसां को सुकूँ देता था
आज कटता वही मासूम शजर जाता है
ले के फिरते सभी इतनी भयानक सूरत
ख़ुद के साये से भी इंसान ये डर लगता है
डूब जाते हैं यहाँ सब को बचाने वाले
वक़्त पे ख़ुद को बचाने का हुनर जाता है
फ़ुर्सते अब कहां मिलने की बची हैं मीना
सुब्ह से निकला बशर शाम को घर जाता है
अपने दामन को बचाके रखो मक्कारी से
अपने दामन को बचाके रखो मक्कारी से
ज़ीस्त को जीते रहो सादगी, ख़ुद्दारी से
ये ज़रूरी तो नहीं ख़्वाब मुकम्मल हों सभी
मंज़िलें मिलतीं हैं इंसान को दुश्वारी से
आस्तीनों के जो हैं सांप, नज़र में रखिए
डस न जाएं ये कहीं मुल्क को ग़द्दारी से
परचम-ए-इल्म-ओ-अदब ऊंचा हमेशा रखना
जीत लो बज़्म का दिल अपनी क़लमकारी से
मौत को याद रखो आएगी बरहक़ इक दिन
ज़िन्दगी आप जियो मौत की तैयारी से
आशियां तुम जो ग़रीबों के जलाओगे अगर
घर तुम्हारा भी तो जल जाएगा चिंगारी से
आम चर्चा ये सरे-बज़्म सुनी है मीना
लूट ली तुमने तो महफ़िल ही ये फ़नकारी से
मिली जब से मुहब्बत हम सफ़र की बात करते हैं
मिली जब से मुहब्बत हम सफ़र की बात करते हैं
हुईं पूरी मुरादें , रहगुज़र की बात करते हैं
बड़े नादान है अब पूछते दिल में हमारे क्या
ये दिल हम हार बैठे अब जिगर की बात करते हैं
सफ़ीना आज मेरा जब फँसा है इस भँवर में तो
करें हम याद रब को और लहर की बात करते हैं
अकेला छोड़ के मुझको चला फिर कारवाँ ये तो
सितारे हैं खफ़ा यारा सहर की बात करते हैं
जलायी हैं बहुत ही मोमबत्ती याद में हम तो
जलाने को घिनौने अब बशर की बात करते हैं
लगी कैसी हवा इस गाँव को तो आज देखो तुम
बडे बूढ़े भी सुन अब तो नगर की बात करते हैं
क़फ़स में काट डाला था जिन्हे सैय्याद ज़ालिम ने
नये जो आ गये पंछी के पर की बात करते हैं
मिला है मुद्दतों के बाद देखो वक़्त ये मीना
चलो सब कुछ भुलाके आज घर की बात करते हैं
मनसद पे बैठा झूट जो अच्छा नहीं लगा
मनसद पे बैठा झूट जो अच्छा नहीं लगा
दुनिया में अब तो सच भी ये ज़िंदा नहीं लगा
हम सा नहीं लगा था वो तुमसा नहीं लगा
सीने में उसके प्यार का जज़्बा नहीं लगा
सस्ता नहीं था इश्क़ वो महँगा नहीं लगा
लेकिन कभी मुनाफ़े का सौदा नहीं लगा
थोड़े बहुत गुनाह में शामिल थे हम सभी
इंसान कोई हमको फ़रिश्ता नहीं लगा
हासिल हुए थे ज़ख्म हज़ारों ही प्यार में
लेकिन अलग है बात के सदमा नहीं लगा
ख़ुशबू कभी भी हाथ के माँ की नहीं गई
खाना किसी भी ग़ैर से अच्छा नहीं लगा
तहज़ीब देखने पे न मिलती है अब यहाँ
जायज ग़ुरूर लोगों का मीना नहीं लगा
हर शाम तराशे थे सरेआम तराशे
हर शाम तराशे थे सरेआम तराशे
पीने को उन्होंने तो फ़क़त जाम तराशे
भेजे थे उन्होंने वही पैग़ाम तराशे
हमने तो मुहब्बत में हैं इल्ज़ाम तराशे
इक नूरे मुसलसल था तेरे हुस्न का जादू
तेरे लिए ही यार ये इन’आम तराशे
तस्वीर मुकम्मल तेरी आँखों में बसी थी
रुख़्सार पे तिल हमने सहर शाम तराशे
जागीर अदावत की कुदूरत की ये दुनिया
नफ़रत बढ़ी ऐसी थी कि सद्दाम तराशे
जब शौक़ रुबाई का हुआ हुस्न को देखो
क़ुदरत ने ज़मीं पर कई ख़य्याम तराशे
ये ज़ीस्त मेरी जिसकी अमानत है ज़मीं पर
हमने यहाँ पत्थर पे वही राम तराशे
इन इश्क़ की राहों से तो अनजान हैं हम भी
इन इश्क़ की राहों से तो अनजान हैं हम भी
कमसिन हैं अगर आप तो नादान हैं हम भी
जब आऐं सुनाने वो हमें ग़म का फ़साना
ये कैसे कहें हम कि परेशान हैं हम भी
ज़र्दार अगर तुम हो मियाँ लाल -ओ -गुहर से !
दौलत है बहुत इल्म की धनवान हैं हम भी
ताक़त का हमें डर न दिखाएँ कभी हज़रत
आँधी हैं अगर आप तो तूफ़ान हैं हम भी
तूफ़ान बड़े आए मिटाने को हमें पर
तिलभर न हिला पाये कि चट्टान हैं हम भी
इक रोज़ गुज़र जाएँगे ख़ामोश यहाँ से
कुछ दिन के फ़क़त देखिए मेहमान हैं हम भी
क्या खूब ग़ज़ल आज ये यारा कही तुमने
पर याद रखो मीर का दीवान हैं हम भी
बेचा न मुसीबत में भी ईमान को “मीना”
है नाज़ बहुत साहिब – ए -ईमान हैं हम भी
ज़ुबाँ रखते नहीं मुँह में अगरचे बोल पड़ते हैं
ज़ुबाँ रखते नहीं मुँह में अगरचे बोल पड़ते हैं
बिसातें जब भी बिछतीं हैं पियादे बोल पड़ते हैं
थके हारे भी चल पड़ते हैं शायद इस सहारे से
मिलेगी मंज़िलें बेशक सितारे बोल पड़ते हैं
किताबें चार क्या पढ़ लीं, बने फ़िरते हैं अब आलिम,
नसीहत दो न, यूँ झुंझला के बच्चे बोल पड़ते हैं
करें वो क़त्ल की साज़िश हमेशा ही निगाहों से
खुलेगा राज़ ये इक दिन इशारे बोल पड़ते हैं
सितारे थम से जाते हैं, तुम्हारी इक झलक पाकर,
ज़मीं की शय नही हो तुम ये सारे बोल पड़ते हैं ।
उठाते हैं वही उँगली नहीं औक़ात कुछ जिनकी
उछलता ख़ुद पे जब कीचड़ लबादे बोल पड़ते हैं
सितम के खौफ़ से मीना ज़ुबाँ ख़ामोश है लेकिन
सुलगते-काँपते, लोगों के चेहरे बोल पड़ते हैं
नन्ही कली चमन में मुस्कान ढूँढती है
जो लुट चुका है अब वो सम्मान ढूँढती है ।
नन्ही कली चमन में मुस्कान ढूँढती है ।
काँटों के वास्ते वो गुलदान ढूँढती है
नादान है जहाँ में इन्सान ढूँढती है
बेबस है ज़िन्दगी और गर्दिश में भी सितारे
अब मौत का वो अपने परवान ढूँढती है
मिलती न दर्द-ए-दिल की उसको दवा भी कोई
देते हैं चैन जो वो लुक़मान ढूँढती है
ज़ख़्मों की अब न परवा तानों की भी नहीं अब
बस भीड़ में वो अपनी पहचान ढूँढती है
ढूँढे नहीं वो हीरा ढूँढे नहीं वो मोती
जीने का बस जहाँ में सामान ढूँढती है
जज़्बात ही नही कुछ जब शाइरी में तेरी ,
मीना कलाम में क्या अरकान ढूँढती है ।
दिलों में जिसके मुहब्बत हो हर बशर के लिए
दिलों में जिसके मुहब्बत हो हर बशर के लिए
कि ऐसा चाहिए बस हमसफ़र सफ़र के लिए
कटे ये रात मिटे तीरगी भी दुनिया से
नसीब कोई चरागाँ हो अब सहर के लिए
मिले सनम हमें ऐसा जो दिल में घर कर ले
सफ़र भी ज़ीस्त का बेहतर हो फिर गुज़र के लिए
वफ़ा का बस हो मुलाज़िम जो शख्स यार यहाँ
ग़ुलाम मैं बनूँ उसकी तो उम्र भर के लिए
रही वो बंद फ़क़त बस्तों में तो आफिस के
कि तरसीं फाइलें हाकिम की इक मुहर के लिए
कहां हैं अब तो मयस्सर श्रमिक को हैं खुशियाँ
बहा है जिनका पसीना तो इस नगर के लिए
अवाम जानती है राज़ हर सियासत का
वो मर मिटेगी हरिक बात में असर के लिए
हम हमेशा से ही तक़दीर के मारे निकले
हम हमेशा से ही तक़दीर के मारे निकले
गुल जिन्हें समझा था वो यार शरारे निकले
इल्म की जिनको समझते थे इमारत अब तक
वो तो पैसों की उगाही के इदारे निकले
डूबना तय था कि मर्ज़ी थी समंदर की यही
तेरी रहमत से ख़ुदा हम तो किनारे निकले
सारी खूबी थी तुम्हारी तो तुम्हारी ही सही
जितने भी ऐब थे देखो तो हमारे निकले
हमको उम्मीद थी दिल हार न दें महफ़िल में
झूठे पर आज भी दिलबर के इशारे निकले
धोका उल्फ़त में मिला हमको तो हर्जा कैसा
वो हमारे नहीं निकले न तुम्हारे निकले
ख़ुदकुशी रोज़ ही करती है जवानी देखो
कैसे माँ बाप के आख़िर ये दुलारे निकले
बेजा बदनाम है मीना ये समंदर देखो
तेरे आँसू तो नमक से भी ये खारे निकले
जवानों है क़सम तुमको शहादत क्यूँ नहीं करते
जवानों है क़सम तुमको शहादत क्यूँ नहीं करते
वतन पे जाँ लुटाने की भी हिम्मत क्यूँ नहीं करते
भला इस हुस्न की तुम क़द्रो-क़ीमत क्यूँ नहीं करते
मुहब्बत क्यूँ नहीं करते शरारत क्यूँ नहीं करते
सियासत रोज़ करते ज़ुल्म की देखो हमेशा ही
ग़रीबों के दिलों में तुम हुकूमत क्यूँ नहीं करते
बड़ी नाज़ुक है नाज़ों से पली ये रौनक़े घर की
कि अपनी बेटियों की ख़ुद हिफ़ाज़त क्यूँ नहीं करते
अदावत ही अदावत है मुहब्बत भूल बैठे हो
भला इस देश को अपने तो जन्नत क्यूँ नहीं करते
ख़िज़ां को अपने फ़न से तुम बदल दो भी बहारों में
जो देखें ख़्वाब हैं तुमने हक़ीक़त क्यूँ नहीं करते
नवाज़ा है मुहब्बत से दुआ की दी हैं दौलत भी
बता वालिद की अपने आप इज़्ज़त क्यूँ नहीं करते
करो हर काम शिद्दत से यक़ीनन फिर मिले शुहरत
हुनर में आप अपने और बरकत क्यों नहीं करते
हमें थी वस्ल की चाहत मगर फ़ुरसत न थी तुमको
करम से रब के अब आये तो रुख़सत क्यूँ नहीं करते
तमाम उम्र की दौलत हुनर का हिस्सा है
तमाम उम्र की दौलत हुनर का हिस्सा है
नज़र लगे न कहीं वो नज़र का हिस्सा है
उठा के फेंक दूं मैं तेरी राह के पत्थर
तू हमनवा है मेरी रह गुज़र का हिस्सा है
बुलंदियों पे नज़र हो बशर तो अब तेरी
नया है दौर ये और तू समर का हिस्सा है
रखूँगी दिल से लगा के हमेशा ही उसको
सही ग़लत जो हो वो मेरे डर का हिस्सा है
नहीं है इल्म तुझे तू समाया है मुझमें
तू मेरी शाम मेरी हर सहर का हिस्सा है
जुदा न कर सका कोई भी तुझको इस दिल से
तू बामो दर है मेरा और घर का हिस्सा है
दग़ा न देगी ये मीना वफ़ा ही बस देगी
कि आशिक़ी तेरी मेरे जिगर का हिस्सा है
लफ़्ज़ों का हरिक मैंने मआनी भी लिखा है
लफ़्ज़ों का हरिक मैंने मआनी भी लिखा है
ग़ज़लों पे चढ़े रंग को धानी भी लिखा है
दानी भी लिखा उसको तो ज्ञानी भी लिखा है
दुनिया को पुराणों में तो फ़ानी भी लिखा है
किस्से वो पुराने तो हमें याद नहीं अब
खोई कहाँ गुड़िया वो दिवानी भी लिखा है
हाथों की लकीरों में तेरा नाम न होगा
धरती पे मगर दिल की तो रानी भी लिखा है
बुझती कहाँ है प्यास तो सहरा की लहू से
प्यासे की फ़क़त चाहतें पानी भी लिखा है
महरूम ख़ुदा हम तेरी रहमत से भले आज
कल होंगे करम तेरे ज़ुबानी भी लिखा है
लोगों को परखने का हुनर उसको है हासिल
मीना को ज़माने ने सयानी भी लिखा है
उनकी नज़रें बनीं तलवार ख़ुदा ख़ैर करे
उनकी नज़रें बनीं तलवार ख़ुदा ख़ैर करे
हुस्न के हो गये बीमार ख़ुदा ख़ैर करे
लोग चेहरे पे लगा लेते हैं चेहरा ही नया
झूठ का गर्म है बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे
क़ैद हैं कब से क़फ़स में तेरी उल्फ़त के सनम
अब तो मरने के हैं आसार ख़ुदा ख़ैर करे
अद्ल-ओ -इंसाफ़ की हमसे न करे बात कोई
बिकते सच के भी हैं दरबार ख़ुदा ख़ैर करे
ख़ुद-ग़रज़ होके किये ज़ुल्म भी क़ुदरत पे बहुत
वक़्त की पड़ने लगी मार ख़ुदा ख़ैर करे
हर तरफ देख बिछीं लाशें ही लाशें मौला
जीना अब हो गया दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे
ग़ैर होते, तो नहीं रंज जफ़ा का होता
सारे अपने हैं गुनहगार ख़ुदा ख़ैर करे
शे’र कहने का सलीक़ा भी नहीं है जिनको
लब पे उनके भी हैं अशआर ख़ुदा ख़ैर करे
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
तुम मुझको वफाओं की सज़ा क्यों नहीं देते
नफ़रत की कहानी को मिटा क्यों नहीं देते
अब अम्न की गंगा भी बहा क्यों नहीं देते
मंज़ूर अगर इश्क़ हमारा नहीं है तो
फिर ज़ह्र हमें आप पिला क्यों नहीं देते
ये चाँद न छिप जाए कहीं शर्म से जानम
तुम रुख़ पे ये चिलमन भी गिरा क्यों नहीं देते
शैतान बना इंसा करे ज़ुल्म-ओ -सितम रोज़
इक दीप मुहब्बत का जला क्यूँ नहीं देते
राहत भी मिले तुमको भी कुछ अपने ग़मों से
महफ़िल में ग़ज़ल एक सुना क्यों नहीं देते
रुसवा किया है इश्क़ ने गर तुमको है मीना
तस्वीर मेरी दिल से हटा क्यों नहीं देते
मालिक हो गए
ज़र, ज़मीं, बंँगलों के और कारों के मालिक हो गए
अब सियासत-दान दरबारों के मालिक हो गए
जो सर-ए-बाज़ार लोगों की उछालें आबरू
आजकल वो लोग दस्तारों के मालिक हो गए
पाँव उनके इस ज़मीं पर अब कहाँ पड़ते हैं दोस्त
क़द हुआ ऊँचा बहुत तारों के मालिक हो गए
एक ख़ंजर थामने में भी लरज़ते थे जो हाथ
वक़्त बदला वो ही तलवारों के मालिक हो गए
खोटे सिक्के थे जो चल पाए नहीं बाज़ार में
चालबाज़ी कर वो बाज़ारों के मालिक हो गए
कल तलक जो ख़ुद ही थे ताज़ा ख़बर इस शह्र की
चमकी है तक़दीर अख़बारों के मालिक हो गए
अब सँभल के पाँव रखना नफ़रतों के शह्र में
इस जगह के लोग अंगारों के मालिक हो गए
तेरी कश्ती की ज़रूरत अब नहीं मल्लाह को
नाख़ुदा मीना सभी धारों के मालिक हो गए
मोहताज नहीं
तेरे इक़रार या इंकार की मोहताज नहीं
ये मेरी ज़ीस्त तेरे प्यार की मोहताज नहीं
क़त्ल कर दे ये किसी का भी फ़क़त लफ़्ज़ों से
उनकी ग़ज़लें किसी तलवार की मोहताज नहीं
मेरे अख़लाक़ के लाखों है यहाँ पे भी मुरीद
गुल की महकार हूँ किरदार की मोहताज नहीं
ऐसे दीवाने हैं चर्चा है जहाँ में अपना
है ख़बर ऐसी जो अख़बार की मोहताज नहीं
मेरी सच्चाई का सिक्का है ज़माने भर में
ये ख़रीदार या बाज़ार की मोहताज नहीं
ता-क़यामत ही रहेगी ये बुलंदी पे जनाब
शायरी मीर की सरकार की मोहताज नहीं
जीती है जंग उसूलों की सदा ही हमने
ये रियासत किसी हथियार की मोहताज नहीं
मुझको अल्लाह ने बख़्शी ये हुनर की दौलत
ज़िंदगी अब किसी दस्तार की मोहताज नहीं
ख़ुद ही दीवार में चुन जाएगी हँस कर मीना
आशिक़ी मेरी ये दरबार की मोहताज नहीं
मत दो किसी को यार फ़रेब
यही है इल्तिजा मत दो किसी को यार फ़रेब
करेगा आबरू वरना ये तार तार फ़रेब
न हमनशीं ही, न दिलबर ही वो हमारा हुआ
हर एक बार दिया उसने बेशुमार फ़रेब
जफ़ा भी दिल में है उसके दग़ा में है माहिर
हमें है शाम-ओ-सहर देता ग़म -गुसार फ़रेब
लिबास पहने शराफ़त का जो बशर है ये
मुझे तो लगता है इसका ये इंकिसार फ़रेब
बड़ा हसीन था पहले का धोका पर अब यार
न जानदार है और है न शानदार फ़रेब
यूँ शर्मसार न कर ख़ुद को तू मेरे हमदम
वगरना तुझको बना देगा दाग़दार फ़रेब
हमें तो ख़ुद से ज़ियादा यक़ीं था मीना पर
बड़ा हसीन दिया उसने बार बार फ़रेब
शायरी भी ईश की आराधना है
शायरी भी ईश की आराधना है
बस क़लम चलती रहे यह कामना है
नफ़रतों का कुहरा धरती पर घना है
हाथ सब का ख़ून से रहता सना है
है यही रब या ख़ुदा तुम जो भी समझो
इश्क़ करना भी तो बंदे साधना है
सब बिठाते झूठ को ही तख़्त पर और
सत्य की करते यहाँ आलोचना है
थक गये हैं माँग कर हम मन्नतें पर
दर्द मिटने की नहीं संभावना है
श्याम मीरा के मिलेगें क्या मुझे भी
ढाई आख़र प्रेम का पढ़ देखना है
कोख़ में मरती हैं बस क्यों बेटियाँ ही
एक अर्ज़ी उसको भी तो भेजना है
तोड़ने दीवार मज़हब की ये मीना
लक्ष्य अर्जुन सा हमें अब साधना है
अस्मिता का भी क्षरण क्यों हो रहा
अस्मिता का भी क्षरण क्यों हो रहा
संस्कृति का यूँ मरण क्यों हो रहा
अब जहाँ में आम रिश्वत हो गई
पुण्य का नगदीकरण क्यों हो रहा
भूला है माँ-बाप का उपकार भी
पुत्र का ये आचरण क्यों हो रहा
साँस लेना भी हुआ दूभर है क्यों
विष भरा वातावरण क्यों हो रहा
हो गया संहार रावण का अगर
फिर भी सीता का हरण क्यों हो रहा
ढ़ेर पर बारूद के बैठा जहाँ
आज विपदा का वरण क्यों हो रहा
प्यार का पी कर ये प्याला बावरे
वारुणी की तू शरण क्यों हो रहा
मुहब्बत में वफ़ा-परवर खड़े हैं
मुहब्बत में वफ़ा-परवर खड़े हैं
लगा के ताज को ठोकर खड़े हैं
न थामा हाथ भी बढ़कर किसी ने
यूँ तन्हा हम शिकस्ता-तर खड़े हैं
करूँ कैसे तुम्हारा मैं नज़ारा
ज़माने में सौ दीदा-वर खड़े हैं
शजर आता न कोई भी नज़र अब
बशर सब धूप में थक -कर खड़े हैं
मिरे ज़हनो गुमाँ में आज तक भी
तिरी यादों के वो लश्कर खड़े हैं
तमाशा देखने मुफ़लिस का यारो
ज़मी क्या सात ये अम्बर खड़े हैं
सदा आई थी “मीना” जिसके घर से
अभी तक हम उसी दर पर खड़े हैं
जामे उल्फ़त पिला दिया तूने
जामे उल्फ़त पिला दिया तूने
उजड़ा गुलशन सजा दिया तूने
रात को दिन बना दिया तूने
अपना जलवा दिखा दिया तूने
तेरा दिलदार था सनम अब तक
आज मजनू बना दिया तूने
एक शतरंज का पियादा हूँ
मुझको वाक़िफ़ करा दिया तूने
चाँद जैसे ज़मीं पे है उतरा
मुख से पर्दा हटा दिया तूने
अपनी माँ के ज़िगर का टुकड़ा था
पर नज़र से गिरा दिया तूने
इस ग़में दौर में ख़ुदा अब तो
सबको जीना सिखा दिया तूने
मिलती जिसकी दवा नहीं मीना
रोग कैसा लगा दिया तूने
ज़िंदगी यूँ भी छला करती है
ज़िंदगी यूँ भी छला करती है
दर्द देती है दग़ा करती है
ग़म से ख़ुद तो वो गिरां-बार रहे
सबके ज़ख़्मों की दवा करती है
नाचती मौत सदा ही सर पे
ज़ीस्त पर लुत्फ़ लिया करती है
सर पे दस्तार पहन नेकी की
झोलियाँ माँ तो भरा करती है
नाच आता ही नहीं उसको पर
दोष आंगन को दिया करती है
इक क़फ़न मौत का पहना कर यूँ
ज़िंदगी हमको रिहा करती है
सबको देने को उजाला मीना
शम्’अ सी ख़ुद ही जला करती है
ज़ालिमों में तेरा हम-सर कौन है
ज़ालिमों में तेरा हम-सर कौन है
तेरे जैसा याँ सितमगर कौन है
चाँद है या हूर कोई पर्दे में,
नूर से मामूर पैकर कौन है?
लोग सब भटका रहे हैं राह से
मील का पत्थर यहाँ पर कौन है?
चश्म-ए-तर होके तू हाथों को उठा,
जानता है तू कि परवर कौन है?
वास्ते हक़ को कटा दे सर को भी
इस ज़माने का वो दावर कौन है?
मार दे अपने अहम को जो सनम
ऐसा इंसा इस ज़मीं पर कौन है?
जीत ले मीना जो सबका दिल यहाँ
इश्क़ का ऐसा सिकंदर कौन है?
