दादी जी का घर

दादी जी का घर

दादी जी सलुम्बर में अकेले ही रहती थी.. नागपुर छोड़ने के बाद वे और दादाजी दोनों सलूंबर में स्थायी हो गए थे.. दादा जी के निधन के बाद मैने दादी जी को बहुत बार कहा की चलो मेरे साथ अकोला.. मगर वे नही मानी।

वे तो भरेपूरे समाज में समाज के साथ रहना चाहती थी.. अपने हम उम्र लोगो के बचा हुआ जीवन बिताना चाहती थी.. जब मैने बहुत जिद की तो बोली जब तक मेरे हाथ पैर सलामत है तब तक तो नही आउंगी.. हा जब शरीर साथ नही देगा तो अकोला आ जाऊंगी.. उन की जिद के आगे मेरी कुछ न चली.. वे नही आयी।

मै ही सलुम्बर जा जा कर उन की खेरियत पूछता रहा.. और फिर खबर आयी की अब दादी जी बीमार रहती है.. अस्वस्थ रहने लगी है तो मै उन्हें लेने सलुम्बर पहुँच गया.. अभी भी वे मना कर रही थी मगर मै इस बार ड़टा रहा.. नही माना.. बोल दिया की मै भी अकोला नही जाऊंगा.. यही रहूंगा.. यही.. सलुम्बर में।

आखिर कार दादी जी ने स्वीकृति दे दी की वे अकोला चलने हेतु तैयार है.. उस रात दादी जी सोयी नही.. करवट पर करवट बदलती रही.. मन में न जाने क्या उमड़ रहा था.. मगर वे बोली कुछ नही.. दादी जी को जागते देख मै सोचने लगा की आज दादी जी सो क्यू नही रही है।

उन के मन में अभी कैसे ख्याल आ रहे होंगे.. क्या वे अकोला की आबोहवा के बारे में सोच रही होंगी..? या फिर सलुम्बर में उन के हम उम्र लोगो से विदा होने के दुःख को महसूस कर रही होंगी..? मै कुछ समझ नही पाया.. किसी नतीजे पर पहुँच नही पाया।

सब तैयारी पूरी हो गयी थी.. सामान बांध लिया था.. जाने का समय करीब आ गया था मगर दादी जी मे उत्साह जरा भी नही था अकोला आने का.. नही तो आम तौर पर वे समय से कितने ही घँटे पहले तैयार हो जाती थी और सब को चेताती थी की जल्दी करो.. गाडी कही छूट न जाए.. मगर आज ऐसा कुछ नही था।

उलट मुझे ही कहना पड़ा दादी जी जल्दी करो.. गाडी का समय हो गया है.. वे अनमने ढंग से बाहर निकली.. भरी भरी निगाहो से घर को देख रही थी.. दरवाजे को छु रही थी.. मैने घर के सभी दरवाजे बंद कर सामान उठा कर आगे बढ़ा.. कुछ कदम चलने के बाद मुझे अहसास हुआ की दादी जी वही खड़ी है.. चल नही रही है।

मैने पलट कर देखा दादी जी अपने घर को देख रही है.. अपने घर को.. हा.. उन के घर को.. यह घर तो उन्होंने ही तो बनाया है.. यह उन का ही घर था.. यह उन के मेहनत की कमाई से बना घर था.. एक एक पैसा बचा कर जमा किये धन से बना घर था.. यह उन के सपनो का घर था.. यह दादी जी का घर था।

मजदूरो के साथ स्वयं मजदूरी कर के बनाया गया घर था.. उन्हें दुःख हो रहा था घर से दूर जाने का.. सारी उम्र उन का राज चला जिस घर में उसे छोड़ कर जाने में उन्हें बहुत तकलीफ हो रही थी.. परिवार के सभी फैसले वे यही बैठ कर किया करती थी।

तमाम जीवन जहाँ आंनद से गुजरा अब जीवन के अंतिम क्षणों में वहा से दूर जाना उन्हें नागवार लग रहा था.. उन के आंतरिक भावो को मै समझ रहा था.. उन के मन में मची धमाल को मै महसूस कर रहा था.. अभी भी उन की निगाहे घर पर से हटने को तैयार नही थी।

