D P Verma Poetry

देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’ की कविताएं | D P Verma Poetry

विषय सूची

अस्तित्व

वो कहते हैं ये मेरा प्रश्न है,
हर उत्तर को निगलेगा,
मैं कहता हूँ ये मेरी अनुभूति है,
मौन में भी उगलेगा।

वो कहते हैं ये मेरी रेखा है,
किस्मत तक पहुँच जाएगी,
मैं कहता हूँ ये मेरा पथ है,
जो नियति को भी मोड़ लाएगी।

वो कहते हैं ये मेरा काल है,
सब कुछ ढहा जाएगा,
मैं कहता हूँ ये मेरी चेतना है,
समय से पार चला जाएगा।

वो कहते हैं ये मेरा भ्रम है,
सच को भी हराएगा,
मैं कहता हूँ ये मेरी दृष्टि है,
अंधेरों को सिखाएगा।

वो कहते हैं ये मेरा नियम है,
सबको झुकना होगा,
मैं कहता हूँ ये मेरा अस्तित्व है,
तुम्हारे नियम को रुकना होगा।

भगवान ऑफलाइन हैं

भगवान ऑफलाइन हैं।
स्वर्गलोक का नेटवर्क ठप है,
जप-तप, ध्यान सब व्यर्थ हो गया
“यह नंबर वर्तमान में उपलब्ध नहीं है”
हर दिशा से यही उत्तर आया।

कहीं झुग्गियों में भूख से बिलबिलाते बच्चे
रात में तारे गिनते हैं
“हे भगवान!” कहकर आँखें मूँदते हैं,
पर ऊपर से कोई उत्तर नहीं आता।

एक माँ,
जिसका बेटा भीड़ की हिंसा में
“राम राम” कहता दम तोड़ गया,
आज भी तुलसी के नीचे बैठ
भगवान से केवल चुप्पी पाती है।

किसी किसान की बेटी
अपने आंगन में लुटती रही
चिल्लाई, “हे कृष्ण! मेरी लाज बचा लो!”
पर मुरली खामोश रही,
कैलाश शांति में डूबा रहा।

किसी दलित के आंगन में
काली रात उतरी
वो तड़पता रहा, “महाकाल, देखो न!”
पर त्रिनेत्र बंद रहा,
शिव ध्यानस्थ थे शायद।

कहीं औरत की चीखें
छत फाड़ बाहर आईं,
पर देवताओं की सभा
Noise Cancellation Mode में थी।

मैंने जनेऊ पहना, माथे पर तिलक लगाया,
हाथ जोड़े, आँखें मूँदीं
सोचा, अब द्वार खुल जाएगा…
पर स्वर्ग से उत्तर आया
“This Devotee is not in our Database.”

माँ मन्नत का धागा बाँधती रही,
बेटी की शादी की आस लिए
पर लगता है अब कृपा
टोकन नंबर देखकर मिलती है।

अब लगता है
ईश्वर तक पहुँचने के लिए
आत्मा नहीं,
आधार कार्ड और पासवर्ड चाहिए।

मंदिर गया
दीप जलाया, घंटा बजाया,
पुजारी ने इशारा किया
“QR Code स्कैन कीजिए,
भगवान अब डिजिटल पेमेंट पर ही कृपा करते हैं।”

एक बाबा मिले, बोले
“अब दर्शन ‘Online Booking’ से होते हैं,
‘Mukti App’ डाउनलोड कीजिए,
Live Darshan Feed और Premium आरती Slot वहीं मिलेगा।”

मैंने हनुमान चालीसा पढ़ी,
रामरक्षा का पाठ किया
पर स्वर्ग के स्क्रीन पर लिखा था —
“Server Busy — Try Again Later”

शिव जी Meditation Mode में हैं,
विष्णु जी Auto Reply पर,
ब्रह्मा जी Terms & Conditions लिख रहे हैं।

नारद अब वीणा नहीं बजाते
वे भक्तों से Feedback Form भरवाते हैं:
“भक्ति कैसी लगी?
1 से 5 स्टार दें,
कृपया सुझाव नीचे लिखें।”

किसी ने कथा YouTube पर सुनी,
फिर कहा — “भगवान, Like कर दिया है,
अब कृपा कर दो, नौकरी लगवा दो।”

अब लोग आरती में Filter लगाते हैं,
लाइक्स और Views से
भक्ति का माप निकलता है।

देवता अब
लड्डू से नहीं,
Follower Count से प्रसन्न होते हैं
“5 हज़ार पर कृपा,
10 हज़ार पर वरदान।”

साधु बोले
“अगर कृपा चाहिए तो Trending बनो!
भगवान भी अब वो ही Reel देखते हैं
जो 30 सेकंड में मन मोह ले।”

अब गीता भी
ई-बुक में बिक रही है,
भक्ति अब EMI पर उपलब्ध है,
और मोक्ष के टोकन
Shopping Festival में मिलते हैं।

अब सोच रहा हूँ
शायद भगवान भी
किसी Customer Support टीम को आदेश दे रहे हों

“जो सच्चे हैं
उन्हें Priority Queue में डाल दो।
बाकी सबको Hold पर रखो —
और कह दो,
‘Your bhakti is important to us… please wait.’”

भारत छोड़ो

नई शिक्षा नीति की सुबह थी
कक्षा में मास्टरजी आए थे
चेहरे पर आशा, हाथ में प्रश्न
बोर्ड पर लिखा –
“भारत छोड़ो आंदोलन के चार सेनानी बताओ”

पीछे से उठा राहुल
जिसे इतिहास से ज़्यादा ट्रेंडिंग टॉपिक आते थे
मुँह में च्युइंग गम था, हाथ में स्मार्टफोन
और चेहरे पर वो आत्मविश्वास
जो सिर्फ़ शॉर्ट वीडियो देखकर आता है

उसने कहा –
“सर, बहुत आसान है
ललित मोदी,
नीरव मोदी,
मेहुल चौकसी,
विजय माल्या
यही तो हैं असली भारत छोड़ो आंदोलन के सेनानी”

कक्षा में हँसी गूंज उठी
गांधीजी दीवार पर टंगे-टंगे थोड़ा और लटक गए
मास्टरजी की चुप्पी भारी हो गई
किताबों के पन्ने खुद शर्म से पलट गए