बैठा इस उर के भी अंदर कौन है
बैठा इस उर के भी अंदर कौन है
दे सका इसका भी उत्तर कौन है
रखता सीने में जो पत्थर कौन है
आंसुओं का खारा सागर कौन है
इस जहाँ में बतला ईश्वर कौन है
माँ से बढ़कर या बराबर कौन है
छोड़ देते साथ दुख में अपने ही
संग चलता भी निरंतर कौन है
पल में रब देता हमें उसकी सज़ा
पाप से होता भयंकर कौन है
जो भला सोचे भी औरों के लिए
इस जहाँ में यार अम्बर कौन है
है वही शिव और वही है शक्ति भी
सोचिये उनसे भी सुंदर कौन है
किसी को कोई हैरानी नहीं है
किसी को कोई हैरानी नहीं है
जहाँ की आंख में पानी नहीं है
मिले कैसे किसी को आज मोहन
कोई मीरा सी दीवानी नहीं है
न हासिल कर सकोगे ज़ीस्त में कुछ
ख़ुदा की गर निगहबानी नहीं है
कलंदर सा मिज़ाज ओ ज़र्फ़ अपना
तबीअत अपनी शाहानी नहीं है।
जहाँ में मौत आनी है सभी को
बता मुझको जो शय फ़ानी नही है
सभी हैं इस चमन में अजनबी से
मगर ख़ुशबू तो अनजानी नहीं है
मजाज़ी इश्क़ अपना है ए” मीना”
मुहब्बत अपनी लाफ़ानी नहीं हैं
इस जहाँ को या ख़ुदा ये क्या हुआ
इस जहाँ को या ख़ुदा ये क्या हुआ
आदमी को पैसा ही प्यारा हुआ
इश्क़ ये अंजाम तक पहुँचा कहाँ
ख़ूब पर इसका यहाँ चर्चा हुआ
रोती बुलबुल लुट गया है आशियाँ
शाखों पर बस काग का डेरा हुआ
ज़ब्त करना भी न था बस में मेरे
आँखों से आँसू बहे तो क्या हुआ
ख़ाक़ हैं सब ख़्वाहिशें सुलगे है दिल
ज़ीस्त का हर सफ़्ह है उलझा हुआ
साज़िशें ही साज़िशें होती रहीं
इश्क़ पे गहरा बड़ा पहरा हुआ
धोखे ही धोखे मिले हैं ज़ीस्त में
काम कोई भी कहाँ अच्छा हुआ
खेल था देखो अजब तक़दीर का
कल का सागर आज तो कतरा हुआ
ख़ूब था माहौल नफ़रत का यहाँ
रोज़ छोटी बात पर दंगा हुआ
दिल में इक शख़्स जगा हो जैसे
दिल में इक शख़्स जगा हो जैसे
तूने नज़रों से छुआ हो जैसे
दर्द देना भी अदा हो जैसे
ज़ीस्त मुझसे ही ख़फ़ा हो जैसे
देखता रहता है बस तुमको ही
आइना तुम पे फ़िदा हो जैसे
मुस्कुराहट बयाँ यूँ करती है
हाले दिल उसको पता हो जैसे
दर्द ओ ग़म आँसू यूँ मैंने पाए
प्यार करना ही सज़ा हो जैसे
सानी उसका न कोई महफ़िल में
वो कोई फितना नया हो जैसे
चश्म- तर बज़्म में थे सब मीना
ग़म भी शेरों में ढला हो जैसे
दिल आशना हो जाएगा
तुझपे जब मासूम सा दिल आशना हो जाएगा
मकतब -ए -दिल में हमारा दाख़िला हो जाएगा
उलझनों के साथ मेरा राब्ता हो जाएगा
दूर मुझसे तू अगर ए हमनवा हो जाएगा
दर्द -ओ- ग़म का दौर है मायूस भी है ज़िंदगी
रोज़ ही अब तो नया इक हादसा हो जाएगा
टकटकी बाँधे अगर देखेंगे मुझको आप तो
सारी दुनिया को मुहब्बत का पता हो जाएगा
बोझ अब शीशा-बदन ये हो गया जानम मेरा
साथ हो तेरा अगर, कुछ हौसला हो जाएगा
काम औरों की मुसीबत में अगर आ जाएँ हम
ख़ुद ब ख़ुद इंसानियत का क़द बड़ा हो जाएगा
ज़ुल्फ़-ए -बरहम को सँवारो अब न मीना इस क़दर,
आशिक़ों की जान का फिर मसअला हो जाएगा।
हमको कभी ख़ुशियों का भी मंज़र नहीं मिलता
हमको कभी ख़ुशियों का भी मंज़र नहीं मिलता
दिल को मिले सुकूँ वो मुकद्दर नहीं मिलता
शिद्दत से जो चाहे वही दिलबर नहीं मिलता
जो ज़ख़्म मेरे सी दे रफ़ूगर नहीं मिलता
रहने को ग़रीबों को कभी घर नहीं मिलता
दे दे उन्हें जो छाँव वो छप्पर नहीं मिलता
जो राह दिखाते थे सदा ज़ीस्त में हमको
अब ऐसे बुज़ुर्गों सा भी रहबर नहीं मिलता
तामीर करूँ मैं अपनी मुहब्बत का महल भी
ऐसा कोई नायाब तो पत्थर नहीं मिलता
जो दूर करे तीरगी रौशन करे घर को
हमको कोई भी मिह्र -ए-अनवर नहीं मिलता
दिल जीत ले शायर जो सभी का ही सुख़न में
अब मीर सा कोई भी सुख़नवर नहीं मिलता
जो अम्न की जागीर हमें जीत के ला दे
ऐसा जहाँ में मीर-ए-लश्कर नहीं मिलता
देते सभी हैं ज़ख़्म हमें रूप बदल कर
अहबाब में दुश्मन में भी अंतर नहीं मिलता
ज़िंदगी क्या देश पर तो जान भी क़ुर्बान है
ज़िंदगी क्या देश पर तो जान भी क़ुर्बान है
मेरा दिल मेरा वतन मेरा ये हिंदुस्तान है
तीरगी ही तीरगी कोई न रौशन दान है
श’म्अ भी करती सियासत आदमी हैरान है
राह सारी अब वफ़ा की देखिए सुनसान है
नफ़रतों से इश्क़ का भी शह्र ये वीरान है
उसके आगे देख लो चलती किसी की भी नहीं
समझे जो ख़ुद को सिकंदर वक़्त से अनजान है
चंद सिक्कों के लिए जो बेचते हैं मुल्क को
ख़ैर अब उनकी नहीं उनकी जगह शमशान है
उसके जैसा दूसरा कोई सुख़नवर कब हुआ
नाज़ जिसपे सब करें वो मीर का दीवान है
शायरी ही ज़िंदगी है शायरी ही बंदगी
गीत ग़ज़लों से ही मीना की हुई पहचान है
हम वफ़ा अपनी जताते हुए मर जाते हैं
हम वफ़ा अपनी जताते हुए मर जाते हैं
प्यार आँखों से दिखाते हुए मर जाते हैं
क्या कहूँ शम्मा पे मिटते हुए परवानों को
वो जो हस्ती को लुटाते हुए मर जाते हैं
आशिक़ों की कहीं मेराज हुआ करती क्या
इश्क़ जो अपना जताते हुए मर जाते है
जिनका हर लफ़्ज़ मोहब्बत से सिवा समझा था
उन ख़तों को यूँ जलाते हुए मर जाते हैं
आरज़ू उनकी है हम पास में आयें उनके
हम गले जिनको लगाते हुए मर जाते हैं
कौन है कौन है वो कौन है जो उल्फ़त में
हुस्न के नाज़ उठाते हुए मर जाते हैं
ख़्वाब रह जाते हैं उनके ही अधूरे मीना
रेत का घर जो बनाते हुए मर जाते हैं
हर शाम तराशे थे सरेआम तराशे
हर शाम तराशे थे सरेआम तराशे
पीने को उन्होंने तो फ़क़त जाम तराशे
भेजे थे उन्होंने वही पैग़ाम तराशे
हमने तो मुहब्बत में हैं इल्ज़ाम तराशे
इक नूरे मुसलसल था तेरे हुस्न का जादू
तेरे लिए ही यार ये इन’आम तराशे
तस्वीर मुकम्मल तेरी आँखों में बसी थी
रुख़्सार पे तिल हमने सहर शाम तराशे
जागीर अदावत की कुदूरत की ये दुनिया
नफ़रत बढ़ी ऐसी थी कि सद्दाम तराशे
जब शौक़ रुबाई का हुआ हुस्न को देखो
क़ुदरत ने ज़मीं पर कई ख़य्याम तराशे
ये ज़ीस्त मेरी जिसकी अमानत है ज़मीं पर
हमने यहाँ पत्थर पे वही राम तराशे
अपना बना के लूट लिया
हमें तो इश्क़ ने अपना बना के लूट लिया
सँभलना चाहा अगर, मुस्कुरा के लूट लिया
हक़ीर कतरे थे, थीं ज़ीस्त में मगर खुशियाँ
बुलंदियों पे हमें तुमने ला के लूट लिया
हताश बैठे थे हारे थे जंग उल्फ़त की
हमें तो जीत का सपना दिखा के लूट लिया
गगन में उड़ते थे मासूम से परिंदे जो
कफ़स में तूने तो उनको सजा के लूट लिया
गिला नहीं था कोई हमको उसके मज़हब से
मगर बशर ने हमें दिल मिला के लूट लिया
कभी लबों की हँसीं से कभी निगाहों से
क़दम -क़दम में यूँ जल्वे दिखा के लूट लिया
हमारी ज़ीस्त में आए बहार बनके वो
लबों में एक तबस्सुम सजा के लूट लिया
मक्कार लोग थे
झूठों के बादशाह थे मक्कार लोग थे
हमको सही जो कहते थे वो चार लोग थे
इल्ज़ाम झूठा हम पे लगाते थे बेसबब
क़ातिल थे ख़ुद ही और गुनहगार लोग थे
वल्लाह बेज़ुबा थे यूँ मज़लूम भी बड़े
रहते थे बंदिशों में भी लाचार लोग थे
चालें समझते ख़ूब सियासत की यार वो
दुश्मन पे वार करते समझदार लोग थे
रखते थे दर खुला ही ग़रीबों के वास्ते
थी फ़िक़्र उनको सबकी मददगार लोग थे
जिनका तो शायरी में न कोई जवाब था
ग़ालिब से मीर जैसे क़लमकार लोग थे
तन के खड़े ही रहते थे इज़्ज़त के वास्ते
जो हार मानते न थे ख़ुद्दार लोग थे
झुकाती है सर-ए-शाम
वो अपनी निगाहों को झुकाती है सर-ए-शाम
सीने में लगी आग बुझाती है सर -ए-शाम
रौनक़ है वो महफ़िल की जले शम्अ में ढलकर
परवाने सा हमको भी जलाती है सर -ए-शाम
उल्फ़त के हमें नगमे सुनाती है सुरीले
ये ज़ीस्त नये ख़्वाब दिखाती है सर-ए-शाम
आबाद कोई करता गया दिल की हवेली
ख़ुशबू-सी दिलो जां में समाती है सर-ए-शाम
दुनिया की जफ़ाओ से परेशांन हुए हम
मज़बूरी तेरी बज़्म में लाती है सर-ए-शाम
उम्मीद सुकूं चैन के मयखाने में लाकर
मय का वो मुझे ज़हर पिलाती है सर- ए- शाम
अल्फ़ाज़ बयां कर नहीं सकते मेरे मीना
जिस प्यार को माँ मुझपे लुटाती है सर-ए -शाम
निभाना बहुत हुआ
उल्फ़त को शिद्दतों से निभाना बहुत हुआ
उस बेवफ़ा का हमको सताना बहुत हुआ
इस आशिक़ी में नाम कमाना बहुत हुआ
अब तेरी महफ़िलों में यूँ जाना बहुत हुआ
कुछ इश्क़ का हो और भी किस्सा जहांन में
फ़रहाद शींरी का ये फ़साना बहुत हुआ
हम जानते न होंगे मुक़म्मल कभी भी ये
अब ख़्वाब झूठे दिल में सजाना बहुत हुआ
खाओ ज़रा तरस भी तो इन मुफ़लिसों पे तुम
आँखों से अश्क उनका बहाना बहुत हुआ
पहरे भी हुस्न पे यूँ हज़ारों लगे यहाँ
उनसे मिले हमें भी ज़माना बहुत हुआ
तहरीर इश्क़ पढ़ भी लो अब आँखों में मेरे
ये सर भी तेरे दर पे झुकाना बहुत हुआ
मीना जवाब देंगे उन्हें हर सितम का हम
इल्ज़ाम झूठें रोज़ लगाना बहुत हुआ
यूं तो आसानी मुझे
ज़ीस्त में हासिल नहीं है यूं तो आसानी मुझे
पर झुका सकते नहीं तख़्ते सुलेमानी मुझे
वो रहें ख़ामोश तो होती परेशानी मुझे
छोटे बच्चों की बहुत भाती है शैतानी मुझे
लुत्फ़ लेती हूँ फ़क़ीरी का नहीं शिकवा कोई
अच्छी लगती देश की मिट्टी ये मुल्तानी मुझे
कह रहा सागर बड़ा मायूस होकर के सुनो
नित डुबाकर रेत का घर है पशेमानी मुझे
रौशनी, ख़ुशबू न मुझमें कोई ऐसी बात है।
लोग नाहक कह रहे हैं रात की रानी मुझे।
मय-कशी का शौक़ ले आया मुझे देखो कहाँ
ले के जाएगी कहां अब मेरी नादानी मुझे
बाद मुद्दत के ग़ज़ल मीना ने कह डाली मगर
अपनी लगती ही नहीं लगती है बेगानी मुझे
यूँ दिल मे उतर आया
आँखों की डगर से वो, यूँ दिल मे उतर आया
सहरा की जमीं पर ज्यूँ , महका सा शज़र आया
इंसान कहीं अब तो, ढूंढे से नही मिलते
मिलता है यहाँ जो भी, भगवान नजऱ आया
अनजान जगह में हम, आये थे मुसाफिर बन
लगता है मगर अब तो, अपना ही नगर आया
सपना न हुआ सच्चा ,अपना न रहा कोई
दिल तोड गया वो भी , ये किसका असर आया
परदे मे छिपा बैठा , दीदार था नामुमकिन
उ्म्मीद नहीं थी पर ,वो चांद इधर आया
क्यों वक़्त हुआ ऐसा, रो रो के गुज़ारे दिन
फिर रात ग़मों वाली ,कोई न क़मर आया
सैलाब मे कश्ती है, ये क़हर है क़िस्मत का
शमशीर बने धारे ,कैसा ये सफ़र आया
जब ज़िन्दगी कहने लगी
एक दिन मुझसे मिली जब ज़िन्दगी कहने लगी
हो गए क्यों आप मुझसे अजनबी कहने लगी
दौरे हाज़िर में कोई घर से निकलता ही नहीं
अब गुज़र कैसे करें ये रहबरी कहने लगी
अब पराया हो चुका देखो तो ये साया मेरा
पर सलामत तुम रहो ये बेख़ुदी कहने लगी
दोस्तों के रूप में दुश्मन हज़ारों हैं खडे़
अब करें किस पर भरोसा सादगी कहने लगी
ख़ूब की हमने इबादत और गए दैर -ओ -हरम
पर ख़ुदा मिलता नहीं ये बंदगी कहने लगी
जुल्फ़ उनकी है घटा और लब भी पैमाने बने
मत फ़िदा रुख़सार पे हो मयकशी कहने लगी
छोड़िए आवारगी अब अपने घर की सोचिए
हो गयी बेटी सयानी मुफ़लिसी कहने लगी
नेकियाँ मिलती नहीं है और बदी बढ़ती बहुत
शर्म आँखों में नहीं ये बेरुख़ी कहने लगी
वक़्ते – रुख़सत जो नमी देखी है तेरी आँखों में
रूह भी तड़पी बहुत और ज़ीस्त भी कहने लगी
पाँव में ज़ंजीर ख़ुद नारी ने पहनी प्रेम की
त्याग को पर उसके दुनिया बुज़दिली कहने लगी
जब रदीफ़ो -काफ़िया भी ख़ूबसूरत है मिला
अब ग़ज़ल मीना कहेगी शाइरी कहने लगी
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
तुम मुझको वफाओं की सज़ा क्यों नहीं देते
नफ़रत की कहानी को मिटा क्यों नहीं देते
अब अम्न की गंगा भी बहा क्यों नहीं देते
मंज़ूर अगर इश्क़ हमारा नहीं है तो
फिर ज़ह्र हमें आप पिला क्यों नहीं देते
ये चाँद न छिप जाए कहीं शर्म से जानम
तुम रुख़ पे ये चिलमन भी गिरा क्यों नहीं देते
शैतान बना इंसा करे ज़ुल्म-ओ -सितम रोज़
इक दीप मुहब्बत का जला क्यूँ नहीं देते
राहत भी मिले तुमको भी कुछ अपने ग़मों से
महफ़िल में ग़ज़ल एक सुना क्यों नहीं देते
रुसवा किया है इश्क़ ने गर तुमको है मीना
तस्वीर मेरी दिल से हटा क्यों नहीं देते
हम नुमाइश भी नहीं करते
कभी अपने हुनर की हम नुमाइश भी नहीं करते
करे तारीफ़ कोई अब ये ख़्वाहिश भी नहीं करते
न जीने का सलीक़ा कुछ करें गुस्ताख़ियां हरदम
जो नालायक हैं उनकी हम सिफ़ारिश भी नहीं करते
नहीं रखते कभी हद से ज़ियादा दोस्ती भी हम
कोई धोखा अगर दे दे तो नालिश भी नहीं करते
बुरे हालात सीने में भले नश्तर चुभाते हों
मगर सबसे मदद की हम गुज़ारिश भी नहीं करते
लगाते हैं गले दुश्मन को रंजिश भी नहीं पालें
मिटाने अपने दुश्मन को कोई साज़िश भी नहीं करते
मुसीबत में नहीं होता सगा कोई किसी का भी
ये बादल भी जरूरत पर यूँ बारिश भी नहीं करते
करें रौशन जगत को चाँद तारे आस्मां के पर
ख़ुदा के नूर पर लेकिन वो नाज़िश भी नहीं करते
थमीं साँसे हमारी अब रुकी धड़कन भी सीने की
अधर ख़ामोश मीना हैं ये लर्जिश भी नहीं करते
जो किए वादे
जो किए वादे सभी से अब मुकर जाती हूँ मैं
डोर साँसों की है टूटी यार घर जाती हूँ मैं
दिल ज़िगर और जिस्म में हमदम समाये आप हो
अक्स दिखता आपका ही अब जिधर जाती हूँ मैं
तयशुदा दिन है क़ज़ा को एक दिन आना ही है
ज़िन्दगी जीकर जहाँ से तो गुजर जाती हूँ मैं
चाहती हूँ आपको मैं जान से भी बढ़ के पर
दूर जब जाते हो मुझसे तो बिखर जाती हूँ मैं
घाव पर मेरे छिड़कते हैं नमक अकसर सभी
अब जहां का नाम सुनकर ही सिहर जाती हूँ मैं
ज़िन्दगी हर रोज देती है सबक मुझको नया
सोचकर अच्छे से फिर सच की डगर जाती हूँ मैं
हैं बहुत सुनसान मीना शह्र की हर इक गली
अब कोई आवाज़ सुनती हूँ तो डर जाती हूँ मैं
वादा निभा के लौट आया
झलक मिली नहीं वादा निभा के लौट आया
तमाम रात ही आँसू बहा के.लौट आया
तुम्हारे कूचे से सब कुछ लुटा के लौट आया।
जिगर में तेरी मुहब्बत बसा के लौट आया
ज़माने भर की भी दौलत रखी थी क़दमों पर
तेरे.लिए उसे ठोकर.लगा के.लौट आया
ख़रीद सकता था ईमां को न उसके कोई
मगर में दाम ही ऊँचा लगा के लौट आया
नज़र के सामने उसको न कर सका रुख़सत
यक़ी न होगा मैं मैय्यत सजा के लौट आया
झुका न मैं कभी आगे किसी के हूँ जानम
गया हूँ मैं जहाँ सर को उठा के लौट आया
उदास दिल था ख़याले-शिकस्तगी भी थी
ग़ज़ल मैं बज़्म में लेकिन सुना के लौट आया
नसीब देखिए हासिल हैं रतजगे मीना
हमें तो नींद से कोई जगा के लौट आया
मेरे महबूब सा दुनिया में प्यारा हो नहीं सकता
मेरे महबूब सा दुनिया में प्यारा हो नहीं सकता
गगन का चाँद भी उससे तो अच्छा हो नहीं सकता
गँवारा है कहाँ हमको चुरा ले दिल तेरा कोई
लिखा है नाम मेरा ही किसी का हो नहीं सकता
तुम्हारी फ़ितरतों से हम हैं वाक़िफ़ और ज़माना भी
हमें क्या दूसरों को भी भरोसा हो नहीं सकता
कहाँ बदला है वो अब तक न बदला स्वाद खारा भी
नदी से मिल के भी सागर ये मीठा हो नहीं सकता
च़रागों सा जला के दिल किया रौशन है इस घर को
फ़लक में भी कोई तुझसा सितारा हो नहीं सकता
रखा ईमान गिरवी है करे सच से भी पर्दा वो
कहीं ऐसे बशर का तो ठिकाना हो नहीं सकता
यही है ज़िंदगी मीना यही है बंदगी अब तो
बिना ग़ज़लों के मेरा अब गुज़ारा हो नहीं सकता
उल्फ़त में ग़म ही ग़म मिले कहना फ़ुज़ूल है
उल्फ़त में ग़म ही ग़म मिले कहना फ़ुज़ूल है
प्यारा हमें तो सूद से अपना ये मूल है
क्यों बात बात पे हमें देना ही तूल है
है शूल कोई बात कोई बात फूल है।।
धोके पे हमसफ़र के करें क्यों मलाल हम
क़िस्मत में जबकि फूल के होना मलूल है।।
डरना ही क्या जो राह-ए-मुहब्बत पे चल पड़े
अब तू मिले या ग़म तेरा, सबकुछ क़ुबूल है।।
लेते नहीं उधार न देते उधार भी
हर हाल बस यही तो हमारा उसूल है
हमको पता है इश्क़ में लाज़िम हैं रंज-ओ-ग़म
ऐसे में फिर तो दिल का लगाना ही भूल है।।
मीना के शेर अब भी रिसाले हैं इश्क़ के
लेकिन वरक़-वरक़ है जो अब धूल-धूल है।।
मिले वों अजनबी बन कर रखें भी राज़दारी है
मिले वों अजनबी बन कर रखें भी राज़दारी है
ख़ुदाया हर समय वो चोट देते क्यों करारी है
जिगर का खून पीते जाम भर -भर कर यहाँ अब तो
कहें क्या कल तेरी थी आज मेरी यार बारी है
चढ़ा दें लोग शूली पर नहीं डरते मगर आशिक
फ़क़त है शौक़-ए-रुख़सत,इश्क़ की कैसी खुमारी है
तबाही ही तबाही हर तरफ़ दिखती है क्या कहिये
है नफ़रत इंतिहा दिल में, फ़ुज़ूली जंग जारी है
सहर को ढूँढ़ती है शाम बस जीने की हसरत में
मगर महरूम है उससे सिसायत पड़ती भारी है
बिना रिश्वत लिए हिलते न करते काम भी कोई
बिगाडे़ काम भी अफ़सर ये कैसी लूटमारी है
हुनर अश्कों का है शेरों में आकर ढल गये मीना
करिश्मा है मुहब्बत का ग़ज़ल अच्छी निखारी है
मंज़िल की आरज़ू तो थी रस्ता नहीं मिला
मंज़िल की आरज़ू तो थी रस्ता नहीं मिला
कुछ कर दिखाने का कोई मौका नहीं मिला
कैसे निकलता पार भँवर से वो आदमी
जिसको सहारे के लिए तिनका नहीं मिला
अख़बार के ये छापने वाले हैं ग़मज़दा
शायद कोई भी क़त्ल का किस्सा नहीं मिला
मायूस ज़िंदगी है, उदासी है हर तरफ़
हँसता हुआ कहीं कोई चेहरा नह़ीं मिला
दिलबर जो दिलनशीं थे वो क़ातिल हुए हैं अब
जाने -जाँ जिसको मैं कहूँ अपना नहीं मिला
साज़िश ही करते थे ये अँधेरें भी रोज़ ही
जो दे उजाला वो दिया जलता नहीं मिला
मीना है सोच में कहे अशआर किस तरह
कह दे जो दिल की बात वो मिसरा नहीं मिला
मिलता नहीं हमें कहीं आराम देखिए
मिलता नहीं हमें कहीं आराम देखिए
बेचैन रहते हम तो सहर शाम देखिए
उल्फ़त का होता क्या है ये अंजाम देखिए
चढ़ जाते शूली पर कई गुलफाम देखिए
सर को मेरे झुका न पाए चाह कर कभी
लाखों लगाये लोगों ने इल्ज़ाम देखिए
सौदा ईमान का न कभी हम करेंगे जी
जी चाहे जितना भी बढ़ा के दाम देखिए
दो नाव पर सवारियाँ जो करते हैं यहाँ
रहते हैं ज़िन्दगी में वो नाकाम देखिए
इक रात के थे मेहमाँ वो ख़ामोश अब पड़े
बदनाम हो के बिखरे हैं ये जाम देखिए
गोदी में माँ की देख मुझे डर गयी कज़ा
वापस चला है मौत का हुक्काम देखिए
पयाम-ए-इश्क़ है ये
पयाम-ए-इश्क़ है ये दिल्लगी नहीं प्यारे
है दिल की बात कोई सर-ख़ुशी नहीं प्यारे
गुनाह वो करें लेकिन सज़ा मिले हमको
ये फ़ैसला भी ख़ुदा का सही नहीं प्यारे
चमन से रुठी बहारें हैं एक मुद्दत से
यहाँ पे डाली कोई अब हरी नहीं प्यारे
सुनाते दर्द ही दिल का हमेशा महफ़िल में
ये शायरी तो कोई शायरी नहीं प्यारे
दिलों में दूरियां शिकवे गिले भी लाखों हों
तो दोस्ती भी कोई दोस्ती नहीं प्यारे
मिटी है हसरतें सब और न आरज़ू कोई
निग़ाह में मेरी पर बेबसी नहीं प्यारे
न मयकशी न मुहब्बत न है कोई चाहत
कि हुस्न में भी है अब दिलकशी नहीं प्यारे
लिबास बदला है बदली है सोच लोगों की
अब इस सदी में तो तहज़ीब भी नहीं प्यारे
भला न जिससे कभी हो किसी का भी मीना
वो बंदगी भी कोई बंदगी नहीं प्यारे
इस मुहब्बत का सफ़र
इस मुहब्बत का सफ़र दिलदार तुम जारी रखो
फ़ख़्र जिसपे हो जहां को ऐसी दिलदारी रखो
वक़्त सजदा है करे ऐसी कलमकारी रखो
शेर तुम अपनी ग़ज़ल के यार मेयारी रखो
लाख तरकीबें मिलेंगी ख़त्म करने की हमें
अपने दुश्मन को जलाने एक चिंगारी रखो
कोई उँगली भी नहीं जिसपर उठा पाये कभी
इश्क़ की ऐसी जहां में तुम वफ़ादारी रखो
बच नहीं सकता कोई भी तंज़ तानो से यहाँ
जब करो तुम बात कोई बस समझदारी रखो
काम हो जाएँगे पूरे आपके सब यूँ जान भी
हाथ में कुछ आप अफ़सर के रकम भारी रखो
याद उल्फ़त की संँजोके मैं सभी रख लूँ जहाँ
अपने दिल में इक वफ़ा की ऐसी अलमारी रखो
आशिक़ी बिकती नहीं देखो किसी भी मोल पर
तुम मुहब्बत में कभी लहजा न बाज़ारी रखो
ख़ूब वाक़िफ़ है मुलाज़िम आप हो सरकार के
काम में मीना मगर कोई न मक्कारी रखो
अपनी मिट्टी से हमेशा ही मोहब्बत करना
तुम सदा मुल्क की अपने तो हिफ़ाजत करना
अपनी मिट्टी से हमेशा ही मोहब्बत करना
बज़्म में हुस्न की हर रोज़ ही शिरकत करना
इक ग़ज़ल उनको सुनाना न शिकायत करना
उनकी सूरत में हमेशा ही ख़ुदा को देखो
अपने मां-बाप की हर वक़्त ही इज़्ज़त करना
जिसकी फ़ितरत में दग़ा है वो दग़ा देगा ही
हमने सीखा है मगर यार शराफ़त करना
है वो सीता वही मरियम करो इज़्ज़त उसकी
ज़ख़्म नारी को न दो इतनी इनायत करना
नफ़रतें हों भले हद से भी ज़ियादा लेकिन
इस मुहब्बत में नहीं तुम तो किफ़ायत करना
लोग करते हैं सियासत ही यहाँ लाशों पर
उनको आता कहाँ ज़ख़्मों की मरम्मत करना
नाम लिखते हो हमारा ही फ़क़त मीना तुम ।
तुमको आता भी नहीं ग़म की किताबत करना
न जाने किस लिए
आप देते हैं हमेशा ग़म न जाने किस लिए
रोते रहते हैं यूँ हरदम हम न जाने किस लिए
देख कर माहौल दुनिया का जुदा ये यार अब
आज कल आँखें मेरी है नम न जाने किस लिए
फूल गुलशन के सभी मुरझा गये आयी ख़िज़ाँ
ये हवाएँ भी हुईं बरहम न जाने किसके लिए
अब वफ़ा मिलती कहाँ है इश्क़ में तो देखिए
और आती है भला पूनम न जाने किस लिए
तख़्ते शाही का नहीं है लोभ अब हमको ज़रा
इश्क़ का फैला है ये परचम न जाने किस लिए
राह तकते थक चुकी हैं ये सनम आँखें मेरी
हो गयी साँसे भी तो बेदम न जाने किस लिए
क़ह्र क़ुदरत का कहाँ कम है सितम ढाने यहाँ
पर बनातें हैं ये फिर भी बम न जाने किस लिए
ज़ख़्मों से छलनी किया सीना किसी ने तो मेरा
ये ग़ज़ल मीना बनी मरहम न जाने किस लिए
बगावत नहीं होने वाली
सद्र बनने को बगावत नहीं होने वाली
कैसे कह दूँ के सियासत नहीं होने वाली
बेरुख़ी उनकी बढ़े यार भले ही कितनी
हुस्न से पर हमें नफ़रत नहीं होने वाली
जब तलक चाँद है पहलू में हमारा हमदम
हमको फिर नूर की किल्लत नहीं होने वाली
दिल्लगी लाख करें यार मुहब्बत में वो
पर मेरे दिल से शरारत नहीं होने वाली
मुफ़लिसी में ही पता हमको चला है यारब
अब बिना पैसे के उल्फ़त नहीं होने वाली
इश्क़ में तेरे गिरफ़्तार हुआ दिल मेरा
अब अदालत से जमानत नहीं होने वाली
बदला दस्तूर ज़माने का ग़रीबी में है
अब ख़ुदा की भी इनायत नहीं होने वाली
ताज तख़्तों को हिला दे ये क़लम ऐ मीना
इसका सानी तो हुकूमत नहीं होने वाली
उनको मुहब्बतों में ख़ुदा कर चुके हैं हम
उनको मुहब्बतों में ख़ुदा कर चुके हैं हम
अब अपनी मंज़िलों का पता कर चुके हैं हम
इक बेवफ़ा को अपना ख़ुदा कर चुके हैं हम
सब अपनी मंज़िलों को खफ़ा कर चुके हैं हम
अपना ये दिल वतन पे फ़ना कर दिया है अब
और जाँ लुटा के फ़र्ज़ अदा कर चुके हैं हम
जो ज़ख़्म आपने दिए उसके हैं अब भी घाव
दुश्मन से दिल लगा के ख़ता कर चुके हैं हम
उल्फ़त में सारी रस्म-ए-वफ़ा हम निभा लिए
इस इश्क़ का भी देख नशा कर चुके हैं हम
दीदार हुस्न का मिला अब तक हमें कहाँ
हर ख़्वाब क़ैद से तो रिहा कर चुके हैं हम
नफ़रत की गर्द अब तेरे चेहरे पे दिख पड़ी
अब ख़ूँ बहा के क़र्ज़ अदा कर चुके हैं
करते दुआ सलाम न हमसे वो आजकल
दामन हुआ है चाक गिला कर चुके हैं हम
बेमौत मरते देखा है मुफ़लिस को तो यहाँ
मीना जला के लाश जुदा कर चुके हैं हम
तन्हाइयों का दर्द मिटाने के लिए आ
तन्हाइयों का दर्द मिटाने के लिए आ
डसती हैं ये नागिन सी, बचाने के लिए आ
परवान चढ़े चाहे मुहब्बत ये मेरी आज
या इसका जनाज़ा ही उठाने के लिए आ
सब मारते हैं पत्थरों से क़ैस को लैला
मर जाए न दीवाना बचाने के लिए आ
फिर सामना दुश्मन से हमारा हुआ है आज
हिम्मत को मेरे यार, बढ़ाने के लिए आ
मां,भूल नहीं सकता हूं वो लोरियां तेरी
दामन से अपने मुझको लगाने के लिए आ
सबको मिलें खुशियां जहां में ऐ मेरे ख़ुदा
दुनिया से बुराई को मिटाने के लिए आ
जाते नहीं हैं ज़र,ज़मीं ये साथ में मीना
समझे नहीं ये दुनिया बताने के लिए आ
मेरे ग़मों से आज तो छुट्टी दिला मुझे
मेरे ग़मों से आज तो छुट्टी दिला मुझे
वह वक़्त आ गया है के तू दे विदा मुझे
ये ज़ीस्त मौत की थी अमानत तो सौंप दी
सब कुछ सुपुर्दे-ख़ाक है अब फ़िक्र क्या मुझे
आतिश -ए-हिज्र में जला हर ख़्वाब तो मेरा
मरहम लगा दे प्यार न आँखें दिखा मुझे
ख़्वाहिश थी दौलतें जहाँ की नाम हो मेरे
हिस्से में रंजोग़म का ही रकबा मिला मुझे
इस ज़ीस्त में कभी कहीं मिलता नहीं नया
तक़दीर में लिखी है बस उतरन ही क्या मुझे
ख़ामोशियाँ नहीं हूँ मैं ज़िन्दा सबूत हूँ
लफ़्ज़ों में तेरे ज़िन्दा हूँ मत दे सज़ा मुझे
कम पड़ गये हैं लफ़्ज़ ग़ज़ल के लिए तो अब
कैसे नया कलाम हो मीना बता मुझे
तुहफ़ा न लेंगे प्यार का
तुहफ़ा न लेंगे प्यार का अब तो किसी से हम
करते हैं फ़ैसला ये बड़ी बे-दिली से हम
मिलते नहीं किसी से यहाँ बेरुख़ी से हम
जीते हैं ज़ीस्त को भी तो ज़िंदादिली से हम
बहते हैं अश्क अब भी जहाँ में ग़रीब के
मायूस होके देखते नाचार जी से हम
उसमें न कोई ख़ामी ज़माने भी अब बता
वाक़िफ़ हैं ख़ूब उसकी तो अब हर कमी से हम
ख़ाना बदोश ज़ीस्त में आई बहार अब
करने लगे हैं दोस्ती भी अजनबी से हम
बेबा बनी ये ज़ीस्त है दुल्हन थी कल यहाँ
ये ज़ुल्म रब है कैसा कि पूछें तुझी से हम
तरजीह नफ़रतों को नही देते हम जनाब
इंसां हैं इश्क़ करते हैं हर आदमी से हम
अब हम फ़ना भी हों जो मुहब्बत में क्या गिला
महरूम क्यों भला रहें इसकी ख़ुशी से हम
हर सू है नफ़रतें है अजब ख़ौफ़ शह्र में
गुज़रे तो काँपते हैं कि अब हर गली से हम
हमको लगा है रोग मुहब्बत का जब से है
अंजाम इश्क़ पूछते हैं बे-कसी से हम
करते मलाल हम न किसी भी ख़ता का और
डरते नहीं हैं औरों की छींटाकशी से हम
मीना क़रार दिल को कहीं भी नहीं मिला
बर्बाद ज़िन्दगी है कहें क्या किसी से हम
उल्फ़त की बात पर
झिड़की सदा ही मिलती है उल्फ़त की बात पर
होते हैं क़त्ल लोग मुहब्बत की बात पर
भौंहें चढ़ाते बच्चे नसीहत की बात पर
आँखें चमक उठी हैं वसीयत की बात पर
रिश्तों के बीच करते हैं दीवार वो खड़ी
बन्दूक़ तानते हैं सख़ावत की बात पर
आए वो कटघरे में सवालों से हैं घिरे
नज़रें झुका रहे हैं अदालत की बात पर
क़ीमत तो हर बशर की लगाता जहान है
कुछ लोग जाँ भी देते हैं इज़्ज़त की बात पर
तक़्दीस भाये लोगों सियासत को अब कहाँ
नेता मनाएं मौज ख़बासत की बात पर
मीना वतन की अपने हिफ़ाज़त करे वो क्या
आँसू टपकते जिसके शहादत की बात पर
वह वक़्त आ गया है
मेरे ग़मों से आज तो छुट्टी दिला मुझे
वह वक़्त आ गया है के तू दे विदा मुझे
ये ज़ीस्त मौत की थी अमानत तो सौंप दी
सब कुछ सुपुर्दे-ख़ाक है अब फ़िक्र क्या मुझे
आतिश -ए-हिज्र में जला हर ख़्वाब तो मेरा
मरहम लगा दे प्यार न आँखें दिखा मुझे
ख़्वाहिश थी दौलतें जहाँ की नाम हो मेरे
हिस्से में रंजोग़म का ही रकबा मिला मुझे
इस ज़ीस्त में कभी कहीं मिलता नहीं नया
तक़दीर में लिखी है बस उतरन ही क्या मुझे
ख़ामोशियाँ नहीं हूँ मैं ज़िन्दा सबूत हूँ
लफ़्ज़ों में तेरे ज़िन्दा हूँ मत दे सज़ा मुझे
कम पड़ गये हैं लफ़्ज़ ग़ज़ल के लिए तो अब
कैसे नया कलाम हो मीना बता मुझे
हैरत में हैं सब देख के
इस दिल पे ग़ज़ब ढा रहे शृंगार के जल्वे
हैरत में हैं सब देख के दिलदार के जल्वे
इनपे लिखा है नाम अज़ल से मेरा देखो
ले ले न कोई और ये रुख़सार के जल्वे
पर्दा-नशीं पर्दा ज़रा रुख़ से तो हटा दे
फिर चैन मिले जब हों ये इक़रार के जल्वे
अँगडाई कयामत है हज़ारों हुए घायल
बीमार को शायद दें वो दीदार के जल्वे
डालो भी इनायत की नज़र हम पे कभी तुम
साँसे घुले साँसों में हों फिर प्यार के जल्वे
ये दिल मेरा बेताब है जल्वा भी दिखा दे
माशूक़ परेशांन मिलें यार के जल्वे
नूरानी वो चेहरा है मुहब्बत का गुहर है
हसरत है कि हासिल हों तलबगार के जल्वे
अंदाज़-ए- बयाँ पे फ़िदा हर शख़्स है मीना
दीवाना बनाते तेरे अशआर के जलवे
मैं लेकिन भटक गया
मंज़िल की जुस्तुजू थी मैं लेकिन भटक गया
मैं शहरे दिल को ढूँढने यूँ दूर तक गया
आहट जो आने की मिली मुखड़ा चमक गया
दिल याद कर के जल्वों को तेरे धड़क गया
रिश्तों का ये पहाड़ ज़रा क्या दरक गया
नाराज़ हो वो ख़त मेरे दर पर पटक गया
शरमाया चाँद आस्मां का भी फ़लक में आज
जब इस ज़मी के चाँद का आँचल सरक गया
आराम मेरे ज़ख़्मों को यारा मिला न फिर
तड़पाने को मगर मुझे छिड़का नमक गया
इज़हार इश्क़ का मुझे करना तो था मगर
जब साथ लफ़्ज़ों का न मिला मैं अटक गया
शर्म -ओ-हया के उठ गये पर्दे भी देखिए
आँखों से राज़े-इश्क़ भी यारा झलक गया
मीना जो इज़्ज़तें मिली शुहरत जो है मिली
मेरा वुजूद तब से हर इक को खटक गया
अब इसपे एतबार नहीं
ज़माने वालों को अब इसपे एतबार नहीं
कभी किया बड़ों को हमने शर्मसार नहीं
हमें न आरज़ू है पारसा कहे कोई
हुए किसी की मुहब्बत में दाग़दार नहीं
वो मो’जिज़ा ही कहाँ लूट ले जो महफ़िल को
क़लम में उनके भी अब पहले- सी है धार नहीं
मिलेगी सख़्त सज़ा तुमको भी गुनाहों की
कि सच की होगी अदालत में अब की हार नहीं
मिज़ाज गर्म ही रहता हमेशा से उनका
अदब लिहाज़ पे उनको है इख़्तियार नहीं
लबों पे नाम लिए तेरा ही हुए रुख़सत
चढ़ा दो फूल भी ये ग़ैर की मज़ार नहीं
पता जो होता मिलेगा सभी से धोका हमें
बनाते हम किसी को अपना राज़दार नहीं
क़द को ऊँचा रखो मत घटाया करो
क़द को ऊँचा रखो मत घटाया करो
घर जो उजड़े उन्हें फिर बसाया करो
बज़्म में हौसला तुम बढ़ाया करो
आके चेहरा भी अपना दिखाया करो
दर्दे-दिल की उन्हें भी दवा दो ज़रा
मुफ़िलसों को नहीं तुम सताया करो
बात औरों की भी मानिए कुछ तो अब
अपनी हरदम ही मत तुम चलाया करो
आप निकलो कभी ख़ौफ़ की हद से तो
बे धड़क मुझसे तुम मिलने आया करो
ख़ौफ़ खाओ ख़ुदा का भी थोड़ा सा तुम
झूठे इल्ज़ाम भी मत लगाया करो
बख़्शी नेमत ख़ुदा ने ये मीना हमें
अपनी जाँ इश्क़ में मत लुटाया करो
कभी प्यार से संभाला है
दिए हैं ज़ख़्म,कभी प्यार से संभाला है
ये किस तरह से मुझे ज़िन्दगी ने पाला है
करे है, रोज़ ही उल्फ़त में यूँ तमाशे वो,
हमें सताने को लो अब हिजाब डाला है।
निज़ात मिल गयी हमको भी इस अँधेरे से
जो डाली एक नज़र तूने हुआ उज़ाला है
हमारा काम है अरदास हम करें उसकी
रज़ा ख़ुदा की हो मिलता तभी निवाला है
पुकारो उसको भले बार -बार तुम लेकिन
गया जहां से वो वापस न आने वाला है
ये शाइरी का हुनर तेरी वज़्ह से आया
जो ग़म दिए मुझे उसका ही ये इज़ाला है
बनाता काम जहां में सभी का ये सिक्का
ये सोच मैने उसे जोर से उछाला है
ग़मों की धूप की परवाह क्यों करूँ मीना
बचाने धूप से माँ का दिया दुशाला है
आज भी दिल ये वही साल पुराने माँगे
आज भी दिल ये वही साल पुराने माँगे
दिन वो बचपन के सभी यार यगाने माँगे
हमसे उल्फ़त के वही फिर से ज़माने माँगे
हीर राझां से सभी और फ़साने माँगे
शेवा-ए-इश्क़ में इज़हार-ए -मोहब्बत के लिए
चश्मे वा, तर्ज़े बयाँ, और दहाने माँगे
जब कभी हाथ उठाया है दुआ में हमने
जब भी माँगे वही एहबाब पुराने माँगे
क्या मोहब्बत में हमेशा यही होता है कहो?