मैने बनावटी उग्रता दिखाई तो दादी जी छड़ी को खटखटाते हुए आगे बढी.. पुरे सफर में वे लगभग मोन ही रही.. मै इधर उधर की बाते कर उनका जी बहलाने की कोशिश करने लगा तो मुझे डाँट कर चुप करा दिया.. बोली की इतना बड़ा हो गया है.. न जाने तुजे कब अक्ल आएँगी..? चुप नही बैठ सकता..! दादी जी की बात सुन पास बैठे मुसाफिर मुस्करा पड़े.. मै मुँह लटका कर चुपचाप बैठ गया।

और फिर कुछ महीनो बाद दादी जी अस्वस्थ रहने लगी.. इतनी अस्वस्थ की पलंग से ही उन का नाता जुड़ गया.. वे इतनी कमजोर हो गयी थी हर बात में परिवार के लोगो पर निर्भर हो गयी.. खाना पीना छूटने लगा और फिर एक दिन वे चली गयी.. भगवान को प्यारी हो गयी.. नश्वर संसार से नाता तोड़ गयी.. जीवन के गहरे अनुभवो को मौत ने सदा सदा के लिए निगल लिया.. हमारे परिवार का मुखिया चल बसा।

दादी जी के मृत्यु उपरांत संस्कार करने के लिए हम लोग सलूम्बर गए.. घर का ताला खोलेते खोलते मेरे दिमाग में हजारो सूर्यो की रौशनी चमकी.. ओह तो यह बात थी.. उस दिन दादी जी को अहसास हो गया था की वो कभी इस घर में वापस नही आएँगी.. कभी नही आएँगी.. अपनी मौत को उन्होंने महीनो पहले ही सूंघ लिया था।

उन्हें अहसास हो गया था की यह सफर जिंदगी का अंतिम सफर है.. इस के बाद तो उन्हें अनंत सफर पर जाना है.. वे जी भर कर अपने बनाये घर को देख लेना चाहती थी.. वे उस घर के मोह से आझाद नही हुयी थी जहा की सालो पहले मेहँदी रचे हाथो के साथ दादाजी के साथ ब्याही गयी थी।

उन यादो से उन का मन मस्तिक उथल पुथल था जो की उन की जीवनभर की पूँजी थी.. घर को एकटक देखना सहज था.. सालो के मोह से टूटना इतना आसान न था.. वे माँ थी.. ममता से भरी ह्दय वाली.. स्नेह बच्चों के लिए भी अपार था.. प्रेम घर के लिए भी कोई कम न था।

वे अश्रुपूरित निगाहो से घर को देखती रही.. वे डबडबाई आँखों से घर को ह्दय में बसाती रही.. उन के मन के दर्द को तब मै समझ न सका.. उन के भीतर के तूफान को समझ न सका.. तूफान.. घर से दूर होने का.. तूफान.. घर से बिछड़ने का.. तूफान.. इस अहसास का की इस घर में फिर कभी नही आना है।

कभी नही.. कभी नही.. और सच ही तो हुआ ये.. वे अकोला ही रह गयी.. अकोला की माटी में ही समा गयी.. सलुम्बर का उन का घर अकेला रह गया.. ताला खोल कर जैसे ही पहला कदम रखा घर के भीतर से जोर से आवाज आयी.. ऐ दादी जी कहा है..? मेरे कानो में मानो किसी ने सीसा सा घोल दिया।

लगा की घर ही बोल रहा हे.. घर की दीवारे मुझे घूरती सी प्रतीत हो रही थी.. आवाज क्रमशः तेज होती गयी.. दादी जी कहा है.. दादी जी कहा है.. मैने झोले में से दादी जी की तस्वीर निकाली और एक खिले पर टाँग दी।

तस्वीर पर दादी जी की फोटो के निचे लिखा था.. स्व. दादी जी श्रीमती हिम्मत बाई साकरचन्द जी तोरावत जैन.. मृत्यु 7 फ़रवरी 2012.. घर की दीवारो से उठता शोर अचानक बंद हो गया.. अनेक अनेक धन्यवाद.

रमेश तोरावत जैन
अकोला

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