धीरे से बोले मास्टरजी
“बेटा, ये आंदोलन देश की आज़ादी के लिए था
ना कि देश की संपत्ति उठाकर विदेश भागने के लिए”
राहुल मुस्कराया, जैसे सबूत सामने रख दिए हों
“लेकिन सर,
अब यही तो सच्चाई है
तब देश ने ज़ंजीरें तोड़ी थीं
अब बैंक लूटकर बंधन मुक्त हुआ जाता है”

अब पासपोर्ट नया चरखा है
बेल-बॉन्ड नमक का कानून
इंटरपोल नोटिस डांडी मार्च बन चुका है
और भगोड़े
आज के नवयुगीन शहीद कहे जाते हैं
जिन्होंने देश को त्यागा
पर लाभ को नहीं

नीरव मोदी बीस हज़ार करोड़ लेकर हीरे की चमक में खो गया
माल्या नौ हज़ार करोड़ की शराब पीकर लंदन चला गया
मेहुल चौकसी नागरिकता बदलकर
देश से रिश्ता बदल चुका है
ललित मोदी ने क्रिकेट को घोटाले में बदल दिया
और खुद को विदेश में शुद्ध कहने लगे

बैंकों की कमर टूट चुकी है
टैक्स देने वालों का भरोसा बिखर चुका है
और नौजवानों ने अब यह सीख लिया है
कि ईमानदारी CV में तो चलती है
पर पासपोर्ट पर स्टैम्प वो लगती है
जिस पर मुहर हो ‘भागने’ की

गांधी का चरखा अब घिस चुका है
नेहरू के सपनों पर धूल है
सुभाष की आवाज़ अब केवल घोषणाओं में बजती है
संविधान धीरे-धीरे रद्दी में बिकने लगा है
और ‘देशभक्ति’
अब रील्स में, हैशटैग में और विज्ञापनों में मिलती है

अब ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन नहीं है
यह एक सुनियोजित निकासी योजना है
जहाँ विमान पहले तय होता है
और अपराध बाद में
जहाँ न्याय धीमा है
और उड़ानें तेज़

इतिहास अब परीक्षा में पूछा जाता है
हकीकत न्यूज़ चैनलों में घूमती है
और भविष्य —
वह भाग रहा है,
सूटकेस में देश की इज़्ज़त लेकर
किसी अगली उड़ान में,
किसी अगली बुलेटिन से पहले।

थार, थाली और थैली

जिस दिन गांव को मिला
साल का विकास अनुदान,
उसी शाम
प्रधान जी लौटे
नई चमचमाती थार में।

बोले—
“गांव अब रफ्तार पकड़ेगा!”
और
सिलेंडर, नाली, और टंकी
तीन साल से
कागज़ पर मुस्कुरा रहे हैं।

वो आए थे
घोषणा–पत्र की मोटरसाइकिल पर,
पीछे लटका था
“हर हाथ को काम” का झोला
और हेलमेट की जगह
थामे थे
‘विकास’ का नारियल।

अब वही मोटरसाइकिल
काफ़िले की फॉर्च्यूनर बन चुकी है।
नारियल फूटा नहीं,
पर जनता की उम्मीदें
हर मोड़ पर फिसल गईं।

जनता की याददाश्त
मोबाइल के बैकअप जैसी है।
हर चुनाव से पहले
“फॉर्मैट” कर दी जाती है।

पिछली बार का झूठ
अब नया सपना बन जाता है,
और हर माइक से निकली
अधूरी बात
अब “विकास यात्रा” कहलाती है।

वो जनता के बीच
मुस्कुराते हुए मिले,
चेहरे पर था
लोकतंत्र का मास्क
और जेब में
तानाशाही का रिमोट।

बोले—
“आप ही हैं असली मालिक!”
और फिर
सारा बजट
अपनों के नाम ट्रांसफर कर दिया।

पंचायत अब
WhatsApp ग्रुप पर चलती है।
सरपंच जी ‘admin’ हैं,
और विरोध करने वाला
सीधा ‘remove’ कर दिया जाता है।

ग्रुप का नाम है —
ग्राम विकास 2025
पर उसमें सिर्फ़
Good Morning
और “योजना सफल हुई” जैसे JPEG आते हैं।

बारिश आए या न आए,
बाढ़, सूखा या ओलावृष्टि —
भाषण तय समय पर आते हैं।
सर्दियों में गर्म,
गर्मियों में ठंडे,
मानो भाषण नहीं
AC हों।

हर बार
“आख़िरी बार झूठ बोल रहा हूँ” वाली
सच्चाई दोहराई जाती है।

वोटर को मिलती है—
एक थाली में
— घोषणाएं
— भाषण
— वादे
— और अंत में मिठाई।

बशर्ते वो
पार्टी के झंडे से मैचिंग टोपी पहनकर
लाइन में खड़ा रहे
और
फोटो खिंचवाए।

अब राजनीति
विचारधारा से नहीं,
थैली की धार से चलती है।
कल तक जो दुश्मन थे,
आज ‘सम्माननीय सहयोगी’ हैं।

दल बदलना
अब अपराध नहीं—
‘रणनीतिक कदम’ कहलाता है।
सिद्धांत?
वो पिछली सरकार में छूट गया था।

सब कुछ देखकर भी
चुप रह जाना
अब ‘समझदारी’ है।
क्योंकि सवाल पूछोगे तो
“देशद्रोही” कहे जाओगे।

अब लोकतंत्र
शब्दों में जीवित है,
ज़मीन पर बस
झंडों की रेल है,
और थार की धूल में
गांव कहीं पीछे छूट गया है।

यादों की संदूक

जहाँ भी आई
तुम्हारे होने की कोई सरगोशी,
मैं बिन आवाज़ के वहाँ पहुँच गया
न दस्तक दी,
न कोई उम्मीद जताई।

चुपचाप…
जैसे हवा छू ले किसी की परछाई
मैं भी गुज़र गया तुम्हारे आस-पास से,
बस तुम्हारी इजाज़त बिन
कई छवियाँ समेट लीं।

कभी तुम हँसती हुई,
कभी अनकहे में कुछ कहती हुई,
कभी बस यूँ ही…
खिड़की से बाहर देखते हुए।

इन्हें रखा है मैंने
एक ख़ास संदूक में
ना ताले की ज़रूरत है,
ना चाबी की।
बस जब भी तन्हा होता हूँ,
उसे खोल लेता हूँ
और तुमसे थोड़ी देर
चुपचाप बातें कर लेता हूँ।