उनसे मिलने के लिए दिल क्यूँ बहाने माँगे?
क्या मोहब्बत की अज़िय्यत का मज़ा जाता रहा?
क्यूँ सुकूँ पाने को महबूब के शाने माँगे?
ज़र ज़मीं की नहीं चाहत हमें तो ऐ मीना
मेरी चाहत ये मुहब्बत के ख़ज़ाने माँगे
ज़िन्दगी गुम हो गई
ख़ौफ़ है ऐसा वबा का, ज़िन्दगी गुम हो गई
सोच में गुम है जहां ये, दिलकशी गुम हो गई
जाम -ए-उल्फ़त हैं कहाँ, अब आशिक़ी गुम हो गई
चाँद, को ये क्या हुआ जो चाँदनी गुम हो गई
तोड़ डाला दिल मेरा अब दोष दूँ किसको भला
चाहतों का गुल भी सूखा, डायरी गुम हो गई
अब नहीं शीरीं बयानी और अब वो आशिक़ी
गुल, कली मुरझा गये हैं ताजग़ी गुम हो गई
बागवां ने खुद उजाड़ा है चमन को देखिए
आ गया मौसम ख़िज़ाँ का और कली गुम हो गई
प्यास थी होठों पे मेरे और.दरिया था मगर
पास आए आप तो फिर तिश्नगी गुम हो गई
हाज़िरी है कौन देता उसके भी दरबार में
क्या कहें अब ज़िन्दगी से बंदगी गुम हो गई
अब सुख़नवर नाम के हैं कौन सुनता है इन्हें
इस जहां से आह! मीना शाइरी गुम हो गई
नहीं अच्छे लगते
नफ़रतों के ये शरारे नहीं अच्छे लगते
ख़ून से लिपटे नज़ारे नहीं अच्छे लगते
अपने मां-बाप की जो क़द्र नहीं करते हैं
उनको ऐसे भी दुलारे नहीं अच्छे लगते
ताड़ लेती हैं हमारी ये निगाहें तुमको
बर सरे-बज़्म इशारे नहीं अच्छे लगते
जिनमें ज़हरीले ही सांपों की रिहायश हो फ़क़त
साँप के ऐसे पिटारे नहीं अच्छे लगते
होश खोकर जो ज़मीं पर ही गिरा करते हैं
हमको टूटे हुए तारे नहीं अच्छे लगते
जो अचानक ही सियासत में लगाते हैं यहां
आग भड़काते ये नारे नहीं अच्छे लगते
सादगी से ही सुकूं मिलता है ‘मीना’ दिल को
हर घड़ी चाँद सितारे नहीं अच्छे लगते
नाज़ तेरे हम उठाते रह गए
उम्र भर बस नाज़ तेरे हम उठाते रह गए
हाथ कुछ आया नहीं बस कसमसाते रह गए
तीर नज़रों से वो अपनी यूँ चलाते रह गए
राज़ जो वर्षों छिपा था वो बताते रह गए
इल्म की बख़्शी थी तुमने ये जो दौलत ऐ ख़ुदा
दोनों हाथों से उसे बस हम लुटाते रह गए
कब तलक जीते रहेंगे रोज घुट -घुट के सुनो
ख़्वाब जो देखे थे हमने बस रुलाते रह गए
क़त्ल अरमानों का कर कर के सभी चलते बने
लाश सपनों की अकेले हम उठाते रह गए
की इबादत थी सदा सजदा किया था राह में
देख कर माँ के चरण बस सिर झुकाते रह गए
जो क़दम पोशी किया करते अमीरी में कभी
इस ग़रीबी में मेरी खिल्ली उड़ाते रह गए
तीरगी का ख़ौफ़ जब हद से ज़ियादा ही बढ़ा
शमअ् के मानिंद हम ख़ुद को जलाते रह गए
हाले दिल उनको कभी भी हम सुना पाये नहीं
ज़ख़्म जो मीना दिए थे वो दिखाते रह गए
हमने यहाँ सब कुछ लुटाया है
रही जब दो क़दम मंज़िल मुझे हरदम गिराया है
बता ये ज़ुल्म क्यों मुझ पर ख़ुदा हर बार ढाया है
वफ़ा की राह में हमने यहाँ सब कुछ लुटाया है
किसी के वास्ते हमने ये अकसर दिल जलाया है
उठाया बोझ कंधो पर था जिनका उम्र भर हमदम
उन्हीं ने प्रश्न अब मेरी वफ़ाओं पर उठाया है
मुहब्बत से कभी तुम हाथ मेरे दिल पे भी रख दो
तुम्हीं ने दिल जिगर मेरा ज़माने में चुराया है
ग़मों की आंधियाँ थी और तूफां भी हज़ारों थे
मगर तेरे लिए फिर भी ये दिल हमने बचाया है
हया है बेच खाई और नहीं डर है ज़माने का
नशे में ज़ीस्त डूबी और ख़ुदा को भी भुलाया है
बिना मर्ज़ी के तेरे कोई पत्ता भी नहीं हिलता
ग़ज़ल कहने के क़ाबिल भी मुझे तूने बनाया है
लब पर क्यूँ हैं ताले पड़ गए
अब जहाँ वालों के लब पर क्यूँ हैं ताले पड़ गए
गुल मुहब्बत के सभी मुरझा के काले पड़ गए
आबा-ओ-अज्दाद ने छोड़ी थीं जो जागीर वो
बेच दी बेटों ने और रोटी के लाले पड़ गये
ख़ून आलूदा है सड़कें मज़हबी उन्माद है
अम्न के बातिल सभी देखो मक़ाले पड़ गए
नक़्श मिटते ही नहीं इतिहास के औराक़ से
ज़ालिमों के ज़ुल्म पढ़ आँखों में जाले पड़ गये
रास्ता पहले तो अपना तीरगी में गुम रहा
और फिर आसोज के पीछे उजाले पड़ गये
अहले-दानिश ने हमें यारो नचाया था यहाँ
सब्र की तलक़ीन में पैरों में छाले पड़ गये
आख़िरी लम्हे तलक लड़ता रहा मज़लूम भी
टूटा मीना हौसला और मंद नाले पड़ गए
रुसवाई ही रुसवाई है
हर तरफ़ प्यार में रुसवाई ही रुसवाई है
क्या कहूँ अब तो मेरी जान पे बन आई है
एक जानिब है कुँआ एक तरफ़ है खाई
जाने किस मोड़ पे हमको ये वफ़ा लाई है
कौन ठहरेगा मुक़ाबिल ही तेरे दुनिया में
शोख़ियाँ गुल की हैं क़ातिल तेरी अँगड़ाई है
तेरी नज़रो का निशाना बना ये दिल पागल
दफ़अतन आज तू मुझसे भले टकराई है
राम रहिमन के जले घर हैं उदासी हर सू
आग नफ़रत की भला किसने ये भड़काई है
अब तो जैसे ये बदन चाहता है सिर्फ़ निज़ात
रूह बैचेन है और ज़ीस्त तमाशाई है
देखते हैं वो तमाशा जला के घर ख़ुद ही
हादसा कुछ भी नहीं शौक़ -ए -कबीराई है
मुझसे साया ही जुदा होने लगा है मीना
किसको इल्ज़ाम दूँ जब सबसे शनासाई है
क्या-क्या
लपट नफ़रतों की जलाती है क्या-क्या
न पूछो हमारा ये खाती है क्या-क्या
मुहब्बत भी तुहमत लगाती है क्या-क्या
मिटाती है क्या-क्या बनाती है क्या-क्या
न पूछो मेरी जान हालाते-उल्फ़त
ग़मे-इश्क़ में ये लुटाती है क्या-क्या
बताऊँ तुम्हें क्या ये दुनिया निगोड़ी
बहाने बना ज़ुल्म ढाती है क्या-क्या
बढ़ाती है महफ़िल की रौनक़ हमेशा
ग़ज़ल-गीत उल्फ़त सुनाती है क्या-क्या
कभी रूठ जाती हूँ मैं उससे तो फिर
मनाकर मुझे माँ खिलाती है क्या-क्या
अगर भूल जाती हूँ मीना जो लिखना
तो फिर शारदे-माँ लिखाती है क्या-क्या!
मनाने की ज़रूरत है
जो रूठे हैं फ़क़त उनको मनाने की ज़रूरत है
मिटाकर दूरियों को पास जाने की ज़रूरत है
उदासी ही उदासी है हमारे दिल की बस्ती में
कोई धुन प्यार की छेड़ो तराने की ज़रूरत है
गुज़ारी ज़िंदगी तन्हा किसी की याद में हम ने
मगर इस दौर में हमको ठिकाने की ज़रूरत है
बने मजनू न यूँ घूमो पुलिस की है बहुत सख़्ती
क़फ़स में डालने को बस बहाने की ज़रूरत है
ख़ुदा ने ज़िंदगी बख़्शी सँभालो अब इसे यारो
बिछी लाशें नगर में क्या जताने की ज़रूरत है
सताइश मत करो मेरे हुनर की है अता उसकी
यही अब दूसरों को भी सिखाने की ज़रूरत है
बुलाती मौत है बाहर ख़ुदारा घर से मत निकालो
भला क्या बात ये अब भी बताने की ज़रूरत है
सभी अशआ़र उम्दा हैं ग़ज़ल के आज मीना की
तरन्नुम से फ़क़त इसको सुनाने की ज़रूरत है
तुझको भुला कर देखूँ
तेरा इसरार है मैं तुझको भुला कर देखूँ
दूर यादों का तेरी जाल हटा कर देखूँ
आज तुझको मैं सनम अपना बना कर देखूँ
चाँद तारों से तेरी माँग सजा कर देखूँ
मसअले इश्क़ के सुलझा न सका है कोई
जाके ये बात मैं उनको भी जता कर देखूँ
साजिशें करते हैं दिन रात जमाने वाले
राज़ ये उनको किसी रोज़ बता कर देखूँ
तेरा दुख दर्द नहीं कैसे मिटेगा आख़िर
आ मेरे लाल तुझे दिल से लगा कर देखूँ
देख इंसान हूँ हिन्दू न हूँ मुस्लिम यारा
खून है एक सभी का ये मिलाकर देखूँ
गूफ़्तगू करती है शब जो कभी हम से मीना
तब ग़ज़ल इश्क़ की उसको ये सुनाकर देखूँ
अजीब था
ग़ुंचे अजीब तर थे गुल -ए- तर अजीब था।
आंखें खुलीं तो शह्र का मंज़र अजीब था।
खुशियाँ तमाम उम्र मयस्सर न हो सकीं।
उस नेक आदमी का मुक़द्दर अजीब था।
निकला था दुश्मनों को मिटाने के वास्ते।
अपनो को मार आया वो लश्कर अजीब था।
दुनिया को जीतने की तो चाहत रही उसे
ख़ुद को न जीत पाया सिकन्दर अजीब था।
उस हुस्न -ए -बे -मिसाल के जलवों के सामने
रौशन फ़लक पे माह -ए -मुनव्वर अजीब था
उसकी हवस ने शह्र को वीरान कर दिया
मैं ने सुना है भीड़ का तेवर अजीब था
ताजिर जहाँ ग़मों का ही मीना था हर कोई
ख़ुशियों को बाँटता वो सुख़नवर अजीब था
निभाना नहीं आता
इस ज़िंदगी से हमको निभाना नहीं आता
और मौत के घर से भी बुलावा नहीं आता
इस दौरे सियासत में भरोसा न किसी पर
मग़रूर जवानी को बुढ़ापा नहीं आता
बदले सभी दस्तूर हैं उल्फ़त के यहाँ अब
जलने को मुहब्बत में दिवाना नहींं आता
ग़र ख्वाब मुकम्मल न हों परवाह न करते
अश्कों को भी आँखों से बहाना नहीं आता
दुश्मन तो ज़माने में भी लाखों हैं हमारे
पर दोस्त कोई हमको बनाना नहीं आता
चालों में न हम फँसते हैं हव्वा की तरह और
जन्नत से निकलने का तरीका नहीं आता
तोड़ी सभी ज़ंजीरें हैं ज़ालिम के क़फ़स की
डरते न किसी से हैं डराना नहीं आता
मंज़ूर न मीना को गुलामी भी किसी की
उसको कभी सर को भी झुकाना नहीं आता
दर्द की दवा करता
जहाँ में कौन मेरे दर्द की दवा करता
मेरी ख़ुशी के लिए सब मेरा ख़ुदा करता
मिला वही जो कि बोया कभी था हमने फिर
भला नसीब से अपने गिला मैं क्या करता
है जुस्तुजू मेरी वो शक़्ल तो दे कूज़ा-गर
विसाल-ए-यार ही दिल में मेरे बसा करता
लचक नहीं किसी फलदार डाल सी तुझमें
बता तुझे में रईसों में क्यों गिना करता।
न हमनवा कोई अपना न हमसफ़र मालिक
बचा है पास में क्या जो अदू दग़ा करता
दवा भी बन कभी तू ग़ैर के भी ज़ख़्मों की
बता तू ज़ख़्म ही लोगों के क्यों हरा करता
अज़ल से हाल बुरे देखें थे मुहब्बत के
अगर जफ़ा नहीं करता तो फिर वो क्या करता
सुख़न-शनास की महफ़िल में पहुँचा था मीना
ग़ज़ल मैं ग़र न सुनाता तो क्या मना करता
सारी चिठ्ठियाँ लेकर
जो उसने फेंक दीं वो सारी चिठ्ठियाँ लेकर।
चली हूँ उसकी गली से मैं सिसकियाँ लेकर।।
तडपते भूख से बच्चे बुरा है हाल उनका
मगर न बेचा है ईमान रोटियाँ लेकर
मुराद लेके भला आज में किधर जाऊँ
हर इक जगह से चली हूँ उदासियाँ लेकर
ज़बाँ ख़मोश लबों पे शिकायतें जानम।
चली हूँ इश्क़ की झूठी कहानियाँ लेकर।।
ख़िज़ाँ मिली न मिली है बहार ही मुझको ।
तड़प रहा है ये दिल आज सिसकियाँ लेकर
क़फ़न में लिपटा जनाज़ा गली से जो गुजरा।
लिपट के बेवफ़ा रोया है हिचकियाँ लेकर।।
मिली न थी हमें खुशियाँ कभी मुहब्बत में।
चली जहाँ से जफ़ा की निशानियाँ लेकर।।
बनाई फिर से हैं काग़ज़ की कश्तियाँ मीना
छुपी दिलों में वो बचपन की मस्तियाँ लेकर
रात काट दी
तारों को देख देख के ये रात काट दी
इस दौर ने तो खुशियों की सौगात काट दी
ख़्वाहिश बहुत थी उनका मैं दीदार भी करूँ
इस दुश्मने -जहाँ ने मुलाकात काट दी
तौबा सितम गरीबी के हाये! बहुत बुरे
इस झोपड़ी में हमने ये बरसात काट दी
भूखे थे मुद्दतों से तुम्हारे जहाँन में
इन बेवफ़ाओं ने मेरी ख़ैरात काट दी
सच्चाई की कोई भला सुनवाई है कहाँ
झूठी गवाहियों ने मेरी बात काट दी
बेबस कली की आबरू से जो हैं खेलते
कानून ने दरिन्दों की भी जात काट दी
था हुस्न लाजवाब परी थी वो आसमाँ
चाहत में उसके हमने हवालात काट दी
ईमान का तो सौदा न हमने कभी किया
यूँ भ्रष्ट अफसरों की करामात काट दी
कह दी ग़ज़ल कमाल ये मीना ने आज तो
मिसरा बहुत था उम्दा शुरूआत काट दी
आरज़ू करके
नहीं है फ़ायदा कोई भी आरज़ू करके
न तेरे ज़ख़्मों को देगा कोई रफ़ू करके
अदावतों ने तो जीना मुहाल कर डाला
मिला है किसको यहां क्या लहू-लहू करके
ये तीरगी तो तुम्हारे भी घर पे जा पहुंची
सिला मिला है अँधेरा ये चार सू करके
हमारे ज़ख़्मों पे मरहम कोई लगा जाए
सुकून ऐसा मिला तुझ से गुफ़्तगू करके
ना साथ छोड़ के ग़म को मेरे बढ़ा अब तू
तकी हूँ राह मैं आँखों को सुर्ख़रू करके
गिना रहा है गुनाहों को मेरे ही हरदम
तू आइना भी कभी रख ले रूबरू करके
क़लम उठा के इबादत है कर रही मीना
ग़ज़ल के शेर भी कहती है वो वज़ू करके
किसी के वास्ते
बेज़ुबाँ रखते नहीं नफ़रत किसी के वास्ते
आदमी रखते हैं लेकिन आदमी के वास्ते
आरज़ू कुछ और इसको और न कोई जुस्तजू
बस ये दिल पागल हुआ है आप ही के वास्ते
मुख़्तसर है ज़िन्दगी तैयारी कर लो हश्र की
वक़्त कुछ अपना निकालो बंदगी के वास्ते
हाथ से अपने तू मुझको ज़हर का प्याला पिला
आ गया दीवाना तेरा ख़ुदकुशी के वास्ते
मेरी क़िस्मत में कहीं कोई दिया रोशन न था
मैंने ख़ुद को ही जलाया रोशनी के वास्ते
छोटे कामों से नहीं मिलती बुलंदी दोस्तो
काम कुछ ऊँचा करो अब बरतरी के वास्ते
इक झलक तेरी मिले तो रुख़्सती हो पुर-सुकूँ
तेरे दर पर आया हूँ मैं बस इसी के वास्ते
मीर, ग़ालिब, दाग़ के जैसे ही मीना ने भी अब
ज़िंदगी अपनी लुटा दी शायरी के वास्ते
तो फिर शेर कहें
जाम नज़रों के जो छलकाओ तो फिर शेर कहें
ख़्वाब हमको हसीं दिखलाओ तो फिर शेर कहें
लौट कर दिन नहीं क्यूँ आते हैं फिर बचपन के
ये पहेली कोई सुलझाओ तो फिर शेर कहें
ज़ख़्म सारे ये निशानी हैं मेरी उल्फ़त के
तुम कभी दिल मेरा बहलाओ तो फिर शेर कहें
मोंगरा चम्पा चमेली खिली दिल में मेरे
अब इन्हें प्यार से महकाओ तो फिर शेर कहें
जब भी मिलते थे झुका लेते थे नज़रें अपनी
आज फिर वैसे ही शरमाओ तो फिर शेर कहें
बेसबब बात बनाते हैं वो अब मिलने पर
राज़ ये इश्क़ का समझाओ तो फिर शेर कहें
दिल में उम्मीद का मीना भी जला दो दीपक
ग़म ग़रीबों का न दहकाओ तो फिर शेर कहें
अपनों की भीड़ में
तन्हा ही हम रहे सदा अपनों की भीड़ में
जैसे कि तबस्सुम रहे अश्कों की भीड़ में
उलझी है ज़िंदगी मेरी क़िस्मत है बेवफ़ा
ग़म की है तीरगी भी उजालों की भीड़ में
कैसा है शह्र जिसमें न मंज़िल न राह है
डेरा है मौत का यहाँ सजदों की भीड़ में
ग़ाफ़िल नशे में फ़ील है मदहोश है शतर
सालार बावला खड़ा प्यादों की भीड़ में
रोते ही हम रहे यहाँ गर्दन को ख़म किये
पहचान अपनी खो गयी लोगों की भीड़ में
मंज़र ये तबाही के तमाशा हैं देखते
आते हैं ज़लज़ले कई ख़ुशियों की भीड़ में
तोड़ा है दिल ज़माने ने मजबूर हुआ इश्क़
परवाह कौन करता है ज़ख़्मों की भीड़ में
बिजली गिरी है ऐसी कि ‘मीना’ का घर जला
देखूँ धुआँ ही बस यहाँ आहों की भीड़ में
क़ुर्बान -सी आँखें
खड़ी सरहद पे सीना तानके क़ुर्बान -सी आँखें
तके माँ राह है.उनकी हुईं बेजान -सी आँखें
अकेली जब चलूँ घर से शिकारी राह तकते हैं
बदन छूने को हैं व्याकुल बनी शैतान -सी आँखें
यही है धर्म मेरा और यही है कर्म मेरा तो
बनी है रहनुमा मेरी मिली वरदान- सी आँखे
हक़ीक़त से करूँ कैसे बता मैं रू-ब-रू उनको
कई सागर छिपाती हैं बनी तूफ़ान- सी आँखें
कई अहबाब ऐसे हैं चलाते तीर हैं दिल पे
सपोलों से रखो दूरी कहें अनजान- सी आँखें
भरम आहू को पानी का, था निकला रेत का दरिया,
मिला पानी नहीं तो बुझ गईं हैरान- सी ऑंखें।
जवानी चार दिन की थी, बुढ़ापा कह रहा मीना
बयाँ सब उम्र के क़िस्से करें वीरान -सी आँखें
नाम मुहब्बत रखा गया
दुनिया को इस तरह से सलामत रखा गया
दो दिल मिले तो नाम मुहब्बत रखा गया
गर वक़्त साथ दे तो बुलंदी पे हैं सभी
रूठा अगर तो नाम कयामत रखा गया
फैलाया हाथ हमने किसी के न सामने
ख़ुद्दारियों को सारी अलामत रखा गया
सब कुछ लुटाया उसने हमारे ही वास्ते
माँ का भी नाम इसलिए जन्नत रखा गया
पहचान हमको ग़ज़लों से यारा मिली कहाँ
शाइर नहीं ये तर्के -हक़ीक़त रखा गया
लिखदी ग़ज़ल है आज ये मीना ने ख़ून से
उनवान ख़ूब इसका भी उल्फ़त रखा गया
रास्तो को वो छोड़कर तन्हा
रास्तो को वो छोड़कर तन्हा।
क्यूँ खड़ा है ये राहबर तन्हा।
फिर मिलूंगी ग़मों से आगे, बस,
मुझको चलना है मीलभर तन्हा।
इससे से ज़्यादा कोई मुसीबत है?
वो उधर है, मैं हूँ इधर तन्हा।
मिल ही जाता है जो नसीब में है,
कौन रहता है उम्र भर तन्हा।
मोड़ ले हर तरफ से दिल अपना,
ज़ीस्त करनी है जो बसर तन्हा।
संग पत्थर हो या कि काँटे फिर
तै तो करनी है ये डगर तन्हा
कोई मीना नहीं है साथ मे अब,
रह गयी हूँ मैं इस क़दर तन्हा।
यूँ किसी का बना नहीं जाता
यूँ किसी का बना नहीं जाता
हमसे सौदा किया नहीं जाता
तू कभी कह दे हमसे ऐ दिलबर
बिन तेरे अब रहा नहीं जाता
इतना हम खो चुके हैं अब उनमें
उनसे कुछ भी कहा नहीं जाता
ये मुहब्बत नहीं तो और क्या है
दूर हम से हटा नहीं जाता
दौलते-हुस्न मिल गई हमको
बज़्म से अब उठा नहीं जाता
होगा दस्तूर ये कहीं का मगर
तंज़ हमसे कसा नहीं जाता
हौसला बाक़ी अब नहीं दिल में
याद में यूं जला नहीं जाता
खो चुके हाय अपना ईमाँ तक
वस्ल में और क्या नहीं जाता
हम हुनर जानते हैं उल्फ़त के
दावा “मीना” किया नहीं जाता
वादा करके मुकर गया कब का
वादा करके मुकर गया कब का
वो तो दिल से उतर गया कब का
ख़्वाब आँखों के टूट जाने से
मैं ग़मों से उबर गया कब का
ज़ेहन में ख़ौफ़ है अभी बाक़ी
हादसा तो गुज़र गया कब का
मेरे अंदर जो मुझसा था कोई
आदमी वो तो मर गया कब का
मैं ग़मों से यूँ दिल लगा कर ही
किर्चें किर्चें बिखर गया कब का
दिल में हमने बिठाया था जिसको
करके वो चश्मे-तर गया कब का
जिसका क़ाइल था ये ज़माना भी
हाथों से वो हुनर गया कब का
देख कर उनके हुस्न के जल्वे
कोई हद से गुज़र गया कब का
बर्क़ जैसी निगाह से हमको
क़त्ल मीना वो कर गया कब का
इस उल्फ़त में घायल हो क्या
इस उल्फ़त में घायल हो क्या
और हुए तुम पागल हो क्या
अश्कों के सँग बहते रहते
नैनों के तुम काजल हो क्या
दूर करे पल में ग़म सारे
पावन माँ का आँचल हो क्या
और कहें क्या तुम ही बोलो
रोज़ गरजते बादल हो क्या
नाजुक ऐसे बनती हो क्यों
तुम ढाका की मलमल हो क्या
याद हमेशा आते मुझको
बीत गया जो वो कल हो क्या
प्यास बुझादी जीवन भर की
पावन तुम गंगाजल हो क्या
मीना फ़जा वही मौसम भी
बिन साजन के बेकल हो क्या
कभी समझा नहीं भगवान हूँ मैं
कभी समझा नहीं भगवान हूँ मैं
ज़मीं पर जब रहूँ इंसान हूँ मैं
सुरों की बह रही सरिता सी अंदर
लगे वीणा से छेड़ी तान हूँ मैं
सितारा हूँ ज़मीं पर आस्मां का
किसी के नूर की पहचान हूँ मैं
फिरावानी ग़मों की बढ़ गई तो
तसल्ली की बड़ी परवान हूँ मैं
ख़ुशी है नाम की दुख का ख़जाना
ग़मों में खुश हूँ वो नादान हूँ मैं
कहाँ मिलती बहाऱें हैं सभी को
चमन उजड़ा हुआ वीरान हूँ मैं
करूँ क्यों वस्ल का इसरार मीना
मुक़द्दर से नहीं अनजान हूँ मैं
जुदाई में यूँ नावदाँ हो गए हम
जुदाई में यूँ नावदाँ हो गए हम
ग़मों की नई दास्ताँ हो गए हम
जला तन बदन इश्क़ की आग में फिर
बचा कुछ नहीं और धुआँ हो गए हम
हमें रास आई न उल्फ़त तुम्हारी
हुआ छलनी दिल बदगुमाँ हो गए हम
मुंँडेरों पे छलके जो आँसू हमारी
बिना कुछ कहे ही बयाँ हो गए हम
मयस्सर न था कि मिले कोई मंज़िल
भटकते रहे कारवाँ हो गए हम
यही बात सुननी है तुमको तो सुनलो
मोहब्बत में बदनाम, हाँ हो गए हम
मोहब्बत में उनकी कहें अब क्या मीना
ज़मीं पे रहे आसमाँ हो गए हम
इश्क़ करना भी क्या सज़ा है कोई
इश्क़ करना भी क्या सज़ा है कोई
मुझपे तोहमत लगा गया है कोई
दर्द ग़म में यूँ मुब्तिला है कोई
और मसर्रत से झूमता है कोई।
मुझको तन्हाई मार डालेगी
जैसे रह रह के डस रहा है कोई।
इक इबादत है ,इश्क़ ऐ लोगो।
फिर भी पैसे से तौलता है कोई
रात इस वस वसे में बीत गई।
जैसे खिड़की से झाँकता है कोई
तश्नगी अब मेरी बुझा साकी
तुझसे मेरा भी राब्ता है कोई
रतजगे दे के हमको ऐ मीना,
चैन की नींद सो रहा है कोई।
कौन है जिसकी कोई कहानी नहीं
कौन है जिसकी कोई कहानी नहीं
इश्क़ में मुझसी ऐसी दिवानी नहीं
क्यूँ नहाते नहीं रंग ए उल्फ़त से तुम
इश्क़ मेरा ये क्या जाफ़रानी नहीं
हमने इज़हारे उल्फ़त किया इस तरह
सर झुका के कहा पर ज़ुबानी नहीं
है अदब और न तहज़ीब उसमें कोई
आदमी है मगर ख़ानदानी नहीं
लूँ अदब से सदा नाम ग़ालिब का मैं
उनकी ग़ज़लों का कोई भी सानी नहीं
चाँद को तोड़कर ला रहे थे जनाब
अब कोई उनमें जोश -ए- जवानी नहीं
किस क़दर प्यार है उनको मीना कहो
उनके जोशे जुनूँ का तो सानी नहीं
यूँ किसी का बना नहीं जाता
यूँ किसी का बना नहीं जाता
हमसे सौदा किया नहीं जाता
तू कभी कह दे हमसे ऐ दिलबर
बिन तेरे अब रहा नहीं जाता
इतना हम खो चुके हैं अब उनमें
उनसे कुछ भी कहा नहीं जाता
ये मुहब्बत नहीं तो और क्या है
दूर हम से हटा नहीं जाता
दौलते-हुस्न मिल गई हमको
बज़्म से अब उठा नहीं जाता
होगा दस्तूर ये कहीं का मगर
तंज़ हमसे कसा नहीं जाता
हौसला बाक़ी अब नहीं दिल में
याद में यूं जला नहीं जाता
खो चुके हाय अपना ईमाँ तक
वस्ल में और क्या नहीं जाता
हम हुनर जानते हैं उल्फ़त के
दावा “मीना” किया नहीं जाता
दिल मे जब से तेरा बसर देखा
दिल मे जब से तेरा बसर देखा
पीछे मुड के न इक नज़र देखा
लाख इंसा निगाह से गुज़रे
हमने तुझसा कहाँ बशर देखा
रौशनी से भरी मेरी दुनिया
कोई तुम सा नहीं क़मर देखा
प्यार कर ढूढ़ता फिरे ख़ुद को
आदमी यूँ न बेख़बर देखा
रब का कोई पता मिला न हमें
उसको जाने किधर -किधर देखा
छोड दी दौलतें ज़माने की
आपने जब से इक नज़र देखा
नफ़रतों के जहां में इंसा को
ख़ून से हमने तरबतर देखा
ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही मीना
इश्क़ मे कैसा ये हुनर देखा
कोई अपना न पराया मौजूद
कोई अपना न पराया मौजूद
सारा मौजूद न आधा मौजूद
झूट ही झूट फ़क़त है जग में
अब यहाँ कौन है सच्चा मौजूद
इश्क़ की फैली है ख़ुशबू हरसू
अब सर-ए-शह्र है चर्चा मौजूद
आज भी कुछ तो दबा है उसमें
कूचा-ए-दिल में है शोला मौजूद
साथ रहता है वो मेरे फिर भी
ख़ौफ़ दिल में है ये कैसा मौजूद
प्यास दौलत की बुझा पाए जो
कोई ऐसा नहीं दरिया मौजूद
शे’र कहने के लिए ऐ “मीना”
चाहिए बह्र में मिसरा मौजूद
कुछ तो हाथों में हिना मौजूद है
कुछ तो हाथों में हिना मौजूद है
इश्क़ में अब भी वफ़ा मौजूद है
अब भरोसा भी करूँ कैसे बता
वायदों में भी दग़ा मौजूद है
कहते हैं छलके हुए ये अश्क भी
प्यार करने का सिला मौजूद हैं
गर्दिशों मे भी नहीं झुकता कभी
मुफ़लिसी में सर उठा मौजूद है
बज़्म में कह दो ग़ज़ल उम्दा कोई
खूबसूरत काफ़िया मौजूद है
चाँद भी उसके बराबर है नहीं
नाज़ो नखरों में हया मौजूद है
हारता मीना ये बाज़ी जीत के
साथ तेरे दूसरा मौजूद है
मुहब्बत में शरारत हो गयी है
मुहब्बत में शरारत हो गयी है
बुरी इस दिल की हालत हो गयी है
नहीं डर है शिकायत का हमें अब
अदालत से जमानत हो गयी है
हड़प कर जाते हैं जनता की दौलत
भला कैसी सियासत हो गयी है
गिरावट हर तरफ आयी है अब तो
ये उल्फ़त भी तिजारत हो गयी है
मेरा सोज़- ए-दरूँ कहता है मुझसे
नसीहत अब ये चाहत हो गयी है
क़दम जब से पड़े इस घर में तेरे
मुझे हासिल ये जन्नत हो गयी है
तेरा मुश्क -ए -बदन है जान लेता
तुझे छूने की हसरत हो गयी है
ज़मीं अम्बर हुआ हमराज़ मीना
ख़ुदा की कुछ इनायत हो गयी है
खेल क़िस्मत अजब दिखाती है
खेल क़िस्मत अजब दिखाती है
नाच सबको ही यह नचाती है
इस मुसीबत के दौर में देखो
आँख रब की तो भीग जाती है
भूल जाता हूँ ग़म भी मैं जग का
गोद में जब भी माँ बिठाती है
तीरगी है नसीब में लेकिन
श’म्अ जल के मुझे जलाती है
क़ैद है ज़िंदगी क़फ़स में अब
रोज़ उड़ने को फड़फड़ाती है
कोख़ में देके ज़िन्दगी माँ फिर
मरने तक फ़र्ज़ सब निभाती है
क़ब्र में भी सुकूँ नहीं मिलता
रोज़ उसकी ही याद आती है
ग़लती की मिलती है सज़ा मीना
ख़ूब क़ुदरत भी आज़माती है
मेरे इस प्यार को अमर कर दे
मेरे इस प्यार को अमर कर दे
मुझपे चाहत की इक नज़र कर दे
इक क़दम अपने रख के अब जानू
इस मकां को तो आज घर कर दे
जल रहा आशियाँ मुहब्बत का
रहमतें अपनी तो इधर कर दे
जान जाती है याद में उनकी
बे-ख़बर को तू ये ख़बर कर दे
इश्क़ रुसवा न हो कभी मेरा
अब दुआ में तो ये असर कर दे
ज़ीस्त के ख़ार सब निकल जाएँ,
ज़ीस्त, फूलों भरी डगर कर दे
गुनगुनाते फिरें वो, ऐ मीना,
शाइरी में भी वो हुनर कर दे
उनको गर्दिश में पुकारा जाएगा
उनको गर्दिश में पुकारा जाएगा
इस तरह जीवन सँवारा जाएगा
बेख़बर वो है, हर इक इल्ज़ाम से,
देखना बेमौत मारा जाएगा।
इश्क़ है मन्नत, अकीदत जानिए
रात दिन उसको निहारा जाएगा
करलो कितनी कोशिशें तुम आज फिर
स्वाद सागर का न खारा जाएगा
होंठों से गायब रहेगी ये हँसीं
जां से जब कोई हमारा जाएगा
नाम तेरा ही लिखा दिल पे सनम
फिर कहीं दिल ये न हारा जाएगा
ज़िन्दगी मीना बना बैठे जिन्हें
अब उन्हें कैसे बिसारा जाएगा
मुझ में
बा-ख़बर सा है बे-ख़बर मुझ में
है नुमायाँ कोई बशर मुझ में
कोई छू ले तो ख़ाक़ हो जाए
अब भी बाक़ी है वो शरर मुझ में
वो दिखाता है ऐब को भी हुनर
रहता है जो कि शीशा-गर मुझ में
हर अदा बेमिसाल है उनकी,
इश्क़ का हो रहा असर मुझ में
ज़ीस्त ज़ंगो-जदल हुई ऐसी
ख़ौफ़ बस कर रहा है घर मुझ में
जानता है सबब अँधेरें का
है क़मर कोई मुस्तक़र मुझ में
क्यूँ तमाशा बना हुआ है मिरा
क्या नज़र आ गया वजर मुझ में ?
हौसलों को अज़ीम रखता है
क्या बसा है वो ताजवर मुझ में?
कश्ती तूफाँ से मोड़ लाई हूँ
अज़्म मीना है इस क़दर मुझ में
अच्छी नहीं
आँखों में इतनी नमी अच्छी नहीं
हमसे अब नाराज़गी अच्छी नहीं
बज़्म में बैठे वो नज़रें फेर कर
इश्क़ में ये बेरुख़ी अच्छी नहीं
हौसला ता-ज़िंदगी रखना बुलंद
इस क़दर आज़ुर्दगी अच्छी नहीं
वो सराबों में ग़ज़ालों की तरह
इश्क़ की सर गश्तगी अच्छी नहीं
पास रखिए अपनी उल्फ़त का ज़रा
प्यार में आवारगी अच्छी नहीं।
हर तरफ तुमको ही देखे ये नज़र
बज़्म में तेरी कमी अच्छी नहीं
मीर ग़ालिब सा सुख़न दरकार है
आज मीना शायरी अच्छी नहीं
महसूस की
ज़ीस्त ये हमने थमी महसूस की
साँस जब भी आख़िरी महसूस की
गुनगुनाने हम लगे अपनी ग़ज़ल
जब कभी भी आशिक़ी महसूस की
हमसफ़र ने साथ जब छोड़ा मेरा
हर समय उसकी कमी महसूस की
तीरगी में रोशनी आई नज़र
आँखों ने जब मयकशी महसूस की
दोस्त उसको हम समझते रह गए
उसने लेकिन दुश्मनी महसूस की
छू लिया जब मखमली तुमने बदन
हमने तब इक गुदगुदी महसूस की
महफ़िलों में छा गयी मीना ग़ज़ल
शाइरों ने शाइरी महसूस की
कोई इन दर्द के नालों को कहाँ देखेगा
वो भला आँख के जालों को कहाँ देखेगा
कोई इन दर्द के नालों को कहाँ देखेगा
रोज़ इल्ज़ाम लगाएगा ज़माना इन पर
वो ग़रीबों के निवालों को कहाँ देखेगा
मर मिटेगा तेरी इन शोख़ अदाओं पर दिल
वो ज़माने के सवालों को कहाँ देखेगा
मयकशी की जिसे आदत पड़ी है देखो वो
इन गुलाबी तेरे गालों को कहाँ देखेगा
कोई मुख़्तार न होगा यहाँ इन साँसों का
इस सियासत की भी चालों को कहाँ देखेगा
रोज़ बदलेगी ये रुत देखना बारूदों से
कोई चुभते हुए भालों को कहाँ देखेगा
जिसकी क़िस्मत में लिखी तीरगी ही मीना बस
वो भला दिन के उजालों को कहाँ देखेगा
हद से सिवा मिले के बहुत मुख़्तसर मिले
हद से सिवा मिले के बहुत मुख़्तसर मिले
हमको ख़ुदा करम तेरा शामो सहर मिले
मौला मुझे सुकून की कोई डगर मिले
ख़्वाहिश मेरी कहाँ मुझे लालो-गुहर मिले
तेरे करम की बारिशें मुझपर जो ख़ुदा
परवाज़ मैं भी कर सकूँ मुझको जो पर मिले
शिद्दत से फ़र्ज़ पूरा करे अपना जो यहां
मुझको हरिक ही मोड़ पे वो राहबर मिले
माज़ी के साथ हाल को भी देखना ज़ुरूर,
जब भी निजात ग़म से तुम्हें हम नज़र मिले
गुलज़ार हो ये ज़ीस्त मिले छाँव और हमें
हसरत है बस ये राह में कोई शजर मिले
तेरी ही जुस्तजू है फ़क़त आरज़ू तेरी
मीना रज़ा तेरी हमें तो उम्र भर मिले
छुपा कर रक्खें
हो न जाए कहीं रुसवाई छुपा कर रक्खें
इन अमीरों से शनासाई छुपा कर रक्खें
फ़ायदा कुछ नहीं चतुराई छुपा कर रक्खें
मूर्ख के सामने दानाई छुपा कर रक्खें
कौन करता है यक़ीं आपकी इन बातों पर
इसलिए अपनी ये सच्चाई छुपा कर रक्खें
लालची कोई भ्रमर इसको चुरा ले न कहीं
फूल कलियाँ सभी अँगड़ाई छुपा कर रक्खें
सब उड़ाएँगें हँसीं साथ न देगा कोई
दर्द की कुछ नहीं सुनवाई छुपा कर रक्खें
आ न जाना कभी तुम साहिलों के झाँसे में
ये समंदर सदा गहराई छुपा कर रक्खें
ज़ख़्म ही देंगे सभी क्या दवा देंगे मीना
राज़दारों से भी परछाई छुपा कर रक्खें
महँगी पड़ी
ग़म मुहब्बत में मिले और बे-ख़ुदी महँगी पड़ी
क़ैस लैला सी हमें दीवानगी महँगी पड़ी
हमको तो ऐ वक़्त तेरी बेरुख़ी महँगी पड़ी
बेबसी हर-सू दिखी यूँ तीरगी महँगी पड़ी
बे अदब इस दौर में ये ज़ीस्त भी आसां न थी
दाँव कुछ आते नहीं थे सादगी महँगी पड़ी
इम्तिहाँ हम रोज़ देते थे मुहब्बत में मगर
लोगों ने जब तोड़ा दिल को आशिक़ी महँगी पड़ी
रोज़ ही इंसानियत का क़त्ल होता है यहाँ
ऐ अमीरे-शह्र तेरी दोस्ती महँगी पड़ी
कुछ नहीं हासिल हुआ रूठा ज़माना है अलग
झूठ की हमको यहाँ पर पैरवी महँगी पड़ी
कर न पायी ये कभी आबाद तो क़ल्बो -जिगर
हमको मीना रोज़ की ये शायरी महँगी पड़ी
इस दिल पे ग़ज़ब ढा रहे शृंगार के जल्वे
इस दिल पे ग़ज़ब ढा रहे शृंगार के जल्वे
हैरत में हैं सब देख के दिलदार के जल्वे
इनपे लिखा है नाम अज़ल से मेरा देखो
ले ले न कोई और ये रुख़सार के जल्वे
पर्दा-नशीं पर्दा ज़रा रुख़ से तो हटा दे
फिर चैन मिले जब हों ये इक़रार के जल्वे
अँगडाई कयामत है हज़ारों हुए घायल
बीमार को शायद दें वो दीदार के जल्वे
डालो भी इनायत की नज़र हम पे कभी तुम
साँसे घुले साँसों में हों फिर प्यार के जल्वे
ये दिल मेरा बेताब है जल्वा भी दिखा दे
माशूक़ परेशांन मिलें यार के जल्वे
नूरानी वो चेहरा है मुहब्बत का गुहर है
हसरत है कि हासिल हों तलबगार के जल्वे
अंदाज़-ए- बयाँ पे फ़िदा हर शख़्स है मीना
दीवाना बनाते तेरे अशआर के जलवे
कौन था
प्यार का मुझको सबक आख़िर सिखाता कौन था
शम्अ उल्फ़त की मेरे दिल में जलाता कौन था
अपने सीने से हमें हँस कर लगाता कौन था
और सिवा माँ के मुहब्बत से बुलाता कौन था
भूल बैठा है तू शायद ऐ बता हमदम मेरे
याद में तेरी यहाँ आँसू बहाता कौन था
जिसके शेरों में तुम्हारा रंग दिखता था मुझे
उस ग़ज़ल को बारहा यूँ गुनगुनाता कौन था
शोला बारी आँखों में थी और बहके थे क़दम
शोख़ दिलकश सी निगाहों से पिलाता कौन था
छोड़ कर जो चल दिया उससे तो पूछे कोई
उसके दिल में मा- सिवा मेरे समाता कौन था
मीरो-ग़ालिब जैसा कोई भी नहीं शायर हुआ
सामने उनके सुख़न में ठहर पाता कौन था
मंज़िल की जुस्तुजू थी मैं लेकिन भटक गया
मंज़िल की जुस्तुजू थी मैं लेकिन भटक गया
मैं शहरे दिल को ढूँढने यूँ दूर तक गया
आहट जो आने की मिली मुखड़ा चमक गया
दिल याद कर के जल्वों को तेरे धड़क गया
रिश्तों का ये पहाड़ ज़रा क्या दरक गया
नाराज़ हो वो ख़त मेरे दर पर पटक गया
शरमाया चाँद आस्मां का भी फ़लक में आज
जब इस ज़मी के चाँद का आँचल सरक गया
आराम मेरे ज़ख़्मों को यारा मिला न फिर
तड़पाने को मगर मुझे छिड़का नमक गया
इज़हार इश्क़ का मुझे करना तो था मगर
जब साथ लफ़्ज़ों का न मिला मैं अटक गया
शर्म -ओ-हया के उठ गये पर्दे भी देखिए
आँखों से राज़े-इश्क़ भी यारा झलक गया
मीना जो इज़्ज़तें मिली शुहरत जो है मिली
मेरा वुजूद तब से हर इक को खटक गया
ज़माने को मैं जला लूँ अगर इजाज़त हो
ज़माने को मैं जला लूँ अगर इजाज़त हो
नसीब तुमको बना लूँ अगर इजाज़त है
है वो दरिंदगी डरते हैं गुल भी भौरों से
जहां से तुमको छिपा लूँ अगर इजाज़त हो
इलाज मिलता नहीं ज़ख़्म है बड़ा ग़हरा
कहो तो दिल में सजा लूँ अगर इजाज़त हो
नज़र नज़र से मिले और मिले ये दिल दिल से
नक़ाब रुख़ से हटा लूँ अगर इजाज़त हो
नवाज़िशें हैं बढ़ी जब से दिल मचलता है
मैं अपने दिल को मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं ख़ुद को क़ैस बना लूँ बने तू जो लैला
कि नाम कुछ तो कमा लूँ अगर इजाज़त हो
कहीं चुभें न तेरे गुलबदन को ये मीना
मैं रह से ख़ार उठा लूँ अगर इजाज़त हो
किधर जाता है
राह-ए-उल्फ़त से परेशान, किधर जाता है
अपनी मंज़िल से भी अनजान किधर जाता है
झूठ से हार के नादान किधर जाता है
मार के अपना तू ईमान किधर जाता है
बिक रहा हूँ सरे बाज़ार तेरी शर्तो पर
दे के मुझको तू ये नुक़सान किधर जाता है
तेरी यादों का उठा था जो मेरे सीने से
देखना है कि वो तूफ़ान किधर जाता है।।
मैं इसी सोच में उलझी हूँ बड़ी मुद्दत से
बाद मरने के ये इंसान किधर जाता है।
क़त्ल करती हूँ हर इक लम्हा तेरी यादों का
तू बना के मुझे श्मशान किधर जाता है
मयकदा भी है, तेरा घर भी, सनम-ख़ाना भी
आज़माना है कि अब ध्यान किधर जाता है।।
नेकियाँ छोड़ के जिसने जो कमाया मीना
देखिए ले के वो सामान किधर जाता है।।
ज़माने वालों को अब इसपे एतबार नहीं
ज़माने वालों को अब इसपे एतबार नहीं
कभी किया बड़ों को हमने शर्मसार नहीं
हमें न आरज़ू है पारसा कहे कोई
हुए किसी की मुहब्बत में दाग़दार नहीं
वो मो’जिज़ा ही कहाँ लूट ले जो महफ़िल को
क़लम में उनके भी अब पहले- सी है धार नहीं
मिलेगी सख़्त सज़ा तुमको भी गुनाहों की
कि सच की होगी अदालत में अब की हार नहीं
मिज़ाज गर्म ही रहता हमेशा से उनका
अदब लिहाज़ पे उनको है इख़्तियार नहीं
लबों पे नाम लिए तेरा ही हुए रुख़सत
चढ़ा दो फूल भी ये ग़ैर की मज़ार नहीं
पता जो होता मिलेगा सभी से धोका हमें
बनाते हम किसी को अपना राज़दार नहीं
क़द को ऊँचा रखो मत घटाया करो
क़द को ऊँचा रखो मत घटाया करो
घर जो उजड़े उन्हें फिर बसाया करो
बज़्म में हौसला तुम बढ़ाया करो
आके चेहरा भी अपना दिखाया करो
दर्दे-दिल की उन्हें भी दवा दो ज़रा
मुफ़िलसों को नहीं तुम सताया करो
बात औरों की भी मानिए कुछ तो अब
अपनी हरदम ही मत तुम चलाया करो
आप निकलो कभी ख़ौफ़ की हद से तो
बे धड़क मुझसे तुम मिलने आया करो
ख़ौफ़ खाओ ख़ुदा का भी थोड़ा सा तुम
झूठे इल्ज़ाम भी मत लगाया करो
बख़्शी नेमत ख़ुदा ने ये मीना हमें
अपनी जाँ इश्क़ में मत लुटाया करो
इश्क़ जाता है वहीं हुस्न जिधर जाता है
इश्क़ जाता है वहीं हुस्न जिधर जाता है
हो अगर सच्ची मुहब्बत तो सँवर जाता है
ज़ीस्त में आज हैं खुशियां तो हैं कल मातम भी
दिल से इनका नहीं जल्दी ही असर जाता है
इश्क़ की राह पे चलना है बहुत मुश्किल सा
बात जब उनकी हो दिल और जिगर जाता है
जो तपन से किसी इंसां को सुकूँ देता था
आज कटता वही मासूम शजर जाता है
ले के फिरते सभी इतनी भयानक सूरत
ख़ुद के साये से भी इंसान ये डर लगता है
डूब जाते हैं यहाँ सब को बचाने वाले
वक़्त पे ख़ुद को बचाने का हुनर जाता है
फ़ुर्सते अब कहां मिलने की बची हैं मीना
सुब्ह से निकला बशर शाम को घर जाता है
अपने दामन को बचाके रखो मक्कारी से
अपने दामन को बचाके रखो मक्कारी से
ज़ीस्त को जीते रहो सादगी, ख़ुद्दारी से
ये ज़रूरी तो नहीं ख़्वाब मुकम्मल हों सभी
मंज़िलें मिलतीं हैं इंसान को दुश्वारी से
आस्तीनों के जो हैं सांप, नज़र में रखिए
डस न जाएं ये कहीं मुल्क को ग़द्दारी से
परचम-ए-इल्म-ओ-अदब ऊंचा हमेशा रखना
जीत लो बज़्म का दिल अपनी क़लमकारी से
मौत को याद रखो आएगी बरहक़ इक दिन
ज़िन्दगी आप जियो मौत की तैयारी से
आशियां तुम जो ग़रीबों के जलाओगे अगर
घर तुम्हारा भी तो जल जाएगा चिंगारी से
आम चर्चा ये सरे-बज़्म सुनी है मीना
लूट ली तुमने तो महफ़िल ही ये फ़नकारी से
हम सफ़र की बात करते हैं
मिली जब से मुहब्बत हम सफ़र की बात करते हैं
हुईं पूरी मुरादें , रहगुज़र की बात करते हैं
बड़े नादान है अब पूछते दिल में हमारे क्या
ये दिल हम हार बैठे अब जिगर की बात करते हैं
सफ़ीना आज मेरा जब फँसा है इस भँवर में तो
करें हम याद रब को और लहर की बात करते हैं
अकेला छोड़ के मुझको चला फिर कारवाँ ये तो
सितारे हैं खफ़ा यारा सहर की बात करते हैं
जलायी हैं बहुत ही मोमबत्ती याद में हम तो
जलाने को घिनौने अब बशर की बात करते हैं
लगी कैसी हवा इस गाँव को तो आज देखो तुम
बडे बूढ़े भी सुन अब तो नगर की बात करते हैं
क़फ़स में काट डाला था जिन्हे सैय्याद ज़ालिम ने
नये जो आ गये पंछी के पर की बात करते हैं
मिला है मुद्दतों के बाद देखो वक़्त ये मीना
चलो सब कुछ भुलाके आज घर की बात करते हैं
जो अच्छा नहीं लगा
मनसद पे बैठा झूट जो अच्छा नहीं लगा
दुनिया में अब तो सच भी ये ज़िंदा नहीं लगा
हम सा नहीं लगा था वो तुमसा नहीं लगा
सीने में उसके प्यार का जज़्बा नहीं लगा
सस्ता नहीं था इश्क़ वो महँगा नहीं लगा
लेकिन कभी मुनाफ़े का सौदा नहीं लगा
थोड़े बहुत गुनाह में शामिल थे हम सभी
इंसान कोई हमको फ़रिश्ता नहीं लगा
हासिल हुए थे ज़ख्म हज़ारों ही प्यार में
लेकिन अलग है बात के सदमा नहीं लगा
ख़ुशबू कभी भी हाथ के माँ की नहीं गई
खाना किसी भी ग़ैर से अच्छा नहीं लगा
तहज़ीब देखने पे न मिलती है अब यहाँ
जायज ग़ुरूर लोगों का मीना नहीं लगा
हर शाम तराशे थे सरेआम तराशे
हर शाम तराशे थे सरेआम तराशे
पीने को उन्होंने तो फ़क़त जाम तराशे
भेजे थे उन्होंने वही पैग़ाम तराशे
हमने तो मुहब्बत में हैं इल्ज़ाम तराशे
इक नूरे मुसलसल था तेरे हुस्न का जादू
तेरे लिए ही यार ये इन’आम तराशे
तस्वीर मुकम्मल तेरी आँखों में बसी थी
रुख़्सार पे तिल हमने सहर शाम तराशे
जागीर अदावत की कुदूरत की ये दुनिया
नफ़रत बढ़ी ऐसी थी कि सद्दाम तराशे
जब शौक़ रुबाई का हुआ हुस्न को देखो
क़ुदरत ने ज़मीं पर कई ख़य्याम तराशे
ये ज़ीस्त मेरी जिसकी अमानत है ज़मीं पर
हमने यहाँ पत्थर पे वही राम तराशे
इन इश्क़ की राहों से तो अनजान हैं हम भी
इन इश्क़ की राहों से तो अनजान हैं हम भी
कमसिन हैं अगर आप तो नादान हैं हम भी
जब आऐं सुनाने वो हमें ग़म का फ़साना
ये कैसे कहें हम कि परेशान हैं हम भी
ज़र्दार अगर तुम हो मियाँ लाल -ओ -गुहर से !