रथ चला वृंदावन पथ पर

कृष्ण दीवानी राधा आई,
प्रेम-सरोवर लहराया,
कुरुक्षेत्र की रज में फिर से,
रास अनुराग समाया।
वीणा की मधुरिमा गूंजे,
नभ में राग उठे प्यारे,
विरह-वेदना हर ली कान्हा,
मिलन भाव से न्यारे।

स्नेहिल नयन पुकार उठे,
वृंदावन को फिर आओ,
राधा बोली—”प्रियतम मोहन,
गोपियों संग मुस्काओ!”
श्याम ने मन में ठान लिया,
प्रेम-पंथ को अपनाया,
बलराम-सुभद्रा संग लेकर,
ब्रज धाम द्वार पहुँचाया।

उल्लास बसा गलियों में,
हर द्वारे मंगल छाया,
बिरहिन गोपियाँ गा उठीं,
राधा ने रास रचाया।
रथ सजा फूलों की महक से,
प्रेम-पंक्ति वह सजी,
वृंदावनवासियों ने खींचा,
अश्वों की कर छुट्टी।

जय-जयकारें गूंज उठीं,
“जय नाथ” हर मुख बोले,
हर दिशा में प्रेम बरसता,
जैसे साक्षात प्रभु डोले।
गूँजी ब्रज से पुरी तक फिर,
यह अनुपम रथ-यात्रा,
जय नाथ बने जगन्नाथ,
प्रेम बना सुख जात्रा।

आज भी जब है रथ निकलता,
भावों का सागर बहता,
भक्तों को वह दर्शन देते,
कृपा का दीपक चिर जलता।
राधा-कृष्ण की इस लीला को,
युग-युग नमन करें,
रथ चला वृंदावन पथ पर,
प्रभु चरणों में नयन धरें।

सरकारी अस्पताल की दीवारें


(इंसानियत की सच्ची तस्वीर)

ना मंदिर, ना मस्जिद,
ना जात, ना धर्म।
यहाँ बस एक नाम है —
मरीज़।

यह सरकारी अस्पताल है,
जहाँ न कोई ऊँच, न नीच,
न कोई अपना, न पराया।
यहाँ सिर्फ़ एक पहचान है —
बीमारी

डॉक्टर न भगवान हैं,
पर मौत से लड़ने वाले देवता हैं।
वो जात नहीं पूछते,
धर्म नहीं देखते,
बस नब्ज़ टटोलते हैं —
ज़िंदा उम्मीद की।

यहाँ
हिन्दू और मुसलमान
एक ही कतार में खड़े होते हैं,
एक ही वार्ड में साँसें गिनते हैं,
और एक-दूसरे की आँखों में
सहानुभूति खोजते हैं।

काश!
शेष दुनिया भी ऐसी ही बन जाए
जहाँ दीवारें सिर्फ़ इमारतों की हों,
दिलों की नहीं।

जहाँ एक ही धर्म हो-
मानवता।
और एक ही ईश्वर –
करुणा।

एक सपना,
जो अगर जगे,
तो पूरी दुनिया स्वस्थ हो जाए।

मैं दोषी उसकी चीख़ों का

( लंबी कविता )

बहुत वर्षों बाद मिला था
वो बचपन का सखा
मेरी स्मृतियों में मुस्कुराते हुए
मनमोहक चित्र सा
पर उसकी आँखों के कोनों में
एक गहरा समंदर ठहरा था
जैसे जीवन की राख में कोई चिंगारी दबी हो।
एक क्षण में ही मेरी यादों से
उसका मुस्कुराता चेहरा ओझल हो गया।
मैं प्रश्नो के झंझावात में पूछने वाला ही था
उसकी वेदना का कारण
कि वह बिलखकर फूट पड़ा,
जैसे वर्षों से थमी हुई पीड़ा
अब बाँध तोड़ रही हो।
सुनो मित्र !
मैं अधम हूँ, नीच हूँ,
मैं पुरुष होकर भी,
पुरुषार्थ का शव हूँ।
मुझे याद है वह रात…
सन्नाटा चीख रहा था,
और चाँदनी…
किसी पाप की गवाही दे रही थी।
रोज रात की तरह
मैं टहलते-टहलते पहुँचा
नुक्कड़ की अंधेरी गली तक,
सहसा मैंने सुनी एक चीख
जो मेरे हृदय को द्रवित कर गई
मै आगे बढ़ा तो मेरी आंखे
फटी की फटी रह गई
वहाँ इंसानियत की साँसे रुक रही थी
एक लड़की….फटे कपड़े,
बिखरे बाल, रोती, तड़पती, काँपती हुई,
कुछ दरिंदों उसे घसीट रहे थे
और वो मदद के लिए पुकार रही थी
और मैं…
मैं देखता रहा
मैंने हिम्मत दिखाने की सोची,
पर मेरी गर्दन पर उनका चाकू आ गया,
मैं भय से रुक गया
और दिल में डर का कीड़ा
तांडव करता हुआ
मेरी आत्मा को कुतर गया।
वो रोती रही
उसके नाखून ज़मीन खुरचते रहे,
उसकी आँखों में गिड़गिड़ाहट थी,
‘कोई है…? कोई है जो मुझे बचाए?’
हाँ… मैं था।
पर मैं ‘कोई’ नहीं बन पाया।”
“मैं उसके साथ मर गया उस रात।“
हर दिन मेरी आत्मा पर उसका रक्त टपकता है
जब भी कोई बहन,कोई लड़की दिखती है,
वो चेहरा सामने आ जाता है
लहूलुहान, टूटी अस्मिता, और मैं
मैं वहीं खड़ा हूँ
अब भी
जड़,
निष्क्रिय,
बेआवाज़।
“धिक्कार है मेरे ज्ञान को,
जिसने सिर्फ शब्द दिए, कर्म नहीं।
धिक्कार है उस साहस को,
जो डर की पहली आहट में घुटने टेक गया।
धिक्कार है इस जीवन को,
जो खुद को पुरुष कहता है…।”
हे ईश्वर…!
अब तू ही बता
क्या तू मुझे क्षमा कर सकेगा?
क्या मेरी आत्मा कभी चैन पाएगी ?
मुझे जीवन नहीं चाहिए
मुझे प्रायश्चित भी नहीं चाहिए
मुझे बस वो क्षण वापस चाहिए
जहाँ मैं कुछ कर सकता था
और मैंने कुछ नहीं किया।
“मैं उसका अपराधी हूँ…।”
उसकी चीखें अब मेरी प्रार्थना हैं,
उसका रक्त मेरी आत्मा का नीर बन चुका है,
और मेरी हर साँस
मेरी कायरता की सज़ा।