दौलत है बहुत इल्म की धनवान हैं हम भी
ताक़त का हमें डर न दिखाएँ कभी हज़रत
आँधी हैं अगर आप तो तूफ़ान हैं हम भी
तूफ़ान बड़े आए मिटाने को हमें पर
तिलभर न हिला पाये कि चट्टान हैं हम भी
इक रोज़ गुज़र जाएँगे ख़ामोश यहाँ से
कुछ दिन के फ़क़त देखिए मेहमान हैं हम भी
क्या खूब ग़ज़ल आज ये यारा कही तुमने
पर याद रखो मीर का दीवान हैं हम भी
बेचा न मुसीबत में भी ईमान को “मीना”
है नाज़ बहुत साहिब – ए -ईमान हैं हम भी
ज़ुबाँ रखते नहीं मुँह में अगरचे बोल पड़ते हैं
ज़ुबाँ रखते नहीं मुँह में अगरचे बोल पड़ते हैं
बिसातें जब भी बिछतीं हैं पियादे बोल पड़ते हैं
थके हारे भी चल पड़ते हैं शायद इस सहारे से
मिलेगी मंज़िलें बेशक सितारे बोल पड़ते हैं
किताबें चार क्या पढ़ लीं, बने फ़िरते हैं अब आलिम,
नसीहत दो न, यूँ झुंझला के बच्चे बोल पड़ते हैं
करें वो क़त्ल की साज़िश हमेशा ही निगाहों से
खुलेगा राज़ ये इक दिन इशारे बोल पड़ते हैं
सितारे थम से जाते हैं, तुम्हारी इक झलक पाकर,
ज़मीं की शय नही हो तुम ये सारे बोल पड़ते हैं ।
उठाते हैं वही उँगली नहीं औक़ात कुछ जिनकी
उछलता ख़ुद पे जब कीचड़ लबादे बोल पड़ते हैं
सितम के खौफ़ से मीना ज़ुबाँ ख़ामोश है लेकिन
सुलगते-काँपते, लोगों के चेहरे बोल पड़ते हैं
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
तुम मुझको वफाओं की सज़ा क्यों नहीं देते
नफ़रत की कहानी को मिटा क्यों नहीं देते
अब अम्न की गंगा भी बहा क्यों नहीं देते
मंज़ूर अगर इश्क़ हमारा नहीं है तो
फिर ज़ह्र हमें आप पिला क्यों नहीं देते
ये चाँद न छिप जाए कहीं शर्म से जानम
तुम रुख़ पे ये चिलमन भी गिरा क्यों नहीं देते
शैतान बना इंसा करे ज़ुल्म-ओ -सितम रोज़
इक दीप मुहब्बत का जला क्यूँ नहीं देते
राहत भी मिले तुमको भी कुछ अपने ग़मों से
महफ़िल में ग़ज़ल एक सुना क्यों नहीं देते
रुसवा किया है इश्क़ ने गर तुमको है मीना
तस्वीर मेरी दिल से हटा क्यों नहीं देते
मालिक हो गए
ज़र, ज़मीं, बंँगलों के और कारों के मालिक हो गए
अब सियासत-दान दरबारों के मालिक हो गए
जो सर-ए-बाज़ार लोगों की उछालें आबरू
आजकल वो लोग दस्तारों के मालिक हो गए
पाँव उनके इस ज़मीं पर अब कहाँ पड़ते हैं दोस्त
क़द हुआ ऊँचा बहुत तारों के मालिक हो गए
एक ख़ंजर थामने में भी लरज़ते थे जो हाथ
वक़्त बदला वो ही तलवारों के मालिक हो गए
खोटे सिक्के थे जो चल पाए नहीं बाज़ार में
चालबाज़ी कर वो बाज़ारों के मालिक हो गए
कल तलक जो ख़ुद ही थे ताज़ा ख़बर इस शह्र की
चमकी है तक़दीर अख़बारों के मालिक हो गए
अब सँभल के पाँव रखना नफ़रतों के शह्र में
इस जगह के लोग अंगारों के मालिक हो गए
तेरी कश्ती की ज़रूरत अब नहीं मल्लाह को
नाख़ुदा मीना सभी धारों के मालिक हो गए
जिसकी ज़ुबाँ होती नहीं
कद्रदाँ है वो ज़मीं जिसकी ज़ुबाँ होती नहीं
रहती मिट्टी में ही मिट्टी और मकाँ होती नहीं
बेवफ़ा हैं वो अज़ल से और जाँ होती नहीं
हमसे उनकी सरकशी अब भी बयाँ होती नहीं
जो जहाँ में आ गया है मौत आनी है उसे
कौन सा ऐसा नगर है वो जहाँ होती नहीं
गहरा कितना हो अँधेरा फ़िक्र करती हैं कहाँ
दह्न में मायूस मेरी लड़कियाँ होती नहीं
सब समझते हैं दिवाना मैं मुहब्बत में हुआ
दास्ताँ क्यों मेरी बिन तेरे बयाँ होती नहीं
हिज़्र के साये डरायें उसको कितना ही भला
गुफ़्तगू ख़ुद से करे और राजदाँ होती नहीं
दर्द -ए-दिल की कोई कब जाने तड़प मीना भला
आग जब भड़की हो दिल में तो धुआँ होती नहीं
चढ़ते है ऐसे छूटे न देखो बदी के रंग
चढ़ते है ऐसे छूटे न देखो बदी के रंग
सच्चाइयों से दूर बहुत आदमी के रंग
बेरंग हो गए हैं सभी ज़िंदगी के रंग
गुल-काग़ज़ी खिलें हैं दिखें बेबसी के रंग
इज़्ज़त नही समाज में उनकी ज़रा भी है
भाते हैं जिनको रोज़ यहाँ मयकशी के रंग
बेबस हैं लोग और भरे आहें भी सभी
जैसे कि सब रंगे हो यहाँ मुफ़लिसी के रंग
क़िस्मत जो साथ दे थमे तूफ़ान ये अगर
मिल जाएंगे अँधेरों को भी रौशनी के रंग
कोई बुझा न पाया यहाँ प्यास भी तेरी
सागर ये खारा रंग चुका तिश्नगी के रंग
साजिश है हादिसे हैं फ़क़त आज ज़ीस्त में
ग़म बेशुमार हैं सभी भूले ख़ुशी के रंग
दामन जुनूं का साथ हो तालीम भी हो गर
बदलेंगे फिर तो देखना हर इक सदी के रंग
जो आग से डरते हैं वो पानी में मरे हैं
जो आग से डरते हैं वो पानी में मरे हैं
कुछ लोग यहाँ पे जाँ -फ़िशानी में मरे हैं
जो ज़ह्न में ज़िन्दा थे ज़ुबानी में मरे हैं
अल्फ़ाज़ की कुछ सादा बयानी में मरे हैं
चालें सदा शतरंज की ऊला में चलें जो
वो शाह भी आकर सभी सानी में मरे है
जो इश्क़ को समझे थे फ़क़त खेल यहाँ पर
नादान परिंदे वो जवानी में मरे हैं
इक लफ़्ज़े मुहब्बत कभी तो लब पे नहीं था
ख़ामोश वो आशिक़ ला- मकानी में मरे हैं
चर्चे थे बहुत जिनकी मुहब्बत के जहाँ में
गुलफ़ाम सभी ऐसे कहानी में मरे हैं
जो ख़ुद बचा पाये न तूफ़ान से कश्ती
मज़बूर वो अश्कों की रवानी में मरे हैं
बेवफ़ा है वो बहुत चल के बताया जाए
बेवफ़ा है वो बहुत चल के बताया जाए
आइना आज उन्हें भी तो दिखाया जाए
ज़िंदगी जीने का हक़ एक सा देखो सबको
बेटियों को भी न क्यूँ देख पढाया जाए
और जीने की अगर यार तुम्हें हसरत हो
चल के इक पेड़ भी फिर रोज़ लगाया जाए
हरकतें दुश्मनों की रोज़ ही बढ़ती जाती
क्यों न उसको भी सबक अब तो सिखाया जाए
रूसवा करके यूँ परदेश बसे है जाकर
ऐसे रूठों को हैं चलके भी मनाया जाए
इल्तिजा आज सभी से है फ़क़त इतनी ही
दीप तो एक मुहब्बत का जलाया जाए
तोड़ के अब सुनो दीवार तो ये नफ़रत की
इस जहाँ को भी चमन यार बनाया जाए
क़ाफ़िये से ही ग़ज़ल में तो है रौनक़ मीना
उसको हर शेर में अच्छे से सजाया जाए
ठोकरें देता रहा पत्थर नहीं बदला
ठोकरें देता रहा पत्थर नहीं बदला
रास्ते में था पड़ा क्यूँ कर नहीं बदला
वो न रिश्वत ले न लेने दे किसी को भी
लाख की कोशिश मगर अफ़सर नहीं बदला
चाह थी मेरी वो हो नदिया सा मीठा पर
मिन्नतें कीं थीं बहुत सागर नहीं बदला
तोड डाला था सनम ने दिल हमारा पर
बेवफ़ा हम थे नहीं ये घर नहीं बदला
अपनी क़िस्मत में लिखी थी ये जुदाई भी
उम्र बीती भी मुकद्दर पर नहीं बदला
ज़ख़्म मिलते ही रहे हमको मुहब्बत में
की इबादत प्यार का मंतर नहीं बदला
कशमकश में रूह भी तो आजकल क्यों है
मरने पर भी इश्क़ का मंज़र नहीं बदला
जान लेता ही रहा हर दिन वो लोगों की
ख़ून का प्यासा रहा ख़ंजर नही बदला
ज़ुल्म भी सच पे हुए मीना हज़ारो पर
वो सदा चलता रहा पैकर नहीं बदला
दिल जीतते हैं
महफ़िल में शम्अ जलती है उनके ही नाम से
दिल जीतते हैं सबका जो शीरीं- कलाम से
आएं न रूबरू करें नींदें हराम वो
बस रूठ कर चले गए हैं एहतिमाम से
खुशहाल हो वतन मेरा नफ़रत ये ख़त्म हो
सौग़ात हमको चाहिए ये अपने राम से
बर्बाद होगा तू भी तो नफ़रत के नाम पर
हासिल न होगा कुछ भी तुझे क़त्ले-आम से
बस खाली हाथ आए थे जाना है खाली हाथ
आये थे हम जहाँ में इसी इंतिज़ाम से
डूबे हैं बस नशे में सियासत के ये सभी
करतूत जान लीजिए इनकी अवाम से
दहशत का कोई भी कहाँ मज़हब है ऐ ख़ुदा
मीना का कहना है यही बस खासो आम से
हमें है प्यार तुम्हीं से
तुम्हारी बज़्म में हम रोज़ आना चाहते हैं
हमें है प्यार तुम्हीं से जताना चाहते हैं
नज़र से हम न किसी को गिराना चाहते हैं
जो लड़खड़ाते हैं उनको भी उठाना चाहते हैं
हरिक ही ख़तरे से उसको बचाना चाहते हैं
वतन के वासते हम सर कटाना चाहते हैं
न करते हम कभी सौदा किसी की गुरबत का
सभी की इज़्ज़तें हम तो बचाना चाहते है
यक़ीं नहीं है हमें अब वफ़ा पे तेरी दोस्त
इसीलिए तो तुझे आज़माना चाहते हैं
नहीं अहद है कि पत्थर में गुल खिलायें हम
कि ख़ारों में भी तो हम गुल खिलाना चाहते हैं
कहाँ ठहरता कोई प्यासा क़ाफ़िला भी यहाँ
किसी नदी को यहाँ हम तो बुलाना चाहते हैं
हमें तो अम्न की चाहत अज़ल से है मीना
कि चैन की सदा वंशी बजाना चाहते हैं
इस दिल के पैमाने में
आज मुहब्बत लेके आये नज़रों के नज़राने में
डूबे आशिक़ देख हज़ारों इस दिल के पैमाने में
क़ैद न कोई कर पाया दौलत के राज-घराने में
आज़ाद मुहब्बत मेरी है इस बंदी-खाने में
ज़ीस्त जहन्नुम से बदतर होती यार फ़कीराने में
नींद सुकूँ की मिलती है क़ब्र तेरे तहखाने में
बचके रहना दुश्मन हैं सारे आतंकी ज़ालिम भी
रोज़ बदल देते हैं वो तो गुलशन को वीराने में
चाँद -सितारे चूमें उल्फ़त के सच्चे दीवानों को
खोटा सिक्का कब चलता चाहत के अफ़साने में
कोई मस्ताना कहता तो कोई हमको परवाना
ढाई आख़र प्रेम पढ़ें हम साक़ी के मयखाने में
आबाद रहे तनहाई में भी मीना दिल ये मेरा
माज़ी की बस रहती यादें इस दिल के काशाने में
गिला कैसे करें
तेरे बिन जी रहे ऐसे कि हम हैं बिन जिए से
गिला कैसे करें जब हो रहे हैं लब सिए से
हिसारे-दर्द मैं हमने बिताई ज़ीस्त सारी
लिखी उसने अगर कोई ख़ुशी तो खो दिए से
है कहना एक मिसरा भी कठिन कैसे ग़ज़ल हो
ग़ज़ल मैं रौनक़ें रहती रदीफ़ो-क़ाफ़िए से
अजी इस इश्क़ में शामो-सहर यूँ खो चुके हैं
कि अब जलते रहे हम तो जहां में बस दिए से
हमें मफ़्लूज करता इश्क़ का ये रोग देखो
बदलते देखता हूँ सबको अपने ज़ाविए से
सही मानूँगा होता भोर का सपना अगर जो
तुम्हारा ख़त मिलेगा दिन निकलते डाकिए से
सनम है ख़ूबसूरत और मौसम भी सुहाना
नशा ऐसा चढ़ा हम लड़खड़ाते हैं पिए से
हवा सब ले गयी मल्बूस मीना क्यों चुरा के
क़बा में हम सजा पैबंद बैठे हाशिए से
तुमने चाहा था जो मंज़र दे दिया
तुमने चाहा था जो मंज़र दे दिया
हमको जो भी था मयस्सर,दे दिया
शुक्रिया सद शुक्रिया ए ज़िन्दगी
जीने का फिर एक अवसर दे दिया
ये करम है आपका या दुश्मनी
मांगा जो पानी समंदर दे दिया
ज़िंदगी में आ गई रौनक़ मेरी
हमसुख़न जब एक दिलबर दे दिया
रोज़ रिश्वत ही फ़क़त खाता है वो
हमको बेईमान अफ़सर दे दिया
शायरी पे जब करम रब का हुआ
मीर ग़ालिब सा सुख़नवर दे दिया
ये सिला कैसा मुहब्बत का मिला
काँटों का मुझको ये बिस्तर दे दि
अच्छी सूरत देख फिसल जाता हूँ मैं
अच्छी सूरत देख फिसल जाता हूँ मैं
जब भी देखूँ चाँद मचल जाता हूँ मैं
देख बग़ावत अकसर बीबी बच्चे की
घर से बाहर यार निकल जाता हूँ मैं
राह अकेले चलने में घबराता हूँ
छूटा माँ का हाथ कुचल जाता हूँ मैं
ढ़ाई आखर प्रेम पढ़ा है जीवन में
आग दिलों में देख सँभल जाता हूँ मैं
एक नदी सूखी सा है जीवन मेरा
और ग़मों के संग पिघल जाता हूँ मैं
साथ हमेशा सबका देता ही रहता
वक़्त बुरा हो गर न बदल जाता हूँ मै
राहत मिलती है ग़ज़लों से ही मीना
अपनी ग़ज़लों में बस ढ़ल जाता हूँ मैं
शबाब आया नया -नया है
शबाब आया नया -नया है
सुरूर गहरा नया- नया है
करें गिले किस तरह बताओ
बना ये रिश्ता नया -नया है
कहें तुझे कैसे अलविदा हम
अभी नजारा नया- नया है
पिला दे उल्फ़त के जाम साकी
हुआ दिवाना नया -नया है
भडक रहे हैं जिगर में शोले
उठा ये पर्दा नया- नया है
क़ुबूल जब से हुई मुहब्बत
हमारा जलवा नया- नया है
ग़ज़ल कही है जो आज मीना
रदीफ़ उसका नया- नया है
तू जैसा भी कहे वैसा करेंगे
तू जैसा भी कहे वैसा करेंगे
चमकती रेत को दरिया करेंगे
अगर टूटे कहीं ये दिल हमारा
नही तक़दीर से शिकवा करेंगे
मयस्सर जो हुए दारो रसन तो
नहीं हम इश्क़ का सौदा करेंगे
बसी है माँ की खुशबू याँ तो हर सू
नहीं इस घर का हम हिस्सा करेंगे
बहुत क़ीमत लगेगी आँसुओं की
उदासी बनके जो बरसा करेंगे
नशीली आँखों पे पर्दा लगा लो
हुआ दीदार तो बहका करेंगे
हमें क्या ये पता था पीठ पीछे
हमारी हर जगह चर्चा करेंगे
रहा है अज़्म अपने साथ मीना
सफ़र हम यार अब तन्हा करेंगे
इश्क़ में मुझसी कोई दिवानी नहीं
इश्क़ में मुझसी कोई दिवानी नहीं
मेरी जैसी किसी की कहानी नहीं
क्यूं नहाते नहीं रंगे उल्फत में तुम
ये मेरा इश्क़ क्या ज़ाफरानी नहीं
हमने इज़हारे उल्फ़त किया इस तरह
चश्मे-तर से कहा सब ज़ुबानी नहीं
बात करने की जिसको न तहज़ीब हो
आदमी है मगर ख़ानदानी नहीं
लूँ अदब से सदा नाम ग़ालिब का मैं
उनकी ग़ज़लों का कोई भी सानी नहीं
चाँद को तोड़कर ला रहे थे जनाब
क्या हुआ अब वो जोश -ए- जवानी नहीं
किस क़दर प्यार है उनको मीना कहो
उनके जोशे जुनूँ का तो सानी नहीं
मुद्दतों से थे पड़े बीमार से
मुद्दतों से थे पड़े बीमार से
खिल उठे अब आपके दीदार से
देख लेना जीत लेंगे एक दिन
उसके दिल को हम यक़ीनन प्यार से
सच सलीबों पर चढ़ाया जाएगा
लग रहा मुंसिफ़ के ये अतवार से
बेच बैठे हैं सभी ईमान को,
बच न पाया कोई भ्रष्टाचार से।
हाथ हो सिर पे अगर उस्ताद का
गल्तियाँ होंगी नही फ़नकार से।
हम ख़यालों में बुलाते हुस्न को
ख़ौफ़ खाते हम कहाँ संसार से
मसअला मिल बैठकर हल कीजिये
फ़ायदा “मीना” नहीं तकरार से।
बात तूफ़ान से छिपानी है
बात तूफ़ान से छिपानी है
मेरी कश्ती बड़ी पुरानी है
जज़्बा -ऐ-शौक जीतने के लिये
दाँव पर मेरी ज़िंदगानी है
रश्क करते हैं हुस्न पर हम तो
जानलेवा भी ये जवानी है
तशनगी से सदा ही दम घुटता
हर समन्दर की ये कहानी है
शहर -ए उम्मीद में तो बैठे हैं
नफ़रतों की चिता जलानी है
हाथ की ये लकीर है कहती
दौलत-ए-इश्क़ ही लुटानी है
जीत ली जंग है कोई शायद
उनके मुखडे पे शादमानी है
हरतरफ हैं अना के ही झगड़े
देख घर घर की यह कहानी है
ज़ख्म़ मेरे न अब कुरेदो तुम
गम की ये दास्तां मिटानी है
कोई देता नहीं पता तेरा
कितनी गलियों की ख़ाक छानी है
शौक़ से बज़्म में गयी मीना
उसको अपनी ग़ज़ल सुनानी है
समय का वक्र तेवर है अभी तक
समय का वक्र तेवर है अभी तक
चुभाता दिल में नश्तर है अभी तक
अकेले ही सफ़र में तो चले हम
न कोई भी तो रहबर है अभी तक
वही दंगा वही हैं नफ़रतें भी
करें क्या हाल बदतर है अभी तक
लगे इल्ज़ाम बेबुनियाद हम पर
कि रिश्वत खोर अफ़सर है अभी तक
शजर की छाँव में बचपन गुज़ारा
न काटो तुम वो मंजर है अभी तक
ख़ुदा हैं वो करो उनकी इबादत
पिता और मातु से घर है अभी तक
सदी बीती न मजनू आज बदले
वही लैला का चक्कर है अभी तक
न ग़ालिब मीर सी ही शायरी है
न ही मीना सुख़नवर है अभी तक
तुम्हें हाल कैसे बताऊँ मैं हमदम
मुझे ज़िन्दगी मे सदा ही मिले गम
तुम्हें हाल कैसे बताऊँ मैं हमदम
लगी आग दिल मे धुआं उठ रहा है
बुझादे इसे अब निकलता मेरा दम
तमाशा तबाही का देखा सभी ने
न देखीं किसी ने भी आँखें जो थी नम
निखारी तुझे भोर की रोशनी यूँ
चमकती बदन पर है मोती सी शबनम
अभी तक नशा वस्ल का वो चढा है
छुअन भूलती ही नहीं वो मुलायम
मिला ही कहाँ कोई साथी हमें तो
अकेले आये थे अकेले चले हम
मुझे बस गिला ख़ुद से है इतना मीना
जफ़ा ही मिली है वफ़ा तो मिली कम
शाम होते ही वो अपने घर जायगा।
शाम होते ही वो अपने घर जायगा।
छोड कर आशियाना किधर जायगा।
इश्क़ का ये नशा जो चढ़ा है अभी
ग़र इनायत हुई तो उतर जायगा।
चाँदनी रात में गर न आओगे तुम
वक़्त मायूस होके ठहर जायगा
बंदिशों में रही हैं सदा बेटियाँ,
जो हुये ज़ुल्म सुन दिल सिहर जायगा।
बन के मरहम रखा हाथ अशआर ने
ज़ख़्म कुछ तो जुदाई का भर जायगा।
गुल की अफ़सुर्दगी बढ गई इस क़दर
जब चलेगी हवा तो बिखर जायगा
मौत मुझको बुलाती मगर जान ले
तेरे काँधे पे मीना का सर जायगा
मुहब्बत का तुमसे सिला चाहती हूँ
मुहब्बत का तुमसे सिला चाहती हूँ
तुम्हीं से तुम्हें माँगना चाहती हूँ
दुखाया बहुत दिल तुम्हारा वफ़ा में
ख़तावार हूँ मैं, सज़ा चाहती हूँ
क़लम आज चलती नहीं क्यों ये मेरी
सुनो शारदे अब कृपा चाहती हूँ
चराग़े मुहब्बत जले उनके दिल में
फ़क़त मैं यही इक दुआ चाहती हूँ
मुसलसल रही भागती ज़िन्दगी में
ऐ मालिक सकूँ अब ज़रा चाहती हूँ
दिए ज़ख़्म तुमने जिगर पे जो मुझको
उन्हीं की मुकम्मल दवा चाहती हूँ
सदा काम आये ग़रीबों के मीना
ये नेमत मैं तुमसे ख़ुदा चाहती हूँ
हम नहीं डरते किसी सद्दाम से
हम नहीं डरते किसी सद्दाम से
बात कहनी है यही हुक़्क़ाम से
इश्क़ करके हो गए बेकाम से
लोग मजनूँ के बुलाते नाम से
मज़हबों में फर्क कुछ होता नहीं
पूछ लो जाकर ख़ुदा और राम से
देख वो परवाह करता है कहाँ
इश्क़ डरता है नही अंज़ाम से
मसअले सब बैठ के सुलझाइए
हल नहीं निकलेगा कुछ संग्राम से
नाम प्रभु का जो न लेता हो कभी
फ़ायदा कुछ भी नहीं उस चाम से
भूत मीना पे चढ़ा ईमान का
बिक नहीं सकती किसी भी दाम से
मुहब्बत भरी इक नज़र देखते हो
मुहब्बत भरी इक नज़र देखते हो
मिलेगी नहीं क्यों इधर देखते हो
समझ तो लो तीर-ए-नज़र का इशारा
है क़ातिल नज़र तुम किधर देखते हो
ख़ुशी इस जहाँ में तो मिलती नह़ीं है
मगर राह क्यों बेख़बर देखते हो
फ़िदा है ज़माना हुए देख पागल
जला के घर अपना असर देखते हो
शरारत भरी इन निगाहों को देखो
बिना बात के क्यों क़मर देखते हो
पड़ा रूप रंगों के पीछे ज़माना
नह़ीं क्यों किसी में हुनर देखते हो
कही प्यार से ये ग़ज़ल हमने मीना
मुकम्मल है क्यों फिर कसर देखते हो
सिर्फ मेरे लिए बना है वो
सिर्फ मेरे लिए बना है वो
मेरे हर दर्द की दवा है वो
उसकी आँखें शराब के प्याले
लोग कहते हैं इक नशा है वो
जो करम से नवाज़ता है हमें
और कोई नहीं ख़ुदा है वो
ढूँढते आदमी नहीं मिलता
आजकल ऐसा लापता है वो
बात कोई न मानता घर में
कहने भर के लिए बड़ा है वो
तप के गर्दिश की आग में हर पल
सोने जैसा निखर गया है वो
मानता दिल न बेवफ़ा मेरा
यार पर देख बेवफ़ा है वो
सीखने आ गई ग़ज़ल मीना
जो सिखाये नहीं मिला है वो
यूँ किसी का बना नहीं जाता
यूँ किसी का बना नहीं जाता
हमसे सौदा किया नहीं जाता
तू कभी कह दे हमसे ऐ दिलबर
बिन तेरे अब रहा नहीं जाता
इतना हम खो चुके हैं अब उनमें
उनसे कुछ भी कहा नहीं जाता
ये मुहब्बत नहीं तो और क्या है
दूर हम से हटा नहीं जाता
दौलते-हुस्न मिल गई हमको
बज़्म से अब उठा नहीं जाता
होगा दस्तूर ये कहीं का मगर
तंज़ हमसे कसा नहीं जाता
हौसला बाक़ी अब नहीं दिल में
याद में यूं जला नहीं जाता
खो चुके हाय अपना ईमाँ तक
वस्ल में और क्या नहीं जाता
हम हुनर जानते हैं उल्फ़त के
दावा “मीना” किया नहीं जाता
प्यार का मौसम न आयेगा
रिश्तों में भी निखार का मौसम न आयेगा
दोगे दग़ा तो प्यार का मौसम न आयेगा
रहता चमन उदास है मायूस बागबाँ
गुलशन में अब बहार का मौसम न आएगा
गर जीतना हो नेकियों की राह पर चलो
फिर ज़िन्दगी में हार का मौसम न आयेगा।
नफ़रत भुला के हाथ किसी का तू थाम अब
वरना कभी क़रार का मौसम न आएगा
इस मुल्क पे अब जान ये क़ुर्बान कीजिए
फिर जानो दिल निसार का मौसम न आएगा
इस ज़िंदगी में चार दिनों की बहार है
हर बार ख़ुशगवार ये मौसम न आएगा
अशजार पे दिलों के समर आए हैं नये
ये रोज़ इन्तिज़ार का मौसम न आएगा
यहाँ बचा ही नहीं जब कोई गदर के बाद
यहाँ बचा ही नहीं जब कोई गदर के बाद
मिलेगी कैसे ख़ुशी फिर हमें सहर के बाद
न मिल सका कहीं साहिल हमें भँवर के बाद
ख़ुशी मिली ही नहीं तेरे इस नगर के बाद
ख़बर मिली जो सरे बज़्म तेरे आने की
ग़ज़ल ही भूल गए हम तो इस ख़बर के बाद
जहाँ उरूज है यारो वहाँ ज़वाल भी है
कहाँ रुकेगें भला आप इस शिखर के बाद
जो निकले मेरा जनाज़ा तो ग़म नहीं करना
मिलेगी अच्छी ख़बर तुमको इस ख़बर के बाद
न ऐसे काटिए घर के शजर को ऐ लोगो
मिलेगी छाँव कहाँ तुमको इस शजर के बाद
न ऐसे अश्क बहा मीना उनकी फुर्क़त में
वो मर न जाएँ कहीं तेरी चश्मे तर के बाद
नसीब रोज़ बिगड़ते पलटते रहते हैं
नसीब रोज़ बिगड़ते पलटते रहते हैं
ग़मों के साये भी ये बढ़ते – घटते रहते हैं
वो रूठ -रूठ के फिर आप पटते रहते हैं
कही वो अपनी ही बातों से हटते रहते हैं
अमीरी में जो करे हमको देख के सजदा
वो मुफ़लिसी में हमें देख कटते रहते हैं
बिना ही बात के खाते हैं भाव वो अकसर
मिला जो मौका सभी पर झपटते रहते हैं
नहीं कमी अभी मजनू की है ज़माने में
दिखा जो हुस्न दीवाने रपटते रहते हैं
गये हैं भूल तो तहज़ीब देखिए बच्चे
दिखाते आँख बड़ो को डपटते रहते हैं
ज़वानी में रहे मदहोश वो सदा देखो
समीप पा क़ज़ा प्रभु नाम रटते रहते हैं
ग़ज़ल मैं नज़्र करूँ हुस्न को अगर मीना,
हया से शर्म से वो यूँ सिमटते रहते हैं।
वो ग़म की दवा जानते हैं
बिला-शक वो ग़म की दवा जानते हैं
जो इक मयक़दे का पता जानते हैं
सुख़नवर हैं हम शौक़ है शायरी का
सुख़न का हर इक क़ायदा जानते हैं
जिन्हें डूब कर के ये साहिल मिला हो
मुहब्बत का वो फ़लसफ़ा जानते हैं
मैं कब रूठती हूँ मैं कब मान जाऊँ
हमारी हर इक वो अदा जानते हैं
सरों को झुकाए हुए रहते हैं वो
मुहब्बत की जो इंतिहा जानते हैं
जो शह्र-ए-मुहब्बत की करते हैं बातें
ज़माने के बारे में क्या जानते हैं?