भिखारिन

भूख से व्याकुल
चित्त से आकुल
बेबस बदहवास
कंठ में लिए प्यास
फटी धोती में खुद को छुपाती हुई
लाजवंती पर न लजाती हुई
मंदिर की सीढ़ियों पर ये कौन बैठी है !
जन्म लेते ही किस्मत फोड़ गए
क्या कहा !
इसके जन्मदाता ही इसे
मंदिर की सीढ़ियों पर छोड़ गए।
तो क्या मंदिर की सीढ़ियों से
किसी ने उठाया नही
उस पत्थर की मूरत के सिवा
किसी ने अपनाया नही
इसका कोई नाम नही है
जो ठीक लगे रख लो
या फिर लोग भिखारिन कहते हैं
तुम भी वही कह लो।
केश बिखरे आंखे पथराई
तन पर धूप से कालिमा है छाई
वेश जान बूझकर ऐसा बनाया नही है।
हाँ ये सच है उसने कई दिन से कुछ खाया नही है।
अन्न की चाह में
मिट्टी का टूटा पात्र लिए बैठी है।
पेट की पुकार पर चीखती है चिल्लाती है
आवाज कर्कश हो गई है
किसी अभिमान में नही ऐंठी है।
और उस पर पूजा की थाल लिए
सीढ़ियों से गुजरते लोग
जिनका ध्यान भूख से बिलखते मन पर नही
बल्कि फटे चिथड़े कपड़ो से झांकते तन पर है
वे भला उस अभागिन को क्या ही दे पाएंगे
हरिनाम बोलेंगे और आगे बढ़ जाएंगे।
माफ करना !
पर जब गर्मी लू और ठंड से बचाने को
एक पत्थर की मूर्ति के लिए
वातानुकूलक लगा सकते हो,
गर्म ऊनी कपड़े पहना सकते हो
तो क्या इन मजबूरों के लिए
तुम्हारे पास कोई उपक्रम नही है
या फिर सब कुछ एक ढोंग है छलावा है
कोई सार्थक अनुक्रम नही है।
घबराओ मत !
ये सवाल मेरे नही हैं
मैं भी तुम्हारे जैसा ही हूँ
कोई फर्क नही है
ये तो उसी के प्रश्न है
जिसका कोई नाम नही है
जो भी चाहे रख लो
लोग भिखारिन कहते हैं
तुम भी वही कह लो।

प्रेम होता नहीं सबको हासिल प्रिये

प्रेम होता नहीं सबको हासिल प्रिये
तुम मेरे हाल पर ग़म जताना नही
मैं तुम्हारा हूँ मैंने है वादा किया,
जिंदगी में कभी भूल जाना नही।

आज है रंग-ओ-रौनक खुशी का पहर
है सुबह मुस्कुराती हंसी दोपहर
चाँदनी रात है शबनमी मख़मली
महके जज़्बात हैं सुरमई अंजलि।

अलि से मिलने को आतुर हैं मिल जाते हैं
तुम जिधर देखती फूल खिल जाते हैं
गुल महकता तुम्हारे सहारे लिए
अब चमन है सुवासित तुम्हारे लिए।

कल अगर संग कोई न हो रब करे
तुम किसी और के पास जाना नहीं
मैं तुम्हारा हूँ मैंने है वादा किया,
जिंदगी में कभी भूल जाना नही।

जिंदगी एक सी सदैव रहती नही
वक्त के खेल में सब बदल जाता है।
जब उफनाती है पीर की एक नदी
दुःख के सैलाब में तन ढल जाता है।

रूप श्रृंगार यौवन महज़ द्वार हैं
प्रीत बसती है गहरे में भीतर कहीं
मैं नजर में नहीं हूँ अभी सच है ये
मन के अन्तर्भवन में मिलूंगा वहीं।

जो आवाज़ ना सुन सको तुम मेरी
हिय में दीपक जलाकर बुझाना नही।
मैं तुम्हारा हूँ मैंने है वादा किया
जिंदगी में कभी भूल जाना नही।

मैंने जीवन समर्पित किया प्रेम को
प्रीत की माधुरी से भरे गीत हैं
हो मिलन देह का ये जरूरी नही
रूह दो एक हों, हाँ यही रीत है।

हृदय से लगाकर रखा है तुमको
तुम ही तुम समाए हो हर एक झलक में
जब गुजरते हो दुःख के साये से तुम
अश्रु संदेश ले आ जाते पलक में।

यदि ठुकराने लगे स्वप्न के द्वार भी
तुम नियति को और आजमाना नही।
मै तुम्हारा हूँ मैंने है वादा किया
जिंदगी में कभी भूल जाना नही।

ख़बर से ख़बर मिली आज के अख़बार में

ख़बर से ख़बर मिली आज के अख़बार में
दो क़त्ल हुए हैं दो भाइयों की तकरार में।

पलक झपकी थी कि परखच्चे उड़ गए
सड़क पर दो गाड़ियां थी बड़ी रफ्तार में।

घर छोड़कर भाग गई लड़की के बयान हैं
अपने प्यार से छली गई है वो ऐतबार में।

जब भी बोलते हैं बस ज़हर ही घोलते हैं
अब लोग कैसे कैसे आ गए सरकार में।

आज ही मंगा ले कंठमाला चमत्कारी है
फिर लाभ ही लाभ होगा देखना व्यापार में।

माँ और बीवी में एक को चुनना पड़ेगा
शर्त ऐसी क्यों रखी जाती है परिवार में।

सरेआम गोली मार कर लूट ले गए
आज बंद रहेंगी सब दुकानें बाजार में।

खिज़ाओं में रहने दे अब यहीं शुकून है
ज़ख्म ही ज़ख्म मिले हैं गुलशन-ए-बहार में।

मोहब्बत ने भी क्या खूब करिश्मा किया

मोहब्बत ने भी क्या खूब करिश्मा किया
मोहब्बत को उसके अंजाम तक ला दिया।

कहीं पत्थरों के टकराने से आग भड़की
कहीं आग ने तपाकर पत्थर का किया।

हां जरूरत है तुम्हारी, जब कह नही पाया
तो बाजार से इक हसीं तोहफ़ा ला दिया।

गुरूर था कि पर्वत है, पिघल नही सकता
एक शबनमी फूँक ने ही मोम सा किया।

मुतमइन है जरूरी चीजों के भाव बढ़ा के
रिश्वत में किसी गरीब से एक पैसा ना लिया।

तुम अच्छे भले शहर में, गाँव में माँ रो पड़ी
बुझ गया जो कल पूजा में आरती का दिया।

अजीब जिंदगी में अजब दौर चला है

अजीब जिंदगी में अजब दौर चला है
हमारा हादसा किसी का चुटकुला है।

मौत से पूछा किसी ने जिंदगी का सच
पानी है, पानी में हवा का बुलबुला है।

परेशां है कि शख्सियत में चमक नही है
कभी न अपने मन का गिलाफ़ धुला है।

हवा को स्वच्छ कर रहे दरख़्त ने कहा
हवा नहीं इंसा की नीयत में विष घुला है।

रब नए रंग भर रहा अपनी निगाह से
और तू है कि बेकार करने पे तुला है।

अब नगर में कोई पालकी आती नही
यहां हवस का नया कारोबार खुला है।

चमन से बात की, फूल को न्यौता दिया

चमन से बात की, फूल को न्यौता दिया
बहारों ने ही लेकिन हमें चौंका दिया।

रंग, रूप, गंध, रस संग तेरे चले गए
खिज़ा हंस रही ये कैसा धोखा दिया।

हिम्मत से भरा दिल कमजोर नही था
बेबस नाउम्मीद होने का मौका दिया।

पार दरिया करने जो उतरे तो डूब गए
क्यों दर्द से भरी यादों की नौका दिया।

प्यार की इक निशानी ये अंगूठी ही थी
रूठकर हाय ! हमसे, हमको लौटा दिया।

घर की हिफाज़त को बग़ावत नही कहते

घर की हिफाज़त को बग़ावत नही कहते
ये संघर्ष न्याय का है अदावत नही कहते।

आप वही कीजिये जो न्याय के पक्ष में है
हम सही कदम को हिमाक़त नही कहते।

आकाश में छाए हैं धरती के नूर-ए-चश्म
ये पुरुषार्थ है, देवों की सजावट नही कहते।

संघर्षरत हैं आने वाली पीढ़ियों की फिक्र में
इस फ़र्ज-ए-अज़ीम को दिखावट नही कहते।

जब क्रांति का बिगुल बजा वक़्त की पुकार थी
इतिहास है व्यर्थ की लिखावट नही कहते।

एक दूसरे का हाथ थाम कर आगे बढ़ो
काफ़िले राह-ए-सख्त को मुसीबत नही कहते।

संगठित रहे तो जीत जाएंगे निश्चित ही
सब एकता की झूठी कहावत नही कहते।

‘विनीत’ जहां सुनी न जाये दोनों पक्षों की बात
ऐसी बैठकों को कभी अदालत नही कहते।

सूरज का प्रकाश चाहिए

बल्ब की चमक नही
सूरज का प्रकाश चाहिए
पिंजरे में कैद पंछी को
खुला आकाश चाहिए।

हवा पानी जमीन में
ज़हर घुलता जा रहा है
बिलख उठे प्रकृति
न ऐसा विकास चाहिए।

बस एक की पहल से
हरियाली लौटेगी नही
पेड़ लगाने और बचाने के
सबके प्रयास चाहिए।

दिल तो बहल जाएगा
तुम्हारी याद से मगर
जीवन को चिर सानिध्य का
मधुर प्रभास चाहिए।

बेरुखी की ठंड में
ठिठुरे हुए जज़्बात हैं
याद है हम, बस हमें
इतना एहसास चाहिए।

कोशिशें करो छिप न पाओगी
अपनी ओढ़नी में
घूरती निगाह को
नेक-नीयत का लिबास चाहिए।

सावन के झूले
हरी चूड़ियों की खनखन
फिर वही मेलों के दिन
मधुमास चाहिए।

संजीदगी इतनी वक़्त से
पहले ही बूढ़ा कर देगी
बच्चों के लिए माहौल में
हास परिहास चाहिए।