ये अहल-ए-मुहब्बत ज़माने में मीना
हर इक दर्द को ख़ुशनुमा जानते हैं
थके हम उन्हें बारहा कहते-कहते
थके हम उन्हें बारहा कहते-कहते
मुहब्बत को जाँ की बला कहते-कहते
चला ख़ूब ही इश्क़ का सिलसिला भी
उठाये सितम मरहबा कहते-कहते
मुकम्मल ग़ज़ल एक कहना हमें थी
अटक हम गए क़ाफ़िया कहते-कहते
बढ़ी नफ़रतें इस क़दर आज सब में
न वो ज़ह्र दें दे दवा कहते-कहते
लिए साथ आए हैं तुहफ़े हज़ारों
मगर बद्दुआ दी दुआ कहते-कहते
कभी रूबरू भी न देखा उन्हें पर
थकी है ज़ुबाँ यह ख़ुदा कहते-कहते
जला आशियाँ था मुहब्बत में ‘मीना’
जलाते थे सब दिल-जला कहते-कहते
वो दिलकश चाँदनी
नहीं चाँदी में रहती है न वो सोने में रहती है
वो दिलकश चाँदनी इस क़ल्ब के टुकड़े में रहती है
ये दौलत क्यों सदा ज़रदार के हिस्से में रहती है
ग़रीबी क्यों भला हम जैसों के खाते में रहती है
शराफ़त नाम की भी आजकल ढूँढे नहीं मिलती
यहां तहज़ीब सारी ही फ़क़त शजरे में रहती है
अज़ल से प्यार का दुश्मन रहा है ये ज़माना क्यों
मोहब्बत भी हमेशा इसलिए चर्चे में रहती है
कभी घबरा न तू नाकामियों से ज़ीस्त की अपनी
छुपी ये क़ामयाबी तो इसी मलबे में रहती है
बहकती ये जवानी मुफ़्त में देती है जाँ अपनी
ख़राबी बस यही तो इश्क़ के नश्शे में रहती है
यहाँ दहशत है नफ़रत भी नहीं महफ़ूज़ है मीना
हमारी ज़ीस्त हर पल क्यों यहाँ ख़तरे में रहती है
अच्छाई नहीं दिखती
ज़माने में कहीं भी आज अच्छाई नहीं दिखती
फ़ना हो जो वतन पर वो भी तरुणाई नहीं दिखती
कसीदे ख़ूब पढ़ते हैं वो अपनी शानो शौकत के
कभी जेबों में पर उनकी हमें पाई नहीं दिखती
हमेशा रोना रोते हैं जो बढ़ती क़ीमतों का वो
मगर पीते है जब दारू तो महँगाई नहीं दिखती
बडे़ बेख़ौफ़ हो कर आज वो उतरे हैं सागर में
उन्हें क्यों आज सागर की भी गहराई नहीं दिखती
जहाँ कल तक बहारें थीं वहाँ पसरे हैं वीराने।
कहीं भी, अब हमें कोई भी रानाई नहीं दिखती
कहें क्या आज कल माहौल ही बदला है जीने का
कहीं बारात में बजती भी, शहनाई नहीं दिखती
मुसलसल हम तो तन्हाई में जीते हैं अभी देखो
किसी भी काम से अपनी शनाशाई नहीं दिखती
न घर में रौनक़ें अपने न बाहर ही ख़ुशी कोई।
जो मेरी राह देखे वो कहीं माई नहीं दिखती
करें हैं शाइरी दुनिया में बहुतेरे मगर मीना
ग़ज़ल में मीर ग़ालिब सी वो दानाई नहीं दिखती
दिल हुआ निशाना था
चला जो तीरे-फ़लक़ दिल हुआ निशाना था
वो आया लेने था हमको खुशी से जाना था
ग़मों का दौर था हारे हुए थे ख़ुद से हम
फ़लक़ को हम पे अभी बिजलियां गिराना था
बुझानी हमको लगी आग थी ये नफ़रत की
हमें तो प्यार का सबको सबक सिखाना था
हमें तलब ही नहीं ज़र ज़मीन की कोई
न ख़्वाब ताज का न कोई हुनर ही पाना था
उड़ा के आँधियां जाने कहाँ गईं ले कर
जो चंद तिनकों का वो मेरा आशियाना था
गुनाह करके बचा कौन आज तक या रब
जो पाप हमने किये बोझ ख़ुद उठाना था
ये ज़ीस्त चार दिनों का सफ़र ही था मीना
सभी को लौट के वापस वहीं पे जाना था
ले के आ गया
लाना नहीं था उसको मगर ले के आ गया
मेरे लिए वो लाल-ओ-गुहर ले के आ गया
मेरे लिए ख़ुशी की ख़बर ले के आ गया
उल्फ़त की इक नई सी नज़र ले के आ गया
होशो-हवास में थे मगर चुप थी ये ज़ुबाँ
गुल की जगह वो सुर्ख़ हजर ले के आ गया
दम घुट रहा था तीरगी से दिल भी था उदास
मेरे लिए वो नूरे-सहर ले के आ गया
आज़ाद हसरतों से न हो पाए तब तलक
यकलख़्त मौत की वो ख़बर ले के आ गया
तारों से मांग भरने की ख़्वाहिश थी वो मगर
मेरे लिए तो शम्सो-क़मर ले के आ गया
मुद्दत से मुंतज़िर था जो “मीना” तेरे लिए
वो अपनी ज़िंदगी मेरे घर ले के आ गया
वतन की आन रखते हैं
हमेशा चूमें मिट्टी को वतन की आन रखते हैं
छिपाकर हम दिलों में अपना हिंदुस्तान रखते हैं
वही गंगो-जमुन तहज़ीब धरती पाक़ है इसकी
पुजारी अम्न के हम हैं यही पहचान रखते हैं
गुज़ारिश है यही रब से कि दम निकले यहीं अपना
क़फ़न ओढ़ें तिरंगे का यही अरमान रखते हैं
चुका सकते नहीं है इस ज़मीं का क़र्ज़ हम यारो
लबों पर हम हमेशा इसका ही जयगान रखते हैं
वतन आज़ाद है आबाद भी जनता यहाँ की भी
कि हम वासी यहाँ के हैं सदा अभिमान रखते हैं
न कोई तोड़ सकता है हमारी देख ताकत को
हिफ़ाज़त करते हम इसकी जिगर चट्टान रखते हैं
बचाते हैं बुरी नज़रों से इसको रोज़ ही मीना
करेंगे नाम भी ऊँचा कि उसकी शान रखते हैं
दिल ये दीवाना नहीं
दिल ये दीवाना नहीं हमको मगर लगता है
तेरी चाहत में ही गुम शाम-ओ-सहर लगता है
तेरे बिन आज अधूरा ये सफ़र लगता है
भटके फिरते हैं बड़ी दूर ये घर लगता है
ज़ीस्त में जिसने कभी देखी न हो गहराई
उसको दरिया में उतरने से भी डर लगता है
जिनकी चाँदी की हैं दीवारें महल सोने के
हर बुराई में छुपा उनके हुनर लगता है
जिस बुलंदी पे मैं पहुँचा हूँ मेरे मालिक अब
ये तो सब सच की कमाई का असर लगता है
खोया रहता हूँ मैं तेरे ही ख़यालों में सनम
तू मेरी बात से लेकिन बे-ख़बर लगता है
हौसले पस्त बहारों के ख़िज़ांओं में यूँ
शह्र में अब कहाँ कोई भी शजर लगता है
वही है रोग वही तो तबीब रहते हैं
वही है रोग वही तो तबीब रहते हैं
हमेशा से ही वो दिल के क़रीब रहते हैं
है ज़लज़ला ही जहाँ तक निगाह है जाती
घरों में भी यहाँ लटके सलीब रहते हैं
नहीं बदलते किसी हाल चाहे सूरत में
हमेशा बिगड़े ही क्यों अपने नसीब रहते हैं
लगाते तुहमतें और तंज़ ही वो बस करते
कि लोग भी यहां कितने अजीब रहते हैं
जिन्हें न ज़र न तो इज़्ज़त न शोहरतें हासिल
जहाँ में ऐसे भी कुछ बदनसीब रहते हैं
उजड़ गई है ये बस्ती हमारी गाँवों की
सुना है शहर में सारे हबीब रहते हैं
सुकूँ कहां है भला अब नसीब में लिक्खा
महल में लोग दिलों से ग़रीब रहते हैं
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
इल्ज़ाम कोई झूठा लगा क्यों नहीं देते
तुम मुझको वफाओं की सज़ा क्यों नहीं देते
नफ़रत की कहानी को मिटा क्यों नहीं देते
अब अम्न की गंगा भी बहा क्यों नहीं देते
मंज़ूर तुम्हें इश्क़ हमारा नहीं है तो
फिर ज़ह्र हमें आप पिला क्यों नहीं देते
ये चाँद न छिप जाए कहीं शर्म से जानम
तुम रुख़ पे ये चिलमन भी गिरा क्यों नहीं देते
शैतान बना इंसा करे ज़ुल्म-ओ -सितम रोज़
इक दीप मुहब्बत का जला क्यूँ नहीं देते
राहत भी मिले तुमको भी कुछ अपने ग़मों से
महफ़िल में ग़ज़ल एक सुना क्यों नहीं देते
इस इश्क़ ने रुसवा किया गर तुमको भी मीना
तस्वीर मेरी दिल से हटा क्यों नहीं देते
दोस्तो मैं एक दिन रंगे वफ़ा हो जाऊँगी
दोस्तो मैं एक दिन रंगे वफ़ा हो जाऊँगी
ख़ुद ब ख़ुद सिमटूंगी अपना दायरा हो जाऊँगी
क़ैद से दुनिया की मैं अब तो रिहा हो जाऊँगी
मौत सिरहाने खड़ी तुमसे ज़ुदा हो जाऊँगी
मुझको तो ख़ुद ही नहीं मालूम अपना रास्ता
कैसे औरों के लिए फिर रहनुमा हो जाऊँगी
ज़ख़्म भी लगने लगे है आजकल मुझको हसीं
देखना हर दर्द की मैं ख़ुद दवा हो जाऊँगी
अब चमक तो आपके चेहरे पे भी आ ही गई।।
देख लेना अब मैँ कोई आईना हो जाऊँगी
हौसले को तोड़ सकता है कहाँ कोई मेरे
एक दिन मैं जगमगाता फ़लसफ़ा हो जाऊँगी
वो अगर चाहें ग़ज़ल कहना तो कह लें शौक़ से
उस ग़ज़ल का ख़ूबसूरत क़फ़िया हो जाऊँगी
फिसल जाता हूँ मैं
अच्छी सूरत देख फिसल जाता हूँ मैं
जब भी देखूँ चाँद मचल जाता हूँ मैं
देख बग़ावत अकसर बीबी बच्चे की
घर से बाहर यार निकल जाता हूँ मैं
राह अकेले चलने में घबराता हूँ
छूटा माँ का हाथ कुचल जाता हूँ मैं
ढ़ाई आखर प्रेम पढ़ा है जीवन में
आग दिलों में देख सँभल जाता हूँ मैं
एक नदी सूखी सा है जीवन मेरा
और ग़मों के संग पिघल जाता हूँ मैं
साथ हमेशा सबका देता ही रहता
वक़्त बुरा हो गर न बदल जाता हूँ मै
राहत मिलती है ग़ज़लों से ही मीना
अपनी ग़ज़लों में बस ढ़ल जाता हूँ मैं
ज़मीं का क़द भी बौना हो गया है
ज़मीं का क़द भी बौना हो गया है
फ़लक वादों का ऊंचा हो गया है
जिधर देखो उधर छींटे ही छींटे
ये किसका ख़ून सस्ता हो गया है
नहीं पहचानता कोई हमे अब
हमारा हाल कैसा हो गया है
झुकाता है ज़माना शीश अपना
अजब कुर्सी का रुतबा हो गया है
नह़ीं परवाह करते हम किसी की
ख़ुदा से अपना रिश्ता हो गया है
भटकता न्याय की ख़ातिर ये इंसा
भला इंसाफ़ को क्या हो गया है
समुन्दर से गले मिलते ही देखो
नदी का जल भी खारा हो गया है
दुआ माँ बाप की मुझपे है शायद
बुलंदी पे सितारा हो गया है
बहुत उम्दा ग़ज़ल की शायरा थी
तुझे क्या आज मीना हो गया है
लफ़्ज़ जैसे ज़ा’फ़रानी हो गए
लफ़्ज़ जैसे ज़ा’फ़रानी हो गए
तेरी ही हम तर्जुमानी हो गए
पाँव जिसने इस सियासत में रखे
ज़ुल्म की ज़िन्दा निशानी हो गए
हर नज़र अपनी ही जानिब हो रही
देश की हम राजधानी हो गए
क़ुर्ब हासिल हो गया जो आपका
हम तो ख़ुशबू ज़ाफ़रानी हो गए
सोच जब से मग़रिबी तेरी हुई
बे-मयानी से-ज़ुबानी हो गए
जब से तहज़ीब-ओ- तमद्दुन भूले हैं
आदमी सब ख़ानदानी हो गए
पूछता कोई न मीना को यहाँ
चीज़ जैसे हम पुरानी हो गए
हर समय नौहा-ज़नी अच्छी नहीं
हर समय नौहा-ज़नी अच्छी नहीं
इस क़दर मुर्दा-दिली अच्छी नहीं
वो कहीं जां की न दुश्मन ही बने
इतनी भी छींटाकशी अच्छी नहीं
इतने भी बरहम बनो आख़िर न तुम
ख़ुद से ख़ुद की मुख़बिरी अच्छी नहीं
रोज़ नख़रे ये दिखाती है हमें
ज़ीस्त इतनी नकचढ़ी अच्छी नहीं
ताज बस झूठे पहनते हैं यहाँ
अब वफ़ा की यूँ कमी अच्छी नहीं
खो गये माज़ी की यादों में तो आज
इतनी अब संजीदगी अच्छी नहीं
वो अदब तहज़ीब भूले हैं सभी
इतनी लेकिन ख़ुद-सरी अच्छी नहीं
क़त्ल करते हो उमीदों का मेरी
इश्क़ में ये रह-ज़नी अच्छी नहीं
ख़ुद ही दिल पे हक़ जमा कर बैठे तुम
इतनी मीना ख़ुर्दगी अच्छी नहीं
चाहे दिल दे सुझाव पहले सा
चाहे दिल दे सुझाव पहले सा
अब न खाएंगे घाव पहले सा
फोन पर इश्क़ कितना आसां है
अब कहाँ है तनाव पहले सा
दिन-ब-दिन बढ़ रही है महँगाई
अब न चीज़ों का भाव पहले सा
नाम पर देश के मेरी रग में
आज भी है बहाव पहले सा
फेसबुक के नए ज़माने में
अब कहाँ है जुड़ाव पहले सा
हैं नए लफ़्ज़ और कहन भी नई
है ग़ज़ल में कसाव पहले सा
आदमी आज कुछ भी कर ले मगर
जाम-ओ- मीना का चाव पहले सा
आँखों में इतनी नमी अच्छी नहीं
आँखों में इतनी नमी अच्छी नहीं
हमसे अब नाराज़गी अच्छी नहीं
बज़्म में बैठे वो नज़रें फेर कर
इश्क़ में ये बेरुख़ी अच्छी नहीं
हौसला ता-ज़िंदगी रखना बुलंद
इस क़दर आज़ुर्दगी अच्छी नहीं
वो सराबों में ग़ज़ालों की तरह
इश्क़ की सर गश्तगी अच्छी नहीं
पास रखिए अपनी उल्फ़त का ज़रा
प्यार में आवारगी अच्छी नहीं
हर तरफ़ तुमको ही देखे ये नज़र
बज़्म में तेरी कमी अच्छी नहीं
मीर ग़ालिब सा सुख़न दरकार है
आज मीना शायरी अच्छी नहीं
कोई हैरानी नहीं है
किसी को कोई हैरानी नहीं है
जहाँ की आंख में पानी नहीं है
मिले कैसे किसी को आज मोहन
कोई मीरा सी दीवानी नहीं है
न हासिल कर सकोगे ज़ीस्त में कुछ
ख़ुदा की गर निगहबानी नहीं है
कलंदर सा मिज़ाज ओ ज़र्फ़ अपना
तबीअत अपनी शाहानी नहीं है।
जहाँ में मौत आनी है सभी को
बता मुझको जो शय फ़ानी नही है
सभी हैं इस चमन में अजनबी से
मगर ख़ुशबू तो अनजानी नहीं है
मजाज़ी इश्क़ अपना है ए” मीना”
मुहब्बत अपनी लाफ़ानी नहीं हैं
किसी को जो अपना बनाना पड़ेगा
किसी को जो अपना बनाना पड़ेगा
तो दिल क्या है सर भी झुकाना पड़ेगा
नहीं है ये मुमकिन के हम तुम मिलें अब
कि क़िस्मत को पर आज़माना पड़ेगा
ख़यालों की परवाज़ से इस जहाँ को
अभी हम है ज़िंदा बताना पड़ेगा
शिकस्ता से खंडहर बचे हैं यहाँ अब
दयार-ए-मुहब्बत बसाना पड़ेगा
कहाँ पे है मर्क़ूम रस्म ए मोहब्बत,
हमेशा मुझे ही मनाना पड़ेगा।
दिये पे मचलते हैं कैसे पतंगे
मुहब्बत में ये भी बताना पड़ेगा
तके राह उसकी यूँ बरसों से मीना
क़सम हैं उसे अबके आना पड़ेगा
हर तरफ़ फैली रौशनी है अभी
हर तरफ़ फैली रौशनी है अभी
सिमटी सिमटी सी तीरगी है अभी
कोई तो बात है कि बे-बस हूँ
उसकी आँखों मे साहिरी है अभी
उसने सरशार मुझको कर डाला,
बाक़ी फिर भी ये तश्नगी है अभी।
कुछ भी बोलो न तुम लबों से सनम
ये मुलाक़ात की घड़ी है अभी
मुस्तक़िल तुम को हो ही जाएगी
ये मुहब्बत जो आरज़ी है अभी
तितलियों से वो बात करता है
तर्ज़ -ए -उस्लूब सादगी है अभी
कैसे कह दूँ कि जानती हूँ तुझे
तू भी मीना तो अजनबी है अभी
प्यार के लफ़्ज़ों में ढली देखो
प्यार के लफ़्ज़ों में ढली देखो
और ग़ज़ल मेरी संदली देखो
इक सुकोमल सी वो कली देखो
है मगर दिल में खलबली देखो
कल तलक रौनक़ें जहाँ पर थी
आज सूनी वही गली देखो
ज़ह्र ही ज़ह्र है भरा इसमें
है जो नफ़रत की पोटली देखो
अब न सहमेगी देख कर वो कभी
लड़ती दानव से लाड़ली देखो
तल्ख़ियाँ हैं ज़ुबाँ पे लोगों की
गुड़ की गायब हुई डली देखो
संग परवाने के तो वो मीना
शम्अ भी रात भर जली देखो
किसी को कोई हैरानी नहीं है
किसी को कोई हैरानी नहीं है
जहाँ की आंख में पानी नहीं है
मिले कैसे किसी को आज मोहन
कोई मीरा सी दीवानी नहीं है
न हासिल कर सकोगे ज़ीस्त में कुछ
ख़ुदा की गर निगहबानी नहीं है
कलंदर सा मिज़ाज ओ ज़र्फ़ अपना
तबीअत अपनी शाहानी नहीं है।
जहाँ में मौत आनी है सभी को
बता मुझको जो शय फ़ानी नही है
सभी हैं इस चमन में अजनबी से
मगर ख़ुशबू तो अनजानी नहीं है
मजाज़ी इश्क़ अपना है ए” मीना”
मुहब्बत अपनी लाफ़ानी नहीं हैं
किसी को जो अपना बनाना पड़ेगा
किसी को जो अपना बनाना पड़ेगा
तो दिल क्या है सर भी झुकाना पड़ेगा
नहीं है ये मुमकिन के हम तुम मिलें अब
कि क़िस्मत को पर आज़माना पड़ेगा
ख़यालों की परवाज़ से इस जहाँ को
अभी हम है ज़िंदा बताना पड़ेगा
शिकस्ता से खंडहर बचे हैं यहाँ अब
दयार-ए-मुहब्बत बसाना पड़ेगा
कहाँ पे है मर्क़ूम रस्म ए मोहब्बत,
हमेशा मुझे ही मनाना पड़ेगा।
दिये पे मचलते हैं कैसे पतंगे
मुहब्बत में ये भी बताना पड़ेगा
तके राह उसकी यूँ बरसों से मीना
क़सम हैं उसे अबके आना पड़ेगा
हर तरफ़ फैली रौशनी है अभी
हर तरफ़ फैली रौशनी है अभी
सिमटी सिमटी सी तीरगी है अभी
कोई तो बात है कि बे-बस हूँ
उसकी आँखों मे साहिरी है अभी
उसने सरशार मुझको कर डाला,
बाक़ी फिर भी ये तश्नगी है अभी।
कुछ भी बोलो न तुम लबों से सनम
ये मुलाक़ात की घड़ी है अभी
मुस्तक़िल तुम को हो ही जाएगी
ये मुहब्बत जो आरज़ी है अभी
तितलियों से वो बात करता है
तर्ज़ -ए -उस्लूब सादगी है अभी
कैसे कह दूँ कि जानती हूँ तुझे
तू भी मीना तो अजनबी है अभी
जाने जाना ये बरहमी कब तक?
जाने जाना ये बरहमी कब तक?
बन के बैठोगे अजनबी कब तक ?
फिर तमाज़त शबाब पर आई
बर्ग-ए-गुल होगी शबनमी कब तक ?
अपनी गु़स्ताख़ियाँ भी देखो तो,
मेरी देखोगे तुम कमी कब तक ?
जुगनुओं की तरह बनो तुम भी,
मैं ही फैलाऊँ रौशनी कब तक?
जिससे राहत मिले वो सामांँ दे,
मेरे मौला ये बेबसी कब तक?
इक न इक रोज़ मिट के रहती है
कोई मुश्किल यहाँ रही कब तक?
हौसलों की उड़ान है मीना,
वो जो कहते हैं ,शायरी कब तक?