नगर में ये नए हुक्मरान का
कैसा फरमान है
हंसता नही, सबका
चेहरा उदास चाहिए।

जब तलक सबब न हो
मंजिलें मिलती नहीं है
पानी के वास्ते ज़ेहन में
होनी प्यास चाहिए।

‘विनीत’ आप जैसे हैं
वैसे ही नजर आइये
हमको नही आप में
कुछ और खास चाहिए।

न दिन देखते हैं न रात देखते हैं

न दिन देखते हैं न रात देखते हैं
कैसे भी हो जाये बात देखते हैं।

परिंदे मोहब्बत के आकाश में हैं
क्यों आप उनकी जात देखते हैं।

घोर तम में भी वो न घबराएंगे
जो अंधेरे में भी प्रभात देखते हैं।

वो हदें पारकर जुल्मों सितम की
अपने लिए पारिजात देखते हैं।

बड़ा अजीब है तुम्हारा शहर
न हुनर न ख़यालात देखते हैं।

नयन हो गए हैं अब चेरापूँजी
रात दिन बस बरसात देखते हैं।

तन की चोट का कुछ ग़म नही
मन पर बड़े आघात देखते है।

आइए हममे शामिल जरा होइए
संग दोनों सुहानी प्रात देखते हैं।

एक ही ख़्वाब में उम्र सारी ढली
रब है कि पूरी कायनात देखते हैं।

न मंदिर बनाइये न मस्जिद बनाइये

न मंदिर बनाइये न मस्जिद बनाइये
रहता ख़ुदा है दिल में, दिल में आइए।

ताकतवर हैं तो ताकत दिखाइए
नदी की एक धार प्यासों में लाइए।

लबरेज़ हूँ हिम्मत से साथ चलने के लिए
टूटे हुए दिल के न टुकड़ों में जाइए।

अपने हिस्से का बोझ खुद ही उठाना है
हंसिये नही, चलिए हाथ में उठाइए।

चंद अमीरों को सब कुछ न चला जाये
जो गरीब के है, हक में दिलाइये।

छज्जे पे आये मायूस पंछी ने कहा
कटोरे में नही जल नदी तालों में चाहिए।

अब सबको चुभने लगी आपकी बातें
सुधार जरा अपने लहज़े में लाइए।

देवगणों की ज़िरह में दर्द है धरा का
देवेंद्र अप्सराओं की न बातों में जाइए।

कहो दिल से थोड़ा बहलने चले

कहो दिल से थोड़ा बहलने चले
चांदनी रात में संग टहलने चले।

सुमन आंख में भाव के शबनमी
प्रेम की गंध लेकर महकने चले।

प्यास का कर्ज बाकी धरा कह रही
मेघ बनकर गगन में उमड़ने चले।

प्रभा प्रीत की पुण्य पावन प्रथम
पंक्षियों के सुरों में चहकने चले।

देख लोनी लता बलखाती हुई
शज़र बाग के सब लचकने चले।

ख्वाहिशों की दुल्हन लजाकर कहे
आइए शौक से फिर भटकने चले।

देह की देहरी पर है टिकना नही
रूह के महल में आ बहकने चले।

मौत इससे सुहानी भला क्या मिले
देश की आन पर जां निकलने चले।

विधाता ने ऐसा विधान लिखा है

विधाता ने ऐसा विधान लिखा है
समस्या से पहले समाधान लिखा है।

बच्चों के चहरे पर छाई चमक है
त्यौहार पर नया परिधान लिखा है।

प्रथम प्रश्न पूछना कि मैं कौन हूँ
यही नियति में अनुसंधान लिखा है।

शख्स जो गरीब का खून पी गया
नाम उसका दयानिधान लिखा है।

खून के छीटें, साजिशें भी लिखी है
फिर बना कैसे वो प्रधान लिखा है।

एक अकेला नहीं रह पाएगा सृष्टि में
प्रकृति ने परस्पर बंधान लिखा है।

तरकश में एक तीर भी बेवजह नही है
सही समय पर सबका संधान लिखा है।

निर्भय हो कि तुम्हारी रक्षा की खातिर
ऊपर ख़ुदा नीचे संविधान लिखा है।

कामयाबी चूमती है

कामयाबी चूमती है ऐसी आंखों को सदा
जो पलक झपकाए बिना लक्ष्य को साधे हुए हैं।

आसमां में छाने की क़वायद में कई तल्लीन हैं
वो शिखर पर है जो कदम जमीं से बांधे हुए हैं।

मेरी हालत देखकर वैद्य जी ने सच कहा
बहुत काम से नही आप तनाव से आधे हुए हैं।

घर की जिम्मेदारियां अब अपने सर उठा लो
देखो जरा मां बाप के कब से झुके कांधे हुए हैं।

बढ़ रहा आतंक असुरों का धरा पर हद से ज्यादा
सुराधिपति देवगण क्यों चुप्पियां साधे हुए हैं।

बांसुरी बजाता प्यारा साँवला हर दिल में है
वो ही जान पाते हैं जो चित्त से राधे हुए हैं।

गरीब और मध्यम परिवार के लोग सरकारी नौकरी की अहमियत बहुत अच्छे से जानते हैं।कठिन परिश्रम करके सरकारी सेवा में आते हैं एक दिन ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है कि सरकारी सेवा से निजी सेवा में स्थानांतरण या फिर सेवा से निवृत्ति का फरमान जारी होता है। निजीकरण किसी समस्या का हल नही है।

यदि सरकारी विभाग खासकर बिजली विभाग में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है तो उसके लिए निजीकरण ही एक मात्र विकल्प नही है।आवश्यकता है प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति की जो सरकारी विभाग को अपने हाथों में रखते हुए उसे उन्नति की ओर ले जाये न कि निजी घरानों को बेच दें।

अपने बचपन से अब तक सेवाकाल में जब अपने जीवन को निहारता हूँ तो निजीकरण के कारण और प्रभाव पर एक कविता अनायास ही सृजित हो गई है।आप इसे पढ़े और निजीकरण से हमारी लड़ाई में सहयोग करें।

ख़्वाब सुनहरे

निश्छल आंखों ने देखे थे
ख़्वाब सुनहरे बचपन में
देश की खातिर काम आऊंगा
इसी देश के आंगन में।

जन जन की सेवा करने का
मन में प्रकट विचार हुआ
चेतना मुखर हुई अंतस में
संकल्प सुमन से प्यार हुआ।

माँ बाप और सम्बंधीजन
संगत समाज और गुरुजन
सब की आंखों को भाए थे
जो स्वप्न मुझे महकाये थे।

शुभाशीष की छांव में
सबने वचन कहे नाना
जन जन की सेवा करनी तो
सरकारी सेवा में जाना।

उन दिनों हमारे गाँव में
रातें अंधियारी होती थी
बिजली का नाम न था कोई
ख्वाहिश दुखियारी रोती थी

शहरों को देखा तो जाना
जीवन को सरल बनाती है
जो शै दिखाई देती न वो
कितना असर दिखाती है।

गांव गांव तक लाना है
हर घर बिजली पहुंचाना है
विद्युत लोक की सेवा में
अब जीवन मुझे बिताना है।

कठिन परिश्रम करके फिर
अभियंता बनकर आये
प्रदेश के विद्युत विभाग में
हम जैसे कितने छाए।

पर जितना सोचा था
उतना नही स्वतंत्र मिला
राजनीति की जंजीरों में
जकड़ा पूरा तंत्र मिला।

भ्रष्टाचार की जड़ें हैं गहरी
विद्युत चोरी व्यापक है
सही दिशा दिखलाने वाले
गिने चुने अध्यापक हैं।

राजनीति का संरक्षण है
मार्ग नही सरल होगा
इच्छाओं की हत्या कर
पीना बड़ा गरल होगा।

संकल्प आत्मबल साहस से
सेवा को अस्त्र बनाया
पूर्ण लगन और निष्ठा से
फिर आगे कदम बढ़ाया।

बढ़ती विद्युत चोरी से
निशदिन लड़ना पड़ा
कभी सिर फूटे घायल हुए
कभी पीछे हटना पड़ा।

कैसे भी निर्बाध रहे
हौसले को जुझारू रखा
सामग्री के अभाव में भी
विद्युत तंत्र सुचारू रखा।

याद करो जब आंधी आई
तूफानों ने रार मचाई
सैकड़ो हजारो खंभे टूटे
परिवर्तक खंभों से छूटे।

घर परिवार की चिंता छोड़
मैदान में उतर गए सारे
जब तक सब कुछ न ठीक हुआ
एक पग पर खड़े रहे न्यारे।

जो फूल खिले उजाले के
शबनम रात भर रोई है
जाने अपनी कितनी खुशियां
बिजलीकर्मी ने खोई है।

फिर भी विचलित नही होते
श्रम साहस है श्रृंगार
अपनी सेवाएं देकर
करते घर घर उजियार।

किंतु हाय ! ये राजनीति
कालिमा बनकर छाई है।
विद्युत विभाग के सूर्य को
चिर ग्रहण लगाने आई है।

प्रतिभाओं के सूर्य को
दीपक दिखाया जा रहा
निकम्मे हो नकारा हो
एहसास कराया जा रहा।

ऐसी विषम परिस्थिति के
असली गुनाहगार हैं
यह जो इतना घाटा है
बिजलीकर्मी जिम्मेदार हैं।

उत्पीड़न और कुप्रबंध का
खेल चल रहा खूब
अति अभिमानी शीर्ष प्रबंधन
मजे रहा है लूट।

सरकारी परियोजनाओं
को पार कर
सस्ती बिजली को
दरकिनार कर।

निजी घरानों से महंगी
बिजली खरीदी जाती है
फिर बिजलीकर्मियों पर घाटे की
तोहमद लगाई जाती है।

घाटे का शोर मचाते
नित करते नया छल है
स्वार्थ में डूबे कहते
निजीकरण ही हल है।

तो क्या सर्व जन की संपत्ति
किसी एक को जाएगी
कुछ पूंजीपति मालिक होंगे
आवाम न कुछ कह पायेगी।

वर्षों से सेवारत
बिजलीकर्मी हटाये जाएंगे
नई व्यवस्था में बंधुआ
मजदूर लगाए जाएंगे।

यदि घाटे का सौदा है तो
क्यों निजी घराने आतुर हैं
या झूठ मूठ का घाटा है
असली मुद्दे काफ़ूर हैं।

घाटे से निजात पाने को
क्या राम बाण चलाएंगे
कुछ और नही होगा बस
बिजली की दरें बढ़ाएंगे।

गरीब जन न झेल पाएंगे
नए वित्तीय व्यवधानों को
मुफ्त बिजली नही मिलेगी
फिर तो यहां किसानों को।

फरियाद सुनेगा कौन भला
सरकारें चुप्पी साध लेंगी
निजी घराने का हक़ है
समझाकर सबको बांध लेंगी।

आम जन के धन से
बड़े धनी महान बनेंगे
पूंजीपतियों की पूंजी के
नए कीर्तिमान बनेंगे।

याद तो होगी देश की शादी
भव्य वैवाहिक आयोजन
हजारों करोड़ खर्च हुए
जब झूठी शान प्रयोजन।

किसने कुबेर बनाया है
यह धन कहाँ से आया है
जब ढूंढने जाओगे
आम जन ही पाओगे।

निर्धन और निर्धन होंगे
धनवान धनी हो जाएंगे
आम जन की मेहनत का फल
निजी घराने खाएंगे।

श्रम साहस स्वाभिमान से
नवप्राण भर लिया था
सरकारी सेवा में रहकर
सेवा का प्रण लिया था।

राजनीति के प्याले सुन लें
निजी घराने वाले सुन लें
सत्ता के रखवाले सुन लें
और हमारे सारे सुन लें।

विद्युत विभाग न चला पाएं
हम इतने लाचार नहीं
निजीकरण किसी कीमत पर
हमें कभी स्वीकार नही।

सत्ता के धनलोलुप
यदि हठ धर्मिता दिखाएंगे
सौगन्ध हमें है विद्युत की
पूरी ताकत से टकराएंगे।

हम सब हैं जुगनू माटी के
सितारों के मोहताज नही
एक जुट होकर जब चमकेंगे
टिक पाये तम का राज नही।

शैलेन्द्र खड़ें है तन कर के
जितेंद्र ने जान लगा दी है
निखिल ने फूंका है बिगुल
क्रांति की अलख जगा दी है।

संजय प्रभात से शूरवीर
रोहित हर्षित और रणवीर
कृष्णा रमेश राहुल सुबोध
तरकश में लिए अचूक तीर।

आलोक भरे पथ में जगदीश
आनन्द सुनाए विजय गीत
सिद्धार्थ रवि और ऋषभ देव
निशांत लाये हैं प्रदीप।

उठो समर्पित करो स्वयं को
कर्तव्य का आह्वान है
जीत मिलेगी निश्चय ही
यह महासमर अतिपावन है।

निजीकरण से मुक्ति मिलेगी
विभाग न बिकने पायेगा
जन जन की उन्नति होगी
पूरा प्रदेश मुस्काएगा।

बचपन की आंखों का सपना
ईश्वर साकार करेंगे
अधर्म और कुरीति का
जब हम प्रतिकार करेंगे।

जुल्मो सितम से जंग वक़्त की पुकार है

जुल्मो सितम से जंग वक़्त की पुकार है
जो मूक हैं जीवित नहीं ज़मीर को मारे हुए हैं।

तटस्थ रहकर जो समझते हैं कि जीत जाएंगे
बड़ी गफ़लत में हैं वो, असल मे हारे हुए हैं।

रोजी रोटी की फ़िकर में आ गए परदेस में
आंख से दूर कितने आंखों के तारे हुए हैं।

रहनुमा कोई नही सबकी मंजिल है अलग
संग केवल आसमा के चमकते सितारे हुए हैं।

पीर में लिपटे हुए शब्द गीतों में ढलें हैं
ये चंद लम्हें है जो साथ गुजारे हुए हैं।

स्वप्न और आंसू दोनों से नजर को प्रेम है
एक भी टूटे अगर तो पथ में अंधियारे हुए हैं।