मौत क्या इसके सिवा करती है
मौत क्या इसके सिवा करती है
क़ैद से ग़म की रिहा करती है
माँ मेरी रोज़ दुआ करती है
मेरी ख़ातिर ही जिया करती है
रहती ख़ामोश ग़ज़ल है मेरी
कोई शिकवा न गिला करती है
रोज़ ख़ंजर चला के सीने में
दोस्ती ज़ख़्म नया करती है
दरम्यां रहके भी वो काँटों के
फूल बनकर ही खिला करती है
उसको परवा नहीं है दुनिया की
बस हवाओं में उड़ा करती है
इक ग़ज़ल कहती है वो सदके में
मेरे दिल में ही रहा करती है
लब पे इंक़ार हज़ारों मीना
नाम पर मेरा लिखा करती है
तेरी आँखों की जो तफ़्सील होगी
तेरी आँखों की जो तफ़्सील होगी
मेरी ख़ुशियों की वो तामील होगी
मुसाफ़िर डूब जाते हैं इन्हीं में
यक़ीनन चश्मे-जाना झील होगी
कहेंगे हम ग़ज़ल लाफ़ानी जब भी
जली लफ़्ज़ों की ये क़िंदील होगी
गुलिस्ताँ पर बढ़ेगा और ख़्तरा
हिफ़ाज़त में अगर यूँ ढील होगी
नहीं रुकती चले कैंची सी हरदम
ज़ुबां उनकी ख़ुदा कब सील होगी
मिले हैं ग़म ही हमको ज़िंदगी में
ख़ुशी में ज़ीस्त कब तब्दील होगी
नज़र आती नहीं सच्चाई उनको
धँसी आंखों में शायद कील होगी
मेरी ग़ज़लों की ज़ीनत तुम हो मीना
तुम्हारे हुक्म की तामील होगी
हर बशर हो गया ख़ुदा तौबा
हर बशर हो गया ख़ुदा तौबा
कौन मांगेगा अब दुआ तौबा
आज शामत है इन चिराग़ों की
तेज़ कितनी है ये हवा तौबा
अब ये चिलमन हटा दे तू वरना
मार डालेगी ये अदा तौबा
ख़ुदकुशी कर न लूं मैं तंग आ कर
बेरुख़ी तेरी दिलरुबा तौबा
इतनी आसां नहीं ग़ज़ल-गोई
ख़ुद को करना पड़ा फ़ना तौबा
तोड़ जाती है डोर साँसों की
ज़ीस्त कितनी है बेवफ़ा तौबा
इश्क़ मुझको है तुझसे ही मीना
हाथ ऐसे भी मत छुड़ा तौबा
हमारे ग़म कभी ये कम न होंगे
हमारे ग़म कभी ये कम न होंगे
अगर इनके लिए मरहम न होंगे
नहीं काबू किसी का ज़ीस्त पर कुछ
कहें कैसे कि अब मातम न होंगे
फ़रेबी है ज़माना जानते हैं
मगर हम तो कभी बरहम न होंगे
भरोसा जीत पाएँगे नहीं वो
जो अपनी बात पर क़ायम न होंगे
ज़मीं और आसमाँ तो होंगे लेकिन
जहाँ में एक दिन पर हम न होंगे
जहाँ नफ़रत का बस है बोलबाला
बहारों के वहाँ मौसम न होंगे
भले आ जाए तूफाँ कोई मीना
हमारे नैन लेकिन नम न होंगे
प्यार मेरा हुआ सफल शायद
प्यार मेरा हुआ सफल शायद
वक़्त पल में गया बदल शायद
वस्ल में अब नहीं ख़लल शायद
खिल गया दिल का है कँवल शायद
घर में आईं मुसीबतें जब से
तब से ग़ायब चहल पहल शायद
छोड़ दीजै ये मसअले अब तो
है हरिक बात का ही हल शायद
हाथ कुछ भी नहीं मेरे आया
कोई अपना गया है छल शायद
चैन आता नहीं है क्यों हमको
होती पूरी नहीं ग़ज़ल शायद
वक़्त हाथों में अब नहीं आया
देके धोखा गया निकल शायद
है भरोसा भी इश्क़ में अपने
वो मिलेगा ज़ुरूर कल शायद
सूद की बात आज क्या मीना
डूब जाएगा अस्ल कल शायद
ये दिल फिर प्यार से सरशार होगा
ये दिल फिर प्यार से सरशार होगा
तुम्हारा जब कभी दीदार होगा
मुहब्बत पे फ़ना दिलदार होगा
लबों पर भी हसीं इक़रार होगा
दिलों में ख़ौफ़ है जिसका सभी के
गुज़रता शह्र का मुख़्तार होगा
मिटा दे जो तेरी यादों को दिल से
कहाँ ऐसा कोई ग़मख़्वार होगा
हवस लोगों के दिल से जब मिटेगी
न कोई जिस्म का बाज़ार होगा
बिना तेरे मेरी जाने ग़ज़ल अब
निभाना साँसों से दुश्वार होगा
रईसों के मोहल्ले में है भूखा
यक़ीनन वो कोई ख़ुद्दार होगा
न जाओ हाथ अब मीना छुड़ाकर
बिना तेरे बहुत अज़रार होगा
मुहब्बत का तुमसे सिला चाहती हूँ
मुहब्बत का तुमसे सिला चाहती हूँ
तुम्हीं से तुम्हें माँगना चाहती हूँ
दुखाया बहुत दिल तुम्हारा वफ़ा में
ख़तावार हूँ मैं, सज़ा चाहती हूँ
क़लम आज चलती नहीं क्यों ये मेरी
सुनो शारदे अब कृपा चाहती हूँ
चराग़े मुहब्बत जले उनके दिल में
फ़क़त मैं यही इक दुआ चाहती हूँ
मुसलसल रही भागती ज़िन्दगी में
ऐ मालिक सकूँ अब ज़रा चाहती हूँ
दिए ज़ख़्म तुमने जिगर पे जो मुझको
उन्हीं की मुकम्मल दवा चाहती हूँ
सदा काम आये ग़रीबों के मीना
ये नेमत मैं तुमसे ख़ुदा चाहती हूँ
बात तूफ़ान से छिपानी है
बात तूफ़ान से छिपानी है
मेरी कश्ती बड़ी पुरानी है
जज़्बा -ऐ-शौक जीतने के लिये
दाँव पर मेरी ज़िंदगानी है
रश्क करते हैं हुस्न पर हम तो
जानलेवा भी ये जवानी है
तशनगी से सदा ही दम घुटता
हर समन्दर की ये कहानी है
शहर -ए उम्मीद में तो बैठे हैं
नफ़रतों की चिता जलानी है
हाथ की ये लकीर है कहती
दौलत-ए-इश्क़ ही लुटानी है
जीत ली जंग है कोई शायद
उनके मुखडे पे शादमानी है
हरतरफ हैं अना के ही झगड़े
देख घर घर की यह कहानी है
ज़ख्म़ मेरे न अब कुरेदो तुम
गम की ये दास्तां मिटानी है
कोई देता नहीं पता तेरा
कितनी गलियों की ख़ाक छानी है
शौक़ से बज़्म में गयी मीना
उसको अपनी ग़ज़ल सुनानी है
समय का वक्र तेवर है अभी तक
समय का वक्र तेवर है अभी तक
चुभाता दिल में नश्तर है अभी तक
अकेले ही सफ़र में तो चले हम
न कोई भी तो रहबर है अभी तक
वही दंगा वही हैं नफ़रतें भी
करें क्या हाल बदतर है अभी तक
लगे इल्ज़ाम बेबुनियाद हम पर
कि रिश्वत खोर अफ़सर है अभी तक
शजर की छाँव में बचपन गुज़ारा
न काटो तुम वो मंजर है अभी तक
ख़ुदा हैं वो करो उनकी इबादत
पिता और मातु से घर है अभी तक
सदी बीती न मजनू आज बदले
वही लैला का चक्कर है अभी तक
न ग़ालिब मीर सी ही शायरी है
न ही मीना सुख़नवर है अभी तक
शाम होते ही वो अपने घर जायगा
शाम होते ही वो अपने घर जायगा।
छोड कर आशियाना किधर जायगा।
इश्क़ का ये नशा जो चढ़ा है अभी
ग़र इनायत हुई तो उतर जायगा।
चाँदनी रात में गर न आओगे तुम
वक़्त मायूस होके ठहर जायगा
बंदिशों में रही हैं सदा बेटियाँ,
जो हुये ज़ुल्म सुन दिल सिहर जायगा।
बन के मरहम रखा हाथ अशआर ने
ज़ख़्म कुछ तो जुदाई का भर जायगा।
गुल की अफ़सुर्दगी बढ गई इस क़दर
जब चलेगी हवा तो बिखर जायगा
मौत मुझको बुलाती मगर जान ले
तेरे काँधे पे मीना का सर जायगा
मुहब्बत का तुमसे सिला चाहती हूँ
मुहब्बत का तुमसे सिला चाहती हूँ
तुम्हीं से तुम्हें माँगना चाहती हूँ
दुखाया बहुत दिल तुम्हारा वफ़ा में
ख़तावार हूँ मैं, सज़ा चाहती हूँ
क़लम आज चलती नहीं क्यों ये मेरी
सुनो शारदे अब कृपा चाहती हूँ
चराग़े मुहब्बत जले उनके दिल में
फ़क़त मैं यही इक दुआ चाहती हूँ
मुसलसल रही भागती ज़िन्दगी में
ऐ मालिक सकूँ अब ज़रा चाहती हूँ
दिए ज़ख़्म तुमने जिगर पे जो मुझको
उन्हीं की मुकम्मल दवा चाहती हूँ
सदा काम आये ग़रीबों के मीना
ये नेमत मैं तुमसे ख़ुदा चाहती हूँ
हम नहीं डरते किसी सद्दाम से
हम नहीं डरते किसी सद्दाम से
बात कहनी है यही हुक़्क़ाम से
इश्क़ करके हो गए बेकाम से
लोग मजनूँ के बुलाते नाम से
मज़हबों में फर्क कुछ होता नहीं
पूछ लो जाकर ख़ुदा और राम से
देख वो परवाह करता है कहाँ
इश्क़ डरता है नही अंज़ाम से
मसअले सब बैठ के सुलझाइए
हल नहीं निकलेगा कुछ संग्राम से
नाम प्रभु का जो न लेता हो कभी
फ़ायदा कुछ भी नहीं उस चाम से
भूत मीना पे चढ़ा ईमान का
बिक नहीं सकती किसी भी दाम से
मुहब्बत भरी इक नज़र देखते हो
मुहब्बत भरी इक नज़र देखते हो
मिलेगी नहीं क्यों इधर देखते हो
समझ तो लो तीर-ए-नज़र का इशारा
है क़ातिल नज़र तुम किधर देखते हो
ख़ुशी इस जहाँ में तो मिलती नह़ीं है
मगर राह क्यों बेख़बर देखते हो
फ़िदा है ज़माना हुए देख पागल
जला के घर अपना असर देखते हो
शरारत भरी इन निगाहों को देखो
बिना बात के क्यों क़मर देखते हो
पड़ा रूप रंगों के पीछे ज़माना
नह़ीं क्यों किसी में हुनर देखते हो
कही प्यार से ये ग़ज़ल हमने मीना
मुकम्मल है क्यों फिर कसर देखते हो
फिक्र उसकी रोज़ ही लगने लगी है
फिक्र उसकी रोज़ ही लगने लगी है
जब से बेटी मेरी ये बढ़ने लगी है
ख़ामुशी तेरी मुझे खलने लगी है
साँस भी तो यार अब रुकने लगी है
हर क़दम पर मौत का डेरा यहाँ अब
ज़िंदगी को देख के हँसने लगी है
बेवफ़ा तेरे लिए क्या क्या किया पर
क्यों इमारत प्यार की ढ़हने लगी है
इब्तदाये इश्क़ में देती सुकूँ थी
क्या कहें तनहाई अब डसने लगी है
अपने ही ढ़ाते सितम हर बात पर क्यों
छोटी सी थी बात जो बढ़ने लगी है
अहमियत रिश्तों की भूला आदमी जब
ख़ुदक़ुशी संसार में बढ़ने लगी है
किसको दें इल्ज़ाम किसकी है ख़ता ये
आँख उनसे जो मेरी लड़ने लगी है
ख़ून सस्ता और मँहगा आज पानी
दिल में नफ़रत किस तरह पलने लगी है
अब ग़ज़ल कैसे कहें हम तू बता दे
शाइराना ज़िंदगी थकने लगी है
किस तरह मीना ख़ुशी के गीत गाए
पीर होठों से ही जब रिसने लगी है
सिर्फ मेरे लिए बना है वो
सिर्फ मेरे लिए बना है वो
मेरे हर दर्द की दवा है वो
उसकी आँखें शराब के प्याले
लोग कहते हैं इक नशा है वो
जो करम से नवाज़ता है हमें
और कोई नहीं ख़ुदा है वो
ढूँढते आदमी नहीं मिलता
आजकल ऐसा लापता है वो
बात कोई न मानता घर में
कहने भर के लिए बड़ा है वो
तप के गर्दिश की आग में हर पल
सोने जैसा निखर गया है वो
मानता दिल न बेवफ़ा मेरा
यार पर देख बेवफ़ा है वो
सीखने आ गई ग़ज़ल मीना
जो सिखाये नहीं मिला है वो
वक़्त इक पल भी ये कहाँ ठहरे
वक़्त इक पल भी ये कहाँ ठहरे
ये भला किसके दरम्याँ ठहरे
रोज़ दिल में ख़याल आते हैं
कब ख़यालों का कारवाँ ठहरे
कोई उनका यक़ीं करे क्यों अब
जब वो झूठों के पासबाँ ठहरे
क़त्ल हो जाएँगे मुहब्बत में
ये हैं आशिक़ ये बे-ज़ुबाँ ठहरे
मेरे दिल में क़याम है उनका
दिलरुबा हैं वो जाने-ज़ाँ ठहरे
चांद सूरज भी ज़ेरे-साया हैं
उनका क्या है वो आस्माँ ठहरे
जर्रे-ज़र्रे में है हवा मीना
पर कहां इसका कुछ निशाँ ठहरे
दिल ये छोटा है तो छोटा ही सही
दिल ये छोटा है तो छोटा ही सही
प्यार सौदा है तो सौदा ही सही
झूठी तारीफ़ नहीं करते हम
उनको शिकवा है तो शिकवा ही नहीं
मेरी आँखों में है काजल जैसे
गर वो काला है तो काला ही सही
थक गए हम तो मना कर उसको
अब जो रूठा है तो रूठा ही सही
जाँ से प्यारा है वो बेटा मुझको
जो वो खोटा है तो खोटा ही सही
हमको घर की भी तमन्ना ही नहीं
सिर पे छाता है तो छाता ही सही
मर मिटे हम तो सनम अब तुम पर
इश्क़ झूठा है तो झूठा ही सही
कोई हमदम न हमनवा दिल का
कोई हमदम न हमनवा दिल का
है जुदा सब से रास्ता दिल का
कब ये टूटे कि कब सँभल जाए
कौन समझा है फ़लसफ़ा दिल का
ख़ामुशी से तेरी ये डर है मुझे
टूट जाएगा आईना दिल का
दफ़्न हैं कितने ही हसीं चेहरे
है वसीह कितना दायरा दिल का
मरकज़ ए दिल में सब मुकीम हुए
रह गया अब तो हाशिया दिल का
बीच मझधार में खड़े हम हैं
रब बढ़ा कुछ तो हौसला दिल का
कितनी सदियाँ गुज़र गई मीना
कौन कर पाया तर्जुमा दिल का
मुहब्बत की गली देखी नहीं है
मुहब्बत की गली देखी नहीं है
कहीं भी आशिक़ी देखी नहीं है
तुम्हें ग़ालिब गुमाँ होता कि हमने
कभी सौदागरी देखी नहीं है
दिखा है मौत का मंज़र यहाँ पर
कहीं भी ज़िन्दगी देखी नहीं है
दिखाई दे रहे हैं शेर इसमें
ग़ज़ल की बेबसी देखी नहीं है
जहालत इल्म से बढ़कर हुई अब
ख़ुदा ऐसी सदी देखी नहीं है
निगाहों से पिलाते हैं वो जैसे
यूँ मैंने मैकशी देखी नहीं है
पढ़ा दे हाले दिल उसका जो मीना
कि ऐसी फ़ारसी देखी नहीं है
चमन में तो इन्हीं से मस्तियाँ हैं
चमन में तो इन्हीं से मस्तियाँ हैं
खिलातीं रोज़ गुल ये तितलियाँ हैं
हमारे साथ बस वीरानियाँ हैं
जिधर देखो उधर तनहाइयाँ हैं
ग़ज़ब की झोपडी में चुप्पियाँ हैं
किसी मरते की शायद हिचकियाँ हैं
रुलाती हमको उजड़ी बस्तियाँ ये
कि डूबी बारिशों में कश्तियाँ हैं
मुसीबत में नहीं कोई किसी का
सहारा छोड़ती परछाइयाँ हैं
नहीं महफूज़ है ये ज़ीस्त भी अब
उगलती ज़ह्र शीरीं तल्ख़ियाँ हैं
करे सजदा हज़ारों हमने तुमको
मगर मिलती सदा रुसवाइयाँ हैं
नहीं सुनवाई कोई मुफ़लिसों की
कि फेंकी फाड़ के सब अर्ज़ियाँ हैं
निशां मंज़िल के अब मिलते नहीं
गिराता आसमां भी बिजलियाँ हैं
किसी ड्यूटी पे कब अफ़सर रहा है
किसी ड्यूटी पे कब अफ़सर रहा है।
शिकायत का फ़क़त दफ़्तर रहा है।
हमेशा ग़म का ही लश्कर रहा है।
जो काँटो का मेरा बिस्तर रहा है।
ज़मीं की चाहतें तो हैं अज़ल से,
बहा जो अश्क ये अंबर रहा है।
ठहरता ही नहीं है एक पल को,
मेरी क़िस्मत का जो चक्कर रहा है।
सियासत भी गिरे क़दमों में आकर,
क़लम का ऐसा ही तेवर रहा है।
अजब मंज़र ये देखा शह्र का भी,
गुलों के हाथ में ख़ंजर रहा है।
वो दिल को मार कर ठोकर चले यूं,
कि, जैसे दिल मेरा पत्थर रहा है।
सुख़न की जान थे वो मीरो- ग़ालिब,
नहीं उनसा कोई शायर रहा है।
उठी आंगन में है दीवार जब से,
कहाँ पहले सा “मीना” घर रहा है।
रहे तनहा होकर
रहे तनहा होकर हज़ारों में शामिल
हमेशा रहे बेसहारों में शामिल
सदा ही रही है ख़ुशी दूर हमसे
रहे हम सदा ग़मगुसारों में शामिल
नहीं बन सके हम महाजन कभी भी
सदा ही रहे देनदारों में शामिल
ज़मीं पे मिलन हो न पाया हमारा
चलो होंगे अब हम सितारों में शामिल
मिली हमको मन की न कोई हसीना
हमेशा रहे हम कुँआरों में शामिल
छुपाते रहे दिल का हर राज़ हमसे
किया ही नहीं राज़दारों में शामिल
कभी लूटते थे ख़ज़ाना जो दिल का
वही आज हैं पहरेदारों में शामिल
मुहब्बत की कश्ती डुबो दी उसी ने
किया हमने जिसको किनारों में शामिल
नहीं फ़ुसतें हमको मिलने की तुमसे
रहे रात दिन बस क़तारों में शामिल
करेंगे इबादत मुहब्बत की मीना
भले ही रहें हम मज़ारों में शामिल
कहीं ये दिल मेरा लगता नहीं है
कहीं ये दिल मेरा लगता नहीं है
जहाँ में अब कोई अपना नहीं है
कोई मुझसा तो दीवाना नहीं है
मगर फिर भी कोई चर्चा नहीं है
किताबे ज़िन्दगी में क्यूँ हमारी
मुहब्बत का कोई किस्सा नहीं है
ज़ुनूं है जोश इक हममें नया भी
कि झुक के अब हमें जीना नहीं है
किसी की बेवफ़ा ज़िन्दगी का
लबों पे नाम अब लाना नहीं है
ग़मों से ये भरी हर इक सतर है
ख़ुशी का कोई भी पन्ना नहीं है
हज़ारों बंदिशें बेटी पे हैं मीना
ज़माना अब भी ये बदला नहीं है
जैसा वह घर में था
जैसा वह घर में था वैसा वही बाहर निकला
उसके व्यवहार में कोई भी न अंतर निकला
कैसा तक़दीर का भी यार ये चक्कर निकला
मैं बड़ा उससे न हर बात में कमतर निकला
दे दग़ा मुझको मेरा दोस्त सितमगर निकला
चीर कर मेरा जिगर प्यार का ख़ंजर.निकला
आँखों में लोगों के आँसू का समुंदर देकर
चार काँधों पे ज़नाजे पे वो सजकर निकला
मौज़ ख़ुद करता रहा देके सितम वह हमको
जिसको.समझा सदा हीरा वही पत्थर.निकला
आया था जग में मैं तन्हा रहा जीवन तन्हा
रौंदकर आज मुझे ख़ुद मेरा लश्कर निकला
रौनक़ें बज़्म की आकर वो बढ़ा दे मीना
मीर सा बनके जहाँ में वो सुख़नवर निकला
ज़र्द चेहरा वो निशानी दे गया
ज़र्द चेहरा वो निशानी दे गया
बे सबब सी ज़िन्दगानी दे गया
उम्र भर जिसको समझ पाए न हम
इतनी मुश्किल वो कहानी दे गया
खूँ चका मंज़र था हर इक सू मगर
कोई लम्हा शादमानी दे गया
जाते जाते वो हमें यादों के साथ
खुश्बुएं भी जाफ़रानी दे गया
हर सतर बे रंग थी जिसकी कभी
ज़िन्दगी को वो मआनी दे गया
रब के फ़ैज़ाने -करम ऐसे हुए
शामें हमको वो सुहानी दे गया
शुक्रिया क्यों कर न बोलूँ उसको मैं
फ़न वो मीना ख़ानदानी दे गया
ज़ेरे मिज़्गाँ जो मेरे पानी है
ज़ेरे मिज़्गाँ जो मेरे पानी है
आँखों के दरिया की रवानी है
पास बैठूँ तो दूर हो जाएँ
उनको मुझसे जो बदगुमानी है
मुर्शिद-ए-इश्क़ तुझसे मिलने को
दश्त दर दश्त ख़ाक़ छानी है
दर्द ही ज़ीस्त में मिले अब तक
ख़्वाहिशों की ये मेहरबानी है
मोहरे ख़ामोशी है लबों पे और
आँख मेरी ये पानी पानी है
दास्तां इश्क़ की लहू से लिखी
शायरी ग़म की तर्जुमानी है
ज़ादे दुनिया की फ़िक्र क्या मीना
चंद रोज़ा ये ज़िन्दगानी है
बिला-शक वो ग़म की दवा जानते हैं
बिला-शक वो ग़म की दवा जानते हैं
जो इक मयक़दे का पता जानते हैं
सुख़नवर हैं हम शौक़ है शायरी का
सुख़न का हर इक क़ायदा जानते हैं
हुए हैं जो बर्बाद राहे वफ़ा में
मुहब्बत का वो फ़लसफ़ा जानते हैं
कहाँ रूठते हैं कहाँ मानते हम
हमारी हर इक वो अदा जानते हैं
सरों को झुकाए हुए हैं वो रहते
मुहब्बत की जो इंतिहा जानते हैं
जो शर्ह-ए-मुहब्बत की करते हैं बातें
ज़माने के बारे में क्या जानते हैं?
ये अहल-ए-मुहब्बत ज़माने में मीना
हर इक दर्द को ख़ुशनुमा जानते हैं
तेरे हुस्न पर कामरानी लुटा दी
तेरे हुस्न पर कामरानी लुटा दी
बुलंदी की हर इक निशानी लुटा दी
ख़ुदा ने सँवारा सजाया चमन को
गुलों पे सभी मेहरबानी लुटा दी
फ़िजाओं में नफ़रत का विष घोल कर के
मुहब्बत की सारी कहानी लुटा दी
ख़ज़ाना किया सारा खाली उन्होंने
कि हासिल हुई राजधानी लुटा दी
करें रोज़ क़ुदरत से वो छेड़खानी
नदी की भी अब तो रवानी लुटा दी
ख़िज़ाँ लेके आये मेरी जीस्त में वो
कि ख़िदमत में रुत वो सुहानी लुटा दी
नहीं हुस्न का तेरे सानी जहाँ में
कि तुझपे ग़ज़ल की रवानी लुटा दी
मिले हैं फ़क़त ग़म ही ग़म देख मीना
तेरे प्यार में ज़िंदगानी लुटा दी
किसी को कोई हैरानी नहीं है
किसी को कोई हैरानी नहीं है
जहाँ की आंख में पानी नहीं है
मिले कैसे किसी को आज मोहन
कोई मीरा सी दीवानी नहीं है
न हासिल कर सकोगे ज़ीस्त में कुछ
ख़ुदा की गर निगहबानी नहीं है
कलंदर सा मिज़ाज ओ ज़र्फ़ अपना
तबीअत अपनी शाहानी नहीं है।
जहाँ में मौत आनी है सभी को
बता मुझको जो शय फ़ानी नही है
सभी हैं इस चमन में अजनबी से
मगर ख़ुशबू तो अनजानी नहीं है
मजाज़ी इश्क़ अपना है ए” मीना”
मुहब्बत अपनी लाफ़ानी नहीं हैं
तेरी आँखों की जो तफ़्सील होगी
तेरी आँखों की जो तफ़्सील होगी
मेरी ख़ुशियों की वो तामील होगी
मुसाफ़िर डूब जाते हैं इन्हीं में
यक़ीनन चश्मे-जाना झील होगी
कहेंगे हम ग़ज़ल लाफ़ानी जब भी
जली लफ़्ज़ों की ये क़िंदील होगी
गुलिस्ताँ पर बढ़ेगा और ख़्तरा
हिफ़ाज़त में अगर यूँ ढील होगी
नहीं रुकती चले कैंची सी हरदम
ज़ुबां उनकी ख़ुदा कब सील होगी
मिले हैं ग़म ही हमको ज़िंदगी में
ख़ुशी में ज़ीस्त कब तब्दील होगी
नज़र आती नहीं सच्चाई उनको
धँसी आंखों में शायद कील होगी
मेरी ग़ज़लों की ज़ीनत तुम हो मीना
तुम्हारे हुक्म की तामील होगी
हर बशर हो गया ख़ुदा तौबा
हर बशर हो गया ख़ुदा तौबा
कौन मांगेगा अब दुआ तौबा
आज शामत है इन चिराग़ों की
तेज़ कितनी है ये हवा तौबा
अब ये चिलमन हटा दे तू वरना
मार डालेगी ये अदा तौबा
ख़ुदकुशी कर न लूं मैं तंग आ कर
बेरुख़ी तेरी दिलरुबा तौबा
इतनी आसां नहीं ग़ज़ल-गोई
ख़ुद को करना पड़ा फ़ना तौबा
तोड़ जाती है डोर साँसों की
ज़ीस्त कितनी है बेवफ़ा तौबा
इश्क़ मुझको है तुझसे ही मीना
हाथ ऐसे भी मत छुड़ा तौबा
भला इस मय से क्या तौबा करोगे
भला इस मय से क्या तौबा करोगे
पुराने शौक़ फिर ज़िन्दा करोगे
दिलों में ज़ख़्म भी गहरा करोगे
हमारी आँख से बरसा करोगे
लगा के झूठी तुहमत रोज़ उस पर
समुंदर को भी तुम कतरा करोगे
हिफ़ाज़त कर न पाये गर वतन की
तो कोह-ए-नूर का भी क्या करोगे
सुकूँन-ओ-चैन खोया इश्क़ में सब
हमें अब हिज्र नज़राना करोगे
रियाया पर हुए हैं ज़ुल्म तारी
दुबारा जीत कर धोखा करोगे
जहां तो है सदा से ही ये फ़ानी
हवस लालच बढ़ाकर क्या करोगे
खिलें रुख़सार कुछ मेरे भी मीना
नया कब अपना ये लहजा करोगे
भला इस मय से क्या तौबा करोगे
पुराने शौक़ फिर ज़िन्दा करोगे
दिलों में ज़ख़्म भी गहरा करोगे
हमारी आँख से बरसा करोगे
लगा के झूठी तुहमत रोज़ उस पर
समुंदर को भी तुम कतरा करोगे
हिफ़ाज़त कर न पाये गर वतन की
तो कोह-ए-नूर का भी क्या करोगे
सुकूँन-ओ-चैन खोया इश्क़ में सब
हमें अब हिज्र नज़राना करोगे
रियाया पर हुए हैं ज़ुल्म तारी
दुबारा जीत कर धोखा करोगे
जहां तो है सदा से ही ये फ़ानी
हवस लालच बढ़ाकर क्या करोगे
खिलें रुख़सार कुछ मेरे भी मीना
नया कब अपना ये लहजा करोगे
मैं ही क्यूँ दम भरूँ मुहब्बत का
मैं ही क्यूँ दम भरूँ मुहब्बत का
रख भरम तू भी मेरी ग़ैरत का
इश्क़ दुनिया में कोई शै ही नहीं
फ़लसफ़ा है ये बस ज़ुरूरत का
आपके जैसे हो गए हम भी
अब ज़माना कहाँ शराफ़त का
ये सियासत तो इक अज़ीयत है
तख़्म बोती है बस ये नफ़रत का
बुग्ज़ कीना हसद नहीं होंगे
नाम बाक़ी रहेगा उल्फ़त का
कूचा ए यार में ये लगता है
वक़्त अब आ गया शहादत का
अज़्म है हौसला है मीना है
हमको अब डर नहीं बग़ावत का
शम्अ जैसे जला नहीं करते
शम्अ जैसे जला नहीं करते
रोज़ हम रतजगा नहीं करते
अश्क बनके रहें वो आँखों में
ज़िद में लेकिन बहा नहीं करते
राह दुश्वार है मोहब्बत की
ख़ैर हम तो गिला नही करते
हम बिछाते बिसात हैं लेकिन
चाल कोई चला नहीं करते
तोड़ देते हैं सब तअल्लुक़ हम
दिल में रंजिश रखा नहीं करते
ज़ब्त करते ज़माने भर के ग़म
घर को जो मैक़दा नहीं करते
बस गिनाते हो पाप मेरे तुम
छू के क्यों पारसा नहीं करते
राज़ दिल में निहाँ जो तेरे हैं
जाम -ए-जम से छुपा नही करते
कहते मीना तेरे लिए ही ग़ज़ल
महफ़िलों में कहा नहीं करते
बोझ ये उम्र भर उठाने से
बोझ ये उम्र भर उठाने से
फ़ायदा कुछ न सर झुकाने से
बाँटने से ही इल्म बढ़ता है
कर लो कुछ ख़र्च इस ख़ज़ाने से
दिल में चाहत फ़क़त तुम्हारी है
आजा मिलने किसी बहाने से
है चमन में बहार तुझसे ही
गुल खिलें तेरे मुस्कराने से
जां हथेली पे ले के चलते हैं
हम कहाँ डरते हैं ज़माने से
हम अज़ल से फ़क़त तुम्हारे हैं
बाज़ आओ भी आज़माने से
झूठी थी उनकी बस मुहब्बत यह
सीख मिलती यही फ़साने से
सब नज़र से बयान होता है
दर्द छिपता कहाँ छिपाने से
क्या मिलेगा भला तुझे मीना
दिल ग़रीबों का यूँ दुखाने से
मुझसे कैसी ये उसकी अनबन है
मुझसे कैसी ये उसकी अनबन है
आइना क्यों बना ये दुश्मन है
उनके फ़न का ये दिल भी है क़ायल
उनके शे’रों में कुछ नयापन है
चाँद को अपने कैसे देखूँ मैं
आज दुश्मन बना ये चिलमन है
हम पे इल्ज़ाम वो लगाते हैं
जिनका ख़ुद दाग़दार दामन है
जिनकी औकात कुछ न थी कल तक
आज उनका हुआ सिंहासन है
गुल हुए सब चिराग़ उल्फ़त के
अश्कों का बह रहा ये सावन है
वो फ़लक का ही चाँद हो जैसे
उनकी आमद से घर ये रौशन है
घर में आई है जब से इक बेटी
खिलखिलाता ये घर का आँगन है
दोस्त कैसे कहूँ उसे मीना
वो अज़ल से ही मेरा दुश्मन है
हमने ख़ुद
प्यार करने की ज़माने से इजाज़त ली है
हमने ख़ुद मोल बिना बात ही आफ़त ली है
है मुनासिब कहाँ हर रोज़ बहाना आँसू
हमने कुछ दिन के लिए ग़म से रिआयत ली है
मुफ़लिसों का नहीं कोई भी सगा दुनिया में
सारी दुनिया ने ग़रीबों से अदावत ली है
दे रहा था मिरा रब सबको मुरादें दिल की
छोड़ के लाल-ओ-गुहर हमने ज़ियारत ली है
धोका ही धोका मिला और मिला ग़म मुझको
क्यों बिना बात ही उल्फ़त में ये उजरत ली है
है घड़ी अब कहाँ रुख़सत की तो आई देखो
फाँसी पे चढ़ने की सरकार से मोहलत ली है
शाइरी रास नहीं आती है हमको मीना
क्यों ग़ज़ल कहने की हमने तो ये ज़हमत ली है
हुस्न के दिल में
हुस्न के दिल में जो तुम यार उतर जाओगे
लेके उल्फ़त के ही फिर लाल-ओ- गुहर जाओगे
अम्न के फूल खिलाओगे तो तर जाओगे
तुम महक जैसे फ़िजाओं में बिखर जाओगे
लाख पाबंदी लगा दे ये ज़माना तुम पर
हुस्न से मिलने मगर शाम-ओ-सहर जाओगे
छोड़कर अपनी ज़मीं और वतन अपना ये
चंद पैसों के लिए दूर किधर जाओगे
लाख मुश्किल हो न छोड़ो ये वफ़ा का दामन
फिर करम होगा ख़ुदा का तो सँवर.जाओगे
तुम मुसाफ़िर हो मुहब्बत की हसीं राहों के
फूल काँटों में खिलेंगे जो गुज़र जाओगे
जानता हूँ मैं ज़माने तेरी हर फ़ितरत को
चैन पाओगे जो दे ज़ख़्म -ए -जिगर जाओगे
साथ देगा न तुम्हारा कोई सुन लो मीना
तन्हा आए थे यहाँ तन्हा ही घर जाओगे
ग़ज़ल रहने दे
कर स़ुखन पे ज़रा एहसान ग़ज़ल रहने दे
बिन मोहब्बत है ये बेजान ग़ज़ल रहने दो
है अदब से अभी अनजान ग़ज़ल रहने दे
पहले अपनी बना पहचान ग़ज़ल रहने दे
हिज़्र ये रोज़ चुभोता है दिलों में नश्तर
है अभी यार तू नादान ग़ज़ल रहने दे
ना ख़ुदा कोई नहीं दिखता बचा ले जो हमें
ज़ीस्त में आया है तूफ़ान ग़ज़ल रहने दे
हैं बहुत बह्रें समझ ले भी पहले इनको तू
कहना इतना नहीं आसान ग़ज़ल रहने दे
गुफ़्तगू क्या करे ख़ुद से कोई तन्हाई में
है ये दिल आज परेशान ग़ज़ल रहने दे
वक़्त क़ुर्बानियों का है ये वतन पर अपने
ख़ुद को कर मुल्क पे कुर्बान ग़ज़ल रहने दे
शम्अ बन ख़ूब जले बज़्म में चाहत में हम
यार मत हो तू परेशान ग़ज़ल रहने दे
बह्रे दिल की है कोई लहर,ये आँसू मीना
ख़ुद का मत कर तू यूँ नुकसान ग़ज़ल रहने दे
मेरे असबाब
ज़िन्दगी भर के मेरे असबाब पत्थर हो गए
आपके जाते ही सारे ख़्वाब पत्थर हो गए
देख कर तूफ़ान सब गिर्दाब पत्थर हो गए
आँसुओं के भी मेरे सैलाब पत्थर हो गए
बादे -शब की साँस भी नाज़ो अदा से थम गयी
मात खाये चाँद तारे बाब पत्थर हो गए
अब मयस्सर है कहाँ हमको वफ़ा संसार में
रिश्ते नाते और सब अहबाब पत्थर हो गए
अब तलक दुनिया में जिनकी कोई क़ीमत ही न थी
जब तराशा है उन्हें नायाब पत्थर हो गए
सोचा था चश्म -ए-सितारा- याब है तक़दीर में
टूटी हर उम्मीद सब आफ़्ताब पत्थर हो गए
इल्तिजा है दे ख़ुशी इस सर ज़मीं को ऐ ख़ुदा
नर्मो नाज़ुक फूल क्या अब दाब पत्थर हो गए
मुफ़लिसों को पूछता कोई नहीं संसार में
ज़ुल्म भी इतने हुए आ’साब पत्थर हो गए
कब मिले इनको रिहाई इस क़फ़स से अब ख़ुदा
क़ैद में मीना हसीं सुरख़ाब पत्थर हो गए
मज़लूम पे करम कर
ज़ालिम हुए हैं मौला ऊँचे मकान वाले
मज़लूम पे करम कर ओ आसमान वाले
मासूम से ये बच्चे हैं जान वालिदों की
रखना हिफ़ाज़तों से अम्नो-अमान वाले
रिज़्क़-ए-हराम से भी परहेज़ अब नहीं है
पकवान फीके रखते ऊँची दुकान वाले
नादान चार दिन की होती है क़ामयाबी
रख पैर तू ज़मीं पर अपना गुमान वाले
शतरंज की बिसातें हर दिन यहाँ बिछाकर
चलते हैं रोज़ चालें आला कमान वाले
बंदे हैं हम ज़मीं के चाहत न कहकशाँ की
खाते शिकस्त अक्सर ऊँची उड़ान वाले
दौर -ए -अलम में यारो मुस्कान पर हमारी
हैरान हो रहे हैं सब दरमियान वाले
ग़ाफ़िल नहीं है हम भी अपनों की साज़िशों से
बख़्शी ख़ुदा ने नेमत हम भी हैं कान वाले
लिख दो कलाम ऐसा महफ़िल भी झूम जाए
हैरत से देखें मीना सारे जहान वाले
कहने को ग़ज़ल
मतला नहीं होता कभी मक्ता नहीं होता
कहने को ग़ज़ल ज़ेहन में मिसरा नहीं होता
सागर नहीं होता कभी मीना नहीं होता
ले जाने लबों तक कभी प्याला नहीं होता
नज़रें चुरा के सबसे वो रह-रह हमें देखें
ये ज़िंदगी में रोज़ करिश्मा नहीं होता
इस ज़िंदगी में हमको फ़रेब इतने मिले हैं
अब दिल को किसी पर भी भरोसा नहीं होता
सौग़ात में हमको मिलीं रुसवाईयाँ अक्सर
दाग़ आब से धुल जाएँ ये, ऐसा नहीं होता
पीता हूँ फ़क़त अश्कों को दिन रात बराबर
गो ये भी सही है कि मैं तिश्ना नहीं होता
ईमान ही दौलत है मेरी और मेरी हिम्मत
लुट जाने का मुझको कोई ख़तरा नहीं होता
तुझ सा हसीं हो साथ किसी सर्द रात में
तुझ सा हसीं हो साथ किसी सर्द रात में
लिख देंगे हम कलाम कोई बात बात में
हासिल हुआ हमें नहीं कुछ भी हयात में
बैठे रहे सभी हमें डसने की घात में
शीरीं नहीं है हम तो हो फ़रहाद तुम कहाँ
करते अगर हो इश्क़ है क्या नाम ज़ात में
हमने किया है प्यार तुम्हें इस क़दर सनम
कोई न कर सकेगा भरी क़ाइनात में
करते दुआ है तुमको सदा जीत ही मिले
हमको नहीं गुरेज़ कोई तुमसे मात में
जिनका दिया था साथ वही दे गये दग़ा
धोख़े मिले हैं हमको सदा ही बिसात में
जलती हुई सहर हैं ये रातें हैं बेवफ़ा
मीना ये ज़िन्दगी ही फँसी हादसात में
इफ़्शा-ए-राज़ हो जा
आँखों के रस्ते आके धड़कन का साज़ हो जा
हैरत से लोग देखें इफ़्शा-ए-राज़ हो जा
सत्ता ये तीरगी की है ख़ौफ़ का भी आलम
रौशन जहां को करने तू सरफ़राज़ हो जा
बरसा है कहर जिनपे अब देख आस्मां का
मज़लूम के लिए तू सोज़ो गुदाज़ हो जा
है वक़्त गूफ्तगू का अब तो न जिंदगी में
बंदा तू आज फिर से नाज़ो नयाज़ हो जा
अब ग़म छिपा न सीने में दिल नवाज़ मेरे
फस्ले बहार आयी बुशरा एजाज़ हो जा
अहकाम -ए -रब -पे बन्दे आयेंगी मुश्किलें पर
ख़ुद को बुलंद कर अब तो इम्तियाज़ हो जा
अब वक़्त आ गया है क़ुर्बान मुल्क पर हो
लें नाम लोग तेरा जरिया ए नाज़ हो जा
सजदा करूँ जहाँ मैं सिर ये झुके जहाँ पर
मिट्टी तू मेरी ख़ातिर वो जा-नमाज़ हो जा
हरदम दुआ मैं माँगू तेरी सलामती की
लग जाए उम्र मेरी उम्रेदराज़ हो जा
ख़ाना-बदोश मीना मुश्किल में ज़िंदगी है
रहमत की वारिशें कर बंदानवाज़ हो जा
किसी को जो अपना बनाना पड़ेगा
किसी को जो अपना बनाना पड़ेगा
तो दिल क्या है सर भी झुकाना पड़ेगा
नहीं है ये मुमकिन के हम तुम मिलें अब
कि क़िस्मत को पर आज़माना पड़ेगा
ख़यालों की परवाज़ से इस जहाँ को
अभी हम है ज़िंदा बताना पड़ेगा
शिकस्ता से खंडहर बचे हैं यहाँ अब
दयार-ए-मुहब्बत बसाना पड़ेगा
कहाँ पे है मर्क़ूम रस्म ए मोहब्बत,
हमेशा मुझे ही मनाना पड़ेगा।
दिये पे मचलते हैं कैसे पतंगे
मोहब्बत में ये भी बताना पड़ेगा
तके राह उसकी यूँ बरसों से मीना
क़सम हैं उसे अबके आना पड़ेगा
हर तरफ़ फैली रौशनी है अभी
हर तरफ़ फैली रौशनी है अभी
सिमटी सिमटी सी तीरगी है अभी
कोई तो बात है कि बे-बस हूँ
उसकी आँखों मे साहिरी है अभी
उसने सरशार मुझको कर डाला,
बाक़ी फिर भी ये तश्नगी है अभी।
कुछ भी बोलो न तुम लबों से सनम
ये मुलाक़ात की घड़ी है अभी
मुस्तक़िल तुम को हो ही जाएगी
ये मुहब्बत जो आरज़ी है अभी
तितलियों से वो बात करता है
तर्ज़ -ए -उस्लूब सादगी है अभी
कैसे कह दूँ कि जानती हूँ तुझे
मीना तू भी तो अजनबी है अभी
कब तक
जाने जाना ये बरहमी कब तक?