कोई सहारा न मिलेगा मत जाना मंझधार में
टकराकर लहरों से तिनके कबके किनारे हुए हैं।

जिंदगी को गले से लगाया जाए

जिंदगी को गले से लगाया जाए
ग़म बांटकर चलो मुस्कुराया जाए।

अलग थलग पड़े हैं अपने आप में
दोस्तों को मिलने बुलाया जाए।

महफ़िल में छलके जवानी के ज़ाम
गीत भूला कोई गुनगुनाया जाए।

जिन घरों तक पहुंचती नही चाँदनी
हौसला जुगनुओं का बढ़ाया जाए।

पत्थरों की चौखट पे जो ना मिले कुछ
दिलों को मंदिर बनाया जाए।

बेटियां सृष्टि हैं उनकी रक्षा करो
बेटों को जनम से सिखाया जाए।

जा रही सरहदों पर जवानों की टोली
फूल राहों में चलकर बिछाया जाए।

‘विनीत’ नफरतों से नहीं कुछ हासिल
प्रेम के ही गीत हर घड़ी गाया जाए।

कली की दास्ताँ

एक कड़वी हकीकत लिखी जाएगी
जब मेरी कहानी सुनी जाएगी।

अश्रुमय वेदना में ढली जाएगी
गीत पीड़ा के क्रंदन कली गाएगी

बाग ने सींच कर रूप यौवन दिया
बाग के ही द्वारा छली जाएगी।

संग भ्रमर का मिला पर नियति का नही
हिय से छूटकर किस गली जाएगी।

करती शिकवा नही बाग से कुछ कभी
मन के भीतर ही भीतर जली जाएगी।

ईश करते नहीं गलतियां आस थी
टूटा विश्वास कैसे खिली जाएगी।

श्वांस में प्राण भर मुस्कुराती हुई
बांटती फिर भी खुशी जाएगी।

हे विधाता रचो न ऐसी तकदीर कोई
विनती करती जहां से चली जायेगी।

गांधी नेहरू का अपमान ढूंढते हैं

हर क्षण गांधी नेहरू का अपमान ढूंढते हैं
खुद कभी लड़े नही और अभिमान ढूंढते हैं।

युद्ध की लालसा में नेत्रहीन हो चुके हैं
सीमाओं पर कितने मरे जवान ढूंढते हैं।

मंदिरों में अब ऐसे लोगों की बड़ी भीड़ है
विष बांटकर जो शिव का वरदान ढूंढते हैं।

खून के प्यासे हुए हैं छोटी सी तकरार पर
चुपचाप कैसे लेनी है जान ढूंढते हैं।

ये वही लोग हैं जिन्होंने बस्तियां तबाह की
गरीब है कि उनमें अपना भगवान ढूंढते हैं

राज कोई और करे और तख्त पर बैठे कोई
कठपुतलियों की तरह बेजुबान ढूंढते हैं।

उनमे खुद में झांकने की हिम्मत नही जरा भी
जो पकड़ने को औरों के गिरहबान ढूंढते हैं।

गांव में मां बाप का महल पड़ा वीरान है
हम हैं कि शहर में छोटा मकान ढूंढते हैं।

‘विनीत’ वतन के नाम कर दे अपनी जिंदगी
इसी में हम तेरी सच्ची शान ढूंढते हैं।

आजमाना चाहते हैं

अपनी अपनी तकदीर आजमाना चाहते हैं
बेटे बड़े हो गए घर छोड़कर जाना चाहते हैं।

बुढ़ापे की दुश्वारियों में खामोश हैं माँ-बाप
बुलंदियों पर बेटों को पहुंचाना चाहते हैं।

भूख कम हो गई है और आंख भी नम है
बच्चों के साथ रोज खाना खाना चाहते हैं।

आजकल ऐसी खबरों से अख़बार भरा है
बुजुर्गों को लोग नही अपनाना चाहते हैं।

गुमान है जिनको शहरों की चहारदीवारी पर
उनको अपना गांव हम दिखाना चाहते हैं।

लोग परिवार से टूटकर बंटते जा रहे हैं
न जाने कौन सा शुकून पाना चाहते हैं।

जीवन के संघर्ष में आनंद कैसे पाना है
दादी दादा कहानियां सुनाना चाहते हैं।

‘विनीत’ हमने देखी है बेबसी उन परिंदों की
आ नही सकते जो लौट कर आना चाहते हैं।

फूल है

फूल है
गंध है
बाग है
बहार है
शब्द है
काव्य है
कलम है
दवात है
किताब है
ध्वनि है
गीत है
संगीत है
साज है।

ये “है” ही
ये है ही फूल है
है ही गंध है
ये है ही बाग है
है ही बहार है
है ही शब्द है
है ही काव्य है
है ही कलम है
है ही दवात है
है ही किताब है
है ही ध्वनि है
है ही गीत है
है ही संगीत है
है ही साज है
है ही परिधान है
है ही आभूषण है
है ही घर है
है ही मकान है।
है ही अस्तित्व है
अस्तित्व का प्रमान है
है ही ब्रह्म है
है ही भगवान है।

जीत का जश्न मनाने सारे जा रहे हैं

जीत का जश्न मनाने सारे जा रहे हैं
असलियत में तो जंग हारे जा रहे हैं।

नजर है जमीन पर चंद पूंजीपतियों की
रोज कितने आदिवासी मारे जा रहे हैं।

कुछ राज है उस पार के हमले न रुक रहे
इस पार से घुसपैठ के इशारे जा रहे हैं।

सहारों पे यकीन बहुत करना नादानी है
छोड़कर मझधार में किनारे जा रहे हैं।

वो तो अंधेरी बस्तियों में रोशनी बरसाए
हिस्से में जिनके चांद सितारे जा रहे हैं।

उठो इंक़लाब लाओ फिर से बदलाव का
माँ के लाल फिर से पुकारे जा रहे हैं।

‘विनीत’ नही छिप पायेगा नूर-ए-हिज़ाब में
सबके चेहरों से नक़ाब उतारे जा रहे हैं।

कहाँ कौन बच पाएगा

कहाँ कौन बच पाएगा
जब मौसम आग लगाएगा

नदियों की पीड़ा का क्रंदन
सागर में जाग जाएगा

पल्लवित प्रलय होगा विशाल
लहरों का तांडव छाएगा।

अंधी प्रगति का शीशमहल
एक झोंके में ढह जाएगा

पर्वत छांटे जंगल काटे
किसके आश्रय में जायेगा

सब हैं शामिल बर्बादी में
कौन किसे समझाएगा

कोई प्रकृति का रखवाला
हाँ सच्ची बात बताएगा

थम सकता है विध्वंस अगर
कुदरत को अमल में लाएगा

प्रत्येक जीव की है धरती
कोई एक नही टिक पाएगा

जो समझ गया मानव ‘विनीत’
जीवन पावन मुस्काएगा।

देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

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