बन के बैठोगे अजनबी कब तक ?
फिर तमाज़त शबाब पर आई
बर्ग-ए-गुल होगी शबनमी कब तक ?
अपनी गु़स्ताख़ियाँ भी देखो तो,
मेरी देखोगे तुम कमी कब तक ?
जुगनुओं की तरह बनो तुम भी,
मैं ही फैलाऊँ रौशनी कब तक?
जिससे राहत मिले वो सामांँ दे,
मेरे मौला ये बेबसी कब तक?
इक न इक रोज़ मिट के रहती है
कोई मुश्किल यहाँ रही कब तक?
हौसलों की उड़ान है मीना,
वो जो कहते हैं ,शायरी कब तक?
नया -नया है
शबाब आया नया -नया है
सुरूर गहरा नया- नया है
करें गिले किस तरह बताओ
बना ये रिश्ता नया -नया है
कहें तुझे कैसे अलविदा हम
अभी नजारा नया- नया है
पिला दे उल्फ़त के जाम साकी
हुआ दिवाना नया -नया है
भडक रहे हैं जिगर में शोले
उठा ये पर्दा नया- नया है
क़ुबूल जब से हुई मुहब्बत
हमारा जलवा नया- नया है
ग़ज़ल कही है जो आज मीना
रदीफ़ उसका नया- नया है
तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं
मशवरा देते इस्तिख़ारे हैं
तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं
क्या ज़माना सताएगा हमको
हम तो तक़दीर के ही मारे हैं
साथ उनके गुज़ारे जो लम्हे
हिज़्र के बस वही सहारे हैं
दो निवाले मिले न खाने को
ऐसे दिन भी कभी गुज़ारे हैं
वस्ल की शब है जगमगाती हुई
कितने दिलकश हसीं नज़ारे हैं
ये मुकम्मल कभी न हो पाए
ख़्वाब दिल के सभी कुँवारे हैं
अपना साया जुदा हुआ मीना
ज़ीस्त से ख़ुद की हम तो हारे हैं
तुम्हारी वो चिट्ठियां
आती हैं याद हमको तुम्हारी वो चिट्ठियां
सहरा में गुल खिलातीं थीं प्यारी वो चिट्ठियां
पड़ती थीं सब पे भारी मयारी वो चिट्ठियां
जादू की बंद कोई पिटारी वो चिट्ठियां
कश्ती-ए-ज़ीस्त की बनी पतवार वो सदा
साथी बनी बुढ़ापे की न्यारी वो चिट्ठियां
हम बार बार पढ़ते हैं होंठों से चूम लें
हैं दिलनशीन जान से प्यारी वो चिट्ठियां
रुसवा न हो कहीं ये मुहब्बत सनम मेरी
सबसे छुपा के रक्खी हैं सारी वो चिट्ठियां
हमने जो ख़ून -ए- दिल से लिखी थी तुम्हें सनम
क्यों तुमने दिल से अपने बिसारी वो चिट्ठियां
फ़ुर्सत मिली न आपको इक बार पढ़ने की
मेरे ही जैसी मेरी कुवांरी वो चिट्ठियां
नटखट कान्हा ( गीत )
नटखट कान्हा बीच डगर,
करता बरजोरी।
डूब रही है श्याम रंग,
ब्रज की भी छोरी।।
शोर मचाती निकली है,
मस्तों की टोली।
कान्हा मारे पिचकारी,
भीग गयी चोली।
रंग की फुहारें चलतीं,
जैसे हो गोली।।
तन मन भी भीगा राधे,
कैसी ये होरी।
प्रेम रंग डालें कान्हा,
छाईं है लाली।
राधे मदहोश रंग में,
मीरा मतवाली।।
चुपके से आती ललिता,
है भोली भाली।
हँसी ठिठोली करतीं सब
ब्रज की तो गोरी।।
मनहर मूरत मोहन की,
जादू है डाला।
चंचल चितवन कान्हा के
गले मणिक माला।।
छैल छबीला रसिया है,
गोकुल का ग्वाला।
मोहित ब्रज की हैं बाला,
पकड़ गई चोरी।
ब्रज की होली
गली गली में ब्रज की देखो,
उड़ता रंग गुलाल सँवरिया।
बाहों का आलिंगन दे दो,
अंग -अंग कर लाल सँवरिया।
चंचल -मन यौवन है मेरा,
फगुनाई में बौराई हूँ।
अलकों के प्याले में भरकर,
मैं मदिरा लेकर आई हूँ।।
प्रेमिल फागुन में मन भीगा,
करता बहुत धमाल सँवरिया।
गली गली में ब्रज की देखो,
उड़ता रंग गुलाल सँवरिया।।
मन मतंग फगुनाया सजना,
छलक रही है प्रेम गगरिया।
मर्यादा के बंधन तोड़ो ,
मौसम मादक है साँवरिया।
मधु गुंजित अधरों को पीकर,
चूमो मेरा भाल सँवरिया।
गली गली में ब्रज की देखो,
उड़ता रंग गुलाल सँवरिया।।
ढलके आँचल कंचुक ढ़ीली,
रोम -रोम में फागुन छाया।
रँग से भीगा देख बदन ये,
मन अनंग भी है हुलसाया ।।
पुष्पित कर अभिसार बल्लरी ,
रति को करो निहाल सँवरिया।
गली गली में ब्रज की देखो,
उड़ता रंग गुलाल सँवरिया।।
मैं ही क्यूँ दम भरूँ मुहब्बत का
मैं ही क्यूँ दम भरूँ मुहब्बत का
रख भरम तू भी मेरी ग़ैरत का
इश्क़ दुनिया में कोई शै ही नहीं
फ़लसफ़ा है ये बस ज़ुरूरत का
आपके जैसे हो गए हम भी
अब ज़माना कहाँ शराफ़त का
ये सियासत तो इक अज़ीयत है
तुख़्म बोती है बस ये नफ़रत का
बुग्ज़ कीना हसद नहीं होंगे
नाम बाक़ी रहेगा उल्फ़त का
कूचा ए यार में ये लगता है
वक़्त अब आ गया शहादत का
अज़्म है हौसला है मीना है
हमको अब डर नहीं बग़ावत का
कम न होंगे
हमारे ग़म कभी ये कम न होंगे
अगर इनके लिए मरहम न होंगे
नहीं काबू किसी का ज़ीस्त पर कुछ
कहें कैसे कि अब मातम न होंगे
फ़रेबी है ज़माना जानते हैं
मगर हम तो कभी बरहम न होंगे
भरोसा जीत पाएँगे नहीं वो
जो अपनी बात पर क़ायम न होंगे
ज़मीं और आसमाँ तो होंगे लेकिन
जहाँ में एक दिन पर हम न होंगे
जहाँ नफ़रत का बस है बोलबाला
बहारों के वहाँ मौसम न होंगे
भले आ जाए तूफाँ कोई मीना
हमारे नैन लेकिन नम न होंगे
जो मिला उसको तू सँभाला कर
जो मिला उसको तू सँभाला कर
ख़्वाहिशों को न दिल में पाला कर
मुझको मुश्किल में तू न डाला कर
बात बेकार की तू टाला कर।
रुतबा अपना सदा ही आला कर
दर्द सीने में अपने पाला कर।
होठ सूखे हैं मय की चाहत है
बंदिशे तोड़ हम-पियाला कर
पास जिनके जरा नही रोटी
उनके मुख पे तो इक निवाला कर
रहते महरूम जो पढ़ाई से
इल्म का उनके घर उजाला कर
ज़िन्दगी भर की ये कमाई है
मेरे शेरों को मत उछाला कर
गुल समझ दी पनाह काँटो को
पैर में बेसबब न छाला कर
लोग डरते हैं इसकी फ़ितरत से
इन अँधेरों का कुछ इजाला कर
रब की रहमत हैं आँखे ऐ मीना
इस नज़र को कभी न काला कर
बेज़ार बैठे हैं
वो अपने आप में ख़ुद ही हुए बेज़ार बैठे हैं
लिए दामन में फूलों की जगह पर ख़ार बैठे हैं
नहीं ऐसा है चारा-गर की दे दे कुछ दवा उनको
बिना ही बात के सरकार जो बीमार बैठे हैं
मुसलसल ज़ुल्म होते हैं नहीं है चैन जनता को
ख़ुदारा क़त्ल करने आज ठेकेदार बैठे हैं
गुज़ारा साथ था बचपन जिन्होंने साथ जो खेले
उठा के आज आँगन में वो क्यों दीवार बैठे हैं
हिमायत करते थे सच की जो खाते थे क़सम उसकी
वहीं अब झूठ की बाँधें हुए दस्तार बैठे हैं
वतन के इक सिपाही हैं हिफ़ाज़त भी करेंगे हम
कटाने के लिए सर भी सदा तैयार बैठे हैं
ये ले लेंगे हमारी जां बड़े जल्लाद हैं मीना
रहो हुशियार की घर में छिपे गद्दार बैठे हैं
बाधा डाल देती है
करूँ कोई अगर सौदा तो बाधा डाल देती है
मेरे जीवन में क़िस्मत क्यों अड़ंगा डाल देती है
निकल जाऊँ न मैं बचकर बखेड़ा डाल देती है।
उदासी क्यों मेरे रस्ते में डेरा डाल देती है
कभी जब ख़ून से लिक्खा हुआ ख़त मिलता है उसका
तो आकर बेक़रारी दिल पे डाका डाल देती है
न हर्गिज़ देख पाती है तड़पते भूख से पंछी
मेरी बेटी परिंदों को भी दाना डाल देती है
मुसलसल ज़ुल्म होते हैं नहीं कोई भी सुनवाई
रिआया पे सियासत बोझ सारा डाल देती है
नहीं माँ देख पाती है कभी रुसवाइयाँ मेरी
हमेशा ही मेरी ग़लती पे पर्दा डाल देती है
मुहब्बत आज़माती है सभी को ही यहाँ मीना
हरिक को ये मुसीबत में ख़ुदाया डाल देती है
वही हाल पुराना देखा
राह-ए-उल्फ़त में वही हाल पुराना देखा
रोती लैला मिली, मजनूँ भी बिलखता देखा।।
और हम कितना भरोसा यूँ अदालत पे करें
चंद सिक्कों में फ़क़त न्याय का सौदा देखा
साज़िशें करता रहा खोद नए गड्ढे जो
उसको ख़ुद हमने उन्ही गड्ढों में गिरता देखा
अब शजर मिलते कहाँ छाँव यहाँ देने को
धूप में जलते परिंदें को है मरता देखा
घटते बचपन के कई खेल बदलते देखे
बोझ बस्तों का मगर पीठ पे बढ़ता देखा।।
अम्न और चैन किताबों में कहीं सिमटे रहे
और नफ़रत को कहीं ज़ीस्त का हिस्सा देखा।।
यूँ तो देखे हैं सुख़नवर भी बहुत से मीना
मीर ग़ालिब सा सुख़न पर न किसी का देखा
मिले मुझको
करें जो ढोंग लोगों से वही साधू मिले मुझको
ग्रहण बन धर्म को लगते कई राहू मिले मुझको
ख़ुशी की जूस्तजू हरदम न रुतबा और ज़र चाहूँ
इबादत रोज़ करती हूँ ख़ुदा बस तू मिले मुझको
सदा ही ख़ून जनता का पिएँ नेता हुए ज़ालिम
न उतरे ज़ह्र भी जिनका बने बिच्छू मिले मुझको
तमन्ना थी फ़लक के चाँद से रौशन हो घर लेकिन
न था मंजूर किस्मत को फ़क़त जुगनू मिले मुझको
चमन का मैं नहीं भौंरा जो बैठूँ फूल कलियों पर
यही ख़्वाहिश पले दिल में कि तू हर-सू मिले मुझको
शिकारी बन के आ पहुँचें हैं जंगल में सभी राजा
बचा इनसे हमें रब, कहते सब आहू मिले मुझको
हमें इक वाह की दरकार थी महफ़िल से पर मीना
ग़ज़ल कहने पे पछतावे के बस आँसू मिले मुझको
सोचा न था
प्यार में फिर रतजगा हो जाएगा सोचा न था
इश्क़ का ऐसा नशा हो जाएगा सोचा न था
यार मुझसे भी ख़फ़ा हो जाएगा सोचा न था
मुझमें उनमें फ़ासला हो जाएगा सोचा न था
वो मुहब्बत का ख़ुदा हो जाएगा सोचा न था
इस ग़मे दिल की दवा हो जाएगा सोचा न था
हाल-ए-दिल हम तो सुना पाए न थे उनको अभी
तब तलक इक हादसा हो जाएगा सोचा न था
हमने पलकों पर बिठाया था तुझे दिलबर मगर
हमसे तू ना-आशना हो जाएगा सोचा न था
अब हक़ीक़त क्यों बयां करता नहीं है क्या पता
आईना भी बेवफ़ा हो जाएगा सोचा न था
क्या पता था ज़ख़्म देगा इतने वो मीना हमें
प्यार करना भी सज़ा हो जाएगा सोचा न था
ख़सारा कर लिया मैंने
बिना समझे ही ख़ुद का है ख़सारा कर लिया मैंने
बुलंदी पर ज़रा सा क्या सितारा कर लिया मैंने
किसी के बिन ज़माने में गुजारा कर लिया मैंने
हर इक अपने से ऐ दुनिया किनारा कर लिया मैंने
जरा सा शोख़ नज़रों का नज़ारा कर लिया मैंने
तुम्हारे हुस्न का पल में इजारा कर लिया मैंने
नहीं क़िस्मत में लिक्खा था हमारा तो मिलन शायद
नहीं तुम वस्ल को आए गवारा कर लिया मैंने
फ़क़त ये आरज़ू थी दिल में तुमको ही बसायें पर
नहीं मंज़ूर रब को था किनारा कर लिया मैंने
बला की ख़ूबसूरत हो कशिश ऐसी है तुममें कुछ
कि तुमसे इश्क़ जाने जाँ दुबारा कर लिया मैंने
फ़क़त सर ही मुहब्बत में क़लम होगा यहां मीना
इरादा जान देने का ख़ुदारा कर लिया मैंने
कोई भी मुखौटा न रहूं
क़ैद हों जिसमें परिंदे मैं वो पिंजरा न रहूं
ओढ़ कर चेहरे पे कोई भी मुखौटा न रहूं
चाहे सागर सा बड़ा और कुशादा न रहूं
बस तबाही का किसी की भी मैं जरिया न रहूं
भीड़ पीछे चले ऐसा रहे किरदार अपना
मेरे मालिक मैं किसी भीड़ का हिस्सा न रहूं
ऐ ख़ुदा इश्क़ मेरा तू ही मुकम्मल करना
प्यार का कोई अधूरा सा मैं किस्सा न रहूं
दोनों हाथों से लुटाऊं मुझे इतना दे दे
होके मुहताज लिए हाथ में कासा न रहूं
राज दिल पर करूं मैं सारे ज़माने के ही
मैं किसी की भी रियासत का पियादा न रहूं
भूल जाऊं न कहीं जग को तेरी चाहत में
तेरी जुल्फ़ों में सनम इतना भी उलझा न रहूं
ज़ीनत ए एहले सुख़न मीना बने है ये दुआ
बनके मिसरा कभी मैं कोई तो तन्हा न रहूँ
माँगे है
अब न आहों की फ़ज़ा और क़ज़ा माँगे है
ये हथेली तेरी चाहत की हिना माँगे है
तेरे रुख़सार की बस शोख़ अदा माँगे है
मेरा ये इश्क़ न कुछ इसके सिवा माँगे है
उस ख़ुदा से तो खुशी की ही रिदा माँगे है
दिल हमेशा तेरी ख़ातिर ये दुआ माँगे है
तीरगी देगी किसी को भी उजाला कैसे
तू भी बेकार अँधेरों से जिया माँगे है
दो निवाले की जगह ज़ह्र ही दे दे कोई
मुफ़लिसी मेरी ये जीने की सज़ा माँगे है
नाम नफ़रत का न हो अब कहीं इस दुनिया मेंद
ये जवानी नयी इक आबो-हवा माँगे है
वो दग़ा देगा करेगा न वफ़ाएँ मीना
क्यों तू सैय्याद से ज़ख़्मों की दवा माँगे है
मौसम न आयेगा
रिश्तों में भी निखार का मौसम न आयेगा
दोगे दग़ा तो प्यार का मौसम न आयेगा
रहता चमन उदास है मायूस बागबाँ
गुलशन में अब बहार का मौसम न आएगा
गर जीतना हो नेकियों की राह पर चलो
फिर ज़िन्दगी में हार का मौसम न आयेगा।
नफ़रत भुला के हाथ किसी का तू थाम अब
वरना कभी क़रार का मौसम न आएगा
इस मुल्क पे अब जान ये क़ुर्बान कीजिए
फिर जानो दिल निसार का मौसम न आएगा
इस ज़िंदगी में चार दिनों की बहार है
हर बार ख़ुशगवार ये मौसम न आएगा
अशजार पे दिलों के समर आए हैं नये
ये रोज़ इन्तिज़ार का मौसम न आएगा
थके हम उन्हें बारहा कहते-कहते
थके हम उन्हें बारहा कहते-कहते
मुहब्बत को जाँ की बला कहते-कहते
चला ख़ूब ही इश्क़ का सिलसिला भी
उठाये सितम मरहबा कहते-कहते
मुकम्मल ग़ज़ल एक कहना हमें थी
अटक हम गए क़ाफ़िया कहते-कहते
बढ़ी नफ़रतें इस क़दर आज सब में
न वो ज़ह्र दें दे दवा कहते-कहते
लिए साथ आए हैं तुहफ़े हज़ारों
मगर बद्दुआ दी दुआ कहते-कहते
कभी रूबरू भी न देखा उन्हें पर
थकी है ज़ुबाँ यह ख़ुदा कहते-कहते
जला आशियाँ था मुहब्बत में ‘मीना’
जलाते थे सब दिल-जला कहते-कहते
दोस्तो मैं एक दिन रंगे वफ़ा हो जाऊँगी
दोस्तो मैं एक दिन रंगे वफ़ा हो जाऊँगी
ख़ुद ब ख़ुद सिमटूंगी अपना दायरा हो जाऊँगी
क़ैद से दुनिया की मैं अब तो रिहा हो जाऊँगी
मौत सिरहाने खड़ी तुमसे ज़ुदा हो जाऊँगी
मुझको तो ख़ुद ही नहीं मालूम अपना रास्ता
कैसे औरों के लिए फिर रहनुमा हो जाऊँगी
ज़ख़्म भी लगने लगे है आजकल मुझको हसीं
देखना हर दर्द की मैं ख़ुद दवा हो जाऊँगी
अब चमक तो आपके चेहरे पे भी आ ही गई।।
देख लेना अब मैँ कोई आईना हो जाऊँगी
हौसले को तोड़ सकता है कहाँ कोई मेरे
एक दिन मैं जगमगाता फ़लसफ़ा हो जाऊँगी
वो अगर चाहें ग़ज़ल कहना तो कह लें शौक़ से
उस ग़ज़ल का ख़ूबसूरत क़फ़िया हो जाऊँगी
ले के आ गया
लाना नहीं था उसको मगर ले के आ गया
मेरे लिए वो लाल-ओ-गुहर ले के आ गया
मेरे लिए ख़ुशी की ख़बर ले के आ गया
उल्फ़त की इक नई सी नज़र ले के आ गया
होशो-हवास में थे मगर चुप थी ये ज़ुबाँ
गुल की जगह वो सुर्ख़ हजर ले के आ गया
दम घुट रहा था तीरगी से दिल भी था उदास
मेरे लिए वो नूरे-सहर ले के आ गया
आज़ाद हसरतों से न हो पाए तब तलक
यकलख़्त मौत की वो ख़बर ले के आ गया
तारों से मांग भरने की ख़्वाहिश थी वो मगर
मेरे लिए तो शम्सो-क़मर ले के आ गया
मुद्दत से मुंतज़िर था जो “मीना” तेरे लिए
वो अपनी ज़िंदगी मेरे घर ले के आ गया
अजीब था
ग़ुंचे अजीब तर थे गुल -ए- तर अजीब था।
आंखें खुलीं तो शह्र का मंज़र अजीब था।
खुशियाँ तमाम उम्र मयस्सर न हो सकीं।
उस नेक आदमी का मुक़द्दर अजीब था।
निकला था दुश्मनों को मिटाने के वास्ते।
अपनो को मार आया वो लश्कर अजीब था।
दुनिया को जीतने की तो चाहत रही उसे
ख़ुद को न जीत पाया सिकन्दर अजीब था।
उस हुस्न -ए -बे -मिसाल के जलवों के सामने
रौशन फ़लक पे माह -ए -मुनव्वर अजीब था
उसकी हवस ने शह्र को वीरान कर दिया
मैं ने सुना है भीड़ का तेवर अजीब था
ताजिर जहाँ ग़मों का ही मीना था हर कोई
ख़ुशियों को बाँटता वो सुख़नवर अजीब था
शम्अ जैसे जला नहीं करते
शम्अ जैसे जला नहीं करते
रोज़ हम रतजगा नहीं करते
अश्क बनके रहें वो आँखों में
ज़िद में लेकिन बहा नहीं करते
राह दुश्वार है मोहब्बत की
ख़ैर हम तो गिला नही करते
हम बिछाते बिसात हैं लेकिन
चाल कोई चला नहीं करते
तोड़ देते हैं सब तअल्लुक़ हम
दिल में रंजिश रखा नहीं करते
ज़ब्त करते ज़माने भर के ग़म
घर को जो मैक़दा नहीं करते
बस गिनाते हो पाप मेरे तुम
छू के क्यों पारसा नहीं करते
राज़ दिल में निहाँ जो तेरे है
जाम -ए-जम से छुपा नही करते
कहते मीना तेरे लिए ही ग़ज़ल
महफ़िलों में कहा नहीं करते

कवियत्री: मीना भट्ट सिद्धार्थ
( जबलपुर )
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